गोदान (भाग 2)

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फागुन अपनी झोली में नवजीवन की विभूति लेकर आ पहुंचा था. आम के पेड़ दोनों हाथों से
बौर की सुगन्ध बांट रहे थे, और कोयल आम की डालियों मे छिपी हुई संगीत का गुप्त दान
कर रही थी.
गांवों में ऊख की बोआई लग गयी थी. अभी धूप नहीं निकली, पर होरी खेत मैं पहुंच गया
है. धनिया,सोना,रूपा तीनों तलैया से ऊख के भीगे हुए गट्ठे निकाल-निकाल कर खेत में
ला रही हैं, और होरी गंड़ासे से ऊख के टुकड़े कर रहा है.अब वह दातादीन की मजदूरी कर
ने लगा है. किसान नहीं, मजूर है. दातादीन से अब उसका पुरोहित-जजमान का नाता नहीं,
मालिक मजदूर का नाता है.
दातादीन ने आकर डांटा-हाथ और फुर्ती से चलाओ होरी!इस तरह तो तुम दिन-भर में न काट
सकोगे.
होरी ने आहत अभिमान के साथ कहा-चला ही तो रहा हूं महाराज, बैठा तो नहीं हूं.
दातादीन मजूरों से रगड़कर काम लेते थे,इसलिए उनके यहां कोई मजूर टिकता न था.
होरी उनका स्वभाव जानता था, पर जाता कहां?
पण्डित उसके सामने खड़े होकर बोले-चलाने-चलाने में भेद है. एक चलाना वह है कि घड़ी
-भर में काम तमाम, दूसरा चलाना वह है कि दिन- भर में भी एक बौझ उख न कटे.
होरी ने विष का घूंट पीकर और जोरसे हाथ चलाना शुरू किया. इधर महीनों से उसे पेट-भर
भोजन न मिला था. प्रायः एक जून तो चबैने पर ही काटता था.दूसरे जून भी कभी आधा पेट
भोजन मिला, कभी कड़ाका हो गया. कितना चाहता था कि हाथ और जल्दी उठे, मगर हाथ जवाब
दे रहा था. इस पर दातादीन सिर पर सवार थे. क्षण-भर दम ले लेने पाता, तो ताजा हो
जाता, लेकिन दम कैसे ले? घुड़कियां पड़ने का भय था.
धनिया और दोनों लड़कियां, ऊख के गट्ठे लिये गीली-साड़ियों से लथपथ, कीचड़ में सनी
हुई आयीं, और गट्ठे पटककर दम मारने लगीं कि दातादीन ने डांट बतायी- यहां तमाशा क्या
देखती है धनिया? जा, अपना काम कर. पैसे सेंत में नहीं आते.पहर-भर में तू एक खेप
लायी है. इस हिसाब से दिन-भर में भी ऊख न ढुल पायेगी.
धनिया ने त्योरी बदलकर कहा-क्या जरा भी दम न लेने दोगे महाराज? हम भी तो आदमी हैं.
तुम्हारी मजूरी करने से बैल नहीं हो गये. जरा मूड़ पर एक गट्ठा लादकर लाओ, तो हाल
मालूम हो. दातादीन बिगड़ उठे-पैसे देते हैं काम करने के लिए, दम मारने के लिए नहीं.
दम मार लेना है,तो घर जाकर दम लो.
धनिया कुछ कहने ही जा रही थी कि होरी ने फटकार बतायी-तू जाती क्यों नहीं धनिया?
क्यों हुज्जत कर रही है?
धनिया ने बीड़ा उठाते हुए कहा-जा तो रही हूं, लेकिन चलते हुए बैल को आंगी न देना
चाहिए.
दातादीन ने लाल आंखे निकाल लीं-जान पड़ता है, अभी मिजाज ठण्डा नहीं हुआ, जभी दाने
दाने को मोहताज हो.
धनिया भला क्यों चुप रहने लगी थी-तुम्हारे द्वार पर भीख मांगने नहीं जाती.
दातादीन ने पैने स्वर में कहा-अगर यही हाल है, तो भीख भी मांगोगी.
धनिया के पास जवाब तैयार था, पर सोना उसे खींचकर तलैया की ओर ले गयी,नहीं बात
बढ़ जाती. लेकिन आवाज की पहुंच के बाहर दिल की जलन निकाली-भीख मांगो तुम, जो
भिखमंगे की जात हो. हम तो मजूर ठहरे, जहां काम करैंगे, वहीं चार पैसे पायेंगे.
सोना ने उसका तिरस्कार किया-अम्मां, जाने भी दो.तुम तो समय नहीं देखतीं,बात-बात पर
लड़ने बैठ जाती हो.
होरी उन्मत्त की भांति सिर से ऊपर गंड़ासा उठा-उठाकर ऊख के टुकड़ों के ठेर करता
जाता था. उसके भीतर जैसे आग लगी हुई थी. उसमें अलौकिक शक्ति आ गयी थी. उसमें जो
पीड़ियों का सञ्चित पानी था, वह इस समय जैसे भाप बनकर उसे यन्त्र की-सी अन्ध शक्ति
प्रदान कर रहा था. उसकी आंखों में अंधेरा छाने लगा. सिर में फिरकी-सी चल रही थी.
फिर भी उसके हाथ यन्त्र की गति से, बिना थके, बिना रुके, उठ रहे थे. उसकी देह से
पसीने की धारा निकल रही थी, मुंह से फिचकुर छूट रहा था, सिर में धम-धम शब्द हो रहा
था, पर उस पर जैसे कोई भूत सवार हो गया हो!
सहसा उसकी आंखों में निबिड़ अन्धकार छा गया. मालूम हुआ, वह जमीन मैं धंसा जा रहा है
उसने संभलने की चेष्टा से शून्य में हाथ फैला दिये और अचेत हो गया. गंड़ासा हाथ से
छूट गया और वह औंधे मुंह जमीन पर पड़ गया.
उसी वक्त धनिया ऊख का गट्ठा लिये आयी. देखा, तो कई आदमी होरी को घेरे खड़े हैं.एक
हलवाहा दातादीन से कह रहा था-मालिक, तुम्हें ऐसी बात न कहनी चाहिए, जो आदमी को लग
जाये. पानी मरते ही मरते तो मरेगा.
धनिया ऊख का गट्ठा पटककर पागलों की तरह दौड़ी हुई होरी के पास गयी, ओर उसका सिर
अपनी जांघ पर रखकर विलाप करने लगी-तुम मुझे छोड़कर कहा जाते हो? अरी सोना, दौड़कर
पानी ला और जाकर सोभा से कह दे, दादा बेहाल हैं. हाय भगवान्! अब, मैं कहां जाऊं?
अब किसकी होकर रहूंगी? कौन मुझे धनिया कहकर पुकारेगा….
लाला पटेश्वरी भागे हुए आये, स्नेह-भरी कठोरता से बोले-क्या करती है धनिया, होश
संभाल. होरी को कुछ नहीं हुआ. गरमी से अचेत हो गये हैं. अभी होश आया जाता है. दिल
इतना कच्चा कर लेगी, तो कैसे काम चलेगा?
धनिया ने पटेश्वरी के पांव पकड़ लिये और रोती हुई बोली-क्या करूं लालाजी, जी नहीं
मानता. भगवान ने सब कुछ हर लिया. मैं सबर कर गयी. अब सबर नहीं होता. हाय रे
हाय रे, मेरा हीरा!
सोना पानी लायी. पटेश्वरी ने होरी के मुंह पर पानी के छींटे दिये. कई आदमी अपनी-
अपनी अंगोछियों से हवा कर रहे थे. होरी की देह ठण्डी पड़ गई थी. पटेश्वरी को भी
चिन्ता हुई, पर धनिया को बराबर साहस देते जाते थे. धनिया अधीर होकर बोली-ऐसा कभी
नहीं हुआ था लाला, कभी नहीं.
पटेश्वरी ने पूछा-रात कुछ खाया ?
धनिया बोली-हां, रोटियां पकायी थीं, लेकिन आजकल हमारे ऊपर जो बीत रही है, वह क्या
तुमसे छिपा है? महीनों से भरपेट रोटी नसीब नहीं हुई. कितना समझाती हूं, जान रखकर
काम करो, लेकिन आराम तो हमारे भाग्य में लिखा ही नहीं.
सहसा होरी ने आंखें खोल दी और उड़ती हुई नजरों से इधर-उधर ताका.
धनिया जैसे जी उठी.विह्वल होकर उसके गले से लिपटकर बोली-अब कैसा जी है तुम्हारा?
मेरे तो परान नहों में समा गये थे.
होरी ने कातर स्वर में कहा-अच्छा हूं. न जाने कैसा जी हो गया था.
धनिया ने स्नेह मैं डूबी भर्त्सना से कहा-देह में दम तो नहीं, काम करते हो जान देकर
लड़कियों का भाग था, नहीं तुम तो ले ही डूबे थे.
पटेश्वरी ने हंसकर कहा- धनिया तो रो-पीट रही थी.
होरी ने आतुरता से पूछा-सचमुच तू रोती थी धनिया?
धनिया ने पटेश्वरी को पीछे ढकेलकर कहा-इन्हें बकने दो तुम. पूछो, वह क्यों कागद
छोड़कर घर से दौड़े आये थे?
पटेश्वरी ने चिढ़ाया -तुम्हीं हीरा-हीरा कहकर रोती थीं. अब लाज के मारे मुकरती है.
छाती पीट रही थी.
होरी ने धनिया को सजल नेत्रों से देखा-पगली है, और क्या?अब न जाने कौन-सा सुख देखने
के लिए मुझे जिलाये रखना चाहती है.
दो आदमी होरी को टिकाकर घर लाये और चारपाई पर लिटा दिया. दातादीन तो कुढ़ रहे थे कि
बोआई में देर हुई जाती है, पर मातादीन इतना निर्दयी न था. दौड़कर घर से गरम दूध
लाया, और एक शीशी में गुलाब जल भी लेता आया. और दूध पीकर होरी में जैसे जान आ गयी.
उसी वक्त गोबर एक मजदूर के सिर पर अपना सामान लादे आता दिखाई दिया.
गांव के कुत्ते पहले तो भूंकते हुए उसकी तरफ दौड़े, फिर दुम हिलाने लगे. रूपा ने
कहा-`भैया आये’ और तालियां बजाती हुई दौड़ी. सोना भी दो-तीन कदम आगे बढ़ी, पर अपने
उछाह को भीतर ही दबा गयी. एक साल में उसका यौवन कुछ और संकोचशील हो गया था.
झुनिया भी घूंघट निकाले द्वार पर खड़ी हो गयी.
गोबर ने मां-बाप के चरण छुए और रूपा को गोद में उठाकर प्यार किया. धनिया ने उसे
आशीर्वाद दिया और उसका सिर अपनी छाती से लगाकर, मानो अपने मातृत्व का पुरस्कार पा
गयी.उसका हृदय गर्व से उमड़ा पड़ता था. आज वह रानी है. इस फटे-हाल में भी रानी है.
कोई उसकी आंखे देखे, उसका हृदय देखे, उसकी चाल देखे. रानी भी लजा जायेगी. गोबर
कितना बड़ा हो गया है और पहन ओढ़कर कैसा भलामानस लगता है. धनिया के मन में कभी
अमंगल की शंका न हुई थी. उसका मन कहता था, गोबर कुशल से है, और प्रसन्न है. आज
उसे आंखों देखकर मानो उसके जीवन के धूल-धक्कड़ में गुम हुआ रत्न मिल गया है, मगर
होरी ने मुंह फेर लिया था.
गोबर ने पूछा- दादा को क्या हुआ है, अम्मां
धनिया घर का हाल कहकर उसे दुखी न करना चाहती थी. बोली-कुछ नहीं बेटा, जरा सिर में
दर्द है. चलो, कपड़े उतारो, हाथ-मुंह धोओ? कहां थे तुम इतने दिन? भला, इस तरह कोई
घर से भागता है? और कभी एक चिट्ठी तक न भेजी? आज साल-भर के बाद जाके सुधि ली है.
तुम्हारी राह देखते देखते आंखें फूट गयीं. यही आसा बंधी रहती थी कि कब वह दिन आयेगा
और कब तुम्हें देखूंगी. कोई कहता था, मिरच भाग गया, कोई डमरा टापू बताता था. सुन-
सुनकर जान सूख जाती थी. कहां रहे इतने दिन?
गोबर ने शरमाते हुए कहा- कहीं दूर नहीं गया था अम्मां, यही लखनऊ में तो था.
`और इतने नियरे रहकर भी एक चिट्ठी न लिखी?’
उधर सोना और रूपा भीतर गोबर का सामान खोलकर चीजों का बांट-बखरा करने में लगी हुई
थीं, लेकिन झुनिया दूर खड़ी थी. उसके मुख पर आज मान का शोख रंग झलक रहा है. गोबर ने
उसके साथ जो व्यवहार किया है, आज वह उसका बदला लेगी. असामी को देखकर महाजन उससे
वह रुपये वसूल करने को भी व्याकुल हो रहा है, जो उसने बट्टेखाते में डाल दिये थे.
बच्चा उन चीजों को लपक रहा था और चाहता था, सब-का-सब मुंह में डाल ले, पर झुनिया
उसे गोद से उतरने न देती थी.
सोना बोली-भैया तुम-हारे लिए ऐना-कंघी लाये हैं भाभी!
झुनिया ने उपेक्षा भाव से कहा-मुझे ऐना-कंघी न चाहिए. अपने पास रखे रहें.
रूपा ने बच्चे की चमकीली टोपी निकाली-ओ हो! यह तो चुन्नु की टोपी है. और उसे बच्चे
के सिर पर रख दिया.
झुनिया ने टोपी उतारकर फेंक दी और सहसा गोबर को अन्दर आते देखकर वह बालक को लिये
कोठरी में चली गयी. गोबर ने देखा, सारा सामान खुला पड़ा है! उसका जी तो चाहता है,
पहले झुनिया से मिलकर अपना अपराध क्षमा कराये, लेकिन अन्दर जाने का साहस नहीं होता.
वहीं बैठ गया और चीजें निकालकर रूपा को देने लगा, मगर रूपा इसलिए फूल गयी कि उसके
लिए चप्पल क्यों नहीं आये, और सोना उसे चिढ़ाने लगी, तू क्या करेगी चप्पल लेकर,अपनी
गुड़िया से खेल. हम तो तेरी गुड़िया देखकर नहीं रोते, तू मेरी चप्पल देखकर क्यों
रोती है? मिठाई बांटने की जिम्मेदारी धनिया ने अपने ऊपर ली.इतने दिनों के बाद लड़का
कुशल से घर आया है. वह गांव-भर मैं बैना बंटवायेगी. एक गुलाबजामुन रूपा के लिए ऊंट
के मुंह में जीरे के समान था. वह चाहती थी, हांडी उसके सामने रख दी जाये वह कूद-कूद
खाये.

अब सन्दूक खुला और उसमें से साड़ियां निकलने लगीं. सभी किनारदार थीं, जैसी
पटेश्वरी लाला के घर में पहनी जाती है, मगर हैं बड़ी हलकी. ऐसी महीन साड़ियां भला
कै दिन चलेंगी? बड़े आदमी जितनी महीन साड़ियां चाहें,पहनें. उनकी मेहरियों को बैठने
और सोने के सिवा और कौन काम है. यहां तो खेत-खलिहान सभी कुछ है. होरी के लिए धोती
के अतिरिक्त एक दुपट्टा भी है.
धनिया प्रसन्न होकर बोली-यह तुमने बड़ा अच्छा किया बेटा! इनका दुपट्टा बिलकुल तार-
तार हो गया था.
गोबर को उतनी देर में घर की परिस्थिति का अन्दाज हो गया था. धनिया की साड़ी में कई
पैबन्द लगे हुए थे. सोना की साड़ी सिर पर फटी हुई थी और उसमें से उसके बाल दिखाई
दे रहे थे. रूपा की धोती मैं चारों तरफ झालरें-सी लटक रही थीं. सभी के चेहरे रूखे,
किसी की देह पर चिकनाहट नहीं. जिधर देखो, विपन्नता का साम्राज्य था.
लड़कियां तो साड़ियों मे मगन थी. धनिया को लड़के के लिए भोजन की चिन्ता हुई. घर में
थोड़ा-सा जौ का आटा सांझ के लिए सञ्चकर रखा हुआ था. इस वक्त तो चबैने पर कटती थी,
मगर गोबर अब वह गोबर थोड़े ही है. उससे जौ का आटा खाया भी जायेगा?परदेस में न जाने
क्या-क्या खाता-पीता रहा होगा? जाकर दुलारी की दूकान से गेहूं का आटा, चांवल, घी
उधार लायी. इधर महीने से सहुआइन एक पैसे की चीज भी उधार न देती थी, पर आज उसने
एक बार भी न पूछा, पैसे कब दोगी.
उसने पूछा-गोबर तो खूब कमा के आया है न?
धनिया ने बोली-अभी तो कुछ नहीं खुला दीदी! अभी मैंने भी कुछ कहना उचित न समझा. हां,
सबके लिए किनारदार साड़ियां लाया है. तुम्हारे आसिरबाद से कुशल से लौट आया, मेरे
लिए तो यही बहुत है. दुलारी ने अशीस दिया-भगवान् करे, जहां रहे, कुशल से रहे. मां
बाप को और क्या चाहिये? लड़का समझदार है और छोकरों की तरह उड़ाऊ नहीं है.हमारे
रुपये अभी न मिले, तो ब्याज तो दे दो. दिन-दिन बोझ बढ़ ही तो रहा है.
इधर सोना चुन्नू को उसका फ्राक और टोप और जूता पहनाकर राजा बना रही थी. बालक इन
चीजों को पहनने से ज्यादा हाथ में लेकर खेलना पसन्द करता था. अन्दर गोबर और झुनिया
में मान-मनोवल का अभिनय हो रहा था.
झुनिया ने तिरस्कार-भरी आंखों से कहा-मुझे लाकर यहां बैठा दिया,आप परदेस की राह ली.
फिर न खोज, न खबर कि मरती है या जीती है. साल-भर के बाद अब जाकर तुम्हारी नींद
टूटी है. कितने बड़े कपटी हो तुम? मैं तो सोचती हूं कि तुम मेरे पीछे-पीछे आ रहे हो
और आप उड़े, तो साल-भर के बाद लौटे. मरदों का विश्वास ही क्या, कहीं कोई ताक ली
होगी. सोचा होगा, एक घर के लिए है ही, एक बाहर के लिए भी हो जाये.
गोबर ने सफाई दी-झुनिया, मैं भगवान् की साक्षी देकर कहता हूं, जो मैंने कभी किसी की
ओर ताका भी हो. लाज और डर के मारे घर से भागा जरूर, मगर तेरी याद एक छन के लिए भी
मन से न उतरती थी. अब तो मैंने तय कर लिया है कि तुझे भी लेता जाऊंगा, इसीलिए आया
हूं तेरे घर वाले तो बहुत बिगड़े होंगे?
`दादा तो मेरी जान लेने पर ही उतारू थे.’
`सच.’
`तीनों जने यहां चढ़ आये थे. अम्मां ने ऐसा डांटा कि मुंह लेकर रह गये. हां, हमारे
बैल खोल ले गये.’
`इतनी बड़ी जबरदस्ती, और दादा कुछ बोले नहीं?’
`दादा अकेले किस-किससे लड़ते? गांववाले तो नहीं ले जाने देते थे, लेकिन दादा ही भल
मनसी में आ गये, तो और लोग क्या करते?’
`तो आजकल खेती-बारी कैसे हो रही है?’
`खेती-बारी सब टूट गयी. थोड़ी-सी पण्डित महाराज के साझे मैं है. ऊख बोयी ही नहीं
.गयी.’ गोबर की कमर में इस समय दो सौ रुपये थे. उसकी गरमी यों भी कम न थी. यह हाल
सुनकर तो उसके बदन में आग ही लग गयी.
बोला-तो फिर पहले मैं उन्हीं से जाकर समझता हूं. उनकी यह मजाल कि मेरे द्वार से बैल
खोल ले जायें? यह डाका है, खुला हुआ डाका. तीन-तीन साल को चलें जायेंगे तीनों. यों
न देंगे, तो अदालत से लूंगा. सारा घमण्ड तोड़ दूंगा.
वह उसी आवेश मे चला था कि झुनिया ने पकड़ लिया और बोली-तो चले जाना, अभी ऐसी क्या
जल्दी? कुछ आराम कर लो, कुछ खा-पी लो. सारा दिन तो पड़ा है. यहां बड़ी-बड़ी पञ्चायत
हुई. पञ्चायत ने अस्सी रुपये ड़ांड के लगाये. तीस मन अनाज ऊपर. उसी में तो और तबाही
आ गयी.
सोना बालक को कपड़े-जूते पहनाकर लायी.कपड़े पहनकर वह जैसे सचमुच राजा हो गया था.
गोबर ने उसे गोद में ले लिया, पर इस समय बालक के प्यार में उसे आनन्द न आया. उसका
रक्त खौल रहा था और कमर के रुपये आंच और तेज कर रहे थे. वह एक-एक से समझेगा. पञ्चों
को उस पर डांड़ लगाने का अधिकार क्या है? कौन होता है कोई उसके बीच बोलने वाला?
उसने एक औरत रख ली, तो पञ्चों के बाप का क्या बिगड़ा? अगर इसी बात पर वह फौजदारी
में दावा कर दे,
तो लोगों के हाथों में हथकड़ियां पड़ जायें. सारी गृहस्थी तहस-नहस हो गयी. क्या समझ
लिया है उसे इन लोगों ने?
बच्चा उसकी गोद में जरा-सा मुस्कराया, फिर जोर से चीख उठा, जैसे कोई डरावनी चीज देख
ली हो.
झुनिया ने बच्चे को उसकी गोद से ले लिया और बोली-अब जाकर नहा-धोलो. किस सोच में पड़
गये? यहां सबसे लड़ने लगो, तो एक दिन निबाह न हो. जिसके पास पैसे हैं, वही बड़ा
आदमी है, वही भला आदमी. पैसे न हों, तो उस पर सभी रोब जमाते हैं.
`मेरा गधापन था कि घर से भगा, नहीं देखता, कैसे कोई एक धेला ड़ांड़ लेता.’
`सहर की हवा खा आये हो, तभी ये बातें सूझने लगी हैं, नहीं घर से भागते क्यों?’
`यही जी चाहता है कि लाठी उठाऊं और पटेश्वरी, दातादीन,झिंगुरी सब सालों को पीटकर
गिरा दूं और उनके पेट से रुपये निकाल लूं.’रुपये की बहुत गरमी चढ़ी है साइत. लाओ
निकालो, देखें, इतने दिन में क्या कमा लाये हो?’ उसने गोबर की कमर में हात लगाया.
गोबर खड़ा होकर बोला-अभी क्या कमाया? हां, अब तुम चलोगी, तो कमाऊंगा. साल-भर तो सहर
का रंग-ढंग पहचानने ही में लग गया.
`अम्मां जाने देंगी तब तो?’
`अम्मां क्यों न जाने देंगी? उनसे मतलब?’
`वाह! मैं उनकी राजी बिना न जाऊंगी. तुम तो छोड़कर चलते बने, और मेरा कौन था यहां?
वह अगर घर में न घुसने देतीं, तो मैं कहां जाती? जब तक जीऊंगी, उनका जस गाऊंगी और
तुम भी क्या परदेस ही करते रहोगे?’
`और यहां बैठकर क्या क्या करूंगा? कमाओ और मरो, इसके सिवा यहां और क्या रखा है?
थोड़ी-सी अकल हो और आदमी काम करने से न डरे, तो वहां भूखों नहीं मर सकता. यहां तो
अकल कुछ काम ही नहीं करती. दादा क्यों मुंह फुलाये हुए हैं?’
`अपने भाग बखानों कि मुंह फुलाकर छोड़ देते हैं. तुमने उपद्रव तो इतना बड़ा किया था
कि उस क्रोध में पा जाते, तो मुंह लाल कर देते.’
`तो तुम्हें भी खूब गालियां देते होंगे?’
`कभी नहीं, भूलकर भी नहीं. अम्मां तो पहले बिगड़ी थीं, लेकिन दादा ने कभी कुछ नहीं
कहा. जब बुलाते हैं बड़े प्यार से. मेरा सिर भी दुखता है, तो बैचेन हो जाते हैं.
अपने बाप को देखते तो मैं इन्हें देवता समझती हूं. अम्मां को समझाया करते हैं, बहू
को कुछ न कहना. तुम्हारे ऊपर सैंकड़ों बार बिगड़ चुके हैं कि इसे घर में बैठाकर आप
न जाने कहां निकल गया. आजकल पैसे-पैसे की तंगी है. ऊख के रुपये बाहर- ही-बाहर उड़
गये. अब तो मजूरी करनी पड़ती है. आज बेचारे खेत मैं बेहोश हो गये. रोना-पीटना मच
गया. तब से पड़े हैं.’
मुंह-हाथ धोकर और खूब बाल बनाकर गोबर गांव की दिग्विजय करने निकला. दोनों चाचाओं के
घर जाकर राम-राम कर आया. फिर मित्रों से मिला. गांव में कोई विशेष परिवर्तन न था.
हां पटेश्वरी की नयी बैठक बन गयी थी और झिंगुरीसिंह ने दरवाजे पर नया कुआं खुदवा लि
या था. गोबर के मन में विद्रोह और भी ताल ठोंकने लगा. जिससे मिला, उसने उसने उसका
आदर किया, और युवकों ने तो उसे अपना हीरो बना लिया और उसके साथ लखनऊ जाने को
तैयार हो गये. साल ही भर में वह क्या से क्या हो गया था?
सहसा झिंगुरीसिंह अपने कुएं पर नहाते हुए मिल गये. गोबर निकला, मगर न सलाम किया,न
बोला. वह ठाकुर को दिखा देना चाहता था, मैं तुम्हें कुछ नहीं समझता.
झिंगुरीसिंह ने खुद ही पूछा-कब आये गोबर, मजे में तो रहे? कहीं नौकर थे लखनऊ में?
गोबर ने हेकड़ी के साथ कहा-लखनऊ गुलामी करने नहीं गया था. नौकरी है तो गुलामी. मैं
व्यापार करता था
ठाकुर ने कुतूहल-भरी आंखों से उसे सिर से पांव तक देखा-कितना रोज पैदा करते थे?
गोबर ने छुरी को भाला बनाकर उनके ऊपर चलाया-यही कोई ढ़ाई तीन रुपये मिल जाते थे.
कभी. कभी चटक गयी तो, तो चार भी मिल गये. इससे बेसी नहीं.
झिंगुरी बहुत नोच-खसोट करके भी पच्चीस-तीस से ज्यादा न कमा पाते थे. और यह गंवार
लौंडा सौ रुपये कमाने लगा. उनका मस्तक नीचा हो गया.अब किस दावे से उस पर रोब जमा
सकते हैं? वर्ण मे वह जरूर ऊंचे हैं, लेकिन वर्ण कौन देखता है? उससे स्पर्द्धा करने
का यह अवसर नहीं,अब तो उसकी चिरौरी करके उससे कुछ काम निकाला जा सकता है.बोले-इतनी
कमाई कम नहीं है बेटा, जो खरच करते बने.गांव में तीन आने भी नहीं मिलते. भवनिया
(उसके जेठे पुत्र का नाम था) को भी कहीं कोई काम दिला दो,तो भेज दूं. न पढ़े,न लिखे
एक न एक उपद्रव करता रहता है.कहीं मुनीमी खाली हो, तो कहना, नहीं साथ ही लेते जाना.
तुम्हारा तो मित्र है.तलब थोड़ी हो, कुण गम नहीं. हां, चार पैसे की ऊपर गुंजाइस हो.
गोबर ने अभिमान भरी हंसी के साथ कहा-यह ऊपरी आमदनी की चाट आदमी को खराब कर देती है
ठाकुर, लेकिन हम लोगों की आदत कुछ ऐसी बिगड़ गयी है कि जब तक बेईमानी न करें, पेट
नहीं भरता. लखनऊ में मुनीमी मिल सकती है, लेकिन हर एक महाजन ईमानदार चौकस आदमी
चाहता है. मैं भवानी को किसी के गले बांध तो दूं, लेकिन पीछे इन्होने कहीं हाथ
लपकाया तो वह तो मेरी गर्दन पकड़ेगा.संसार में इलम की कदर नहीं है, ईमान की कदर है.
यह तमाचा लगाकर गोबर आगे निकल गया.झिंगुरी मन में ऐंठकर रह गये.लौंडा कितने घमण्ड
की बातें करता है, मानो धर्म का अवतार ही तो है.
इसी तरह गोबर ने दातादीन को भी रगड़ा.भोजन करने जा रहे थे. गोबर को देखकर प्रसन्न
होकर बोले-मजे में तो रहे गोबर? सुना, वहां कोई अच्छी जगह पा गये हो. मातादीन को भी
किसी हीले से लगा दो न? भंग पीकर पड़े रहने के सिवा यहां और कौन काम है?
गोबर ने बनाया-तुम्हारे घर में किस बात की कमी है महाराज, जिस जजमान के द्वार पर
जाकर खड़े हो जाओ, कुछ-न कुछ मार ही लाओगे. जनम में लो , मरन में लो, सादी में लो,
गमी में लो, खेती करते हो, लेनदेन करते हो, किसी से कुछ भूल-चूक हो जाये, तो डांड़
लगाकर उसका घर लूट लेते हो. इतनी कमाई से पेट नहीं भरता? क्या करोगे बहुत-सा धन
बटोरकर कि साथ ले जाने की कोई जुगत निकाल ली है?
दातादीन ने देखा, गोबर कितनी ढिठाई से बोल रहा है, अदब और लिहाज जैसे भूल गया. अभी
शायद नहीं जानता कि बाप मेरी गुलामी कर रहा है. सच है, छोटी नदी को उमड़ते देर नहीं
लगती. मगर चेहरे पर मैल नहीं आने दिया, जैसे बड़े लोग बालकों से मूंछे उखड़वाकर भी
हंसते हैं, उन्होंने भी इस फटकार को हंसी में लिया और विनोद भाव से बोले- लखनऊ की
हवा खा के तू बड़ा चण्ट हो गया है गोबर! ला, क्या कमा के लाया है कुछ निकाल. सच
कहता हूं गोबर, तुम्हारी बहुत याद आती थी. अब तो रहोगे कुछ दिन?
`हां, अभी तो रहूंगा कुछ दिन. उन पञ्चों पर दावा करना है, जिन्होंने डांड़ के बहाने
मेरे डेढ़ सौ रुपये हजम किये हैं. देंखे कौन मेरा हुक्का पानी बन्द करता है और कैसे
बिरादरी मुझे जात से बाहर करती है?’
यह धमकी देकर वह आगे बढ़ा. उसकी हेकड़ी ने उसके युवक भक्तों को रोब में डाल दिया था
एक ने कहा-कर दो नालिस गोबर भैया! बुड्ढा काला सांप है, जिसके काटे मन्तर नहीं.
तुमने अच्छी डांट बतायी. पटवारी के कान भी जरा गरमा दो.बड़ा मुतफन्नी है दादा. बाप-
बेटे में आग लगा दे, भाई-भाई में आग लगा दे, कारिन्दे से मिलकर असामियों का गला
काटता है. अपने खेत पीछे जोतो, पहले उसके खेत जोतो. अपनी सिंचाई पीछे करो, पहले
उसकी सिंचाई कर दो.
गोबर ने मूंछों पर ताव देकर कहा-मुझसे क्या कहते हो भाई, साल-भर में भूल थोड़े ही
गया? यहां मुझे रहना ही नहीं है, नहीं एक-एक को नचाकर छोड़ता. अबकी होली धूम-धाम से
मनाओ और होली का स्वांग बनाकर इन सबों को खूब भिगो-भिगोकर लगाओ.
होली का प्रोग्राम बनने लगा. खूब भंग घुटे, दूधिया भी, नमकीन भी, और रंगों के साथ
कालिख भी बने और मुखियों के मुंह पर कालिख ही पोती जाये.होली मैं कोई बोल ही क्या
सकता है? फिर स्वांग निकले और पञ्चों की भद्द उड़ायी जाये. रुपये पैसे की कोई
चिन्ता नहीं. गोबर भाई कमाकर आये हैं.
भोजन करके गोबर भोला से मिलने चला. जब तक अपनी जोड़ी लाकर अपने द्वार पर बांध न दे,
उसे चैन नहीं. वह लड़ने-मरने को तैयार था.
होरी ने कातर स्वर में कहा-रार मत बढ़ाओ बेटा! भोला गोई ले गये, भगवान उनका भला करे
लेकिन उनके रुपये तो आते ही थे.
गोबर ने उत्तेजित होकर कहा-दादा, तुम बीच में न बोलो. उनकी गाय पचास की थी. हमारी
गोई डेढ़ सौ में आयी थी. तीन साल हमने जोती. फिर भी सौ की थी. वह अपने रुपये के लिए
दावा करते, डिग्री कराते या जो चाहते करते, हमारे द्वार से जोड़ी क्यों खोल ले गये?
और तुम्हें क्या कहूं? इधर गोई खो बैठे, उधर डेढ़ सौ रुपये डांड़ के भरे. यह है गऊ
होने का फल. मेरे सामने जोड़ी खोल ले जाते, तो देखता. तीनों को यहीं जमीन पर सुला
देता, और पञ्चों से तो बात तक न करता. देखता, कौन बिरादरी से अलग करता है, लेकिन
तुम बैठे ताकते रहे.
होरी ने अपराधी की भांति सिर झुका लिया, लेकिन धनिया यह अनीत कैसे देख सकती थी?
बोली-बेटा, तुम भी अन्धेर करते हो. हुक्का पानी बन्द हो जाता, तो गांव मै निर्वाह
होता? जवान लड़की बैठी है, उसका कहीं ठिकाना लगाना है कि नहीं? मरने जीने में आदमी
बिरादरी….
गोबर ने बात काटी-हुक्का-पानी सब तो था, बिरादरी में आदर भी था, फिर मेरा ब्याह
क्यों नहीं हुआ? बोलो? इसलिए कि घर में रोटी न थी. रुपये हों, तो न हुक्का-पानी का
काम है, न जात-बिरादरी का. दुनिया पैसे की है, हुक्का-पानी कोई नहीं पूछता.
धनिया तो बच्चे का रोना सुनकर भीतर चली गई और गोबर भी घर से निकला. होरी बैठा सोच
रहा था. लड़के की अकल जैसे खुल गयी है.कैसी बेलाग बात कहता है. उसकी वक्र बुद्धि ने
होरी के धर्म और नीति को परास्त कर दिया था.
सहसा होरी ने उससे पूछा-मैं भी चला चलूं?
`मैं लड़ाई करने नहीं जा रहा हूं दादा, डरो मत. मेरी ओर तो कानून है, मैं क्यों
लड़ाई करने लगा?’
`मैं भी चलूं तो कोई हरज है?’
`हां, बड़ा हरज है. तुम बनी बात बिगाड़ दोगे.’
होरी चुप हो गया और गोबर चल दिया.
पांच मिनट भी न हुए होंगे कि धनिया बच्चे को लिए बाहर निकली और बोली-क्या गोबर चला
गया, अकेले? मैं कहती हूं, तुम्हें भगवान् कभी बुद्धि देंगे या नहीं.भोला क्या सहज
में गोई देगा? तीनों उस पर टूट पडेंगे बाज की तरह. भगवान् ही कुशल करें. अब किससे
कहूं, दौड़कर गोबर को पकड़ ले. तुमसे तो मैं हार गयी.
होरी ने डन्डा उठाया और गोबर के पीछे दौड़ा. गांव के बाहर आकर उसने निगाह दौड़ायी.
एक क्षीण-सी रेखा क्षितिज से मिली हुई दिखाई दी.इतनी ही देर में गोबर इतनी दूर कैसे
निकल गया. होरी की आत्मा उसे धिक्कारने लगी. उसने क्यों गोबर को रोका नहीं? अगर
वह डांटकर कह देता, भोला के घर मत जाओ, तो गोबर कभी न जाता. और अब उससे दौड़ा भी तो
नहीं जाता. वह हारकर वहीं बैठ गया और बोला-उसकी रच्छा करो महाबीर स्वामी.
गोबर उस गांव में पहुंचा, तो देखा, कुछ लोग बरगद के नीचे बैठे जुआ खेल रहें हैं.
उसे देखकर लोगों ने समझा, पुलिस का सिपाही है. कौड़ियां समेटकर भागे कि सहसा जंगी
ने उसे पहचान कर कहा-अरे, यह तो गोबरधन है.
गोबर ने देखा, जंगी पेड़ की आड़ में खड़ा झांक रहा है. बोला- डरो मत जंगी भैया, मैं
हूं. राम-राम! आज ही आया हूं. सोचा, चलूं सबसे मिलता आऊं, फिर न जाने कब आना हो.
मैं तो भैया, तुम्हारे आसिरबाद से बड़े मजे में निकल गया. जिस राजा की नौकरी में
हूं, उन्होंने मुझसे कहा है कि एक-दो आदमी मिल जायें, तो लेते आना. चौकीदारी के लिए
चाहिए. मैंने कहा, सरकार ऐसे आदमी दूंगा कि चाहे जान चली जाये, मैदान से हटने वाले
नहीं, इच्छा हो,तो मेरे साथ चलो. अच्छी जगह है.
जंगी उसका ठाट-बाट देखकर रोब में आ गया. उसे कभी चमरौधे जूते भी मयस्सर नहीं हुए थे
और गोबर चमाचम बूट पहने हुए था. साफ सुथरी धारीदार कमीज, संवारे हुए बाल, पूरा बाबू
साहब बना हुआ. फटेहाल गोबर और इस परिष्कृत गोबर में बड़ा अन्तर था. हिंसा-भाव कुछ
तो यों ही समय के प्रभाव से शान्त हो गया था और बचा-खुचा अब शान्त हो गया. जुआड़ी
था ही, उस पर गांजे की लत. और घर में बड़ी मुश्किल से पैसे मिलते थे. मुंह मैं पानी
भर आया. बोला- चलूंगा क्यों नहीं, यहां पड़ा-पड़ा मक्खी ही तो मार रहा हूं. कै
रुपये मिलेंगे?
गोबर ने बड़े आत्मविश्वास से कहा-इसकी कुछ चिन्ता न करो. सब कुछ अपने ही हाथ में है
जो चाहोगे, वह हो जायेगा. हमने सोचा, जब घर में ही आदमी है, तो बाहर क्यों जायें.
जंगी ने उत्सुकता से पूछा-काम क्या करना पड़ेगा?
`काम चाहे चौकीदारी करो, चाहे तगादे पर जाओ. तगादे का काम सबसे अच्छा. असामी से गठ
गये. आकर मालिक से कह दिया, घर पर नहीं, चाहो तो रुपये-आठ आने रोज बना सकते हो.’
`रहने की जगह भी मिलती है.’
`जगह की कौन कमी? पूरा महल पड़ा है. पानी का नल, बिजली, किसी बात की कमी नहीं है.
कामता हैं कि कहीं गये हैं.’
`दूध लेकर गये हैं. मुझे कोई बाजार नहीं जाने देता. कहते हैं, तुम तो गांजा पी जाते
हो. मैं अब बहुत कम पीता हूं भैया, लेकिन दो पैसे रोज चाहिए ही. तुम कामता से कुछ न
कहना. मैं तुम्हारे साथ चलूंगा.’
`हां-हां, बेखटके चलो. होली के बाद.’
तो पक्की रही.’
दोनों आदमी बातें करते भोला के द्वार पर आ पहुंचे. भोला बैठे सुतली कात रहे थे.गोबर
ने लपककर उनके चरण छुए और इस वक्त उसका गला सचमुच भर आया. बोला-काका
मुझसे जो कुछ भूल-चूक हुई, उसे क्षमा करो.
भोला ने सुतली कातना बन्द कर दिया और पथरीले स्वर मैं बोला-काम तो तुमने ऐसा ही
किया था गोबर कि तुम्हारा सिर काट लूं, तो भी पाप न लगे, लेकिन अपने द्वार आये हो,
अब क्या कहूं? जैसा मेरे साथ किया, उसकी सजा भगवान् देंगे. कब आये?
गोबर ने खूब नमक मिर्च लगाकर अपने भाग्योदय का वृतान्त कहा और जंगी को अपने साथ ले
जाने की अनुमति मांगी. भोला को जैसे बेमांगे वरदान मिल गया. जंगी घर पर एक-न-एक
उपद्रव करता रहता था. बाहर चला जायेगा, तो चार पैसे पैदा तो करेगा. न किसी को कुछ
दे, अपना बोझ तो उठा लेगा.
गोबर ने कहा-नहीं काका, भगवान् ने चाहा और इनसे रहते बना, तो साल-दो साल में आदमी
हो जायेंगे.
`हां जब इनसे रहते बने.’
`सिर पर पड़ती है, तो आदमी आप संभल जाता है.’
`तो कब तक जाने का विचार है?’
`होली करके चला जाऊंगा. यहां खेती- बारी का सिलसिला फिर जमा दूं, तो निश्चिन्त हो
जाऊं.’
`होरी से कहो, अब बैठके राम-राम करें.’
`कहता तो हूं, लेकिन जब उनसे बैठा जाये.’
`वहां किसी बैद से तो तुम्हारी जान-पहचान होगी. खांसी बहुत दिक कर रही है. हो सके,
तो कोई दवाई भेज देना.’
`एक नामी बैद तो मेरे पड़ोस में रहते हैं. उनसे हाल कहके दवा बनवाकर भेज दूंगा.
खांसी रात को जोर करती है कि दिन को?’
`नहीं बेटा, रात को. आंख नहीं लगती. नहीं वहां कोई डौल हो, तो मैं भी वहीं चलकर
रहूं. यहां तो कुछ परता नहीं पड़ता.’
`रोजगार का जो मजा वहां है काका, यहां क्या होगा? यहां रुपये का दस सेर दूध भी कोई
नहीं पूछता. हलवाइयों के गले लगाना पड़ता है. वहां पांच-छः सेर के भाव से चाहो, तो
एक घड़ी में मनों दूध बेच दो.’
जंगी गोबर के लिए दूधिया शर्बत बनाने चला गया था. भोला ने एकान्त देखकर कहा- और
भैया! अब इस जञ्जाल से जी उब गया है. जंगी का हाल देखते ही हो. कामता दूध लेकर जाता
है. सानी-पानी, खोलना-बांधना, सब मुझे करना पड़ता है. अब तो यही जी चाहता है कि सुख
से कहीं एक रोटी खाऊं और पड़ा रहूं. कहां तक हाय-हाय करूं? रोज लड़ाई-झगड़ा. किस-
किसके पांव सहलाऊं. खांसी आती है,रात को उठा नहीं जाता, पर कोई एक लोटा पानी को
को भी नहीं पूछता. पगहिया टूट गयी है, मुदा किसी को इसकी सुधि नहीं है. जब मैं
बनाऊंगा तभी बनेगी.
गोबर ने आत्मीयता के साथ कहा-तुम चलो लखनऊ काका. पांच सेर का दूध बेचो, नगद. कितने
ही बड़े-बड़े अमीरों से मेरी जान-पहचान है. मन भर- दूध की निकासी का जिम्मा मैं
लेता हूं. मेरी चाय की दुकान भी है. दस सेर दूध तो मैं ही नित लेता हूं. तुम्हें
किसी तरह का कष्ट न होगा?
जंगी दूधिया शर्बत ले आया. गोबर ने एक गिलास शर्बत पीकर कहा- तुम तो खाली सांझ-
सबेरे चाय की दुकान पर बैठ जाओ काका, तो एक रुपया कहीं नहीं गया है.
भोला ने एक मिनट के बाद संकोच-भरे भाव से कहा-क्रोध में बेटा आदमी अन्धा हो जाता है
मैं तुम्हारी गोई खोल लाया था. उसे लेते जाना. यहां कौन खेती-बारी होती है?
`मैंने तो एक नयी गोई ठीक करली है काका!’
`नहीं-नहीं, नयी गोई लेकर क्या करोगे? इसे लेते जाओ.’
`तो मैं तुम्हारे रुपये भिजवा दूंगा.’
`रुपये कहीं बाहर थोड़े ही हैं बेटा, घर में ही तो हैं. बिरादरी का ढकोसला है, नहीं
तुममें और हममें कौन भेद है? सच पूछो, तो मुझे खुश होना चाहिए था कि झुनिया भले घर
में है, आराम से है.और मैं उसके खून का प्यासा बन गया था.’
संध्या के समय गोबर वहां से चला, तो गोई उसके साथ थी और दही की दो हाड़ियां लिये

जंगी पीछे-पीछे आ रहा था.

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