मानसरोवर भाग 1

11 – मूठ

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

………….

डॊक्टर जयपाल ने प्रथम श्रेणी की सनद पायी थी, पर इसे भाग्य कहिए या व्यावसायिक
सिद्धांतों का अज्ञान कि उन्हें अपने व्यवसाय में कभी उन्नत अवस्था न मिली । उनका
घर सँकरी गली में था; पर उनके जी में खुली जगह में घर लेने का कभी विचार तक न उठा
औषधालय की आलमारियाँ,शीशियाँ और डॊक्टरी यंत्र आदि भी साफ-सुथरे न थे । मितव्ययिता
के सिद्धांत का वह अपनी घरेलू बातों में भी बहुत ध्यान रखते थे ।
लड़का जवान हो गया था, पर अभी उसकी शिक्षा का प्रश्न सामने न आया था । सोचते थे
कि इतने दिनों तक पुस्तकों से सर मार कर मैंने ऐसी कौन सी बड़ी सम्पत्ति पा ली, जो
उसके पढ़ाने-लिखाने में हजारों रुपये बर्बाद करूँ उनकी पत्नी अहिल्या धैर्यवान
महिला थी, पर डॊक्टर साहब ने उसके इन गुणों पर इतना बोझ रख दिया था कि उसकी
कमर भी झुक गई थी । माँ भी जीवित थी, पर गंगास्नान के लिए तरस-तरस कर रह जाती
थी ; दूसरे पवित्र स्थानों की चर्चा ही क्या ! इस क्रूर मितव्ययिता का परिणाम यह था
कि इस घर में सुख और शांति का नाम न था । अगर कोई मद फुटकल थी तो यह
बुढ़िया महरी जगिया थी । उसने डॊक्टर साहब को गोद में खिलाया था और उसे इस घर
से ऐसा प्रेम हो गया था कि सब प्रकार की कठिनाइयाँ झेलती थी, पर टलने का नाम न लेती
थी ।

(2)

डॊक्टर साहब डॊक्टरी आय की कमी की कपड़े और शक्कर के कारखानों में हिस्से ले कर
पूरा करते थे । आज संयोगवश बम्बई के कारखाने ने इनके पास वार्षिक लाभ के साढ़े
सात सौ रूपये भेजे । डॊक्टर साहब ने बीमा खोला, नोट गिने, डाकिये को बिदा किया, पर
डाकिये के पास रुपये अधिक थे, बोझ से दबा जाता था । बोला – हुजूर रुपये ले लें और
मुझे नोट दे दें तो बड़ा एहसान हो, बोझ हलका हो जाय । डाक्टर साहब डाकियों को
प्रसन्न रखा करते थे, उन्हें मुफ्त दवाइयाँ दिया करते थे ।
सोचा कि हाँ, मुझे बैंक जाने के लिए ताँगा मँगाना ही पड़ेगा, क्यों न बिन कौड़ी के
उपकार वाले सिद्धान्त से काम लूं । रुपये गिन कर एक थैली में रख दिये और सोच ही रहे
थे कि चलूँ इन्हें बैंक में रखता आऊँ कि एक रोगी ने बुला भेजा । ऐसे अवसर यहाँ कदा
चित ही आते थे । यद्यपि डॊक्टर साहब को बक्स पर भरोसा न था, पर विवश हो कर थैली
बक्स में रखी और रोगी को देखने चले गये । वहाँ से लौटे तो तीन बज चुके थे,
बैंक बंद हो चुका था । आज रूपये किसी तरह जमा न हो सकते थे । प्रतिदिन की भाँति
औषधालय में बैठ गये । आठ बजे रात को जब घर के भीतर जाने लगे, तो थैली को घर ले
जाने के लिए बक्स से निकाला, थैली कुछ हलकी जान पड़ी, तत्काल उसे दवाइयों के तराजू
पर तौला, होश उड़ गये । पूरे पाँच सौ रुपये कम थे । विश्वास न हुआ । थैली खोल कर
रुपये गिने । पाँच सौ रुपये कम निकले । विक्षिप्त अधीरता के साथ बक्स के दूसरे
खानों को टटोला परंतु व्यर्थ ! निराश होकर एक कुरसी पर बैठ गये और स्मरण-शक्ति को
एकत्र करने के लिए आँखें बन्द कर दी और सोचने लगे, मैंने रुपये कहीं अलग तो नहीं
रखे, डाकिये ने रुपये कम तो नहीं दिये, मैंने गिनने में भूल तो नहीं की, मैंने पचीस
पचीस रुपये कि गड्डियाँ लगायी थीं, पूरी तीस गड्डियाँ थीं, खूब याद है । मैंने
एक-एक गड्डी गिन कर थैली में रखी, स्मरण-शक्ति मुझे धोखा नहीं दे रही है ।
सब मुझे ठीक-ठीक याद है । बक्स का ताला भी बंद कर दिया था, किंतु ओह, अब
समझ में आ गया, कुँजी मेज पर ही छोड़ दी, जल्दी के मारे उसे जेब में रखना भूल
गया, वह अभी तक मेज पर पड़ी है । बस यही बात है, कुंजी जेब में डालने की याद
नहीं रही, परंतु ले कौन गया, बाहर दरवाजे बंद थे । घर में धरे रुपये-पैसे कोई छूता
नहीं, आज तक कभी ऐसा अवसर नहीं आया । अवश्य यह किसी बाहरी आदमी का काम
है । हो सकता है कोई दरवाजा खुला रह गया हो, कोई दवा लेने आया हो ,कुंजी मेज पर
पड़ी देखी हो और बक्स खोल कर रुपये निकाल लिये हो ।
इसी से मैं रुपये नहीं लिया करता, कौन ठिकाना डाकिये की ही करतूत हो, बहुत सम्भव
है, उसने मुझे बक्स में थैली रखते देखा था । ये रुपये जमा हो जाते तो मेरे पास पूरे
हजार रुपये हो जाते, ब्याज जोड़ने में सरलता होती ।
क्या करूँ । पुलिस को खबर दूँ ? व्यर्थ बैठे -बिठाये उलझन मोल लेनी है । टोले भर के
आदमियों की दरवाजे पर भीड़ होगी । दस-पाँच आदमियों को गालियाँ खानी पड़ेंगी और फल
कुछ नहीं ! तो क्या धीरज धर कर बैठ रहूँ ? कैसे धीरज धरूँ ! यह कोई सेंतमेंत मिला
धन तो था नहीं, हराम की कौड़ी होती तो समझता कि जैसे आयी, वैसे गयी। यहाँ एक एक
पैसा पसीने का है । मैं जो इतनी मितव्ययिता से रहता हूँ, इतने कष्ट से रहता हूँ,
कंजूस प्रसिद्ध हूँ, घर के आवश्यक व्यय में काट-छाँट करता हूँ, क्या इसीलिए कि
किसी उचक्के के लिए मनोरंजन का सामान जुटाऊँ ? मुझे रेशम से घृणा नहीं, न मेवे ही
अरुचि कर हैं , न अजीर्ण का रोग है कि मलाई खाऊँ और अनपच हो जाय, न
आँखों में दृष्टि कम है कि थियेटर और सिनेमा का आनन्द न उठा सकूँ । मैं सब ओर से
अपने मन को मारे रहता हूँ, इसीलिए तो कि मेरे पास चार पैसे हो जायँ, काम पड़ने पर
किसी के आगे हाथ फैलाना न पड़े । कुछ जायदाद ले सकूँ, और नहीं तो अच्छा घर ही
बनवा लूँ । पर इस मन मारने का यह फल ! गाढ़े परिश्रम के रुपये लुट जायँ ।
अन्याय है कि मैं यों दिन दहाड़े लुट जाऊँ और उस दुष्ट का बाल भी टेढ़ा न हो ।
उसके घर दीवाली हो रही होगी , आनन्द मनाया जा रहा होगा, सब के सब बगलें बजा
रहे होंगे ।
डॊक्टर साहब बदला लेने के लिए व्याकुल हो गये । मैंने कभी किसी फकीर को,
किसी साधु को, दरवाजे पर खड़ा होने नहीं दिया । अनेक बार चाहने पर भी मैंने कभी
मित्रों को अपने यहाँ निमंत्रित नहीं किया, कुटुम्बियों और संबंधियों से सदा बचता
रहा, क्या इसीलिए । उसका पता लग जाता तो मैं एक विषैली सूई से उसके जीवन का
अंत कर देता ।
किंतु कोई उपाय नहीं है । जुलाहे का गुस्सा दाढ़ी पर । गुप्त पुलिसवाले भी बस नाम
ही के हैं पता लगाने की योग्यता नहीं । इनकी सारी अक्ल राजनीतिक व्याख्यानों और
झूठी रिपोर्टों के लिखने में समाप्त हो जाती है । किसी मेस्मेरिजम जानने वाले के
पास चलूँ, वह इस उलझन को सुलझा सकता है । सुनता हूँ यूरोप और अमेरिका में
बहुधा चोरियों का पता इसी उपाय से लग जाता है । पर यहाँ ऐसा मेस्मेरिजम का पंडित
कौन है और फिर मेस्मेरिजम के उत्तर सदा विश्वनीय नहीं होते । ज्योतिषियों के समान
के भी अनुमान और अटकल के अनंत-सागर में डुबकियाँ लगाने लगते हैं ।
कुछ लोग नाम भी तो निकालते हैं । मैंने कभी उन कहानियों पर विश्वास नहीं किया,
परन्तु कुछ न कुछ इसमें तत्व हैं अवश्य, नहीं तो इस प्रकृति-उपासना के युग में
इनका अस्तित्व ही न रहता । आजकल के विद्वान भी तो आत्मिक-बल का लोहा मानते हैं,
पर मान लो किसी ने नाम बतला ही दिया तो मेरे हाथ में बदला चुकाने का कौन-सा उपाय
है, अंतर्ज्ञान साक्षी का नाम नहीं दे सकता । एक क्षण के लिए मेरे जी को शांति मिल
जाने के सिवाय और इनसे क्या लाभ है ?
हाँ खूब याद आया । नदी की ओर जाते हुए वह जो एक ओझा बैठता है, उसके करतब
की कहानियाँ प्रायः सुनने में आती हैं । सुनता हूँ, गये हुए धन का पता बतला देता है
रोगियों को बात की बात में चंगा कर देता है, चोरी के माल का पता लगा देता है,
मूठ चलाता है । मूठ की बड़ी बढ़ाई सुनी है, मूठ चली और चोर के मुँह से रक्त जारी
हुआ, जब तक वह माल न लौटा दे रक्त बन्द नहीं होता । यह निशाना बैठ जाय तो मेरी
हार्दिक इच्छा पूरी हो जाय! मुँह माँगा फल पाऊँगा । रूपये भी मिल जायँ, चोर को
शिक्षा भी मिल जाय ! उसके यहाँ सदा लोगों की भीड़ लगी रहती है । उसमें कुछ करतब
न होता तो इतने लोग क्यों जमा होते ? उसकी मुखाकृति से एक प्रतिभा बरसती है ।
आजकल के शिक्षित लोगों को तो इन बातों पर विश्वास नहीं है । पर नीच और मूर्ख मंडली
में उसकी बहुत चर्चा है । भूति-प्रेत आदि की कहानियाँ प्रतिदिन ही सुना करता हूँ ।
क्यों न उसी ओझे के पास चलूँ ? मान लो कोई लाभ न हुआ तो हानि ही क्या हो जायगी ।
जहाँ पाँच सौ गये है; दो-चार रुपये का खून और सही । यह समय भी अच्छा है । भीड़ कम
होगी, चलना चाहिए ।

(3)

जी में यह निश्चय करके डाक्टर साहब उस ओझे के घर की ओर चले; जाड़े की रात थी ।
नौ बज गये थे । रास्ता लगभग बन्द हो गया था । कभी कभी घरों से रामायण की ध्वनि
कानों में आ जाती थी । कुछ देर के बाद बिलकुल सन्नाटा हो गया रास्ते के दोनों ओर
हरे-भरे खेत थे । सियारों का हुँआना सुन पड़ने लगा । जान पड़ता है, इनका दल कहीं
पास ही है । डाक्टर साहब को प्रायः दूर से इनका सुरीला स्वर सुनने का सौभाग्य हुआ
था । पास से सुनने का नहीं ।
इस समय इस सन्नाटे में और इतने पास से उनका चीखना सुन कर उन्हें डर लगा । कई बार
अपनी छड़ी धरती पर पटकी, फैर धमधमाये । सियार बड़े डरपोक होते हैं । आदमी के पास
नहीं आते; पर फिर संदेह हुआ, कहीं इनमें कोई पागल हों तो उसका काटा तो बचता ही नहीं
। यह संदेह होते ही कीटाणु बेक्टिरिया, पास्टयार इन्स्टिट्यूट और कसौली की याद उनके
मस्तिष्क में चक्कर काटने लगी । वह जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाये चले जाते थे । एकाएक जी
में विचार उठा- कहीं मेरे ही घर में किसी ने रुपये उड़ा लिये हों तो । वे तत्काल
ठिठक गये, पर एक ही क्षण में उन्होंने इसका भी निर्णय कर लिया, क्या हर्ज है, घर
वालों को तो और भी कड़ा दंड मिलना चाहिए ।चोर की मेरे साथ सहानुभूति नहीं हो सकती
पर घरवालों की सहानुभूति का मैं अधिकारी हूँ।उन्हें जानना चाहिए कि में जो कुछ करता
हूँ, उन्हीं के लिए करता हूँ । रात-दिन मरता हूँ तो उन्हीं के लिए मरता हूँ । यदि
इस पर भी वे मुझे यों धोखा देने के लिए तैयार हों तो उनसे अधिक कृतघ्न, उनसे अधिक
अकृतज्ञ, उनसे अधिक निर्दय और कोई होगा ? उन्हें और भी कड़ा दंड मिलना चाहिए ।
इतना कड़ा, इतना शिक्षाप्रद कि फिर कभी किसी को ऐसा करने का साहस न हो ।
अंत में वे ओझे के घर के पास जा पहुँचे । लोगों की भीड़ न थी । उन्हें बड़ा संतोष
हुआ । हाँ, उनकी चाल कुछ धीमी पड़ गयी । फिर जी में कहीं यह सब ठकोसला हो
तो व्यर्थ लज्जित होना पड़े । जो सुने मूर्ख बनाये । कदाचित् ओझा ही मुझे तुच्छ
बुद्धि समझे । पर अब तो आ गया, यह तजरबा भी हो जाय । और कुछ न होगा तो सही
जाँच ही सही । ओझा का नाम बुद्धू था । लोग चौधरी कहते थे । जाति का चमार था ।
छोटा सा घर और वह भी गन्दा । छप्पर इतनी नीची थी कि झुकने पर भी टक्कर लगने
का डर लगता था । दरवाजे पर एक नीम का पेड़ था, उसके नीचे एक चौरा । नीम के
पेड़ पर एक झंडी लहराती थी । चौरा पर सैकड़ों हाथी सिंदूर से रँगे हुए खड़े थे । कई
लोहे के नोकदार त्रिशूल भी गड़े थे, जो मानो इन मंद गति हाथियों के लिये अंकुश का
काम दे रहे थे । दस बजे थे । बुद्धू चौधरी जो एक काले रंग का तोंदीला और रोबदार
आदमी था, एक फटे हुए टाट पर बैठा नारियल पी रहा था । बोतल और गिलास भी सामने
रखे हुए थे ।
बुद्धू ने डाक्टर साहब को देखकर तुरंत बोतल छिपा दी और नीचे उतर कर सलाम किया ।
घर से एक बुढ़िया ने मोढ़ा लाकर उनके लिए रख दिया । डाक्टर साहब ने कुछ झेंपते हुए
सारी घटना कह सुनायी । बुद्धू ने कहा, हुजूर, यह कौन बड़ा काम है । अभी इतवार
को दारोगाजी की घड़ी चोरी गयी थी, बहुत कुछ तहकीकात की, पता न चला । मुझे बुलाया ।
मैंने बात की बात में पता लगा दिया । पाँच रुपये इनाम दिये । कल की बात है, जमादार
साहब की घोड़ी खो गई थी । चारों तरफ दौड़ते फिरते थे । मैंने ऐसा पता बता दिया कि
घोड़ी चरती हुई मिल गयी । इसी विद्या की बदौलत हजूर हुक्काम सभी जानते हैं ।
डाक्टर को दारोगा और जमादार की चर्चा न रुचि । इन सब गँवारों की आँखों में जो कुछ
है , वह दारोगा और जमादार ही हैं । बोले -मैं केवल चोरी का पता लगाना नहीं चाहता,
मैं चोर को सजा देना चाहता हूँ ।
बुद्धू ने एक क्षण के लिए आँखे बंद कीं, जमुहाइयाँ लीं, चुटकियाँ बजायीं और फिर कहा
यह घर ही के किसी आदमी का काम है ।
डाक्टर – कुछ परवाह नहीं, कोई हो ।
बुढ़िया – पीछे से कोई बात बने या बिगड़ेगी तो हुजूर हमीं को बुरा कहेंगे ।
डाक्टर – इसकी तुम चिंता न करो, मैंने खूब सोच-विचार लिया है । बल्कि घर के
किसी आदमी की शरारत है तो मैं उसके साथ और भी कड़ाई करना चाहता हूँ ।
बाहर का आदमी मेरे साथ छल करे तो क्षमा के योग्य है, पर घर के आदमी को मैं किसी
प्रकार क्षमा नहीं कर सकता ।
बुद्धु – तो हुजूर क्या चाहते है ?
डाक्टर – बस यही कि मेरे रुपये मिल जायँ और चोर किसी बड़े कष्ट में पड़ जाय ।
बुद्धू – मूठ चला दूँ ?
बुढ़िया – ना बेटा, मूठ के पास न जाना । न जाने कैसी पड़े, कैसी न पड़े ।
डाक्टर – तुम मूठ चला दो, इसका जो कुछ मेहनताना और इनाम हो, मैं देने के
लिए तैया हूँ ।
बुढ़िया – बेटा, मैं फिर कहती हूँ, मूठ के फेर में मत पड़ । कोई जोखम की बात आ
पड़ेगी तो वह बाबू जी फिर तेरे सिर होंगे और तेरे बनाये कुछ न बनेगी । क्या जानता
नहीं, मूठ का उतार कितना कठिन है ?
बुद्धू – हाँ बाबूजी ! फिर एक बार सोच लीजिए । मूठ तो मैं चला दूँगा , लेकिन उसको
उतारने का जिम्मा मैं नहीं ले सकता ।
डाक्टर – अजी कह तो दिया, मैं तुमसे उतारने को न कहूँगा, चलाओ भी तो ।
बुद्धू ने आवश्यक सामान की एक लम्बी तालिका बनायी । डाक्टर साहब ने सामान
की अपेक्षा रुपया देना अधिक उचित समझा । बुद्धू राजी हो गया । डॊक्टर साहब चलते
चलते बोले – ऐसा मंतर चलाओ कि सबेरा होते-होते चोर मेरे सामने माल लिये आ जाय ।
बुद्धू ने कहा आप निसा खातिर रहें ।

(4)

डाक्टर साहब वहाँ से चले तो ग्यारह बजे थे । जाड़े की रात, कड़ाके की ठंड थी ।
उनकी माँ और स्त्री दोनों बैठी हुई उनकी राह देख रही थीं । जी को बहलाने के लिए
बीच में एक अँगीठी रख ली थी, जिसका प्रभाव शरीर की अपेक्षा विचार पर अधिक पड़ता
था । यहाँ कोयला विलास्य पदार्थ समझा जाता था । बुढ़िया महरी जगिया वहीं फटाफट
टाट का टुकड़ा ओढ़े पड़ी थी । वह बार-बार उठ कर अपनी अँधेरी कोठरी में जाती, आले पर
कुछ टटोल कर देखती और फिर अपनी जगह पर आ कर पड़ रहती । बार-बार पूछती,
कितनी रात गयी होगी । जरा भी खटका होता तो चौंक पड़ती और चिंतित दृष्टि से इधर-
उधर देखने लगती । आज डाक्टर साहब ने नियम के प्रतिकूल क्यों इतनी देर लगायी,
इसका सबको आश्चर्य था । ऐसे अवसर बहुत कम आते थे । कि उन्हें रोगियों को देखने
के लिए रात को जाना पड़ता हो । यदि कुछ लोग उनकी डाक्टरी के कायल भी थे, तो वे
रात को उस गली में आने का साहस न करते थे । सभा-सोसाइटियों में जाने को उन्हें रुचि
न थी । मित्रों से भी उनका मेलजोल न था । माँ ने कहा – जाने कहाँ चला गया, खाना
बिलकुल पानी हो गया ।
अहिल्या – आदमी जाता है तो कह कर जाता है, आधी रात से ऊपर हो गयी ।
माँ – कोई ऐसी ही अटक हो गयी, नहीं तो वह कब घर से बाहर निकलता है ?
अहिल्या – मैं तो अब सोने जाती हूँ, उनका जब जी चाहे आयें । कोई सारी रात
बैठा पहरा देगा । यही बातें हो रही थी कि डॊक्टर साहब घर आ पहुँचे । अहिल्या सँभल
बैठी; जगिया उठकर खड़ी हो गयी और उनकी ओर सहमी हुई आँखों से ताकने लगी ।
माँ ने पूछा – आज कहाँ इतनी देर लगा दी ?
डॊक्टर – तुम लोग तो सुख से बैठी हो न ! हमें देर हो गयी, इसकी तुम्हें क्या
चिंता ! जाओ, सुख से सोओ,इन ऊपरी दिखावटी बातों से मैं धोखे में नहीं आता । अवसर
पाओ तो गला काट लो, इस पर चली हो बात बनाने !
माँ ने दुःखी हो कर कहा – बेटा ! ऐसी जी दुखाने वाली बातें क्यों करते हो । घर में
तुम्हारा कौन बैरी है जो तुम्हारा बुरा चेतेगा ?
डाक्टर – मैं किसी को अपना मित्र नहीं समझता, सभी मेरे बैरी हैं , मेरे प्राणों के
ग्राहक हैं । नहीं तो क्या आँख ओझल होते ही मेरी मेज से पाँच सौ रुपये उड़ जायँ,
दरवाजे बाहर से बंद थे, कोई गैर आया नहीं, रुपये रखते ही उड़ गये । जो लोग इस
तरह मेरा गला काटने पर उतारू हों, क्योंकर अपना समझूँ । मैंने खूब पता लगा लिया
है, अभी एक ओझे के पास से चला आ रहा हूँ ।
उसने साफ कह दिया कि घर के ही किसी आदमी का काम है । अच्छी बात है,
जैसी करनी वैसी भरनी । मैं भी बता दूँगा कि मैं अपने बेरियों का शुभ चिंतक नहीं
हूँ । यदि बाहर का आदमी होता तो कदाचित मैं जाने भी देता । पर घर के आदमी
जिनके लिए रात-दिन चक्की पीसता हूँ, मेरे साथ ऐसा छल करे तो वे इसी योग्य हैं कि
उनके साथ जरा भी रियायत न की जाय । देखना सबेरे तक चोर की क्या दशा होती है ।
मैंने ओझे से मूठ चलाने को कह दिया है । मूठ चली और उधर चोर के प्राण संकट में
पड़े ।
जगिया घबड़ा कर बोली – भइया, मूठ में जान जोखम है ।
डॊक्टर – चोर की यही सजा है ।
जगिया – किस ओझे ने चलाया है ?
डॊक्टर – बुद्धू चौधरी ने ।
जगिया – अरे राम, उसकी मूठ का तो कोई उतार ही नहीं ।
डॊक्टर अपने कमरे में चले गये, तो माँ ने कहा सूम का धन शैतान खाता है ।
पाँच सौ रुपया कोई मुँह मार कर ले गया । इतने में तो मेरे सातों धाम हो जाते ।
अहिल्या बोली – कंगन के लिए बरसों से झींक रही हूँ, अच्छा हुआ, मेरी आह पड़ी है ।
माँ – भला घर में उसके रुपये कौन लेगा ?
अहिल्या – किवाड़ खुले होंगे, कोई बाहरी आदमी उड़ा ले गया होगा ।
माँ – उसको विश्वास कैसे आ गया कि घर ही के किसी आदमी ने रुपया चुराये हैं ।
अहिल्या – रुपये का लोभ आदमी को शक्की बना देता है ।

(5)

रात को एक बजा था । डॊक्टर जयपाल भयानक स्वप्न देख रहे थे । एकाएक अहिल्या ने
आकर कहा – जरा चल कर देखिए, जगिया का क्या हाल हो रहा है । जान पड़ता है,
जीभ ऐंठ गयी । कुछ बोलती ही नहीं, आँखें पथरा गयी हैं ।
डाक्टर चौंक कर उठ बैठे । एक क्षण तक इधर-उधर ताकते रहे; मानो सोच रहे थे,
यह भी स्वप्न तो नहीं है । तब बोले क्या कहा जगिया को क्या हो गया ?
अहिल्या ने फिर जगिया का हाल कहा । डॊक्टर के मुख पर हल्की-सी मुस्कराहट
दौड़ गयी । बोले -चोर पकड़ गया । मूठ अपना काम किया ।
अहिल्या – और जो घर ही के किसी आदमी ने ले लिये होते ?
डाक्टर – तो उसकी भी यही दशा होती, सदा के लिए सीख जाता ।
अहिल्या – पाँच सौ रुपये के पीछे प्राण ले लेते ?
डाक्टर – पाँच सौ रुपये के लिए नहीं, आवश्यकता पड़े तो पाँच हजार खर्च कर सकता हूँ,
केवल छल-कपट का दंड देने के लिए ।
अहिल्या – बड़े निर्दयी हो ।
डॊक्टर – तुम्हें सिर से पैर तक सोने से लाद दूँ तो मुझे भलाई का पुतला समझने लगो,
क्यों ? खेद है कि मैं तुमसे यह सनद नहीं ले सकता ।
यह कहते हुए जगिया की कोठरी में गये ।
उसकी हालत उससे कहीं अदिक खराब थी जो अहिल्या ने बतायी थी । मुख पर मुर्दानी छायी
हुई थी, हाथ पैर अकड़ गये थे, नाड़ी का कहीं पता न था । उसकी माँ उसे होश में लाने
के लिए बार-बार उसके मुँह पर पानी के छींटे दे रही थी । डाक्टर ने यह हालत देखी तो
होश उड़ गये । उन्हें अपने उपाय की सफलता पर प्रसन्न होना चाहिए था । जगिया ने
रुपये चुराये, इसके लिए अब अधिक प्रमाण की आवश्यकता न थी ; परंतु मूठ इतनी प्रभाव
डालने वाली और घातक वस्तु है, इसका उन्हें अनुमान भी न था । वे चोर की एड़ियाँ
रगड़ते, पीड़ा से कराहते और तड़पते देखना चाहते थे । बदला लेने की इच्छा आशातीत सफल
हो रही थी; परंतु वह नमक की अधिकता थी,जो कौर को मुँह के भीतर धँसने नहीं देती ।
यह दुःखमय दृश्य देखकर प्रसन्न होने के बदले उनके हृदय पर चोट लगी । रोब में हम
अपनी निर्दयता और कठोरता का भ्रममूलक अनुमान कर लिया करते हैं । प्रत्यक्ष घटना
विचार से कहीं अधिक प्रभावशालिनी होती है । रणस्थल का विचार कितना कवित्वमय है ।
युद्धावेश का काव्य कितनी गर्मी उत्पन्न करने वाला है । परन्तु कुचले हुए शव के कटे
हुए अंग-प्रत्यंग देखकर कौन मनुष्य है, जिसे रोमांच न होने आवे । दया मनुष्य का
स्वाभाविक गुण है ।
इसके अतिरिक्त इसका उन्हें अनुमान न था कि जगिया जैसी दुर्बल आत्मा मेरे रोष पर
बलिदान होगी । वह समझते थे, मेरे बदले का वार किसी सजीव मनुष्य पर होगा; यहाँ तक कि
वे अपनी स्त्री और लड़के को भी इस वार के योग्य समझते थे । पर मरे को मारना, कुचले
को कुचलना, उन्हें अपना प्रतिघात मर्यादा के विपरीत जान पड़ा । जगिया का यह काम
क्षमा के योग्य था । जिसे रोटियों के लाले हों, कपड़ों को तरसे, जिसकी आकांक्षा का
भवन सदा अंधकार मय रहा हो । जिसकी इच्छायें कभी पूरी न हुई हों, उसकी नीयत बिगड़
जाय तो आश्चर्य की बात नहीं । वे तत्काल औषधालय में गये, होश में लाने की जो अच्छी-
अच्छी औषधियाँ थीं, उनको मिला कर एक मिश्रित नयी औषधि बना लाये , जगिया के गले
में उतार दी ।
कुछ लाभ न हुआ । तब विद्युत यंत्र ले आये और उसकी सहायता से जगिया को होश में लाने
का यत्न करने लगे । थोड़ी ही देर में जगिया की आँखें खुल गयीं । उसने सहमी हुई
दृष्टि डॊक्टर साहब को देखा, जैसे लड़का अपने अध्यापक की छड़ी की ओर देखता है,
और उखड़े हुए स्वर से बोली – हाय राम, कलेजा फूँका जाता है, अपने रुपये ले ले,
आले पर एक हाँडी है, उसी में रखे हुए हैं, मुझे अंगारों से मत जला । मैंने तो यह
रुपये तीरथ करने के लिए चुराये थे । क्या तुझे तरस नहीं आता, मुट्ठी भर रुपयों
के लिए मुझे आग में जला रहा है, मैं तुझे काला न समझती थी । हाय राम !
यह कहते कहते वह फिर मूर्छित हो गई, नाड़ी बंद हो गयी, ओठ नीले पड़ गये, शरीर
के अंगों में खिंचाव होने लगा । डॊक्टर ने दीन भाव से अहिल्या की ओर देखा और
बोले – मैं तो अपने सारे उपाय कर चुका, अब इसे होश लाना मेरी सामर्थ्य के बाहर है ।
मैं क्या जानता था कि यह अभागी मूठ इतनी घातक होती है । कहीं इसकी जान पर बन
गयी तो जीवन भर पछताना पड़ेगा । आत्मा की ठोकरों से कभी छुटकारा न मिलेगा । क्या
करूँ बुद्धि कुछ काम नहीं करती ।
अहिल्या – सिविल सर्जन को बुलाओ, कदाचित वह कोई अच्छी दवा दे दे किसी को जान-बूझ
कर आग में ढकेलना न चाहिए ।
डाक्टर – सिविल सर्जन इससे अधिक और कुछ नहीं कर सकता, जो मैं कर चुका ।
हर घड़ी इसकी दशा और गिरती जाती है, न जाने हत्यारे ने कौन सा मंत्र चला दिया ।उसकी
माँ मुझे बहुत समझाती रही, पर मैंने क्रोध में उसकी बातों की जरा भी परवाह न की ।
माँ – बेटा, तुम उसी को बुलाओ जिसने मंत्र चलाया; पर क्या किया जायगा । कहीं मर गयी
तो हत्या सिर पर पड़ेगी । कुटुम्ब को सदा सतायेगी ।

(6)

दो बज रहे थे, ठंडी हवा हड्डियों में चुभी जाती थी । डॊक्टर लम्बे पाँवों बुद्धू
चौधरी के घर की ओर चले जाते थे । इधर-उधर व्यर्थ आँखे दौड़ाते थे कि कोई एक्का या
ताँगा मिल जाय । उन्हें मालूम होता था कि बुद्धू का घर बहुत दूर हो गया है । कई बार
धोखा हुआ, कहीं रास्ता तो नहीं भूल गया ।
कई बार इधर आया हूँ , यह बाग तो कभी नहीं मिला, यह लेटर-बक्स भी सड़क पर
कभी नहीं देखा, यह पुल तो कदापि न था, अवश्य राह भुल गया । किससे पूछूँ । वे
अपनी स्मरण-शक्ति पर झुँझलाये और उसी ओर थोड़ी दूर तक दौड़े । पता नहीं, दुष्ट इस
समय मिलेगा भी या नहीं, शराब में मस्त पड़ा होगा । कहीं इधर बेचारी चल न बसी हो ।
कई बार इधर-उधर घूम जाने का विचार हुआ पर अंतःप्रेरणा ने सीधी राह से हटने न
दिया । कई बार इधर-उधर घूम जाने का विचार हुआ पर अंतःप्रेरणा ने सीधी राह से हटने
न दिया । यहाँ तक कि बुद्धू का घर दिखाई पड़ा । डाक्टर जयपाल की जान में जान आयी।
बुद्धू के दरवाजे पर जा कर जोर से कुंडी खटखटायी । भीतर से कुत्ते ने असभ्यतापूर्ण
उत्तर दिया, पर किसी आदमी का शब्द न सुनायी दिया । फिर जोर-जोर से किवाड़ खट
खटाये कुत्ता और भी तेज पड़ा, बुढ़िया की नींद टूटी । बोली – यह कौन इतनी रात गये
किवाड़ तोड़े डालता है ?
डाक्टर – मैं हूँ, जो कुछ देर हुई तुम्हारे पास आया था ।
बुढ़िया ने बोली पहचानी, समझ गयी इनके घर के किसी आदमी पर विपद पड़ी, नहीं तो
इतनी रात गये क्यों आते; पर अभी तो बुद्धू ने मूठ चलाई नहीं । उसका असर क्यों कर
हुआ, समझाती थी तब न माने । खूब फँसे । उठकर कुप्पी जलायी और उसे लिये बाहर
निकली । डॊक्टर साहब ने पूछा – बुद्धू चौधरी सो रहें हैं । जरा उन्हें जगा दो ।
बुढ़िया – न बाबू जी, इस बखत मैं न जगाऊँगी , मुझे कच्चा ही खा जायगा, रात को लाट
साहब भी आवें तो नहीं उठता ।
डॊक्टर साहब ने थोड़े शब्दों में पूरी घटना कह सुनायी और बड़ी नम्रता के साथ कहा कि
बुद्धू को जगा दे । इतने में बुद्धू अपने ही आप बाहर निकल आया और आँखे मलता हुआ
बोला – कहिए बाबूजी, क्या हुकुम है ।
बुढ़िया ने चिढ़ कर कहा – तेरी नींद आज कैसे खुल गयी, मैं जगाने गयी होती तो मारने
उठता ।
डॊक्टर – मैंने बस माजरा बुढ़िया से कह दिया है, इसी से पूछो ।
बुढ़िया – कुछ नहीं, तूने मूठ चलायी थी, रुपये इनके घर की महरी ने लिये हैं, अब
उसका अब तब हो रहा है ।
डॊक्टर – बेचारी मर रही है, कुछ ऐसा उपाय करो कि उसके प्राण बच जायँ ।
बुद्धू -यह तो आपने बुरी सुनायी , मूठ को फेरना सहज नहीं है ।
बुढ़िया – बेटा, जान जोखम है, क्या तू जानता नहीं । कहीं उल्टे फेरने वाले पर ही
पड़े तो जान बचना कठिन हो जाय ।
डॊक्टर – अब उसकी जान तुम्हारे ही बचाये बचेगी , इतना धर्म करो ।
बुढ़िया – दूसरे की जान की खातिर कोई अपनी जान गढ़े में डालेगा ?
डाक्टर – तुम रात-दिन यही काम करते हो, तुम उसके दाँव-घात सब जानते हो । मार भी
सकते हो, जिला भी सकते हो । मेरा तो इन बातों पर बिलकुल विश्वास ही न था ,लेकिन
तुम्हारा कमाल देखकर दंग रह गया । तुम्हारे हाथों कितने ही आदमियों का भला होता है,
उस गरीब बुढ़िया पर दया करो ।
बुद्धू कुछ पसीजा, पर उसकी माँ मामलेदारी में उससे कहीं अधिक चतुर थी । डरी, कहीं
यह नरम हो कर मामला बिगाड़ न दे । उसने बुद्धु को कुछ कहने का अवसर न दिया ।
बोली – यह तो सब ठीक है , पर हमारे भी बाल बच्चे हैं । न जाने कैसी पड़े कैसी न
पड़े । वह हमारे सिर आवेगी न ? आप तो अपना काम निकाल कर अलग हो जायेंगे ।
मूठ फेरना हँसी नहीं है ।
बुद्धू -हाँ बाबूजी, काम बड़े जोखिम का है ।
डॊक्टर – काम जोखम का है तो मुफ्त तो नहीं करवाना चाहता ।
बुड़िया – आप बहुत देंगे, सौ-पचास रुपये देंगे । इतने में हम कै दिन तक खायेंगे ।
मूठ फेरना साँप के बिल में हाथ डालना है, आग में कूदना है । भगवान की ऐसी ही
निगाह हो तो जान बचती है ।
डॊक्टर – तो माताजी , मैं तुमसे बाहर तो नहीं होता हूँ । जो कुछ तुम्हारी मरजी
हो, वह कहो । मुझे तो उस गरीब की जान बचानी है । यहाँ बातों मे देर हो रही है
वहाँ मालूम नहीं उसका क्या हाल होगा ।
बुढ़िया – देर तो आप ही कर रहे हैं, आप पक्की कर दें तो यह आपके साथ चला जाय।
आपकी खातिर यह जोखिम अपने सिर ले रही हूँ दूसरा होता तो झट इनकार कर जाती ।
आपके मुलाहजे में पड़ कर जानबूझ कर जहर पी रही हूँ ।
डॊक्टर साहब को एक क्षण एक वर्ष जान पड़ रहा था । वह बुद्धू को उसी समय उनकी
आँखों में रुपये का कोई मूल्य न था । बस यही चिंता थी कि जगिया मौत के मुँह से निकल
आये । जिस रुपये पर वह अपनी आवश्यकताएँ और घरवाली की आकांक्षाएँ निछावर करते उसे
दया के आवेश ने बिलकुल तुच्छ बना दिया था । बोले – तुम्हीं बतलाओ, अब मैं क्या कहूँ
, पर जो कुछ कहना हो झटपट कह दो ।
बुढ़िया – अच्छा तो पाँच सौ रुपये दीजिए इससे कम में कम न होगा ।
बुद्धू ने माँ ने की ओर आश्चर्यसे देखा, और डक्टर साहब तो मूर्छित-से हो गये ;
निराशा से बोले – इतना मेरे बूते के बाहर है, जान पड़ता है उसके भाग्य में मरना ही
बदा है ।
बुढ़िया – तो जाने दीजिए, हमें अपनी जान भार थोड़े ही है । हमने तो आपके मुलाहिजे
से इस काम का बीड़ा उठाया था । जाओ बुद्धू सोओ ।
डॊक्टर – बूढ़ी माता इतनी निर्दयता न करो, आदमी का काम आदमी से निकलता है ।
बुद्धू – नहीं बाबू जी, मैं हर तरह से आपका काम करने को तैयार हूँ इसने पाँच सौ
कहे, आप कुछ कम कर दीजिए । हाँ, जोखम का ध्यान रखिएगा ।
बुढ़िया – तू जा के सोता क्यों नहीं ? इन्हें रुपये प्यारे हैं तो क्या मुझे अपनी
जान प्यारी नहीं है । कल को लहू थूकने लगेगा तो कुछ बनाये न बनेगी , बाल-
बच्चों को किस पर छोड़ेगा ? है घर में कुछ ?
डाक्टर साहब ने संकोच करते हुए ढाई सौ रुपये कहे । बुद्धू राजी हो गया, मामला
तय हुआ, डाक्टर साहब उसे साथ ले कर घर की ओर चले । उन्हें ऐसी आत्मिक
प्रसन्नता कभी न मिली थी । हारा हुआ मुकदमा जीत कर अदालत से लौटने वाला मुकदमे
बाज भी इतना प्रसन्न न होगा । लपके चले जाते थे । बुद्धू से बार-बार तेज चलने को
कहते । घर पहुँचे तो जगिया को बिलकुल मरने के निकट पाया । जान पड़ता था यही
साँस अंतिम साँस है । उनकी माँ और स्त्री दोनों आँसू भरे निराश बैठी थीं । बुद्धू
को दोनों ने विनम्र दृष्टि से देखा । दोनों ने विनम्र दृष्टि से देखा । डॊक्टर साहब
के आँसू भी न रुक सके । जगिया की ओर झुके तो आँसू की बूँदें
उसके मुरझाये हुए पीले मुँह पर टपक पड़ी । स्थिति ने बुद्धू को सजग कर दिया बुढ़िया
की देह पर हाथ रखते हुए बोला – बाबू जी, अब मेरा किया कुछ नहीं हो सकता, यह तो
दम तोड़ रही है ।
डॊक्टर साहब ने गिड़गिड़ा कर कहा – नहीं चौधरी, ईश्वर के नाम पर अपना मंत्र
चलाओ, इसकी जान बच गई तो सदा के लिए मैं तुम्हारा गुलाम बना रहूँगा ।
बुद्धू – आप मुझे जान बूझ कर जहर खाने को कहते हैं । मुझे मालूम था कि मूठ के
देवता इस बखत इतने गरम हैं । वह मेरे मन में बैठे कह रहे है । तुमने हमारा शिकार
छीना तो हम तुम्हें निगल जायेंगे ।
डाक्टर – देवता को किसी तरह राजी कर लो ।
बुद्धू – राजी करना बड़ा कठिन है , पाँच सौ रुपये दीजिए तो इसकी जान बचे । उतारे के
लिए बड़े-बड़े जतन करने पड़ेंगे ।
डाक्टर – पाँच सौ रुपये दे दूँ तो इसकी जान बचा दोगे ।
बुद्धू – हाँ, शर्त बद कर ।
डाक्टर साहब बिजली की तरह लपक कर अपने कमरे में आ गये और पाँच सौ रुपये की
थैली लाकर बुद्धू के सामने रख दी । बुद्धू ने विजय की दृष्टि से थैली को देखा । फिर
जगिया का सर अपनी गोद में रख कर उस पर हाथ फेरने लगा । कुछ बुदबुदा कर छू-छू
करता जाता था । एक क्षण में उसकी सूरत डरावनी हो गयी, लपटें-सी निकलने लगीं । बार-
बार अँगड़ाइयाँ लेने लगा । इसी दशा में उसने एक बेसुरा गीत गाना आरम्भ किया, पर हाथ
जगिया के सर पर ही था । अंत में कोई आध घंटा बीतने पर जगिया ने आँखे खोल दीं,
जैसे बुझते हुए दिये में तेल पड़ जाय । धीरे धीरे उसकी अवस्था सुधरने लगी । उधर
कौवे की बोली सुनाई दी, जगिया एक अँगड़ाई ले कर उठ बैठी ।

(7)

सात बजे थे । जगिया मीठी नींद सो रही थी; उसकी आकृति निरोग थी, बुद्धू रुपयों की
थैली ले कर अभी गया था । डॊक्टर साहब की माँ ने कहा । बात की बात में पाँच सौ रुपये
मार ले गया ।
डॊक्टर – यह क्यों नहीं कहती कि एक मुरदे को जिला गया । क्या उसके प्राण का मूल्य
इतना भी नहीं है ।
माँ देखो, आले पर पाँच सौ रुपये हैं या नहीं ?
डॊक्टर – नहीं, उन रुपयों में हाथ मत लगाना, उन्हें वहीं पड़े रहने दो । उसने तीरथ
करने के वास्ते लिये थे, वह उसी काम में लगेंगे ।
माँ – यह सब रुपये उसी के भाग के थे ।
डॊक्टर – उसके भाग के तो पाँच सौ ही थे , बाकी मेरे भाग के थे । उनकी बदौलत मुझे
ऐसी शिक्षा मिली, जो उम्र भर न भूलेगी । तुम मुझे अब आवश्यक कामों में मुट्ठी बंद
करते हुए न पाओगी ।

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