गोदान (भाग 2)

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सोना सत्रहवें साल में थी और इस साल उसका विवाह करना आवश्यक था. होरी तो दो साल से
इसी फिक्र में था, पर हाथ खाली होने से कोई काबू न चलता था. मगर इस साल जैसे भी हो,
उसका विवाह कर देना चाहिए, चाहे कर्ज लेना पड़े, चाहे खेत गिरों रखने पड़ें. और
अकेले होरी की बात चलती, तो दो साल पहले ही विवाह हो गया होता. वह किफायत से काम
करना चाहता था. पर धनिया कहती थी, कितना ही हाथ बांधकर खर्च करो, दो ढ़ाई सौ लग ही
जायेंगे. झुनिया के आ जाने से बिरादरी में इन लोगों का स्थान कुछ हेठा हो गया था और
बिना सौ-दो सौ दिये कोई कुलीन वर न मिल सकता था. पिछले साल चैती में कुछ न मिला.
था तो पण्डित दातादीन का आधा साझा, मगर पण्डितजी ने बीज और मजूरी का कुछ ऐसा ब्योरा
बताया कि होरी के हाथ एक-चौथाई से ज्यादा अनाज न लगा. और लगान देना पड़ गया पूरा.
ऊख और सन की फसल नष्ट हो गयी. सन तो वर्षा अधिक होने और ऊख दीमक लग जाने के कारण.
हां, इस साल की चैती अच्छी थी और ऊख भी खूब लगी हुई थी. विवाह के लिए गल्ला तो
मौजूद था, दो सौ रुपये भी हाथ आ जाये, तो कन्या-ऋण से उसका उद्धार हो जाये. अगर
गोबर सौ रुपये की मदद कर दे, तो बाकी सौ रुपये होरी को आसानी से मिल जायेंगे.
झिंगुरीसिंह और मंगरू साह दोनों ही अब कुछ नरम पड़ गये थे. जब गोबर परदेस में कमा
रहा है, तो उनके रुपये मारे न पड़ सकते थे.
एक दिन होरी ने गोबर के पास दो-तीन दिन के लिए जाने का प्रस्ताव किया.
मगर धनिया अभी तक गोबर के वह कठोर शब्द न भूली थी. वह गोबर से एक पैसा भी न लेना
चाहती थी, किसी तरह नहीं.
होरी ने झूंझलाकर कहा-लेकिन काम कैसे चलेगा, यह बता?
धनिया सिर हिला कर बोली-मान लो, गोबर परदेस न गया होता, तब तुम क्या करते?
वही अब करो.
होरी की जबान बन्द हो गयी. एक क्षण बाद बोला-मैं तो तुझसे पूछता हूं.
धनिया ने जान बचायी-यह सोचना मरदों का काम है.
होरी के पास जवाब तैयार था-मान ले, मैं न होता, तू ही अकेली रहती, तब तू क्या करती?
वह कर.
धनिया ने तिरस्कार-भरी आंखों से देखा-तब मैं कुश-कन्या भी दे देती, तो कोई हंसने
वाला न था. 198
कुश-कन्या होरी भी दे सकता था. इसी में उसका मंगल था, लेकिन कुल-मर्यादा कैसे छोड़
दे? उसकी बहिनों के विवाह में तीन-तीन सौ बराती द्वार पर आये थे. दहेज भी अच्छा ही
दिया गया था. नाच-तमाशा, बाजा-गाजा, हाथी-घोड़े, सभी आये थे.आज भी बिरादरी में उसका
नाम है. दस गांव के आदमियों से उसका हेल-मेल है. कुश-कन्या देकर वह किसे मुंह
दिखायेगा? इससे तो मर जाना अच्छा है. और वह क्यों कुश-कन्या दे? पेड़-पालो हैं,
जमीन है और थोड़ी-सी साख भी है. अगर वह एक बीघा भी बेच दे, तो सौ मिल जायें, लेकिन
किसान के लिए जमीन जान से प्यारी है, ओर कुल तीन ही बीघे तो उसके पास हैं. अगर एक
बीघा बेच दे तो फिर खेती कैसे करेगा?
कई दिन इसी हैस-बैस में गुजरे. होरी कुछ फैसला न कर सका. दशहरे की छुट्टियों के दिन
थे. झिंगुरी, पटेश्वरी और नोखेराम तीनों ही सज्जनों के लड़के छुट्टियों में घर आये
थे. तीनों अंग्रेजी पढ़ते थे और यद्यपि तीनों बीस-बीस साल के हो गये थे, पर अभी तक
यूनिवर्सिटी में जाने का नाम न लेते थे. एक-एक क्लास में दो-दो, तीन-तीन साल पड़े
रहते.तीनों की शादियां हो चुकी थीं. पटेश्वरी के सपूत बिन्देश्वरी तो एक पुत्र के
पिता भी हो चुके थे.तीनों दिन-भर ताश खेलते, भंग पीते और छैला बने घूमते. वे दिन
में कई-कई बार होरी के द्वार की ओर ताकते हुए निकलते और कुछ ऐसा संयोग था कि जिस
वक्त वे निकलते, उसी वक्त सोना भी किसी-न किसी काम से द्वार पर आ खड़ी होती. देख-
देख होरी का खून सूखता जाता था, मानो उसकी खेती चौपट करने के लिए आकाश में ओले
वाले पीले बादल उठे चले आते हों.
एक दिन तीनों उसी कुएं पर नहाने पहुंचे, जहां होरी सींचने के लिए पुर चला रहा था.
सोना मोट ले रही थी. होरी का खून आज खौल उठा. उसी सांझ को वह दुलारी सहुआइन के पास
गया. सोचा औरतों में दया होती है, शायद इसका दिल पसीज जाये और कम सूद पर रुपये दे
दे. मगर दुलारी अपना ही रोना ले बैठी. गांव में ऐसा कोई घर न था, जिस पर उसके कुछ
रुपये न आते हों, यहां तक कि झिंगुरीसिंह पर भी उसके बीस रुपये आते थे, लेकिन कोई
देने का नाम न लेता था. बेचारी कहां से रुपये लाये?
होरी ने गिड़गिड़ाकर कहा-भाभी, बड़ा पुन्न होगा. तुम रुपये न दोगी, मेरे गले की
फांसी खोल दोगी. झिंगुरी और पटेश्वरी मेरे खेतों पर दांत लगाये हुए हैं. मै सोचता
हूं, बाप-दादा की यही तो निसानी है, यह निकल गयी, तो जाऊंगा कहां? एक सपूत वह
होता है कि घर की सम्पत बढ़ाता है, मैं ऐसा कपूत हो जाऊं कि बाप-दादों की कमाई पर
झाड़ू फेर दूं?
दुलारी ने कसम खायी-होरी, मैं ठाकुरजी के चरन छूकर कहती हूं कि इस समय मेरे पास कुछ
नहीं है. जिसने लिया, वह देता नहीं, तो मैं क्या करूं? तुम कोई गैर तो नहीं हो.
सोना भी मेरी ही लड़की है, लेकिन तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं? तुम्हारा ही भाई
हीरा है. बैल के लिए पच्चीस रुपये लिये. उसका तो कहीं पता-ठिकाना नहीं, उसकी घरवाली
से मांगों, तो लड़ने को तैयार. शोभा भी देखने में बड़ा सीधा-सादा है, लेकिन पैसा

देना नहीं जानता. और असल बात तो यह है कि किसी के पास है ही नहीं, दें कहां से.
सबकी दशा देखती हूं, इसी मारे सबर कर जाती हूं. लोग किसी तरह पेट पाल रहें हैं, और
क्या? खेती-बारी बेचने की मैं सलाह न दूंगी. कुछ नहीं है, मरजाद तो है.
फिर कनफुसकियों में बोली-पटेसरी लाला का लौंडा तुम्हारे घर की ओर बहुत चक्कर लगाया
करता है. तीनों का वही हाल है.इनसे चौकस रहना. यह सहरी हो गये, गांव का भाई-चारा
क्या समझें? लड़के गांव में भी हैं, मगर उनमें कुछ लिहाज हैं, कुछ अदब है, कुछ डर
हैं ये सब तो छूटे सांड है. मेरी कौसल्या ससुराल से आयी थी, मैंने सबों के ढंग देख
कर उसके ससुर को बुलाकर विदा कर दिया. कोई कहां तक पहरा दे?
होरी को मुसकराते देखकर उसने सरस ताड़ना के भाव से कहा-हंसोगे होरी, तो मैं भी
कुछ कह दूंगी. तुम क्या किसी से कम नटखट थे? दिन में पचीसों बार किसी-न-किसी
बहाने मेरी दुकान पर आया करते थे, मगर मैंने कभी ताका तक नहीं.
होरी ने मीठे प्रतिवाद के साथ कहा-यह तो तुम झूठ बोलती हो भाभी. बिना कुछ रस पाये
कोई थोड़े ही आता था. चिड़िया एक बार परच जाती है, तभी दूसरी बार आंगन में आती है.
`चल झूठे.’
`आंखों से न ताकती रही हो, लेकिन तुम्हारा मन तो ताकता था, बल्कि बुलाता था.’
`अच्छा रहने दो, आये बड़े अन्तरजामी बनके. तुम्हें बार-बार मंडराते देखके मुझे दया
आ जाती थी, नहीं तुम कोई ऐसे बांके जवान न थे.’
हुसेनी एक पैसे का नमक लेने आ गया ओर यह परिहास बन्द हो गया. हुसेनी नमक लेकर चला
गया, तो दुलारी ने फिर कहा-गोबर के पास क्यों नहीं चले जाते? देखते भी आओगे और साइत
कुछ मिल भी जाये.
होरी निराश मन से बोला- वह कुछ न देगा. लड़के चार पैसे कमाने लगते हैं, तो उनकी
आंखें फिर जाती हैं. मैं तो बेहयाई करने को तैयार था, लेकिन धनिया नहीं मानती. उसकी
मरजी बिना चला जाऊं, तो घर में रहना अपाढ़ करदे. उसका सुभाव तो जानती हो.
दुलारी ने कटाक्ष करके कहा-तुम तो मेहरिया के जैसे गुलाम हो गये.
`तुमने पूछा ही नहीं, तो क्या करता?’
`मेरी गुलामी करने को कहते, तो मैंने लिखा लिया होता, सच.’
`तो अब से क्या बिगड़ा है,लिखा लो न.दो सौ में लिखता हूं,इन दामों महंगा नहीं हूं.’
`तब धनिया से तो न बोलोगे.’
`नहीं, कहो कसम खाऊं.’
`और जो बोलो.’
`तो मेरी जीभ काट लेना.’
`अच्छा, तो जाओ, घर ठीक-ठाक करो, मैं रुपये दे दूंगी.’
होरी ने सजल नेत्रों से दुलारी के पांव पकड़ लिये. भावावेश से मुंह बन्द हो गया.
सहुआइन ने पांव खींचकर कहा-अब यही सरारत मुझे अच्छी नहीं लगती. मै साल-भर के भीतर
अपने रुपये सूद-समेत कान पकड़कर लूंगी. तुम तो व्यवहार के ऐसे सच्चे नहीं हो, लेकिन
धनिया पर मुझे विशवास है. सुना, पण्डित तुमसे बहुत बिगड़े हुए हें. कहते हैं इसे
गांव से निकालकर नहीं छोड़ा, तो ब्राह्मण नहीं. तुम सिलिया को निकाल बाहर क्यों
नहीं करते? बैठे-बैठाये झगड़ा मोल ले लिया.
`धनिया उसे रखे हुए है, मैं क्या करूं?’
`सुना है, पण्डित कासी गये थे! वहां एक बड़ा नामी विद्वान पण्डित है. वह पांच सौ
मांगता है. तब परासचित करायेगा. भला पूछो, ऐसा अन्धेर कहीं हुआ है? जब धरम नष्ट हो
गया, तो एक नहीं हजार परासचित करो, इससे क्या होता है. तुम्हारे हाथ का छुआ पानी
कोई न पियेगा, चाहे जितना परासचित करो.
होरी यहां से घर चला, तो उसका दिल उछल रहा था, जीवन में ऐसा सुखद अनुभव उसे न हुआ
था. रास्ते मैं शोभा के घर गया और सगाई लेकर चलने के लिए नेवता दे आया. फिर दोनों
दातादीन के पास सगाई की सायत पूछने गये. वहां से आकर द्वार पर सगाई की तैयारियों की
सलाह करने लगे.
धनिया ने बाहर निकलकर कहा-पहर रात गयी, अभी रोटी खाने की बेला नहीं आयी?
खाकर बैठो. गपड़चौथ करने को तो सारी रात पड़ी है.
होरी ने उसे भी परामर्श में शरीक होने का अनुरोध करते हुए कहा-इसी सहालग में लगन
ठीक हुआ है. बता, क्या-क्या लाना चाहिए? मुझे तो कुछ मालूम नहीं.’
`जब कुछ मालूम ही नहीं, तो सलाह करने क्या बैठो हो? रुपये-पेसे का डौल भी हुआ कि मन
की मिठाई खा रहे हो?’
होरी ने गर्व से कहा- तुझे इससे क्या मतलब? तू इतना बता दे, क्या-क्या सामान लाना
होगा?
`तो मैं ऐसी मन की मिठाई नहीं खाती.’
`तू इतना बता दे कि हमारी बहिनों के ब्याह में क्या-क्या सामान आया था?’
`पहले यह बता दो, रुपये मिल गये?’
`हां मिल गये, और नहीं क्या भंग खायी है?’
`तो पहले चलकर खा लो. फिर सलाह करेंगे.’
मगर जब उसने सुना कि दुलारी से बातचीत हुई है, तो नाक सिकोड़कर बोली-उससे रुपये
लेकर आजतक कोई उरिन हुआ है? चुड़ैल कितना कसकर सूद लेती है.
`लेकिन करता क्या? दूसरा देता कौन?’
`यह क्यों नहीं कहते कि इसी बहाने दो गाल हांकने-बोलने गया था. बूढ़े हो गये, पर यह
बान न गयी.
`तू तो धनिया, कभी-कभी बच्चों की सी बातें करने लगती है. मेरे जैसे फटेहालों से वह
हंसे-बोलेगी? सीधे मुंह बात तो करती नहीं.’
`तुम जैसों को छोड़कर उसके पास जायेगा ही कौन?’
`उसके द्वार पर अच्छे-अच्छे नाक रगड़ते हैं धनिया,तू क्या जाने?उसके पास लच्छमी है’
`उसने जरा- सी हामी भर दी, तुम चारों ओर खुशखबरी लेकर दौड़े.’
`हामी नहीं भर दी, पक्का वादा किया है.’
होरी रोटी खाने गया और शोभा अपने घर चला गया, तो सोना सिलिया के साथ बाहर निकली. वह
द्वार पर खड़ी सारी बातें सुन रही थी. उसकी सगाई के लिए दो सौ रुपये दुलारी से उधार
लिये जा रहे हैं, यह बात उसके पेट में इस तरह खलबली मचा रही थी, जैसे ताजा चूना
पानी में पड़ गया हो. द्वार पर एक कुप्पी जल रही थी, जिसके ताक के ऊपर की दीवार
काली हो गयी थी. दोनों बैल नांद में सानी खा रहे थे और कुत्ता जमीन पर टुकड़े के
इन्तजार में बैठा हुआ था. दोनों युवतियां बैलों की चरनी के पास आकर खड़ी हो गयी.
सोनी बोली-तूने कुछ सुना? दादा सहुआइन से मेरी सगाई के लिए दो सौ रुपये उधार ले रहे
हैं.
सिलिया घर का रत्ती-रत्ती हाल जानती थी. बोली-घर में पैसा नहीं है, तो क्या करें?
सोना ने सामने के काले वृक्षों की ओर ताकते हुए-कहा-मैं ऐसा नहीं करना चाहती,
जिसमें मां- बाप को कर्जा लेना पड़े. कहां से देंगे बेचारे, बता? पहले ही कर्ज के
बोझ से दबे हुए हैं. दो सौ और ले लेंगे, तो बोझा और भारी होगा कि नहीं?
`बिना दान-दहेज के बड़े आदमियों का कहीं ब्याह होता है पगली? बिना दहेज के तो
कोई बूढ़ा-ठेला ही मिलेगा. जायेगी बूढ़े के साथ?’
`बूढ़े के साथ क्यों जाऊं? भैया बूढ़े थे, जो झुनिया को ले आये? उन्हें किसने कै
पैसे दहेज में दिये थे?’
`उसमें बाप-दादा का नाम डूबता है.’
`मैं तो सोनारीवालों से कह दूंगी, अगर तुमने एक पैसा भी दहेज लिया, तो मैं तुमसे
ब्याह न करूंगी.’
सोना का विवाह सोनारी के एक धनी किसान के लड़के से ठीक हुआ था.
`और जो वह कह दें कि मैं क्या करूं, तुम्हारें बाप देते हैं, मेरे बाप लेते हैं,
इसमें मेरा क्या अख्तियार है?’
सोना ने जिस अस्त्र को रामबाण समझा था, अब मालूम हुआ कि वह बांस की कैन है. हताश
होकर बोली-मैं एक बार उससे कहके देख लेना चाहती हूं. अगर उसने कह दिया, मेरा कोई
अख्तियार नहीं है, तो क्या गोमती यहां से बहुत दूर है? डूब मरूगी. मां-बाप ने मर-मर
के पाला-पोसा. उसका बदला क्या यही है कि उनके घर से जाने लगूं, तो उन्हें कर्जे से
और लादती जाऊं? मां-बाप को भगवान ने दिया हो, तो खुशी से जितना चाहें लड़की को दें,
मैं मना नहीं करती, लेकिन जब वह पैसे-पैसे को तंग हो रहे हैं, आज महाजन नालिश करके
लिल्लाम कराले, तो कल मजूरी करनी पड़ेगी, तो कन्या का धरम यही है कि डूब मरे. घर की
जमीन-जैजात तो बच जायेगी, रोटी का सहारा तो रह जायेगा. मां-बाप चार दिन मेरे नाम को
रोकर सन्तोष कर लेंगे. यह तो न होगा कि मेरा ब्याह करके उन्हें जनम-भर रोना पड़े.
तीन-चार साल में दो सौ के दूने हो जायेंगे, दादा कहां से लाकर देंगे?
सिलिया को जान पड़ा, जैसे उसकी आंख में नयी ज्योति आ गयी है. आवेश में सोना को छाती
से लगाकर बोली-तूने इतनी अक्कल कहां से सीख ली सोना?देखने में तो तू बड़ी भोली-भाली
है? `इसमें अक्ल की कौन बात है चुड़ैल? क्या मेरे आंखें नहीं हैं कि मैं पागल हूं?
दो सौ मेरे ब्याह में लें. तीन-चार साल में वह दूना हो जाये. तब रुपिया के ब्याह
में दो सौ और लें. जो कुछ खेती-बारी है, सब लिलाम-तिलाम हो जाये, और द्वार-द्वार
भीख मांगते फिरें. यही न? इससे तो कहीं अच्छा है कि मैं अपनी ही जान दे दूं. मुंह
अंधेरे सोनारी चली जाना और उसे बुला लाना, मगर नहीं, बुलाने का काम नहीं है. मुझे
उससे बोलते लाज आयेगी. तू ही मेरा सन्देशा कह देना. देख, क्या जवाब देते हैं? कौन
दूर है? नदी के उस पार ही तो है.कभी-कभी ढौर लेकर इधर जाता है. एक बार उसकी भैंस
मेरे खेत में पड़ गयी थी, तो मैंने उसे बहुत गालियां दी थी. हाथ जोड़ने लगा. हां,
यह तो बता, इधर मतई से तेरी भेंट नहीं हुई? सुना, ब्राह्मन लोग उन्हें बिरादरी में
नहीं ले रहे हैं.
सिलिया ने हिकारत के साथ कहा-बिरादरी में क्यों न लेंगे? हां, बूढ़ा रुपये नहीं
खरच करना चाहता. इसको पैसा मिल जाये, तो झूठी गंगा उठा ले. लड़का आजकल बाहर ओसारे
में टिक्कड़ लगाता है.
`तू इसे छोड़ क्यों नहीं देती? अपनी बिरादरी में किसी के साथ बैठ जा और आराम से रह.
वह तेरा अपमान तो न करेगा.’
`हां रे, क्यों नहीं, मेरे पीछे उस बेचारे की इतनी दुर्दशा हुई, अब मैं उसे छोड़
दूं. अब वह चाहे पण्डित बन जाये, चाहे देवता बन जाये, मेरे लिए तो वही मतई है,
जो मेरे पैरों पर सिर रगड़ा करता था, और ब्राह्मन भी हो जाये और ब्राह्मनी से ब्याह
भी कर ले, फिर भी जितनी उसकी सेवा मैंने की है, वह कोई ब्राह्मनी क्या करेगी?
अभी मान मरजाद के मोह में वह चाहे मुझे छोड़ दे, लेकिन देख लेना, फिर दौड़ा आयेगा.’
`आ चुका अब. तुझे पा जाये, तो कच्चा ही खा जाये.’
`तो उसे बुलाने ही कौन जाता है? अपना-अपना धरम अपने-अपने साथ हैं. वह अपना धरम तोड़
रहा है, तो मैं अपना धरम क्यों तोड़ूं?’
प्रातःकाल सिलिया सोनारी की ओर चली, लेकिन होरी ने रोक लिया. धनिया के सिर में दर्द
था. उसकी जगह क्यारियों को बराना था. सिलिया इन्कार न कर सकी. यहां से जब दोपहर को
छुट्टी मिली, तो वह सोनारी चली.
इधर तीसरे पहर होरी फिर कुएं पर चला, तो सिलिया का पता न था. बिगड़कर बोला-सिलिया
कहां उड़ गयी? रहती है, रहती है, न जाने किधर चल देती है, जैसे किसी काम में जी ही
नहीं लगता. तू जानती है सोना, कहां गयी है?
सोना ने बहाना किया-मुझे तो कुछ मालूम नहीं. कहती थी धोबिन के घर कपड़े लेने जाना
है, वहीं चली गयी होगी.
धनिया ने खाट से उठकर कहा-चलो, मैं क्यारी बराये देती हूं. कौन उसे मजूरी देते हो,
जो बिगड़ रहे हो?
`हमारे घर में रहती नहीं है? उसके पीछे सारे गांव में बदनाम नहीं हो रहे हैं?’
`अच्छा, रहने दो, एक कोने में पड़ी हुऐ है, तो उससे किराया लोगे?’
`एक कोने में नहीं पड़ी हुई है, एक पूरी कोठरी लिये हुए है.’
`तो उस कोठरी का किराया होगा कोई पचास रुपये महीना?’
`उसका किराया एक पैसे सही. हमारे घर में रहती है, जहां जाये पूछकर जाये. आज आती है,
तो खबर लेता हूं.’
पुर चलने लगा. धनिया को होरी ने न आने दिया. रूपा क्यारी बराती थी और सोना मोट ले
रही थी. रूपा गीली मिट्टी के चूल्हे और बरतन बना रही थी, और सोना सशंक आंखों से
सोनारी की ओर ताक रही थी. शंका भी थी, आशा भी थी. शंका अधिक थी, आशा कम.सोचती थी,
उन दोनों को रुपये मिल रहें हैं, तो क्यों छोड़ने लगे? जिनके पास पैसे हैं, वे तो
पैसे पर और जान देते हैं. और गौरी महतो तो एक ही लालची हैं. मथुरा में दया है, धरम
है, लेकिन बाप की इच्छा जो होगी, वही उसे माननी पड़ेगी, मगर सोना भी बचा को ऐसा
फटकारेगी कि याद करेंगे. साफ कहेगी, जाकर किसी धनी की लड़की से ब्याह कर, तुझ जैसे
पुरूष के साथ मेरा निबाह न होगा. कहीं गौरी महतो मान गये, तो वह उनके चरन धो-धोकर
पियेगी. उनकी ऐसी सेवा करेगी कि अपने बाप की भी न की होगी, और सिलिया को भर पेट
मिठाई खिलायेगी. गोबर ने उसे जो रुपया दिया था, उसे वह अभी तक संचे हुऐ थी. इस मृदु
कल्पना से उसकी आंखें चमक उठीं और कपोलों पर हलकी-सी लाली दौड़ गयी.
मगर सिलिया अभी तक क्यों नहीं आयीं? कौन बड़ी दूर है? न आने दिया होगा उन लोगों ने.
अहा! वह आ रही है, लेकिन बहुत धीरे-धीरे आती है. सोना का दिल बैठ गया. अभागे नहीं
माने साइत, नहीं सिलिया दौड़ती आती. तो सोना से हो चुका ब्याह. मुंह धो रखो.
सिलिया आयी जरूर, पर कुएं पर न आकर खेत में क्यारी बराने लगी. डर रही थी, होरी
पूछेंगे कहां थी अब तक, तो क्या जवाब देगी? सोना ने यह दो घण्टे का समय बड़ी
मुश्किल से काटा. पुर छूटते ही वह भागी हुई सिलिया के पास पहुंची.
`वहां जाकर तू मर गयी थी क्या? ताकते-ताकते आंखें फूट गयीं?’
सिलिया को बुरा लगा-तो क्या मैं वहां सोती थी? इस तरह की बातचीत राह चलते थोड़े ही
हो जाती है. अवसर देखना पड़ता है. मथुरा नदी की ओर ढौर चराने गये थे. खोजती-खोजती
उसके पास गयी और तेरा सन्देश कहा. ऐसा परसन हुआ कि तुझसे क्या कहूं? मेरे पांव पर
गिर पड़ा और बोला- सिल्लो, मैंने तो जब से सुना है कि सोना मेरे घर में आ रही है,
तब से आंखों की नींद हर गयी है. उसकी वह गालियां मुझे फल गयीं, लेकिन काका को क्या
करूं? वह किसी की नहीं सुनते.
सोना ने टोका-तो सुने. सोना भी जिद्दिन है. जो कहा वह कर दिखायेगी. फिर हाथ
मलते रह जायेंगे.
`बस, उसी छन ढोरों को वहीं छोड़, मुझे लिये हुए गौरी महतो के पास गया. महतो के चार
पुर चलते हैं. कुआं भी उन्हीं का है. दस बीघे का ऊख है. महतो को देखके मुझे हंसी आ
गयी. जैसे कोई घसियारा हो. हां, भाग का बली है. बाप-बेटे में खूब कहा-सुनी हुई.
गौरी महतो कहते थे, तुझसे क्या मतलब, मैं चाहे कुछ लूं या न लूं, तू कौन होता है
बोलनेवाला? मथुरा कहता था, तुझको लेना-देना है,
तो मेरा ब्याह मत करों, मैं अपना ब्याह जैसे चाहूंगा, कर लूंगा. बात बढ़ गयी और
गौरी महतो ने पनहियां उतारकर मथुरा को खूब पीटा. कोई दूसरा लड़का इतनी मार खाकर
बिगड़ खड़ा होता. मथुरा एक घूंसा भी जमा देता, तो महतो फिर न उठते, मगर बेचारा
पचासों जूते खाकर भी कुछ न बोला. आंखों में आंसू भरे, मेरी ओर गरीबों की तरह ताकता
हुआ चला गया. तब महतो मुझ पर बिगड़ने लगे. सैकड़ों गालियां दी, मगर मैं क्यों सुनने
लगी थी? मुझे उनका क्या डर था? मैंने सफा कह दिया-महतो, दो-तीन सौ कोई भारी रकम
नहीं है, और होरी महतो इतने में बिक न जायेंगे. न तुम्हीं धनवान हो जाओगे, वह सब धन
नाच-तमासे में ही उड़ जायेगा. हां, ऐसी बहू न पाओगे.
सोना ने सजल नेत्रों से पूछा-महतो इतनी ही बात पर उन्हें मारने लगे?
सिलिया ने यह बात छिपा रक्खी थी. ऐसी अपमान की बात सोना के कानों में न डालना
चाहती ती, पर प्रश्न सुनकर संयम न रख सकी. बोली-वही गोबर भैयावाली बात थी. महतो ने
कहा-आदमी जूठा तभी खाता है, जब मीठा हो. कलंक चांदी से ही धुलता है. इस पर मथुरा
बोला-काका, कौन घर कलंक से बचा हुआ है? हां, किसी का खुल गया, किसी का छिपा हुआ है.
गौरी महतो भी पहले एक चमारिन से फंसे थे. उससे दो लड़के भी हैं, मथुरा के मुंह से
इतना निकलना था कि डोकरे पर जैसे भूत सवार हो गया. जितना लालची है, उतना ही क्रोधी
भी है बिना लिए न मानेगा.
दोनों घर चलीं. सोना के सिर पर चरसा, रस्सा और जुए का भारी बोझ था, पर इस समय वह
उसे फूल से भी हलका लग रहा था. उसके अन्तस्तल में जैसे आनन्द और स्फूर्ति का सोता
खुल गया हो. मथुरा की वह वीर मूर्ति सामने खड़ी थी, और वह जैसे उसे अपने हृदय मैं
बैठाकर उसके चरण आंसुओं से पखार रही थी. जैसे आकाश की देवियां उसे गोद में उठाये,
आकाश में छायी हुई लालिमा में लिये चली जा रही हों.
उसी रात को सोना को बड़े जोर का ज्वर चढ़ आया.
तीसरे दिन गौरी महतो ने नाई के हाथ यह पत्र भेजा.
`स्वस्ती श्री सर्वोपम जोग श्री होरी महतो को गौरीराम का राम-राम बांचना. आगे जो हम
लोगों में दहेज की बातचीत हुई थी, उसपर हमने सान्त मन से बिचार किया, समझ में आया
कि लेनदेन से वर और कन्या दोनों ही के घरवाले जेरबार होते हैं. जब हमारा-तुम्हारा
सम्बन्ध हो गया, तो हमें ऐसा व्यवहार करना चाहिए कि किसी को न अखरे. तुम दान-दहेज
की कोई फिकर मत करना, हम तुमको सौगन्ध देते हैं. जो कुछ मोटा-महीन जुरे, बरातियों
को खिला देना. हम वह भी न मांगेंगे. रसद का इन्तजाम हमने कर लिया है. हां, तुम खुशी
-खुरमी से हमारी जो खातिर करोगे, वह सिर झुकाकर स्वीकार करेंगे.’
होरी ने पत्र पढ़ा और दौड़े हुए भीतर जाकर धनिया को सुनाया. हर्ष के मारे उछला
पड़ता था,मगर धनिया किसी विचार में डूबी बैठी रही. एक क्षण के बाद बोली-यह गौरी
महतो की भलमनसी है, लेकिन हमें भी तो अपने मरजाद का निबाह करना है. संसार क्या
कहेगा? रुपया हाथ का मैल है. उसके लिए कुल-मरजाद नहीं छोड़ा जाता. जो कुछ हमसे हो
सकेगा, देंगे और गौरी महतो को लेना पड़ेगा. तुम यही जवाब लिख दो. मां-बाप की कमाई
में क्या लड़की का कोई हक नहीं है? नहीं, लिखना क्या है, चलो, मैं नाई से सन्देश
कहलाये देती हूं.
होरी हतबुद्धि-सा आंगन में खड़ा था और धनिया उस उदारता की प्रतिक्रिया मे, जो गौरी
महतो की सज्जनता ने जगा दी थी, सन्देशा कह रही थी. फिर उसने नाई को रस पिलाया और
विदाई देकर विदा किया.
वह चला गया, तो होरी ने कहा-यह तूने क्या कर डाला धनिया? तेरा मिजाज आज तक मेरी समझ
में न आया. तू आगे भी चलती है, पीछे भी चलती है. पहले तो इस बात पर लड़ रही थी कि
किसी से एक पैसा करज मत लो, कुछ देने-दिलाने का काम नहीं, और जब भगवान ने गौरी के
भीतर बैठकर यह पत्र लिखवाया, तो तूने कुल-मरजाद का राग छेड़ दिया.तेरा मरम भगवान्
ही जाने.
धनिया बोली- मुंह देखकर बौड़ा दिया जाता है, जानते हो कि नहीं? तब गौरी अपनी सान
दिखाते थे, अब वह भलमनसी दिखा रहे हैं. ईंट का जवाब पत्थर हो, लेकिन सलाम का जवाब,
तो गाली नहीं.होरी ने नाक सिकोड़कर कहा-तो दिखाश अपनी भलमानसी. देखें, कहां से
रुपये लाती है? धनिया आंखें चमकाकर बोली-रुपये लाना मेरा काम नहीं है, तुम्हारा काम

है. `मैं तो दुलारी से ही लुंगा.’
`ले लो उसी से. सूद तो सभी लेंगे. जब डूबना ही है, तो क्या तालाब और क्या गंगा?’
होरी बाहर आकर चिलम पीने लगा. कितने मजे से गला छूटा जाता था, लेकिन धनिया जब जान
छोड़े तब तो. जब देखो, उलटी ही चलती है. इसे जैसे कोई भूत सवार हो जाता है. घर की
दशा देखकर भी इसकी आंखें नहीं खुलतीं.

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