गोदान (भाग 2)

: 21 :

देहातों में साल के छः महीने किसी-न-किसी उत्सव में ढोल-मजीरा बजता रहता है. होली
के एक महीना पहले से एक महीना बाद तक फाग उड़ती है, आषाढ़ लगते ही आल्हा शुरू हो
जाता है ओर सावन भादों में कजलियां होती हैं.कजलियों के बाद रामायण-गान होने लगता
है. सेमरी भी अपवाद नहीं है. महाजन की धमकियां और कारिन्दे की बोलियां इस समारोह
में बाधा नहीं डाल सकतीं. घर में अनाज नहीं है. देह पर कपड़े नहीं हैं, गांठ में
पैसे नहीं हैं, कोई परवाह नहीं, जीवन की आनन्दवृति तो दबयी नहीं जा सकती, हंसे
बिना तो जिया नहीं जा सकता.
यों होली में गाने-बजाने का मुख्य स्थान नोखेराम की चौपाल थी. वहीं भंग बनती थी,
वहीं रंग उड़ता था, वहीं नाच होता था. इस उत्सव में कारिन्दा साहब के दस-पांच रुपये
खर्च हो जाते थे. और किसमें यह सामर्थ्य थी कि अपने द्वार पर जलसा कराता?
लेकिन अबकी गोबर ने गांव के सारे नवयुवकों को अपने द्वार पर खींच लिया है और
नोखेराम की चौपाल खाली पड़ी हुई है. गोबर के द्वार पर भंग घुट रही है, पान के बीड़े
लग रहे हैं, रंग घोला जा रहा है, फर्श बिछा हुआ है, गान हो रहा है, और चौपाल में
सन्नाटा छाया हुआ है.भंग रखी हुई है, पीसे कौन? ढोल-मजीरा सब मौजूद है,पर गाये कौन?
जिसे देखो, गोबर के द्वार की ओर दौड़ा चला जा रहा है. यहां भंग में गुलाब जल और
केसर और बादाम की बहार है. हां-हां, सेर-भर बादाम गोबर खुद लाया. पीते ही चोला तर
हो जाता है, आंखें खुल जाती हैं. खमीरा तमाखू लाया है, खास बिसवां की? रंग में भी
केवड़ा छोड़ा है. रुपये कमाना भी जानता है और खरच करना भी जानता है.गाड़कर रख लो
तो कौन देखता है? धन की यही शोभा है. और केवल भंग ही नहीं है, जितने गानेवाले हैं,
सबका नेवता भी है, और गांव में न नाचनेवालों की कमी है, न गानेवालों की, न अभिनय
करने वालों की. शोभा ही लंगड़ों की ऐसी नकल करता है कि क्या कोई करेगा और बोली की
नकल करने में तो उसका सानी नहीं है. जिसकी बोली कहो, उसकी बोले-आदमी की भी, जानवर
की भी. गिरधर नकल करने में बेजोड़ है. वकील की नकल वह करे, पटवारी की नकल वह करे,

थानेदार की, चपरासी की, सेठ की-सभी की नकल कर सकता है. हां, बेचारे के पास वैसा
सामान नहीं है, मगर अबकी गोबर ने उसके लिए सभी सामान मंगा दिया है, उसकी नकलें
देखने जोग होगी.
यह चर्चा इतनी फैली कि सांझ से ही तमाशा देखने वाले जमा होने लगे. आसपास के गांवों
से दर्शकों की टोलियां आने लगीं. दस बजते-बजते तीन चार हजार जमा हो गये और जब गिरधर
झिंगुरीसिंह का रूप धरे अपनी मण्डली के साथ खड़ा हुआ, तो लोगों को खड़े होने की जगह
भी न मिलती थी. वही खल्वाट सिर, वही बड़ी-बड़ी मूंछे, और वही तोंद. बैठे भोजन कर
रहे हैं पहली ठकुराइन बैठी पंखा झल रही हैं.
ठाकुर ठकुराइन को रसिक नेत्रों से देखकर कहते हैं-अब भी तुम्हारे ऊपर वह जोबन है कि
कोई जवान भी देख ले,तो तड़प जाये, और ठकुराइन फूलकर कहती हैं-जभी तो नयी नवेली लाये
`उसे तो लाया हूं तुम्हारी सेवा करने के लिए. वह तुम्हारी क्या बराबरी करेगी?’
छोटी बीवी यह वाक्य सुन लेती है और मुंह फुलाकर चली जाती है.
दूसरे दृश्य में ठाकुर खाट पर लेटे हैं और छोटी बहू मुंह फेरे हुए जमीन पर बैठी है.
ठाकुर बार-बार उसका मुंह अपनी ओर फेरने की चेष्टा करके कहते हैं-मुझसे क्यों रूठी
हो मेरी लाड़ली?
`तुम्हारी लाड़ली जहां हो, वहां जाओ. मैं तो लौंडी हूं, दूसरों की सेवा-टहल करने के
लिए आयी हूं.’ 169
`तुम मेरी रानी हो. तुम्हारी सेवा-टहल करने के लिए वह बुढ़िया है’.
पहली ठकुराइन सुन लेती हे, और झाड़ू लेकर घर में घुसती है और कई झाड़ू उन पर
जमाती है. ठाकुर साहब जान बचाकर भागते हैं.

फिर दूसरी नकल हुई,जिसमें ठाकुर ने दस रुपये का दस्तावेज लिखकर पांच रुपये दिये,

शेष नजराने और तहरीर और दस्तूरी और ब्याज में काट लिये.
किसान आकर ठाकुर के चरण पकड़कर रोने लगता है. बड़ी मुश्किल से ठाकुर रुपये देने पर
राजी होते हैं .जब कागज लिखा जाता है और असामी के हाथ में पांच रुपये रख दिये जाते
हैं, तो वह चकराकर पूछता है-
`यह तो पांच है मालिक!’
`पांच नहीं दस हैं. घर जाकर गिनना.’
`नहीं सरकार, पांच हैं.’
एक रुपया नजराने का हुआ कि नहीं?’
`हां, सरकार.’
`एक कागद का?’
`हां, सरकार .’
`एक दस्तूरी का?’
`हां,सरकार.’
`एक सूद का.’
`हां, सरकार.’
`पांच नगद, दस हुए कि नहीं?’
`हां, सरकार! अब यह पांचों भी मेरी ओर से रख लीजिये.’
`कैसा पागल है?’
`नहीं सरकार, एक रुपया छोटी ठकुराइन का नजराना है, एक रुपया बड़ी ठकुराइन का. एक
रुपया छोटी ठकुराइन के पान खाने को, एक बड़ी ठकुराइन के पान खाने को. बाकी बचा एक,
वहüआपकी क्रिया-करम के लिए.’
इस तरह नोखेराम और पटेश्वरी और दातादीन की-बारी-बारी से सबकी-खबर ली गयी. और
फबतियों में चाहे कोई नयापन न हो और नकलें पुरानी हों, लेकिन गिरधर का ढंग ऐसा
हास्यजनक था, दर्शक इतने सरल हृदय थे कि बेबात की बात में भी हंसते रहते थे. रात-भर
भंड़ैती होती रही और सताये हुए दिल, कल्पना मैं प्रतिशोध पाकर प्रसन्न होते रहे.
आखिरी नकल समाप्त हुई, तो कौवे बोल रहे थे.
सबेरा होते ही जिसे देखौ, उसी की जबान पर वही रात के गाने, वही नकल, वही फिकरे.
मुखिये तमाशा बन गये. जिधर निकलते हैं, उधर ही दो-चार लड़के पीछे लग जाते हैं और
वही फिकरे कसते हैं. झिंगुरीसिंह तो दिल्लगीबाज आदमी थे, इसे दिल्लगी में लिया, मगर
पटेश्वरी में चिढ़ने की बुरी आदत थी. और पण्डित दातादीन तो इतने तुनुकमिजाज थे कि
लड़ने पर तैयार हो जाते थे, वह सबसे सम्मान पाने के आदी थे. कारिन्दा की तो बात ही
क्या, रायसाहब तक उन्हें देखते ही सिर झुका देते थे. उनकी ऐसी हंसी उड़ायी जाये और
अपने ही गांव में, यह उनके लिए असह्य था.अगर उनमें ब्रह्म तेज होता, तो इन दुष्टों
को भस्म कर देते. ऐसा शाप देते कि सब-के-सब भस्म हो जाते, लेकिन इस कलियुग में शाप
का असर ही जाता रहा. इसलिए उन्होंने कलियुग वाला हथियार निकाला. होरी के द्वार पर
आये और आंखें निकालकर बोले-क्या आज भी तुम काम
करने न चलोगे होरी? अब तो तुम अच्छे हो गये. मेरा कितना हरज हो गया, यह तुम नहीं
सोचते.
गोबर देर में सोया था. अभी-अभी उठा था और आंखें मलता हुआ बाहर आ रहा था कि दातादीन
की आवाज कान में पड़ी. पालागन करना तो दूर रहा, उलटे और हेकड़ी दिखाकर बोला-अब वह
तुम्हारी मजूरी न करेंगे. हमें अपनी ऊख जो बोनी है.
दातादीन ने सुरती फांकते हुए कहा-काम कैसे नहीं करेंगे? साल के बीच में काम नहीं
छोड़ सकते. जेठ में छोड़ना हो,तो छोड़ दें, करना हो करें.उसके पहले नहीं छोड़ सकते.
गोबर ने जम्हाई लेकर कहा-उन्होंने तुम्हारी गुलामी नहीं लिखी है. जब तक इच्छा थी,
काम किया. अब नहीं इच्छा है, नहीं करेंगे. इसमें कोई जबरदस्ती नहीं कर सकता.
`तो होरी काम नहीं करेंगे?’
`ना.’
`तो हमारे रुपये सूद समेत दे दो. तीन साल का सूद होता है सौ रुपया. असल मिलाकर
दो सौ होते हैं. हमने समझा था, तीन रुपये महीने सूद में कटते जायेंगे, लेकिन
तुम्हारी इच्छा नहीं है, तो मत करो, मेरे रुपये दे दो. धन्ना सेठ बनते हो, तो धन्ना
सेठ का काम करो.’
होरी ने दातादीन से कहा-तुम्हारी चाकरी से मैं कब इनकार करता हूं महाराज? लेकिन
हमारी ऊख भी तो बोने को पड़ी है.
गोबर ने बाप को डांटा-कैसी चाकरी और किसकी चाकरी?यहां तो कोई किसी का चाकर नहीं.
सभी बराबर हैं अच्छी दिल्लगी है. किसी को सौ रुपये उधार दिये और उससे सूद में
जिन्दगी-भर काम लेते रहे. मूल ज्यों का त्यों! यह महाजनी नहीं है, खून चूसना है.
`तो रुपये दे दो भैया,लड़ाई काहे की. मैं आने रुपये ब्याज लेता हूं. तुम्हे गांव घर
का समझ कर आध आने रुपये पर दिया था.’
`हम तो एक रुपया सैकड़ा देंगे एक कौड़ी बेसी नहीं. तुम्हें लेना हो, तो लो, नहीं
अदालत से ले लेना. एक रुपया सैकड़े ब्याज कम नहीं होता.’
`मालूम होता है,रुपये की गरमी हो गयी है.’
`गरमी उन्हें होती है, जो एक के दस लेते हैं. हम तो मजूर हैं हमारी गरमी पसीने के
रास्ते बह जाती है.मुझे याद है, तुमने बैल के लिए तीस रुपये दिये थे.उसके सौ हुए.
और अब सौ के दो सौ हो गये.इसी तरह तुम लोगों ने किसानों को लूट-लूट कर मजूर बना
डाला और आप उनकी जमीन के मालिक बन बैठे. तीस के दो सौ! कुछ हद है? कितने दिन होंगे
दादा?’
होरी ने कातर कण्ठ से कहा-यही आठ -नौ साल हुए होंगे.
गोबर ने छाती पर हाथ रखकर कहा-नौ साल मैं तीस रुपये कै दो सौ! एक रुपये के हिसाब से
कितना होता है?उसने जमीन पर एक ठीकरे से हिसाब लगाकर कहा-दस साल में छत्तीस रुपये
होते हैं. असल मिलाकर छाछठ. उसके सत्तर रुपये ले लो. इससे बेसी मैं एक कौड़ी न
दूंगा.
दातादीन ने होरी को बीच में डालकर कहा-सुनते हो होरी, गोबर का फैसला? मैं अपने दो
सौ छोड़ के सत्तर रुपये ले लूं, नहीं अदालत करूं. इस तरह का व्यवहार हुआ, तो कै दिन
संसार चलेगा? और तुम बैठे सुन रहे हो, मगर यह समझ लो, मैं ब्राह्मण हूं, मेरे रुपये
हजम करके तुम चैन न पाओगे. मैंने ये सत्तर रुपये भी छोड़े, अदालत भी न जाऊंगा, जाओ.
अगर मैं ब्राह्मण हूं तो अपने पूरे दो सौ रुपये लेकर दिखा दूंगा. और तुम मेरे द्वार
पर आओगे और हाथ बांधकर दोगे.
दातादीन झल्लाये हुए लौट पड़े, गोबर अपनी जगह बैठा रहा. मगर होरी के पेट में धर्म
की क्रान्ति मची हुई थी. अगर ठाकुर या बनिये के रुपये होते, तो उसे ज्यादा चिन्ता न
होती, लेकिन ब्राह्मण के रुपये! उसकी एक पाई भी दब गयी, तो हड्डी तोड़कर निकलेगी.
भगवान् न करें कि- 171
ब्राह्मण का कोप किसी पर गिरे. बंस में कोई चिल्लू भर पानी देनेवाला, घर में दीया
जलाने वाला भी नहीं रहता. उसका धर्मभीरु मन त्रस्त हो उठा.
उसने दौड़कर पण्डितजी के चरण पकड़ लिये और आर्त स्वर में बोला-महाराज, जब तक मैं
जीता हूं, तुम्हारी एक-एक पाई चुकाऊंगा. लड़कों की बातों पर मत जाओ. मामला तो हमारे
-तुम्हारे बीच में हुआ है. वह कौन होता है?
दातादीन जरा नरम पड़े-जरा इसकी जबरदस्ती देखो, कहता है, दो सौ रुपये के सत्तर लो या
अदालत जाओ. अभी अदालत की हवा नहीं खायी है, जभी. एक बार किसी के पाले पड़ जायेंगे,
तो फिर यह ताव न रहेगा. चार दिन सहर में क्या रहे, तानासाह हो गये.
`मैं तो कहता हूं महाराज, मैं तुम्हारी एक-एक पाई चुकाऊंगा.’
`तो कल से हमारे यहां काम करने आना पड़ेगा.’
`अपनी ऊख बोना है महाराज, नहीं तुम्हारा ही काम करता.’
दातादीन चले गये, तो गोबर ने तिरस्कार की आंखों से देखकर कहा-गये थे देवता को मनाने
तुम्ही लोगों ने तो इन सबों का मिजाज बिगाड़ दिया है. तीस रुपये दिये, अब दो सौ
रुपये लेगा, और डांट ऊपर से बतायेगा और तुमसे मजूरी करायेगा और काम कराते-कराते मार
डालेगा. होरी ने अपने विचार से सत्य का पक्ष लेकर कहा-नीति हाथ से न छोड़ना चाहिए
बेटा, अपनी-अपनी करनी अपने साथ है. हमने जिस ब्याज पर रुपये लिये, वह तो देने ही
पड़ेंगे. फिर ब्राह्मण ठहरे. इनका पैसा हमें पचेगा? ऐसा माल तो इन्हीं लोगों को
पचता है.
गोबर ने त्योरियां चढ़ायीं- नीति छोड़ने को कौन कह रहा है? और कौन कह रहा है कि
ब्राह्मण का पैसा दबा लो? मैं तो यही कहता हूं कि इतना सूद नहीं देंगे. बंकवाले
बारह आने सूद लेते हैं. तुम एक रुपये लेलो. और क्या किसी को लूट लोगे.
`उनका रोयां जो दुखी होगा?’
`हुआ करें. उनके दुखी होने के डर से हम बिल क्यों खोदे?’
`बेटा, जब तक मैं जिन्दा हूं, मुझे अपने रास्ते चलने दो. जब मर जाऊं, तो तुम्हारी
जो इच्छा हो, वह करना.’
`तो फिर तुम्हीं देना. मैं तो अपने हाथों अपने पांव में कुल्हाड़ी न मारूंगा. मेरा
गधापन था कि तुम्हारे बीच में बोला.तुमने खाया है,तुम भरो.मैं क्यों अपनी जान दूं?’
यह कहता हुआ गोबर भीतर चला गया. झुनिया ने पूछा-आज सबेरे-सबेरे दादा से क्यों
उलझ पड़े?
गोबर ने सारा वृतान्त कह सुनाया और अन्त में बोला-इनके ऊपर रिन का बोझ इसी तरह
बढ़ता जायेगा. मैं कहां तक भरूंगा? उन्होंने कमा-कमा कर दूसरों का घर भरा है. मैं
मैं क्यों उनकी खोदी हुई खन्दक में गिरूं? इन्होने मुझसे पूछ के करज नहीं लिया.
न मेरे लिए लिया. मैं उसका देनदार नहीं हूं.
उधर मुखियों में गोबर को नीचा दिखाने के लिए षड्यन्त्र रचा जा रहा था. यह लौंडा
शिकंजे में न कसा गया, तो गांव में उधम मचा देगा. कहता है, रुपये सैकड़े सूद से
बेसी न दूंगा. लेना हो लो, नहीं अदालत जाओ. रात इसने सारे गांव के लौंडों को बटोर
कर कितना अनर्थ किया. लेकिन मुखियों में भी ईर्ष्या की कमी न थी. सभी अपने बराबर
वालों के परिहास पर प्रसन्न थे. पटेश्वरी और नोखेराम में बातें हो रही थीं.
पटेश्वरी ने कहा-मगर सबों के घर-घरका रत्ती-रत्ती का हाल मालूम है. झिंगुरीसिंह को
तो सबों ने ऐसा रगेदा कि कुछ न पूछो. दोनों ठकुराइनों की बातें सुन-सुनकर लोग
हंसी के मारे लोट गये.
नोखेराम ने ठट्ठा मारकर कहा-मगर नकल सच्ची थी. मैने कइ बार उनकी छोटी बेगम को
द्वार पर खड़े लौंडों से हंसी करते देखा.
`और बढ़ी रानी काजल और सेंदुर और महावर लगाकर जवान बनी रहती है.’
`दोनों में रात दिन छिड़ी रहती है.झिंगरी पक्का बेहया है. कोई दूसरा होता, तो पागल
हो जाता.’
`सुना, तुम्हारी बड़ी भद्दी नकल की. चमरिया के घर में बन्द कराके पिटवाया.’
`मैं तो बचा, पर बकाया लगान का दावा करके ठीक कर दूंगा, वह भी क्या याद करेंगे कि
किसी से पाला पड़ा था.’
`लगान तो उसने चुका दिया है न?’
`लेकिन रसीद तो मैंने नहीं दी. सबूत क्या कि लगान चुका दिया? और यहां कौन हिसाब
-किताब देखता है? आज ही प्यादा भेजकर बुलाता हूं.’
होरी और गोबर दोनों ऊख बोने के लिए खेत सींच रहे थे. अबकी ऊख की खेती होने की आशा
तो थी नहीं, इसलिए खेत परती पड़ा हुआ था. अब बैल आ गये हैं,तो ऊख क्यों न बोयी जाये
मगर दोनों जैसे छत्तीस बने हुए थे. न बोलत थे, न ताकते थे. होरी बैलों को हांक रहा
था और गोबर मोट ले रहा था. सोना और रूपा दोनों खेत में पानी दौड़ा रही थीं कि उनमें
झगड़ा हो गया. विवाद का विषय यह था कि झिंगुरीसिंह की छोटी ठकुराइन पहले कुछ खाकर
पति को खिलाती है या पति को खिलाकर तब खुद खाती है. सोना कहती थी, पहले वह खुद खाती
है. रूपा का मत इसके प्रतिकूल था.
रूपा ने जिरह की-अगर वह पहले खाती है, तो क्यों मोटी नहीं है?ठाकुर क्यों मोटे है?
अगर ठाकुर उन पर गिर पड़े, तो ठकुराइन पिस जायें
सोना ने प्रतिवाद किया-तू समझती है, अच्छा खाने से लोग मोटे हो जाते हैं. अच्छा
खाने से लोग बलवान् होते हैं.मोटे नहीं होते. मोटे होते हैं घास-पात खाने से.
`तो ठकुराइन ठाकुर से बलवान् है?’
`और क्या? अभी उस दिन दोनों में लड़ाई हुई, तो ठकुराइन ने ठाकुर को ऐसा ढकेला
कि उनके घुटने फूट गये.’
`तो तू भी पहले आप खाकर तब जीजा को खिलायेगी?’
`और क्या!’
`अम्मां तो पहले दादा को खिलाती है.’
`तभी तो जब देखो तब दादा डांट देते हैं. मैं बलवान होकर अपने मरद को काबू में
रखूंगी तेरा मरद तुझे पीटेगा, तेरी हड्डी तोड़कर रख देगा.’
रूपा रुआंसी होकर बोली-क्यों पीटेगा, मैं मार खाने का काम ही न करूंगी.
`वह कुछ न सुनेगा. तूने जरा भी कुछ कहा और वह मार चलेगा. मारते-मारते तेरी खाल
उधेड़ लेगा.’
रूपा ने बिगड़कर सोना की साड़ी दांतों से फाड़ने की चेष्टा की और असफल होने पर
चुटकियां काटने लगी.
सोना ने और चिढ़ाया-वह तेरी नाक भी काट लेगा
इस पर रूपा ने बहिन को दांत से काट खाया. सोना की बांह लहुआ गयी. उसने रूपा को जोर
से ढकेल दिया. वह गिर पढ़ी और उठकर रोने लगी. सोना भी दांतों के निशान देखकर रो
पड़ी. उन दोनों का चिल्लाना सुनकर गोबर गुस्से में भरा हुआ आया और दोनों को दो-दो
घूंसे जड़ दिये. दोनों रोती हुई खेत से निकलकर घर चल दीं. सिंचाई का काम रुक गया.इस
पर पिता-पुत्र में एक झड़प हो गयी. 173
होरी ने पूछा-पानी कौन चलायेगा? दौड़े-दौड़े गये, दोनों को भगा आये. अब जाकर मना
क्यों नहीं लाते?
`तुम्हीं ने सबों को बिगाड़ रखा है.’
`इस तरह मारने से और निर्लज्ज हो जायेगी.’
`दो जून खाना बन्द कर दो, आप ठीक हो जायें.’
`मैं उनका बाप हूं, कसाई नहीं हूं.’
पांव में एक बार ठोकर लग जाने के बाद किसी कारण से बार-बार ठोकर लगती है और कभी-कभी
अंगूठा पक जाता है और महीनों कष्ट देता है. पिता और पुत्र के सद्भाव को आज उसी तरह
चोट लग गयी थी और उस पर यह तीसरी चोट पड़ी.
गोबर ने घर जाकर झुनिया को खेत मैं पानी देने के लिए साथ लिया. झुनिया बच्चे को
लेकर खेत में गयी.
धनिया और उसकी दोनों बेटियां ताकती रहीं. मां को भी गोबर की यह उद्दण्डता बुरी
लगती थी. रूपा को मारता, तो वह बुरा न मानती, मगर जवान लड़की को मारना, यह उसके लिए
असह्य था.
आज ही रात को गोबर ने लखनऊ लौट जाने का निश्चय कर लिया. यहां अब वह नहीं रह सकता.
जब घर में उसकी पूछ नहीं है, तो वह क्यों रहे? वह लेन-देन के मामले में बोल नहीं
सकता. लड़कियों को जरा मार दिया, तो लोग ऐसे जामे के बाहर हो गये, मानों वह बाहर का
आदमी है. तो इस सराय में वह न रहेगा.
दोनों भोजन करके बाहर आये थे कि नोखेराम के प्यादे ने आकर कहा-चलो, कारिन्दा
साहब ने बुलाया है.
होरी ने गर्व से कहा-रात को क्यों बुलाते हैं, मैं तो बाकी दे चुका हूं.
प्यादा बोला-मुझे तो तुम्हें बुलाने का हुक्म मिला है. जो कुछ अरज करना हो, वहीं चल
कर करना.
होरी की इच्छा न थी, मगर जाना पड़ा. गोबर विरक्त-सा बैठा रहा. आध घण्टे में होरी
लौटा और चिलम भरकर पीने लगा अब गोबर से न रहा गया. अब गोबर से न रहा गया.
पूछा- किस मतलब से बुलाया था?
होरी ने भर्रायी हुई आवाज में कहा-मैंने पाई-पाई लगान चुका दिया. वह कहते हैं,
तुम्हारे ऊपर दो साल की बाकी है. अभि उस दिन मैंने ऊक बेची, पचीस रुपये वहीं उनको
दे दिये, और आज वह दो साल का बाकी निकालते हैं. मैंने कह दिया,मैं एक धेला न दूंगा.
गोबर ने पूछा-तुम्हारे पास रसीद तो होगी?
`रसीद कहां देते हैं?’
` तो तुम बिना रसीद लिये रुपये देते ही क्यों हो?’
`मैं क्या जानता था, वह लोग बेईमानी करेंगे. यह सब तुम्हारी करनी का फल है. तुमने
रात को उनकी हंसी उड़ायी, यह उसी का दण्ड है. पानी में रहकर मगर से बैर नहीं किया
जाता. सूद लगाकर सत्तर रुपये बाकी निकाल दिये. ये किसके घर से आयेंगे?’
गोबर ने अपनी सफाई देते हुऐ कहा- तुमने रसीद लेली होती, तो मैं लाख उनकी हंसी
उड़ाता, तुम्हारा बाल भी बांका न कर सकते. मेरी समझ में नहीं आता कि लेन-देन में
तुम सावधानी से क्यों काम नहीं लेते. यों रसीद नहीं देते, तो डाक से रुपये भेजो.
यही तो होगा, एकाध रुपया महसूल पड़ जायेगा. इस तरह की धांधली तो न होगी.
`तुमने यह आग न लगायी होती, तो कुछ न होता. अब तो सभी मुखिया बिगड़े हुए हैं. बेखली
की धमकी दे रहे हैं. देव जाने कैसे बेड़ा पार लगेगा?’
`मैं जाकर पूछता हूं.’
`तुम जाकर और आग लगा दोगे.’
`अगर आग लगानी पड़ेगी, तो आग भी लगा दूंगा. यह बेदखली करते हैं, करें. मैं उनके हाथ
में गंगाजली रखकर अदालत में कसम खिलाऊंगा. तुम दुम दबाकर बैठे रहो. मैं इसके पीछे
जान लड़ा दूंगा. मैं किसी का एक पैसा नहीं चाहता, न अपना एक पैसा खोना चाहता हूं.’
वह उसी वक्त उठा और नोखेराम की चौपाल में जा पहुंचा. देखा, तो सभी मुखिया लोगों का
केबिनेट बैठा हुआ है. गोबर को देखकर सबके सब सतर्क हो गये. वातावरण में षड़यन्त्र
की सी कुण्ठा भरी हुई थी. गोबर ने उत्तेजित कण्ठ से पूछा-यह क्या बात है कारिन्दा
साहब कि आपको दादा ने हाल तक का लगान चुकता कर दिया और आप अभी दो साल की
बाकी निकाल रहे हैं यह कैसा गोलमाल है?
नोखेराम ने मसनद पर लेटकर रोब दिखाते हुए कहा-जब तक होरी है, मैं तुमसे लेन-देन की
कोई बातचीत नहीं करना चाहता.
गोबर ने आहत भरे स्वर में कहा-तो मैं घर में कुछ नहीं हूं?
`तुम अपने घर में सब कुछ होगे. यहां तुम कुछ नहीं हो.’
`अच्छी बात है, आप बेदखली दायर कीजिये. मैं अदालत में तुमसे गंगाजली उठवाकर
रुपये दूंगा. इसी गांव से एक सौ सहादतें दिलाकर साबित कर दूंगा कि तुम रसीद नहीं
देते. सीधे-सादे किसान हैं, कुछ बोलते नहीं, तो तुमने समझ लिया कि सब काठ के उल्लू
हैं. रायसाहब वहीं रहते हैं, जहां मैं रहता हूं. गांव के सब लोग उन्हें हौवा समझते
होंगे, मैं नहीं समझता. रत्ती-रत्ती हाल कहूंगा और देखूंगा, तुम कैसे मुझसे दोबारा
रुपये वसूल कर लेते हो.’
उसकी वाणी में सत्य का बल था. डरपोक प्राणियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है. वही
सीमेण्ट जो ईंट पर चढ़कर पत्थर हो जाता है, मिट्टी पर चड़ा दिया जाये, तो मिट्टी हो
जायेगा. गोबर की निर्भीक स्पष्टवादिता ने उस अनीति के बख्तर को बेध डाला, जिससे
सज्जित होकर नोखेराम की दुर्बल आत्मा अपने को शक्तिमान समझ रही थी.
नोखेराम ने जैसे कुछ याद करने का प्रयास करके कहा-तुम इतना गरम क्यों हो रहे हो,
इसमें गरम होने की कौन बात है? अगर होरी ने रुपये दिये हैं, तो कहीं-न कहीं तो
टांके गये होंगे. मैं कल कागज निकाल कर देखूंगा. अब मुझे कुछ-कुछ याद आरहा है
कि शायद होरी ने रुपये दिये थे. तुम निसाखातिर रहो, अगर रुपये यहां आ गये हैं,तो
कहीं जा नहीं सकते. तुम थोड़े- से रुपये के लिए झूठ थोड़े ही बोलोगे और न ही मैं इन
रुपयौं से धनी हो जाऊंगा.
गोबर ने चौपाल से आकर होरी को ऐसा लताड़ा कि बेचारा स्वार्थ-भीरू बूढ़ा रुआंसा हो
गया-तुम तो बच्चों से भी गये बीते हो, जो बिल्ली की म्याऊं सुनकर चिल्ला उठते हैं.
कहां-कहां तुम्हारी रच्छा करता फिरूंगा? मैं तुम्हें सत्तर रुपये दिये जाता हूं.
दातादीन ले, तो देकर भरपाई लिखा देना. इसके ऊपर तुमने एक पैसा भी दिया, तो फिर
मुझसे एक पैसा भी न पाओगे. परदेस में इसलिए नहीं पड़ा हूं कि तुम अपने को लुटवाते
रहो और मैं कमाकर भरता रहूं. मैं कल चला जाऊंगा, लेकिन इतना कहे देता हूं, किसी से
एक पैसा उधार मत लेना और किसी को कुछ मत देना. मंगरू, दुलारी, दातादीन-सभी
से एक रुपया सैकड़े सूद कराना होगा.
धनिया भी खाना खाकर बाहर निकल आयी. बोली-अभी क्यों जाते हो बेटा, दो-चार दिन और
रहकर ऊख की बोनी करा लो और कुछ लेन-देन का हिसाब भी ठीक कर लो, तो जाना.
गोबर ने शान जमाते हुए कहा- मेरा दो तीन रुपये रोज का घाटा हो रहा है, यह भी समझती
हो? यहां मैं बहुत-बहुत तो चार आने की मजूरी ही तो करता हूं, और अबकी मैं झुनिया को 175
भी लेता जाऊंगा. वहां मुझे खाने-पीने की बड़ी तकलीफ होती है. धनिया ने डरते -डरते
कहा- जैसी तुम्हारी इच्छा, लेकिन वहां वह कैसे अकेले घर संभालेगी, कैसे बच्चे की
देखभाल करेगी?
`अब बच्चे को देखूं कि अपना सुभीता देखूं, मुझसे चूल्हा नहीं फूंका जाता.’
`ले जाने को मैं नहीं रोकती, लेकिन परदेस में बाल-बच्चों के साथ रहना, न कोई आगे,
न पीछे, सोचो कितना झञ्झट है.’
`परदेस में संगी -साथी निकल ही आते हैं अम्मां, और यह तो स्वारथ का संसार है, जिसके
साथ चार पैसे गम खाओ ,वही अपना. खाली हाथ तो मां बाप भी नहीं पूछते.’
धनिया कटाक्ष समझ गयी. उसके सिर से पांव तक आग लग गयी.बोली-मां-बाप को भी
तुमने उन्हीं पैसे के यारों में समझ लिया?
`आखों देख रहा हूं.’
`नहीं देख रहे हो, मां-बाप का मन इतना निठुर नहीं होता. हां, लड़के अलबत्ता जहां
चार पैसे कमाने लगे कि मां बाप से आंखें फेर लीं इसी गांव में एक-दो नहीं, दस-बीस
परतोख दे दूं. मां-बाप करज-कवाज लेते हैं किसके लिए?लड़के-लड़कियों ही के लिए कि
अपने भोग-विलास के लिए?’
`क्या जाने तुमने किसके लिए करज लिया? मैंने तो एक पैसा भी नहीं जाना.’
`बिना पाले ही इतने बड़े हो गये?’
`पालने में तुम्हारा क्या लगा? जब तक बच्चा था, दूध पिला दिया.फिर लावारिस की तरह
छोड़ दिया. जो सबने खाया, वही मैंने खाया. मेरे लिए दूध नहीं आता था, मक्खन नहीं
बंधा था. और तुम भी चाहती हो, और दादा भी चाहते हैं कि मैं सारा करजा चुकाऊं,लगान
दूं, लड़कियों का ब्याह करूं. जैसे मेरी जिन्दगी तुम्हारा देना भरने ही के लिए है.
मेरे भी तो बाल-बच्चे हैं?’
धनिया सन्नाटे में आ गयी. एक क्षण में उसके जीवन का मृदु स्वप्न जैसे टूट गया. अब
तक वह मन में प्रसन्न थी कि अब उसका दुःख-दरिद्र सब दूर हो गया. जब से गोबर घर आया,
उसके मुख पर हास की एक छटा खिली रहती थी. उसकी वाणी में मृदुता और व्यवहार में
उदारता आ गयी थी. भगवान् ने उस पर दया की है, तो उसे सिर झुकाकर चलना चाहिए. भीतर
की शान्ति बाहर सौजन्य बन गयी थी. ये शब्द तपते बालू की तरह हृदय पर पड़े और चने की
भांति सारे अरमान झुलस गये. उसका सारा घमण्ड चूर-चूर हो गया. इतना सुन लेने के बाद
अब जीवन में क्या रस रह गया? जिस नौका पर बैठकर इस जीवन-सागर को पार करना चाहती थी,
वह टूट गयी, तो किस सुख के लिए जिये!
लेकिन नहीं. उसका गोबर इतना स्वार्थी नहीं है. उसने कभी मां की बात का जवाब नहीं
दिया, कभी किसी बात के लिए जिद नहीं की. जो कुछ रूखा-सूखा मिलगया, वही खा लेता था.
वही भोला-भाला, शील-स्नेह का पुतला आज क्यों ऐसी दिल तोड़ने वाली बातें कर रहा है?
उसकी इच्छा के विरुद्ध तो किसी ने कुछ नहीं कहा. मां-बाप दोनों ही उसका मुंह जोहते
रहते हैं. उसने खुद ही लेन-देन की बात चलायी, नहीं कौन कहता हे कि तू मां-बाप का
देना चुका. मां बाप के लिए यही क्या कम सुख है कि वह इज्जत-आबरू के साथ भले मानसों
की तरह कमाता-खाता है. उससे कुछ हो सके, तो मां बाप की मदद कर दे. नहीं हो सकता, तो
मां-बाप उसका गला न दबायेंगे. झुनिया को ले जाना चाहता है, खुशी से ले जाये. धनिया
ने तो केवल उसकी भलाई के खयाल से कहा था कि झुनिया को वहां ले जाने में उसे जितना
आराम मिलेगा, उससे कहीं ज्यादा झञ्झट बढ़ जायेगा. उसने ऐसी कौन-सी लगने वाली बात
कही थी कि वह इतना बिगड़ उठा.हो न हो, यह आग झुनिया ने लगायी हो. वही बैठे-बैठे उसे
मन्तर पढ़ा रही है. यहां सौक-सिंगार करने को नहीं मिलता, घर का
कुछ न कुछ काम भी करना पड़ता है. वहां रुपये पैसे हाथ में आयेंगे, मजे से चिकना
खायेगी, चिकना पहनेगी और टांग फैलाकर सोयेगी. दो आदमियों की रोटी पकाने में क्या लग
ता है, वहां तो पैसा चाहिए. सुना, बाजार में पकी पकायी रोटियां मिल जाती हैं. यह
सारा उपद्रव उसी ने खड़ा किया है, शहर में कुछ दिन रह भी चुकी है. वहां का दाना-
पानी मुंह लगा हुआ है. यहां कोई पूछता न था. यह भोंदू मिल गया. इसे फांस लिया. जब
यहां पांच महीने का पेट लेकर आयी थी, तब कैसी म्यांव-म्यांव करती थी? तब यहां सरन
न मिली होती, तो आज कहीं भीख मांगती होती. यह उसी नेकी का बदला है! इसी चुड़ैल के
पीछे डांड़ देना पड़ा, बिरादरी में बदनामी हुई, खेती टूट गयी, सारी दुर्गत हो गयी.
और आज यह चुड़ैल जिस पत्तल खाती है,उसी में छेद कर रही है. पैसे देखे, तो आंख
हो गयी. तभी ऐंठी-ऐंठी फिरती है, मिजाज नहीं मिलता. आज लड़का चार पैसे कमाने लगा है
न! इतने दिनों बात नहीं पूछी, तो सास का पांव दबाने के लिए तेल लिए दौड़ती थी. डाइन
उसके जीवन की निधि को उसके हाथ से छीन लेना चाहती है.
दुखित स्वर में बोली-यह मन्तर तुम्हें कौन दे रहा है बेटा, तुम तो ऐसे न थे. मां
बाप तुम्हारे ही बहिनें तुम्हारी ही हैं, घर तुम्हारा ही है. यहां बाहर का कौन है?
और हम क्या बहुत दिन बैठे रहेंगे? घर की मरजाद बनाये रहोगे, तो तुम्हीं को सुख होगा
आदमी घरवालों ही के लिए धन कमाता है कि और किसी के लिए? अपना पेट तो सुअर भी पाल
लेता है. मैं न जानती थी, झुनिया नागिन बनकर हमीं को डसेगी.
गोबर ने तिनक कर कहा-अम्मां, नादान नहीं हूं कि झुनिया मुझे मन्तर पढ़ायेगी. तुम
उसे नाहक कोस रही हो. तुम्हारी गिरस्ती का सारा बोझ मैं नहीं उठा सकता. मुझसे जो
कुछ हो सकेगा,तुम्हारी मदद कर दूंगा,लेकिन अपने पांवों में बेड़ियां नहीं डाल सकता.
झुनिया भी कोठरी से निकल कर बोली-अम्मां, जुलाहे का गुस्सा दाढ़ी पर न उतारो. कोई
बच्चा नही हैं कि उन्हें फोड़ लूंगी. अपना-अपना भला बुरा सब समझते हैं. आदमी इसीलिए
नहीं जन्म लेता कि सारी उम्र तपस्या करता रहे और एक दिन खाली हाथ मर जाये. सब
जिन्दगी का कुछ सुख चाहते हैं,सबकी लालसा होती है कि हाथ में चार पैसे हों.
धनिया ने दांत पीसकर कहा-अच्छा झुनिया, बहुत ज्ञान न बघार. अब तू भी अपना भला-बुरा
सोचने जोग हो गयी है. जब यहां आकर मेरे पैरों पर सिर रखे रो रही थी, तब अपना भला-
बुरा नहीं सूझा था? उस घड़ी हम भी अपना भला-बुरा सोचने लगते, तो आज तेरा कहीं पता न
होता.
इसके बाद संग्राम छिड़ गया.ताने-मेहने, गाली-गलोच, थुक्का-फजिहत, कोई बात न बची.
गोबर भी बीच-बीच में डंक मारता जाता था. होरी बरौठे मैं बैठा सब कुछ सुन रहा था.
सोना और रूपा आंगन में सिर झुकाये खड़ी थी, दुलारी, पुनिया और कई स्त्रियां बीच-
बचाव करने आ पहुंची थीं. गरजन के बीच में कभी-कभी बूंदें भी गिर जाती थीं.दोनो ही
अपने-अपने भाग्य को रो रही थीं. दोनो ही ईश्वर को कोस रही थीं, और दोनों अपनी-अपनी
निर्दोषिता सिद्ध कर रही थीं. झुनिया गड़े मुर्दे उखाड़ रही थी आज उसे हीरा और शोभा
से विशेष सहानुभुति हो गयी थी, जिन्हें धनिया ने कहीं का न रखा था. धनिया की आज तक
किसी से न पटी थी,तो झुनिया से कैसे पट सकती है? धनिया अपनी सफाई देने की चेष्टा कर
रही थी, लेकिन न जाने क्या बात थी कि जनमत झुनिया की ओर था.शायद इसलिए कि झुनिया
संयम हाथ से न जाने देती थी और धनिया आपे से बाहर थी. शायद इसलिए कि झुनिया अब कमाऊ
पुरुष की स्त्री थी, उसे प्रसन्न रखने में ज्यादा मसलहत थी.
तब होरी ने आंगन में आकर कहा-मैं तेरे पैरों पड़ता हूं धनिया, चुप रह. मेरे मुंह
में कालिख मत लगा. हां, अभी मन न भरा हो, तो और सुन.
धनिया फुंकार मारकर उधर दौड़ी-तुम भी मोटी डाल पकड़ने चले. मैं ही दोसी हूं. वह तो
मेरे ऊपर फूल बरसा रही है?
संग्राम का क्षेत्र बदल गया.
`जो छोटों के मुंह लगे, वह छोटा.’
धनिया किस तर्क से झुनिया को छोटा मान ले?
होरी ने व्यथित कण्ठ से कहा- अच्छा, वह छोटी नहीं, बड़ी सही. जो आदमी नहीं रहना
चाहता, क्या उसे बांधकर रखेगी? उनके हाथ-पांव हो गये. अब तू क्या चाहती है, वे दाना
-चारा लाकर खिलायें. मां-बाप का धरम सोलहों आना लड़कों के साथ है. लड़कों का मां
-बाप के साथ एक आना भी धरम नहीं है. जो जाता है, उसे असीस देकर विदा करदे. हमारा
भगवान् मालिक है. जो कुछ भोगना बदा है, भोगेंगे. चालीस सात सैंतालीस साल इसी तरह
रोते-धोते कट गय. दस-पांच साल है, वह भी यों ही कट जायेंगे.
उधर गोबर जाने की तैयारी कर रहा था. इस घर का पानी भी उसके लिए हराम है. माता होकर
जब उसे ऐसी-ऐसी बातें कहे, तो अब वह उसका मुंह भी न देखेगा.
देखते-ही-देखते उसका बिस्तर बंध गया. झुनिया ने भी चुंदरी पहन ली. मुन्नू भी टोप
और फ्राक पहनकर राजा बन गया.
होरी ने आर्द्र कण्ठ से कहा-बेटा, तुमसे कुछ कहने का मुंह तो नहीं है, लेकिन कलेजा
नहीं मानता. क्या जरा जाकर अपनी अभागिनी माता के पांव छू लोगे, तो कुछ बुरा होगा?
जिस माता की कोख से जनम लिया और जिसका रक्त पीकर पले हो, उसके साथ इतना भी नहीं कर
सकते?
गोबर ने मुंह फेरकर कहा- मैं उसे अपनी माता नहीं समझता.
होरी ने आंखों में आंसू लाकर कहा-जैसी तुम्हारी इच्छा. जहां रहो. सुखी रहो.
झुनिया ने सास के पास जाकर उसके चरणों को अञ्चल से छुआ. धनिया के मुंह से असीस का
एक शब्द भी न निकला. उसने आंखे उठाकर देखा भी नहीं गोबर बालक को गोद में लिये आगे-
आगे था झुनिया झुनिया बिस्तर बगल मै दबाये पीछे. एक चमार का लड़का सन्दूक लिये था.
गांव के कई स्त्री -पुरुष गोबर को पहुंचाने गांव के बाहर तक आये.
धनिया बैठी रो रही थी, जैसे कोई उसके हृदय को आरे से चीर रहा हौ. उसका मातृत्व उस
घर के समान हो रहा था, जिसमें आग लग गयी हो और सब कुछ भस्म हो गया हो. बैठकर
रोने के लिए भी स्थान न बचा हो

Leave a Reply

Are you human? *