गोदान (भाग 2)

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लाला पटेश्वरी पटवारी-समुदाय के सद्गुणों के साक्षात अवतार थे. वह यह न देख सकते थे
कि कोई असामी अपने दूसरे भाई की इञ्च-भर भी जमीन दबा ले. न वह यही देख सकते थे कि
असामी किसी महाजन के रुपये दबा ले. गांव के समस्त प्राणियों के हितों की रक्षा करना
उनका परम धर्म था. समझौते या मेल-जोल में उनका विश्वास न था, यह तो निर्जीवता के
लक्षण हैं. वह तो संघर्ष के पुजारी थे, जो सजीवता का लक्षण है, आये दिन इस जीवन को
उत्तेजना देने का प्रयास करते रहते थे. एक-न-एक फुलझड़ी छोड़ते रहते थे. मंगरू साह
पर इन दिनों उनकी विशेष कृपा-दृष्टि थी. मंगरू साह गांव का सबसे धनी आदमी था, पर
स्थानीय राजनीति में बिलकुल भाग न लेता था. रोब या अधिकार की लालसा उसे न थी.
मकान भी उसका गांव के बाहर था, जहां उसने एक बाग और…
एक कुआं और एक छोटा-सा शिव-मन्दिर बनवा लिया था. बाल-बच्चा कोई न था, इसलिए
लेनदेन भी कम कर दिया था और अधिकतर पूजा-पाठ में ही लगा रहता था. कितने ही असामियों
ने उसके रुपये हजम कर लिए थे, पर उसने किसी पर नालिश-फरियाद न की. होरी पर भी उसके
सूद-ब्याज मिलाकर कोई डेढ़ सौ रुपये हो गये थे, मगर न होरी को ऋण चुकाने की कोई
चिन्ता थी और न उसे वसूल करने की. दो-चार बार उसने तकाजा किया, घुड़का-डांटा भी,
मगर होरी की दशा देखकर चुप हो बैठा. अब संयोग से होरी की ऊख गांव-भर के ऊपर थी.
कुछ नहीं, तो उसके दो-ढाई सौ सीधे हो जायेंगे, ऐसा लोगों का अनुमान था. पटेश्वरी
प्रसाद ने मंगरू को समझाया कि अगर इस वक्त होरी पर दावा कर दिया जाये, तो सब रुपये
वसूल हो जायें. मंगरू इतना दयालु नहीं, जितना आलसी था.झञ्झट में पड़ना न चाहता था,
मगर जब पटेश्वरी ने जिम्मा लिया कि उसे एक दिन भी कचहरी न जाना पड़ेगा, न कोई दूसरा
कष्ट होगा, बैठे-बैठाये उसकी डिग्री हो जायेगी, तो उसने नालिश करने की अनुमति दे दी
और अदालत-खर्च के लिए रुपये भी दे दिये.
होरी को खबर भी न थी कि क्या खिचड़ी पक रही है. कब दावा दायर हुआ, कब डिग्री हुई,
उसे बिलकुल पता न चला. कुर्क अमीन उसकी ऊख नीलाम करने आया, तब उसे मालूम हुआ.
सारा गांव खेत के किनारे जमा हो गया. होरी मंगरू साह के पास दौड़ा और धनिया
पटेश्वरी को गालियां देने लगी. उसकी सहज बुद्धि ने बता दिया कि पटेश्वरी ही की
कारस्तानी है, मगर मंगरू साह पूजा पर थे, मिल न सके और धनिया गालियों की वर्षा
करके भी पटेश्वरी का कुछ बिगाड़ न सकी. उधर ऊख डेढ़ सौ रुपये में नीलाम हो गयी और
बोली भी हो गई मंगरू साह ही के नाम. कोई दूसरा आदमी न बोल सका. दातादीन में भी
धनिया की गालियां सुनने का साहस न था.
धनिया ने होरी को उत्तेजित करके कहा-बैठे क्या हो,जाकर पटवारी से पूछते क्यों नहीं?
यही धरम है तुम्हारा गांव-घर के आदमियों के साथ?
होरी ने दीनता से कहा-पूछने के लिए तूने मुंह भी रखा हो.तेरी गालियां क्या उन्होंने
न सुनी होगी?
`जो गाली खाने का काम करेगा, उसे मिलेंगी ही.’
`तू गालियां भी देगी और भाई- चारा भी निभायेगी?’
`देखूंगी. मेरे खेत के नगीच कौन जाता है?’
`मिलवाले आकर काट ले जायेंगे, तू क्या करेगी, और मैं क्या करूंगा? गालियां देकर
अपनी जीभ की खुजली चाहे मिटा ले.’
`मेरे जीते-जी कोई मेरा खेत काट ले जायेगा?’
`हां-हां, तेरे और मेरे जीते-जी सारा गांव मिलकर भी उसे नहीं रोक सकता. अब वह चीज
मेरी नहीं, मंगरू साह की हे.’
`मंगरू साह ने मर-मरकर जेठ की दुपहरी में सिंचाई और गोड़ाई की थी?’
`वह सब तूने किया, मगर अब वह चीज मंगरू साह की है. हम उनके करजदार नहीं हैं?’
ऊख तो गयी, लेकिन उसके साथ ही एक नयी समस्या आ पड़ी. दुलारी इसी ऊख पर रुपये देने
पर तैयारी हुई थी. अब वह किस जमानत पर रुपये दे? अभी उसके पहले ही के दो सौ पड़े
हुए थे.सोचा था, ऊख के पुराने रुपये मिल जायेंगे, तो नया हिसाब चलने लगेगा. उसकी
नजर में होरी की साख दो सौ तक थी. इससे ज्यादा देना जोखिम था. सहालग को टालना असंभव
था. होरी को ऐसा क्रोध आता था कि जाकर दुलारी का गला दबा दे. जितनी चिरौरी-बिनती हो
सकती थी, वह कर चुका, मगर वह पत्थर की देवी जरा भी न पसीजी. उसने चलते-चलते हाथ
बांधकर कहा- दुलारी, मैं तुम्हारे रुपये लेकर भाग न जाऊंगा. न इतनी जल्दी मरा ही
जाता हूं, खेत हैं, पेड़-पालो हैं, घर है,
जवान बेटा है. तुम्हारे रुपये मारे न जायेंगे, मेरी इज्जत जा रही है, इसे संभालो?
मगर दुलारी ने दया को व्यापार में मिलाना स्वीकार न किया. अगर व्यापार को वह दया का
रूप दे सकती, तो उसे कोई आपत्ति न होती. पर दया को व्यापार का रूप देना उसने न सीखा
था. होरी ने घर आकर धनिया से कहा-अब?
धनिया ने उसी पर दिल का गुबार निकाला-यही तो तुम चाहते थे.
होरी ने जख्मी आंखों से देखा-मेरा ही दोष है?
`किसी का दोष हो, हुई तुम्हारे मन की.’
`तेरी इच्छा है कि जमीन रेहन रख दूं’
`जमीन रेहन रख दोगे, तो करोगे क्या?’
`मजूरी.’
मगर जमीन दोनों को एक-सी प्यारी थी. उसी पर तो उनकी इज्जत और आबरू अवलम्बित थी.
जिसके पास जमीन नहीं, वह गृहस्थ नहीं, मजूर है.
होरी ने कुछ जवाब न पाकर पूछा- तो क्या कहती है?
धनिया ने आहत कण्ठ से कहा- कहना क्या है! गौरी बरात लेकर आयेंगे. एक जून खिला देना.
सबेरे बेटी विदा कर देना. दुनिया हंसेगी, हंस ले.भगवान् की यही इच्छा है कि हमारी
नाक कटे,मुंह में कालिख लगे, तो हम क्या करेंगे?
सहसा नोहरी चुन्दरी पहने सामने से जाती हुई दिखाई दी. होरी को देखते ही उसने जरा-सा
घूंघट निकाल लिया.. उससे समदी का नाता मानती थी. धनिया से उसका परिचय हो चुका था.
उसने पुकारा-आज किधर चलीं समधिन? आओ. नोहरी ने दिग्विजय कर लिया था और अब जनमत को
अपने पक्ष में बटोर लेने का प्रयास कर रही थी. आकर खड़ी हो गयी.
धनिया ने उसे सिर से पांव तक आलोचना कीं आंखों से देखकर कहा-आज इधर कैसे भूल पड़ी?
नोहरी ने कातर स्वर में कहा-ऐसे ही तुम लोगों से मिलने चली आयी. बिटिया का ब्याह कब
तक है?
धनिया सन्दिग्ध भाव से बोली-भगवान के अधीन है, जब हो जाये.
`मैंने तो सुना, इसी सहालग में होगा. तिथि ठीक हो गयी है?’
`हां, तिथि तो ठीक हो गयी है.’
`मुझे भी नेवता देना.’
`तुम्हारी तो लड़की है, नेवता कैसा?’
दहेज का सामान तो मंगवा लिया होगा? जरा मैं भी देखूं.’
धनिया असमंजस में पड़ी, क्या कहे. होरी ने उसे संभाला-अभी तो कोई सामान नहीं
मंगवाया है, और सामान क्या करना है, कुस-कन्या तो देना है.
नोहरी ने अविश्वास-भरी आंखों से देखा-कुस-कन्या क्यों दोगे महतो, पहली बेटी है, दिल
खोलकर करो.
होरी हंसा, मानो कह रहा हो, तुम्हें चारों ओर हरा दिखाई देता होगा, यहां तो
सूखा ही पड़ा हुआ है.
`रुपये पैसे की तंगी है, क्या खोलकर करूं? तुमसे कौन परदा है?’
`बेटा कमाता है, तुम कमाते हो, फिर भी रुपये-पैसे की तंगी? किसे विश्वास आयेगा?’
बेटा ही लायक होता, तो फिर काहे को रोना था. चिट्ठी-पत्तर तक भेजता नहीं,रुपये क्या
भेजेगा? दूसरा साल है, एक चिट्ठी नहीं.’
इतने में सोना बैलों के चारे के लिए हरियाली का एक गट्ठा सिर पर लिये, यौवन को अपने
अञ्चल से चुराती, बालिका-सी सरल, आयी और गट्ठा वहीं पटककर अन्दर चली गयी. नोहरी ने
कहा-लड़की तो खूब सयानी हो गयी है.
धनिया बोली-लड़की की बाढ़ रेंड की बाढ़ है. नहीं, है अभी कै दिन की?
`वर तो ठीक हो गया है न?’
`हां वर तो ठीक है. रुपये का बन्दोबस्त हो गया, तो इसी महीने में ब्याह कर देंगे.’
नोहरी दिल की ओछी न थी. इधर उसने जो थोड़े-से रुपये जोड़े थे, वे उसके पेट में उछल
रहे थे. अगर वह सोना के ब्याह के लिए कुछ रुपये दे दे, तो कितना यश मिलेगा! सारे
गांव में उसकी चर्चा हो जायेगी. लोग चकित होकर कहेंगे-नोहरी ने इतने रुपये दे दिये.

बड़ी देवी है. होरी और धनिया दोनों घर-घर उसका बखान करते फिरेंगे. गांव में उसका
मान-सम्मान कितना बढ़ जायेगा. वह उंगली दिखानेवालों का मुंह सी देगी. फिर किसकी
हिम्मत है, जो उस पर हंसे या उस पर आवाजें कसे? अभी सारा गांव उसका दुश्मन है. सारा
गांव उसका हितेषी हो जायेगा. इस कल्पना से उसकी मुद्रा खिल गयी.
`थोड़े-बहुत से काम चलता है, तो मुझसे लो. जब हाथ में रुपये आ जायें, तो दे देना.’
होरी और धनिया दोनों ही ने उसकी ओर देखा. नहीं,नोहरी दिल्लगी नहीं कर रही है.
दोनों की आंखों में विस्मय था, कृतज्ञता थी, सन्देह था और लज्जा थी. नोहरी उतनी
बुरी नहीं, जितना लोग समझते हैं.
नोहरी ने फिर कहा-तुम्हारी और हमारी इज्जत एक है. तुम्हारी हंसी हो, तो क्या मेरी
हंसी न होगी? कैसे भी हुआ, पर अब तो तुम हमारे समधी हो.
होरी ने सकुचाते हुए कहा-तुम्हारे रुपये तो घर में ही हैं, जब काम पड़ेगा, लें
लेंगे. आदमी अपनों ही का भरोसा तो करता है, मगर ऊपर से इन्तजाम हो जाये, तो घर के
रुपये क्यों छुए?
धनिया ने अनुमोदन किया-हां, और क्या!
नोहरी ने अपनापन जताया-जब घर में रुपये हैं, तो बाहरवालों के सामने हाथ क्यों फैलाओ
सूद भी देना पड़ेगा, उसपर इस्टाम लिखो, गवाही कराओ, दस्तूरी दो, खुशामद करो. हां,
मेरे रुपये में छूत लगी हो, तो दूसरी बात है.
होरी ने संभाला-नहीं, नहीं, नोहरी, जब घर में काम चल जायेगा, तो बाहर क्यों हाथ
फैलायेंगे, लेकिन आपसवाली बात है. खेती-बारी का भरोसा नहीं. तुम्हें जल्दी कोई काम
पड़ा और हम रुपये न जुटा सके, तो तुम्हें भी बुरा लगेगा और हमारी जान भी संकट में
पड़ेगी. इससे कहता था. नहीं, लड़की तो तुम्हारी है.
`मुझे अभी रुपये की ऐसी जल्दी नहीं है.’
`तो तुम्ही से ले लेंगे. कन्यादान का फल भी क्यों बाहर जाये?’
`कितने रुपये चाहिए?’
`तुम कितने दे सकोगी?’
`सौ में काम चल जायेगा?’
होरी को लालच आया. भगवान् ने छप्पर फाड़कर रुपये दिये हैं, तो जितना ले सके, उतना
क्यों न लें.
`तो इतने में बड़ा खुसफैली से काम चल जायेगा. अनाज घर में है, मगर ठकुराइन, आज
तुमसे कहता हूं, मैं तुम्हें ऐसी लच्छमी न समझता था. इस जमाने में कौन किसकी मदद
करता है, और किसके पास है? तुमने मुझे डूबते से बचा लिया.’
दीया-बत्ती का समय आगया था. ठण्डक पड़ने लगी थी. जमीन ने नीली चादर ओढ़ ली थी.
धनिया अन्दर जाकर अंगीठी लायी. सब तापने लगे. पुआल के प्रकाश में छबीली, रंगीली,
कुलटा नोहरी इनके सामने वरदान-सी- बैठी थी. इस समय उसकी उन आंखों में कितनी
सहृदयता थी, कपोलों पर कितनी लज्जा, ओंठों पर कितनी सत्प्रेरणा!
कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करके नोहरी ऊठ खड़ी हुई और यह कहती हुई घर चली-
अब देर हो रही है. कल तुम आकर रुपये ले लेना महतो.
`चलो, मैं तुम्हें पहुंचा दूं.’
`नहीं-नहीं, तुम बैठो, मैं चली जाऊंगी.’
`जी तो चाहता है तुम्हें कन्धे पर बैठाकर पहुंचाऊं.’
नोखेराम की चौपाल गांव के दूसरे सिरे पर थी, और बाहर-बाहर जाने का रास्ता साफ था.
दोनों उसी रास्ते से चले. अब चारों ओर सन्नाटा था.
नोहरी ने कहा-तनिक समझा देते रावत को. क्यों सबसे लड़ाई किया करते हैं? जब इन्हीं
लोगों के बीच में रहना है, तो ऐसे रहना चाहिए न कि चार आदमी अपने हो जायें. और
इनका हाल यह है कि सबसे लड़ाई, सबसे झगड़ा. जब तुम मुझे परदे में नहीं रख सकते,
मुझे दूसरों की मजूरी करनी पड़ती है, तो यह कैसे निभ सकता है कि मैं न किसी से
हंसूं, न बोलूं, न कोई मेरी ओर ताके, न हंसे.यह सब तो परदे में ही हो सकता है. पूछो
कोई मेरी ओर ताकता या घूरता है, तो मैं क्या करूं? उसकी आंखें तो नहीं फोड़ सकती.
फिर मेल-मुहब्बत से आदमी के सौ काम निकलते हैं. जैसा समय देखों, वैसा व्यवहार करों.
तुम्हारे घर हाथी झूमता था, तो अब वह तुम्हारे किस काम का? अब तो तुम तीन रुपये के
मजूर हो. मेरे घर तो भैंस लगती थी, लेकिन अब तो मजूरिन हूं, मगर उनकी समझ मे कोई
बात आती ही नहीं. कभी लड़कों के साथ रहने की सोचते, कभी लखनऊ जाकर रहने की सोचते
हैं. नाक में दम कर रखा है मेरे.
होरी ने ठकुरसुहाती की-यह भोला की सरासर नादानी है. बूढ़े हुए, अब तो उन्हें समझ
आनी चाहिए. मैं समझा दूंगा.
`तो सबेरे आ जाना, रुपये दे दूंगी.’
`कुछ लिखा पढ़ी….’
`तुम मेरे रुपये हजम न करोगे, मैं जानती हूं.’
उसका घर आ गया. वह अन्दर चली गयी. होरी घर लौटा.

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