गोदान (भाग 2)

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गोबर और झुनिया के जाने के बाद घर सुनसान लगने लगा. धनिया को बार-बार चुन्नू की याद
आती रहती. बच्चे की मां तो झुनिया थी, पर उसका पालन धनिया ही करती थी. वही उसे उबटन
मलती, काजल लगाती, सुलाती और जब कामकाज से अवकाश मिलता, उसे प्यार करती.वात्सल्य
का यह नशा ही उसकी विपत्ति को भुलाता रहता था. उसका भोला-भाला, मक्खन-सा मुंह देखकर
वह अपनी सारी चिन्ता भूल जाती, और स्नेहमय गर्व से उसका हृदय फूल उठता . वह जीवन
का आधार अब न था. उसका सूना खटोला देखकर वह रो उठती. वह कवच, जो सारी चिन्ताओं और
दुराशाओं से उसकी रक्षा करता था, उससे छिन गया था. डाइन ने आकर उसका सोना-सा घर
मिट्टी में मिला दिया. गोबर ने कभी उसकी बात का जवाब भी न दिया था. इसी रांड ने उसे
फोड़ा और वहां ले जाकर न जाने कौन-कौन-सा नाच नचायेगी. यहां ही वह बच्चे की कौन
बहुत परवाह करती थी. उसे तो अपनी मिस्सी काजल, मांग चोटी से ही छुट्टी नहीं मिलती.
बच्चे की देखभाल क्या करेगी? बेचारा अकेला जमीन पर पड़ा रोता होगा. बेचारा एक दिन
भी तो सुख से रहने नहीं पाता.
कभी खांसी, कभी दस्त, कभी कुछ. यह सोचकर उसे झुनिया पर क्रोध आता. गोबर के लिए अब

भी उसके मन में वही ममता थी. इसी चुड़ैल ने उसे कुछ खिला-पिलाकर अपने वश में कर
लिया. ऐसी मायाविनी न होती, तो वह टोना ही कैसे करती? कोई बात न पूछता था. भौजाइयों
की लातें खाती थी. यह भुग्गा मिल गया, तो आज रानी हो गयी.
होरी ने चिढ़कर कहा-जब देखो तब तू झुनिया ही को दोष देती है. यह नहीं समझती कि अपना
सोना खोटा, तो सोनार का क्या दोष! गोबर उसे न ले जाता, तो क्या आप-से-आप चली जाती?
सहर का दाना-पानी लगने से लौंडे की आंखें बदल गयीं, ऐसा क्यों नहीं समझ लेती.
धनिया गरज उठी-अच्छा, चुप रहो. तुम्हीं ने रांड को मूड़ चढ़ा रखा था, नहीं मैंने
पहले ही दिन झाड़ू मारकर निकाल दिया होता.
खलिहान में डाठें जमा हो गयी थीं. होरी बैलों को जुखरकर अनाज मांड़ने जा रहा था.
पीछे मुंह फेरकर बोला-मान ले, बहू ने गोबर को फोड़ लिया, तो तू इतनी कुढ़ती क्यों
है? जो सारा जमाना करता है, वही गोबर ने किया. अब उसके बाल-बच्चे हुए. मेरे बाल-
बच्चों के लिए क्यों अपनी सांसत कराये, क्यों हमारे सिर का बोझ अपने सिर पर रखे?
`तुम्हीं उपद्रव की जड़ हो.’
`तो मुझे भी निकाल दो. ले जा बैलों को, अनाज मांड. मैं हुक्का पीता हूं.’
`तुम चलकर चक्की पीसो, मैं अनाज मांडूंगी.’
विनोद में दुःख उड़ गया. वही उसकी दवा है. धनिया प्रसन्न होकर रूपा के बाल गूंथने
बैठ गयी, जो बिलकुल उलझकर रह गये थे, और होरी खलिहान चला. रसिक वसन्त सुगन्ध और
प्रमोद और जीवन की विभूति लुटा रहा था, दोनों हाथों से दिल खोलकर.कोयल आम की
डालियों में छिपी अपनी रसीली, मधुर, आत्मस्पर्श कूक से आशाओं को जगाती फिरती थी.
महुए की डालियों पर मैनाओं की बरात-सी लगी बैठी थी. नीम और सिरस और करौंदे अपनी महक
में नशा-सा घोल देते थे. होरी आमों के बाग में पहुंचा, तो वृक्षों के नीचे तारे से
खिले थे. उसका व्यथित, निराश मन भी इस व्यापक शोभा और स्फूर्ति में आकर गाने लगे-
`हिया जरत रहत दिन- रैन
आम की डरिया कोयल बोले
तनिक न आवत चैन.’
सामने से दुलारी सहुआइन, गुलाबी साड़ी पहने चली आ रही थी. पांव में मोटे चांदी के
कड़े थे, गले में मोटी सोने की हंसली, चेहरा सूखा हुआ, पर दिल हरा. एक समय था, जब
होरी खेत खलिहान में उसे छेड़ा करता था. वह भाभी थी, होरी देवर था, इस नाते दोनों
में विनोद होता रहता था. जब से साहजी मर गये, दुलारी ने घरसे निकलना छोड़ दिया.
सारे दिन दुकान पर बैठी रहती थी और वहीं से सारे गांव की खबर लगाती रहती थी. कहीं
आपस में झगड़ा हो जाये, सहुआइन वहां बीच-बचाव करने के लिए अवश्य पहुंचेगी. आने
रुपये सूद से कम पर रुपये उधार न देती थी. और यद्यपि सूद के लोभ में मूल भी हाथ न
आता था-जो रुपये लेता, खाकर बैठ रहता- मगर उसके ब्याज का दर ज्यों- का-त्यों बना
रहता था. बेचारी कैसे वसूल करे. नालिश-फरयाद करने से रही, थाना-पुलिस करने से रही,
केवल जीभ का बल था. मगर ज्यों-ज्यों उम्र के साथ जीभ की तेजी बढ़ती जाती थी, उसकी
काट घटती जाती थी.अब उसकी गालियों पर लोग हंस देते थे और मजाक में कहते-क्या करेगी
रुपये लेकर काकी, साथ तो एक कौड़ी भी न ले जा सकेगी. गरीब को खिला-पिलाकर जितनी
असीम मिल सके, ले-ले. यही परलोक में काम आयेगा. और दुलारी परलोक के नाम से जलती थी.
होरी ने छेड़ा-आज तो भाभी, तुम सचमुच जवान लगती हो.
सहुआइन मगन होकर बोली-आज मंगल का दिन है, नजर न लगा देना. इसी मारे मैं कुछ पहनती-
ओढ़ती नहीं. घर से निकलो, तो सभी घूरने लगते हैं, जैसे कभी कोई मेहरिया देखी न हो.
पटेश्वरी लाला की पुरानी बान अभी नहीं छूटी.
होरी ठिठक गया, बड़ा मनोरंजक प्रसंग छिड़ गया था बैल आगे निकल गये.
`वह आजकल बड़े भगत हो गये हैं देखती नहीं हो, हर पूरनमासी को सत्यनारायन की
कथा सुनते हैं. और दोनों जून मन्दिर मैं दर्शन करने जाते हैं.’
`ऐसे लम्पट जितने होते हैं बूढ़े होकर भगत बन जाते हैं. कुकर्म का परासचित तो करना
ही पड़ता है. पूछो, मै अब बुढ़िया हुई, मुझसे क्या हंसी?’
`तुम अभी बुढ़िया कैसे हो गयीं भाभी? मुझे तो अब भी…’
`अच्छा,चुप ही रहना, नहीं डेढ़ सौ गाली दूंगी. लड़का परदेस कमाने लगा, एक दिन नेवता
भी न खिलाया, सेंत-मेंत में भाभी बनाने को तैयार.’
`मुझसे कसम ले लो भाभी, जो मैंने उसकी कमाई का एक पैसा भी छुआ हो.न जाने क्या लाया,
कहां खरच किया,मुझे कुछ भी पता नहीं. बस,एक जोड़ा धोती और एक पगड़ी मेरे हाथ लगी.’
`अच्छा कमाने तो लगा, आज नहीं कल घर संभालेगा ही. भगवान् उसे खुशी रखे. हमारे रुपये
भी थोड़ा-थोड़ा देते चलो. सूद ही तो बढ़ रहा है.’
`तुम्हारी एक-एक पाई दूंगा भाभी, हाथ में पैसे आने दो. और खा ही जायेंगे, तो कोई
बाहर के तो नहीं हैं, हैं तो तुम्हारे ही.’
सहुआइन ऐसी विनोद-भरी चापलुसियों से निरस्त्र हो जाती थी. मुसकराती हुई अपनी राह
चली गयी. होरी लपककर बैलों के पास पहुंच गया और उन्हें पौर मैं डालकर चक्कर देने
लगा. सारे गांव का यही एक खलिहान था. कहीं मड़ाई हो रही थी, कोई अनाज ओसा रहा था,
कोई गल्ला तौल रहा था. नाई-बारी, बढ़ई, लोहार, पुरोहित, भाट, भिखारी, सभी अपने-अपने
जेवरे लेने के लिए जमा हो गये थे. एक पेड़ के नीचे झिंगुरीसिंह खाट पर बैठे अपनी

सवाई उगाह रहे थे. कई बनिये खड़े गल्ले का भाव-ताव कर रहे थे. सारे खलिहान में
मण्डी की-सी रौनक थी. एक खटिकन बेर और मकोय बेच रही थी और एक खोंचेवाला तेल के
सेव और जलेबियां लिये फिर रहा था. पण्डित दातादीन भी होरी से अनाज बंटवाने के लिए आ
पहुंचे थे और झिंगुरीसिंह के साथ खाट पर बैठे थे.
दातादीन ने सुरती मलते हुए कहा-कुछ सुना, सरकार भी महाजनों से कह रही हे कि सूद का
दर घटा दो, नहीं डिग्री न मिलेगी.
झिंगुरी तमाखू फांककर बोले-पण्डित , मैं तो एक बात जानता हूं. तुम्हें गरज पड़ेगी,
तो सौ बार हमसे रुपये उधार लेने आओगे, और हम जो ब्याज चाहेंगे, लेंगे. सरकार अगर
असामियों को रुपये उधार देने का कोई बन्दोबस्त न करेगी, तो हमें इस कानून से कुछ न
होगा. हम दर कम लिखायेंगे, लेकिन एक सौ में पचीस पहले ही काट लेगें. इसमें सरकार
क्या कर सकती है?
`यह हो ठीक है, लेकिन सरकार भी इन बातों को खूब समझती है. इसकी भी कोई रोक

निकालेगी, देख लेना.
`इसकी कोई रोक हो ही नहीं सकती.’
`अच्छा अगर वह शर्त करदे, जब तक स्टाम्प पर गांव के मुखिया या कारिन्दा के दसखत न
होंगे, वह पक्का न होगा, तब क्या करोगे?’
`असामी को सौ बार गरज होगी, मुखिया का हाथ-पांव जोड़ के लायेगा और दसखत करायेगा. हम
तो एक-चौथाई काट ही लेंगे.’
`और जो फंस जाओ? जाली हिसाब लिखा और गये चौदह साल को.’
झिंगुरीसिंह जोर से हंसा-तुम क्या कहते हो पण्डित, क्या तब संसार बदल जायेगा? कानून
और न्याय उसका है, जिसके पास पैसा है. कानून तो है कि महाजन किसी असामी के साथ
कड़ाई न करे, कोई जमींदार किसी कास्तकार के साथ सख्ती न करे, मगर होता क्या है?
रोज ही देखते हो. जमींदार मुसक बंधवा के पिटवाता है और महाजन लात और जूते से बात
करता है. जो किसान पोंढ़ा है, उससे न जमींदार बोलता है, न महाजन. ऐसे आदमियों से हम
मिल जाते हैं और उनकी मदद से दूसरे आदमियों की गर्दन दबाते हैं. तुम्हारे ही ऊपर
रायसाहब के पांच सौ रुपये निकलते हैं, लेकिन नोखेराम में है इतनी हिम्मत कि तुमसे
कुछ बोले? वह जानते हैं, तुमसे मेल करने ही में उनका हित है. असामी में इतना बूता
है कि रोज अदालत दौड़े? सारा कारबार इसी तरह चलता जायेगा, जैसे चल रहा है. कचहरी-
अदालत इसी के साथ है, जिसके पास पैसा है. हम लोगों को घबराने की कोई बात नहीं.
यह कहकर उन्होंने खलिहान का एक चक्कर लगाया और फिर आकर खाट पर बैठते हुए बोले-हां,
मतई के ब्याह का क्या हुआ हमारी सलाह तो है कि उसका ब्याह कर डालो. अब तो बड़ी
बदनामी हो रही है.
दातादीन को जैसे ततैया ने काट खाया. इस आलोचना का क्या आशय था, वह खूब समझते थे.गरम
होकर बोले-पीठ पीछे आदमी जो चाहे बके, हमारे मुंह पर कोई कुछ कहे. तो उसकी मूंछें
उखाड़ दूं. कोई हमारी तरह नरम नेमी बन तो ले. कितनों को जानता हूं, जो कभी सन्ध्या-
बन्दन नहीं करते हैं. हमारे ऊपर क्या हंसेगा कोई, जिसने अपने जीवन में एक एकादशी भी
नागा नहीं की, कभी बिना स्नान-पूजा किये मुंह में पानी नहीं डाला. नेम निभाना कठिन
है. कोई बता दे कि हमने कभी बाजार की कोई चीज खायी हो या किसी दूसरे के हाथ का पानी
पिया हो, तो उसकी टांग की राह निकाल जाऊं.सिलिया हमारी चौखट नहीं लांगने पाती, बरतन
-भांडे छूना, तो दूसरी बात है. मैं यह नहीं कहता कि मतई यह बहुत अच्छा काम कर रहा
है, लेकिन जब एक बार एक बात हो गयी, तो यह पाजी का काम है कि औरत को छोड़ दे. मैं
खुल्लमखुल्ला कहता हूं, इसमें छिपाने की कोई बात नहीं. स्त्री-जाति पवित्र है.
दातादीन अपनी जवानी में स्वयं बड़े रसिया रह चुके थे, लेकिन नेम-धर्म से भी कभी
नहीं चूके. मातादीन भी सुयोग्य पुत्र की भांति उन्हीं के पद चिन्हों पर चल रहा था.
धर्म का मूल तत्त्व है पूजा-पाठ, कथा-व्रत और चौका-चूल्हा. जब पिता-पुत्र दोनों ही
मूल तत्त्व को पकड़े हुए हैं, तो किसकी मजाल है कि उन्हें पथ-भ्रष्ट कह सके?
झिंगुरीसिंह ने काइल होकर कहा-मैंने तो भाई, जो सुना था, वह तुमसे कह दिया.
दातादीन ने महाभारत और पुराणों से ब्राह्मणों और अन्य जातियों की कन्याओं के ग्रहण
किये जाने की एक लम्बी सूची पेश की और यह सिद्ध कर दिया कि उनसे जो सन्तान हुई, वह
ब्राह्मण कहलायी और आजकल के जो ब्राह्मण हैं, वह उन्हीं की सन्तान हैं. यह प्रथा
आदिकाल से चली आयी है ओर इसमें कोई लज्जा की बात नहीं.
झिंगुरीसिंह उनके पाण्डित्य पर मुग्ध होकर बोले-तब क्यों आजकल लोग वाजपेयी और
सुकुल बने फिरते हैं?
`समय-समय की परथा है और क्या? किसी में उतना तेज तो हो. बिस खाकर उसे पचाना तो
चाहिए. वह सतजुग की बात थी, सतजुग के साथ गयी. अब तो अपना निबाह बिरादरी के साथ मिल
कर रहने में है. मगर करूं क्या, कोई लड़कीवाला आता ही नहीं. तुमसे भी कहा , औरों से
भी कहा, कोई नहीं सुनता, तो मैं क्या लड़की बनाऊं?’
झिंगुरीसिंह ने डांटा-झूठ मत बोलो पण्डित, मैं दो आदमियों को फांस-फूंसकर लाया, मगर
तुम मुंह फैलाने लगे, तो दोंनों कान खड़े करके निकल भागे. आखिर किस बिरते पर हजार-

पांच सौ मांगते हो तुम? दस बीघे खेत और भीख के सिवा तुम्हारे पास और क्या है?
दातादीन के अभिमान को चोट लगी. दाढ़ी पर हाथ फेरकर बोले-पास कुछ न सही, मैं भीख ही
मांगता हूं. लेकिन मैंने अपनी लड़कियों के ब्याह मैं पांच-पांच सौ दिये हैं, फिर
लड़के के लिए पांच सौ क्यों न मांगू? किसी ने सेंत-मेंत में मेरी लड़की ब्याह ली
होती, तो मैं भी सेंत में लड़का ब्याह लेता. रही हैसियत की बात. तुम जजमानी कौ भीख
समझो, मैं तो उसे जमींदारी समझता हूं,बंकघर. जमींदारी मिट जाये, बंकघर टूट जाये,
लेकिन जजमानी अन्त तक बनी रहेगी. जब तक हिन्दू जाति रहेगी, तब तक ब्राह्मण भी
रहेंगे और जजमानी भी रहेगी. सहालग में मजे से घर बैठे सौ-दो सौ फटकार लेते हैं. कभी
भाग लड़ गया, तो चार-पांच सौ मार लिया. कपड़े, बरतन, भोजन अलग. कहीं-न-कहीं नित ही
कार-परोजन पड़ा ही रहता है. कुछ न मिले तब भी एक दो थाल और दो चार आने दक्षिणा मिल
ही जाते हैं. ऐसा चेन न जमींदारी में है, न साहूकारी में. और फिर मेरा तो सिलिया से
जितना उबार होता है, उतना ब्राह्मण की कन्या से क्या होगा? वह तो बहुरिया बनी बैठी
रहेगी. बहुत होगा रोटियां पका देगी.यहां सिलिया अकेली तीन आदमियों का काम करती है.
और मैं उसे रोटी के सिवा और क्या देता हूं? बहुत हुआ, तो साल में एक धोती दे दी.
दूसरे पेड़ के नीचे दातादीन का निजी पैरा था. चार बैलौं से मड़ाई हो रही थी. धन्ना
चमार बैलों को हांक रहा था, सिलिया पैर से अनाज निकाल-निकालकर ओसा रही थी और
मातादीन दूसरी ओर बैठा लाठी में तेल मल रहा था.
सिलिया सांवली, सलौनी, छरहरी बालिका थी, जो रूपवती न होकर भी आकर्षक थी. उसके
हास मैं, चितवन में, अंगों के विलास में हर्ष का उन्माद था, जिससे उसकी बोटी-बोटी
नाचती रहती थी, सिर से पांव तक भूसे के अणुओं में सनी, पसीने से तर, सिर के बाल आधे
खुले. वह दौड़-दौड़कर अनाज ओसा रही थी, मानो तन-मन से कोई खेल खेल रही हो.

मातादीन ने कहा-आज सांझ तक अनाज बाकी न रहे सिलिया! तू थक गयी हो, तो मैं आऊं.
सिलिया प्रसन्न मुख बोली-तुम काहे को आओगे पण्डित! मैं सांझ तक सब ओसा दूंगी.
`अच्छा, तो मैं अनाज ढो-ढोकर रख आऊं. तू अकेली क्या-क्या कर लेगी?’
`तुम घबराते क्यों हो, मै ओसा दूंगी, ढोकर रख भी आऊंगी. पहर रात तक यहां एक दाना
भी न रहेगा.’
दुलारी सहुआइन आज अपना लेहना वसूल करती फिरती थी. सिलिया उसकी दुकान से होली
के दिन दो पैसे का गुलाबी रंग लायी थी. अभी तक पैसे न दिये थे. सिलिया के पास आकर
बोली- क्यों री, सिलिया, महीना-भर रंग लाये हो गया, अभी तक पैसे न दिये? मांगती हूं
तो मटकक चली जाती है. आज मैं बिना पैसा लिये न जाऊंगी.
मातादीन चुपके-से सरक गया. सिलिया का तन और मन दोनों लेकर भी बदले में कुछ न देना
चाहता था. सिलिया अब उसकी निगाह में केवल काम करने की मशीन थी, और कुछ नहीं. उसकी
ममता को वह बड़े कौशल से नचाता रहता था. सिलिया ने आंख उठाकर देखा, तो मातादीन वहां
न था. बोली-चिल्लाओ मत सहुआइन, यह ले लो, दो कली जगह चार पैसे का अनाज अब क्या
जान लेगी? मैं मरी थोड़े ही जाती थी.
उसने अन्दाज से कोई सेर- भर अनाज ढेर में से निकालकर सहुआइन के फैले हुए आंचल में
डाल दिया. इसी वक्त मातादीन पेड़ की आड़ से झल्लाया हुआ निकला और सहुआइन का आंचल
पकड़कर बोला-अनाज सीधे से रख दो सहुआइन, लूट नहीं है.
फिर उसने लाल-लाल आंखों से सिलिया कि देखकर डांटा-तूने अनाज क्यों दे दिया? किससे
पूछकर दिया? तू कौन होती है मेरा अनाज देने वाली?
सहुआइन ने अनाज ढेर में डाल दिया और सिलिया हक्का-बक्का होकर मातादीन का मुंह

देखने लगी. ऐसा जान पड़ा, जिस डाल पर वह निश्चिन्त बैठी हुई थी, वह टूट गयी और अब
वह निराधार नीचे गिरी जा रही है. खिसियाये हुए मुंह से आंखों में आंसूं भरकर सहुआइन
से बोली- तुम्हारे पैसे मैं फिर दे दूंगी सहुआइन! आज मुझ पर दया करो.
सहुआइन ने उसे दयार्द्र नेत्रों से देखा और मातादीन को धिक्कार-भरी आंखों से देखती
हुई चली गयी.
तब सिलिया ने अनाज ओसाते हुए आहत गर्व से पूछा-तुम्हारी चीज में मेरा कुछ अख्तियार
नहीं है?
मातादीन आंखें निकालकर बोला- नहीं, तुझे कोई अख्तियार नहीं है. काम करती है, खाती
है. जो तू चाहे खा भी, लुटा भी, तो यह यहां न होगा. अगर तुझे यहां न परता पड़ता हो,
कहीं और जाकर काम कर. मजूरों की कमी नहीं हैं. सेंत में नहीं लेते, खाना-कपड़ा देते
हैं.
सिलिया ने उस पक्षी की भांति, जिसे मालिक ने पर काटकर पिंजरे से निकाल दिया हो,
मातादीन की ओर देखा. उस चितवन में वेदना अधिक थी या भर्त्सना, यह कहना कठिन है, पर
उसी पक्षी की भांति उसका मन फड़फड़ा रहा था और ऊंची डाल पर उन्मुक्त वायु-मण्डल में
उड़ने की शक्ति न पाकर उसी पिंजरे में जा बैठना चाहता था, चाहे बेदाना, बेपानी,

पिंजरे की तीलियों से सिर टकराकर मर ही क्यों न जाना पड़े. सिलिया सोच रही थी, अब
उसके लिए दूसरा कौन-सा ठौर है. वह ब्याहता न होकर भी संस्कार में और व्यवहार में और
मनोभावना में ब्याहता थीं, और अब मातादीन चाहे उसे मारे या काटे, उसे दूसरा आश्रय
नहीं है. उसे वह दिन याद आये-और अभी दो साल भी तो नहीं हुए-जब यही मातादीन उसके
तलवे सहलाता था, जब उसने जनेऊ हाथ में लेकर कहा था-सिलिया, जब तक दम में दम है,
तुझे ब्याहता की तरह रखूंगा, जब वह प्रेमातुर होकर हार में और बाग में और नदी के तट
पर उसके पीछे-पीछे पागलों की भांति फिरा करता था. और आज उसका यह निष्ठुर व्यवहार!
मुट्ठी-भर अनाज के लिए उसका पानी उतार लिया.
उसने कोई जवाब न दिया. कण्ठ में नमक के डले का-सा अनुभव करती हुई आहत हृदय
और शिथिल हाथों से फिर काम करने लगी.
उसी वक्त उसकी मां, बाप, दोनों भाई और कई अन्य चमारों ने न जाने किधर से आकर
मातादीन को घेर लिया. सिलिया की मां ने आते ही उसके हाथ से अनाज की टोकरी छीनकर
फेंक दी और गाली देकर बोली-रांड़, जब तुझे मजूरी ही करनी थी, तो घर की मजूरी छोड़कर
यहां क्या करने आयी? जब ब्राह्मन के साथ रहती है, तो ब्राह्मन की तरह रह. बिरादरी
की नाक कटवाकर भी चमारिन ही बनना था, तो यहां क्या घी का लोंदा लेने आयी थीं?
चुल्लू-भर पानी में डूब नहीं मरती!
झिंगुरीसिंह और दातादीन दोनों दौड़े और चमारों के बदले हुए तेवर देखकर उन्हें शान्त
करने की चेष्टा करने लगे. झिंगुरीसिंह ने सिलिया के बाप से पूछा-क्या बात है चौधरी,
किस बात का झगड़ा है?
सिलिया का बाप हरखू साठ साल का बूढ़ा था, काला, दुबला, सूखी मिर्च की तरह पिचका
हुआ, पर उतना ही तीक्ष्ण. बोला-झगड़ा कुछ नहीं है ठाकुर, हम आज या तो मातादीन को
चमार बना के छोड़ेंगे या उनका और अपना रक्त एक कर देंगे. सिलिया कन्या जात है, किसी
-न- किसी के घर जायेगी ही.इस पर हमें कुछ नहीं कहना है, मगर उसे जो कोई भी रखे,
हमारा होकर रहे. तुम हमें ब्राह्मन नहीं बना सकते, मुदा हम तुम्हें चमार बना सकते
हैं. हमें ब्राह्मन बना दो, हमारि सारी बिरादरी बनने को तैयार है. जब यह समरथ नहीं
है, तो फिर तुम चमार बनो. हमारे साथ खाओ-पिओ, हमारे साथ उठो-बैठो. हमारी इज्जत लेते
हो, अपना धरम हमें दो.
दातादीन ने लाठी फटकार कहा-मुंह संभालकर बातें कर हरखुआ. तेरी बिटिया वह खड़ी
है,ले जा जहां चाहे. हमने उसे बांध नहीं रक्खा है. काम करती थी, मजूरी लेती थी.
यहां मजूरों की कमी नहीं है.
सिलिया की मां उंगली चमकाकर बोली-वाह पण्डित! खूब नियाव करते हो. तुम्हारी लड़की
किसी चमार के साथ निकल गयी होती और तुम इसी तरह की बातें करते, तो देखती. हम चमार
हैं, इसलिए हमारी कोई इज्जत नहीं? हम सिलिया को अकेले न ले जायेंगे, उसके साथ
मातादीन को भी ले जायेंगे, जिसने उसकी इज्जत बिगाड़ी है. तुम बड़े नेमी-धरमी हो. उस
के साथ सोओगे. लेकिन उसके हाथ का पानी न पियोगे. यही चुड़ैल है कि यह सब सहती है.

मैं तो ऐसे आदमी को माहुर दे देती.
हरखू ने अपने साथियों को ललकारा-सुन ली इन लोगों की बात कि नहीं? अब क्या खड़े मुंह
ताकते हो?
इतना कहना था कि दो चमारों ने लपककर मातादीन के हाथ पकड़ लिए, तीसरे ने झपटकर उसका
जनेऊ तोड़ डाला और इसके पहले कि मातादीन और झिंगुरीसिंह अपनी-अपनी लाठी संभाल सकें,
दो चमारों ने मातादीन के मुंह में एक बड़ी-सी हड्डी का टुकड़ा डाल दिया. मातादीन ने
दांत जकड़ लिये, फिर भी वह घिनौनी वस्तु उनके होंठों में तो लग ही गयी. उन्हें मतली
हुई और मुंह आप- से-आप खुल गया और हड्डी कण्ठ तक जा पहुंची. इतने में खलिहान के
सारे आदमी जमा हो गये, पर आश्चर्य यह कि कोई इन धर्म के लुटेरों से मुजाहिम न हुआ.
मातादीन का व्यवहार सभी को नापसन्द था.वह गांव की बहू-बेटियों को घूरा करता था,
इसलिए मन में सभी उसकी दुर्गति से प्रसन्न थे. हां ऊपरी मन से चमारों पर रोब जमा
रहे थे.
होरी ने कहा-अच्छा, अब बहुत हुआ हरखू. भला चाहते हो, तो यहां से चले जाओ. हरखू ने

निडरता से उत्तर दिया-तुम्हारे घर में भी लड़कियां है होरी महतो, इतना समझ लो. इसी
तरह गांव की मरजाद बिगड़ने लगी, तो किसी की आबरू न बचेगी.
एक क्षण में शत्रु पर पूरी विजय पाकर आक्रमणकारियों ने वहां से टल जाना ही उचित
समझा. जनमत बदलते देर नहीं लगती. उससे बचे रहना ही अच्छा.
मातादीन कै कर रहा था. दातादीन नेत उसकी पीठ सहलाते हुए कहा-एक-एक को पांच-
पांच साल के लिए न भेजवाया, तो कहना. पांच-पांच साल तक चक्की पिसवाऊंगा.
हरखू ने हेकड़ी के साथ जवाब दिया-इसका यहां कोई गम नहीं.कौन तुम्हारी तरह बैठे
मौज करते हैं? जहां काम करेंगे, वहीं आधा पेट दाना मिल जायेगा.
मातादीन कै करने के बाद निर्जीव-सा जमीन पर लेट गया, मानो कमर टूट गयी हो, मानो डूब
मरने के लिए चुल्लू-भर पानी खोज रहा हो. जिस मर्यादा के बल पर उसकी रसिकता और
घमण्ड और पुरुषार्थ अकड़ता फिरता था, वह मिट चुकी थी. उस हड्डी के टुकड़े ने उसके
मुंह को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी अपवित्र कर दिया था. उसका धर्म इसी खान-पान,
छूत-विचार पर टिका हुआ था. आज उस धर्म की जड़ कट गयी. अब वह लाख प्रायश्चित करे
लाख गोबर खाये और गंगाजल पिये, लाख दान-पुण्य और तीर्थ-व्रत करे, उसका मरा हुआ धर्म
जी नहीं सकता. अगर अकेले की बात होती, तो छिपा ली जाती, यहां तो सबके सामने उसका

धर्म लुटा.अब उसका सिर हमेशा के लिए नीचा हो गया. आज से वह अपने ही घर में अछूत
समझा जायेगा. उसकी स्नेहमयी माता भी उससे घृणा करेगी, और संसार से धर्म का ऐसा लोप
हो गया कि इतने आदमी केवल खड़े तमाशा देखते रहे. किसी ने चूं तक न की.एक क्षण पहले
जो लोग उसे पालागन करते थे, अब उसे देखकर मुंह फेर लेंगे. वह किसी मन्दिर में भी न
जा सकेगा,न किसी के बरतन-भांडे छू सकेगा. और यह सब हुआ इस अभागिनि सिलिया के कारण.
सिलिया जहां अनाज ओसा रही थी, वहीं सिर झुकाये खड़ी थी, मानो यह उसी की दुर्गति हो
रही है. सहसा उसकी मां ने आकर डांटा-खड़ी ताकती क्या है? चल सीधे घर, नहीं बोटी-
बोटी काट डालूंगी. बाप-दादा का नाम तो खूब उजागर कर चुकी, अब क्या करने लगी है?
सिलिया मूर्तिवत खड़ी ताकती रही. माता-पिता और भाइयों पर उसे क्रोध आ रहा था. यह
लोग क्यों उसके बीच में बोलते हैं? वह जैसे चाहती है, रहती है, दूसरों से क्या
मतलब? कहते हैं, यहां तेरा अपमान होता है, तब क्या कोई ब्राह्मण उसका पकाया खा
लेगा? उसके हाथ का पानी पी लेगा? अभी जरा देर पहले उसका मन मातादीन के निठुर
व्यवहार से खिन्न हो रहा था, पर अपने घरवालों और बिरादरी के इस अत्याचार ने उस
विराग को प्रचण्ड अनुराग का रूप दे दिया.
विद्रोह-भरे मन से बोली-मैं कहीं न जाऊंगी. तू क्या यहां भी मुझे जीने न देगी?
बुढ़िया कर्कश स्वर में बोली-तू न चलेगी?
`नहीं.’
`चल सीधे से.’
`नहीं जाती.’
तुरन्त दोनों भाइयों ने उसके हाथ पकड़ लिये और उसे घसीटते हुए ले चले. सिलिया जमीन
पर बैठ गयी. भाइयों ने इस पर भी न छोड़ा. घसीटते ही रहे. उसकी साड़ी फट गयी, पीठ और
कमर की खाल छिल गयी, पर वह जाने पर राजी न हुई.
तब हरखू ने लड़कों से कहा-अच्छा, अब इसे छोड़ दो. समझ लेंगे मर गयी. मगर अब जो कभी
मेरे द्वार पर आयी, तो लहू पी जाऊंगा.
सिलिया जान पर खेल कर बोली- हां, जब तुम्हारे द्वार पर जाऊं, तो पी लेना.
बुढ़िया ने क्रोध के उन्माद में सिलिया को कई लातें जमायीं और हरखू ने उसे हटा न
दिया होता, तो शायद प्राण ही लेकर छोड़ती.
बुढ़िया फिर झपटी, तो हरखू ने उसे धक्के देकर पीछे हटाते हुए कहा-तू भी हत्यारिन है
कलिया. क्या उसे मार ही डालेगी?
सिलिया बाप के पैरों से लिपटकर बोली-मार डालो दादा, सब जने मिलकर मार डालो. हाय
अम्मां, तुम इतनी निर्दयी हो? इसीलिए दूध पिलाकर पाला था? सौर में ही क्यों न गला
घोंट दिया? हाय! मेरे पीछे पण्डित को भी तुमने भिरस्ट कर दिया. उसका धरम लेकर
तुम्हें क्या मिला? अब तो वह भी मुझे न पूछेगा. लेकिन पूछे-न-पूछे, रहूंगी तो उसी
के साथ. वह मुझे चाहे भूखों रखे, चाहे मार डाले, पर उसका साथ न छोडूंगी. उनकी सांसत
कराके छोड़ दूं? मर जाऊंगी, पर हरजाई न बनूंगी. एक बार जिसने बांह पकड़ ली, उसी की
रहूंगी.
कलिया ने ओठ चबाकर कहा- जाने दो रांड को. समझती है, वह इसका निबाह करेगा. मगर आज
आज ही मारकर भगा न दे, तो मुंह न दिखाऊं.
भाइयों को भी दया आ गयी. सिलिया को वहीं छोड़कर सब-के-सब चले गये. तब वह धीरे से उठ
कर लंगड़ाती, कराहती, खलिहान में आकर बैठ गयी और अञ्चल में मुंह ढ़ांपकर रोने लगी

दातादीन ने जुलाहे का गुस्सा दाढ़ी पर उतारा-उनके साथ चली क्यों नहीं गयी सिलिया!अब
क्या करवाने लगी हुई है? मेरा सत्यानाश कराके भी पेट नहीं भरा?
सिलिया ने आंसूं-भरी आंखें ऊपर उठायी. उनमें तेज की झलक थी.
`उनके साथ क्यों जाऊं? जिसने बांह पकड़ी है, उसके साथ रहूंगी.’
पण्डित जी ने धमकी दी- मेरे घर मैं पांव रखा, तो लातों से बात करूंगा.
सिलिया ने भी उद्दण्डता से कहा- मुझे जहां वह रखेंगे वहां रहूंगी. पेड़ तले रखें,
चाहे महल में रखें.
मातादीन संज्ञाहीन-सा बैठा था. दोपहर होने आ रही थी. धूप पत्तियों से छन-छनकर उसके
चेहरे पर पड़ रही थी. माथे से पसीना टपक रहा था. पर वह मौन, निस्पन्द बैठा हुआ था.
सहसा जैसे उसने होश में आकर कहा-मेरे लिए अब क्या कहते हो दादा?
दातादीन ने उसके सिर पर हाथ रखकर ढाढ़स देते हुए कहा- तुम्हारे लिए अभी मैं क्या
कहूं बेटा? चलकर नहाओ, खाओ, फिर पण्डितों की जैसी व्यवस्था होगी, वैसा किया जायेगा.
हां, एक बात है, सिलिया को त्यागना पड़ेगा.
मातादीन ने सिलिया की ओर रक्त-भरे नेत्रों से देखा-मैं अब इसका कभी मुंह न देखूंगा,
लेकिन परासचित हो जाने पर कोई दोष न रहेगा?
`परासचित हो जाने पर कोई दोष-पाप नहीं रहता.’
`तो आज ही पण्डितों के जाओ.’
`आज ही जाऊंगा बेटा!’
`लेकिन पण्डित लोग कहें कि उसका परासचित नहीं हो सकता, तब?’
`उनकी जैसी इच्छा.’
`तो तुम मुझे घर से निकाल दोगे?’
दातादीन ने पुत्र-स्नेह से विह्वल होकर कहा-ऐसा कहीं हो सकता है, बेटा? धन जाये,धरम
जाये, लोक-मरजाद जाये, पर तुम्हें छोड़ नहीं सकता.
मातादीन ने लकड़ी उठायी और बाप के पीछे-पीछे घर चला. सिलिया भी उठी और लंगड़ाती हुई
उसके पीछे हो ली.
मातादीन ने पीछे फिरकर निर्मम स्वर में कहा-मेरे साथ मत आ. मेरा तुझसे कोई वास्ता
नहीं. इतनी सांसत करवा करके भी तेरा पेट नहीं भरता?
सिलिया ने धृष्टता के साथ उसका हाथ पकड़ कर कहा-वास्ता कैसे नहीं है? इसी गांव में
तुमसे धनी, तुमसे सुन्दर, तुमसे इज्जतदार लोग हैं. मैं उनका हाथ क्यों नहीं पकड़ती?
तुम्हारी यह दुर्दशा ही आज क्यों हुई? जो रस्सी तुम्हारे गले में पड़ गई है, उसे
तुम लाख चाहो,नहीं छोड़ सकते. और न मैं तुम्हें छोड़कर कहीं जाऊंगी.मजूरी करूंगी,
भीख मांगूंगी? लेकिन तुम्हें न छोड़ूंगी
यह कहते हुए उसने मातादीन का हाथ छोड़ दिया और फिर खलिहान में जाकर अनाज ओसाने
लगी.होरी अभी तक वहां अनाज मांड रहा था.धनिया उसे भोजन करने के लिए बुलाने आयी थी
होरी ने बैलों को पैर से बाहर निकालकर एक पेड़ में बांध दिया और सिलिया से बोला-तू
भी जा,खा-पी-आ सिलिया. धनिया यहां बैठी है.तेरी पीठ पर की साड़ी तो लहू से रंग गई
है री! कहीं घाव पक न जाय. तेरे घरवाले बड़े निर्दयी हैं
सिलिया ने उसकी ओर करूण नेत्रों से देखा-यहां निर्दयी कौन नहीं है दादा? मैंने तो
किसी को दयावान नहीं पाया.
`क्या कहा पण्डित ने?’
`कहते हें, मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं.’
`अच्छा ऐसा! कहते हैं?’
`समझते होंगे, इस तरह अपने मुंह की लाली रख लेंगे, लेकिन जिस बात को दुनिया जानती
है, उसे कैसे छिपा लेंगे? मेरी रोटियां भारी हैं, न दें. मेरे लिए क्या? मजूरी अब
भी करती हूं, तब भी करूंगी. सोने की हाथ-भर जगह तुम्ही से मांगूंगी, तो क्या तुम
न दोगे?’
धनिया दयार्द्र होकर बोली-जगह की कौन कमी है बेटी? तू चल मेरे घर रह.
होरी ने कातर स्वर में कहा-बुलाती तो है, लेकिन पण्डित को जानती नहीं?
धनिया ने निर्भीक स्वर में कहा-बिगड़ेंगे, तो एक रोटी बेसी खा लेंगे, और क्या
करेंगे? कोई उनकी दबैल हूं? उसकी इज्जत ली, बिरादरी से निकलवाया, अब कहते हैं
मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं. 197
आदमी है कि कसाई? यह उसी नीयत का आज फल मिला है. पहले नहीं सोच लिया था, तब
तो बिहार करते रहे. अब मुझसे कौन वास्ता!
होरी के विचार में धनिया गलत कर रही थी. सिलिया के घरवालों ने मतई को कितना बेधरम

कर दिया, यह कोई अच्छा काम नहीं किया. सिलिया को चाहे मारकर ले जाते, दुलारकर ले
जाते, वह उनकी लड़की है. मतई को क्यों बेधरम किया?
धनिया ने फटकार बतायी-अच्छा रहने दो, बड़े न्यायी बने हो. मरद-मरद सब एक होते हैं.
इसको मतई ने बेधरम किया, तब तो किसी को बुरा न लगा. अब जो मतई बेधरम हो गये, तो
क्यों बुरा लगता है? क्या सिलिया का धरम, धरम ही नहीं? रखी तो चमारिन, उस पर नेमी-
धर्मी बनते हैं. बड़ा अच्छा किया किया हरखू चौधरी ने. ऐसे गुण्डों की यही सजा है.
तू चल सिलिया मेरे घर, न जाने कैसे बेदरद मां-बाप हैं कि बेचारी की सारी पीठ
लहुलुहान कर दी. तुम जाके सोना को भेज दो. मैं इसे लेकर आती हूं.
होरी चला गया और सिलिया धनिया के पैरों पर गिरकर रोने लगी.

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