गोदान (भाग 1)

: 9 :

प्रातःकाल होरी के घर में एक पूरा हंगामा हो गया. होरी धनिया को मार रहा था. धनिया
उसे गालियां दे रही थी. दोनों लड़कियां बाप के पांवों से लिपटी चिल्ला रही थी और
गोबर मां को बचा रहा था. बार-बार होरी का हाथ पकड़ कर पीछे ढकेल देता, पर ज्यों ही
धनिया के मुंह से कोई गाली निकल जाती, होरी अपने हाथ छुड़ाकर उसे दो चार घूंसे और
लात जमा देता. उसका बूढ़ा क्रोध जैसे किसी गुप्त सञ्चित शक्ति को निकाल लाया हो.
सारे गांव में हलचल पड़ गयी. लोग समझाने के बहाने तमाशा देखने आ पहुंचे. शोभा लाठी
टेकता आ खड़ा हुआ. दातादीन ने डांटा-यह क्या है होरी, तुम बावले हो गये हो क्या?
कोई इस तरह घर की लक्ष्मी पर हाथ छोड़ता है? तुम्हे तो यह रोग न था. क्या हीरा की
छूत तुम्हे भी लग गयी?
होरी ने पालागन करके कहा- महाराज, तुम इस बखत न बोलो. मैं आज इसकी बान छुड़ाकर तब
दम लूंगा. मैं जितना ही तरह देता हूं, उतना ही यह सिर चढ़ती जाती है.
धनिया सजल क्रोध में बोली- महाराज, तुम गवाह रहना. मैं आज इसे और इसके हत्यारे भाई
को जेहल भेजवाकर तब पानी पिऊंगी. इसके भाई ने गाय को माहुर खिलाकर मार डाला. अब जो
मैं थाने में रपट लिखाने जा रही हूं, तो यह हत्यारा मुझे मारता है. इसके पीछे अपनी
जिन्दगी चौपट कर दी, उसका यह इनाम दे रहा है.
होरी ने दांत पीशकर और आंखे निकालकर कहा-फिर वही बात मुंह से निकाली? तूने देखा
था हीरा को माहुर खिलाते?
`तू कसम खा जा कि तूने हीरा को गाय की नांद के पास खड़े नहीं देखा?’
`हां मैंने नहीं देखा, कसम खाता हूं.’
`बेटे के माथे पर हाथ रख के कसम खा.’
होरी ने गोबर के माथै पर कांपता हुआ हाथ रखकर कांपते हुए स्वर में कहा-मैं बेटे की
कसम खाता हूं कि मैंने हीरा को नांद के पास नहीं देखा.
धनिया ने जमीन पर थूककर कहा-थुड़ी है तेरी झुठाई पर. तूने खुद मुझसे कहा कि हीरा
चोरों की तरह नांद के पास खड़ा था,और अब भाई के पक्ष में झूठ बोलता है. थुड़ी है.
अगर मेरे बेटे का बाल भी बांका हुआ, तो घर में आग लगा दूंगी. सारी गृहस्थी में आग
लगा दूंगी.भगवान्, आदमी मुंह से बात कहकर इतनी बेसरमी से मुकर जाता है.
होरी पांव पटककर बोला- धनिया, गुस्सा मत दिला, नहीं बुरा होगा.
`मार तो रहा है, और मार ले. जा, तू अपने बाप का बेटा होगा, तो आज मुझे मारकर तब
पानी पियेगा. पापी ने मारते-मारते मेरा भुरकस निकाल दिया, फिर भी इसका जी नहीं भरा.
मुझे मारकर समझता है बड़ा बीर हूं. भाइयों के सामने बिल्ली बन जाता है, पापी कहीं
का, हत्यारा.’
फिर वह बैन कहकर रोने लगी-इस घर में आकर उसने क्या नहीं झेला, किस-किस तरह पेट-तन
नहीं काटा,किस तह एक-एक लत्ते को तरसी, किस तरह एक-एक पैसा प्राणों की तरह सञ्चा,
किस तरह घर-भर को खिलाकर आप पानी पीकर सो रही. और आज उन सारे बलिदानों
का यह पुरस्कार! भगवान् बैठे यह अन्याय देख रहें हैं और उसकी रक्षा को नहीं दौड़ते.
गज की और द्रौपदी की रक्षा करने बैकुण्ठ से दौड़े थे. आज क्यों नींद में सोये हुए
हैं?
जनमत धीरे-धीरे धनिया खी ओर आने लगा. इसमें अब किसी को सन्देह नहीं रहा कि
हीरा ने ही गाय को जहर दिया. होरी ने बिलकुल झूठी कसम खायी है, इसका भी लोगों को
विश्वास हो गया. गोबर को भी बाप की इस झूठी कसम और उसके फलस्वरूप आने वाली विपत्ति
की शंका ने होरी के विरुद्ध कर दिया. उस पर जो दातादीन ने डांट बतायी, तो होरी
परास्त हो गया. चुपके से बाहर चला गया. सत्य ने विजय पायी.
दातादीन ने शोभा से पूछा-तुम कुछ जानते हो शोभा, क्या बात हुई?
शोभा जमीन पर लेटा हुआ बोला- मैं तो महाराज, आठ दिन से बाहर नहीं निकला.होरी दादा
कभी-कभी जाकर कुछ दे आते हैं, उसी से काम चलता है. रात भी वह मेरे पास गये थे.
किसने क्या किया, मैं कुछ नहीं जानता. हां, कल सांझ को हीरा मेरे घर खुरपी मांगने
गया था. कहता था, एक जड़ी खोदना है. फिर तब से मेरी उससे भेंट नहीं हुई.
धनिया इतनी शह पाकर बोली-पण्डित दादा यह उसी का काम है. सोभा के घर से खुरपी मांगकर
लाया और कोई जड़ी खोदकर गाय को खिला दी. उस रात को जो झगड़ा हुआ था, उसी दिन से
वह खार खाये बैठा था. दातादीन बोले–
यह बात साबित हो गयी,तो उसे हत्या लगेगी. पुलिस कुछ करे या न करै, धरम तो बिना दण्ड
दिये न रहेगा.चली तो जा रुपिया, हीरा को बुला ला. कहना. पण्डित दादा बुला रहें हैं.
अगर उसने हत्या नहीं की है, तो गंगाजली उठा ले और चौरे पर चढ़कर कसम खाये
धनिया बोली- महाराज उसके कसम का भरोसा नहीं. चटपट खा लेगा. जब इसने झूठी कसम
खा ली, जो बड़ा धर्मात्मा बनता है, तो हीरा का क्या विश्वास!
अब गोबर बोला-खाले झूठी कसम. बंस का अन्त हो जाये. बूढ़े जीते रहें. जवान जीकर
क्या करेंगे?
रूपा एक क्षण में आकर बोली-काका घर में नहीं है, पण्डित दादा! काकी कहती है,
कहीं चले गयें हैं.
दातादीन ने लम्बी दाढ़ी फटकार कहा- तूने पूछा नहीं, कहां चले गये है?
घर में छिपा बैठा न हो. देख तो सोना, भीतर तो नहीं बैठा है?
धनिया ने टोका-उसे मत भेजो दादा! हीरा के सिर हत्या सवार है, न जाने क्या कर बैठे?
दाताधीन ने खुद लकड़ी संभाली और खबर लाये कि हीषा सचमुच कहीं चला गया है. पुनिया
कहती है, लुटिया-डोर और डण्डा सब लेकर गये हैं. पुनिया ने पूछा भी, कहां जाते हो,
पर बताया नहीं उसने पांच रुपये आले में रखे थे. रुपये वहां नहीं है.साइत रुपये भी
लेता गया.
धनिया शीतल हृदय से बोली- मुंह में कालिख लगाकर कहीं भागा होगा.
शोभा बोला- भाग के कहां जायेगा? गंगा नहाने न चला गया हो.
धनिया ने शंका की-गंगा जाता,तो रुपये क्यों ले जाता,और आजकल कोई परब भी तो नहीं है.
इस शंका का कोई समाधान न मिला. धारणा दृढ़ हो गयी.
आज होरी के घर भोजन नहीं पका.न किसी ने बैलों को सानी-पानी दिया.सारे गांव में
सनसनी फैली हुई थी. दो-दो चार-चार आदमी जगह-जगह जमा होकर इसी विषय की
आलोचना कर रहे थे. हीरा अवश्य कहीं भाग गया. देखा होगा भेद खूल गया,अब जेहल जाना
पड़ेगा,हत्या अलग लगेगी. बस, कहीं भाग गया.पुनिया अलग रो रही थी, कुछ कहा न सुना,
न जाने कहां चल दिये.

जो कुछ कसर रह गयी थी, वह सन्ध्या-समय हलके के थानेदार ने आकर पूरी कर दी.
गांव के चौकीदार ने इस घटना की रपट की, जैसा उसका कर्तव्य था. और थानेदार साहब भला
अपने कर्तब्य से कब चूकने वाले थे? अब गांव वालों को भी उनकी सेवा-सत्कार करके अपने
कर्तव्य का पालन करना चाहिए.दातादीन, झिंगुरीसिंह, नोखेराम, उनके चारों प्यादे,
मंगरू साह और लाला पटेश्वरी सभी आ पहुंचे और दारोगाजी के सामने हाथ बांधकर खड़े हो
गये.होरी की तलबी हुई. जीवन में यह पहला अवसर था कि वह दारोगा के सामने आया. ऐसा
डर रहा था,जैसे फांसी हो जायेगी. धनिया को पीटते समय उसका एक-एक अंग फड़क रहा था.
दारोगा के सामने कछुए की भांति भीतर सिमटा जाता था. दारोगा ने उसे आलोचक नेत्रो से
देखा और उसके हृदय तक पहुंच गये. आदमियों की नस पहचानने का उन्हें अच्छा अभ्यास था.
किताबी मनोविज्ञान में कोरे, पर व्यावहारिक मनोविज्ञान के मर्मज्ञ थे. यकीन हो गया,
आज अच्छे का मुंह देखकर उठे हैं. और होरी का चेहरा कहे देता था, इसे केवल एक
घुड़की काफी है.
दारोगा ने पूछा-तुझे किस पर शुबहा है?
होरी ने जमीन छुई और हाथ बांधकर बोला-मेरा सुबहा किसी पर नहीं है सरकार, गाय अपनी
मौत से मरी है. बुड्ढी हो गई थी.
धनिया भी आकर पीछे खड़ी हो गई थी. तुरन्त बोली-गाय मारी है तुम्हारे भाई हीरा ने.
सरकार ऐसे बौड़म नहीं हैं कि जो कुछ तुम कह दोगे, मान लेंगे. यहां जांच-तहकीकात
करने आये हैं.
दारोगा ने पूछा -यह कौन औरत है?
कई आदमियों ने दारोगाजी से कुछ बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए चढ़ा-
ऊपरी की. एक साथ बोले और अपने मन को इस कल्पना से सन्तोष दिया कि पहले मैं बोला
-होरी की घरवाली है सरकार!
`तो इसे बुलाओ, मैं पहले इसी का बयान लिखूंगा. वह कहां है हीरा?’
विशिष्ट जनों ने एक स्वर से कहा-वह तो आज सवेरे से कहीं चला गया है सरकार!
`मैं उसके घर की तलाशी लूगां’
तलाशी. होरी की सांस तले-ऊपर होने लगी. उसके भाई हीरा के घर की तलाशी न होने
पायेगी,और धनिया से अब उसका कोई सम्बन्ध नहीं. जहां चाहे जाये. जब वह उसकी
इज्जत बिगाड़ने पर आ गयी, तो उसके घर में कैसे रह सकती है? जब गली-गली ठोकर खायेगी,
तब पता चलेगा.
गांव के विशिष्ट जनों ने इस महान् संकट को टालने के लिए कानाफूसी शुरू की.
दातादीन ने गंजा सिर हिलाकर कहा-यह सब कमाने के ढंग हैं. पूछो, हीरा के घर में क्या
रखा है?
पटेश्वरी लाल बहुत लम्बे थे, पर लम्बे होकर भी बेवकूफ न थे. अपना लम्बा काला मुंह
और लम्बा करके बोले-और यहां आया है किसलिए, और जब आया है, बिना कुछ लिए-दिये
गया कब है?
झिंगुरीसिंह ने होरी को बुलाकर कान में कहा-निकालो जो कुछ देना हो.यों गला न छूटेगा
दारोगाजी ने अब जरा गरज कर कहगा- मैं हीरा के घर की तलाशी लूंगा.
होरी के मुख का रंग ऐसे उड़ गया था, जैसे देह का सारा रक्त सूख गया हो. तलाशी उसके
घर हुई तो, उसके भाई के घर हुई तो,एक ही बात है. हीरा अलग सही, पर दुनिया तो जानती
है, वह उसका भाई है, मगर इस वक्त उसका कुछ बस नहीं. उसके पास रुपये होते, तो इसी
वक्त पचास रुपये लाकर दारोगाजी के चरणों पर रख देता और कहता-सरकार, मेरी इज्जत अब
आपके हाथ है. मगर उसके पास तो जहर खाने को भी एक पैसा नहीं है. धनिया के पास चाहे
दो-चार रुपये पड़े हों, पर वह क्यों देने लगी, मृत्युदण्ड पाये हुए आदमी की भांति
सिर झुकाये, अपने अपमान की वेदना का तीव्र अनुभव करता हुआ चुपचाप खड़ा रहा.
दातादीन ने होरी को सचेत किया- अब इस तरह खड़े रहने से काम न चलेगा होरी,रुपये की
कोई जुगत करो.
होरी दीन स्वर में बोला- अब मैं क्या अरज करूं महाराज? अभी तो पहले ही की गठरी सिर
पर लदी है, और किस मुंह से मांगू, लेकिन इस संकट से उबार लो. जीता रहा, तो कौड़ी
कौड़ी चुका दूंगा. मैं मर भी जाऊं, तो गोबर तो है ही.
नेताओं में सलाह होने लगी. दारोगाजी को क्या भेंट किया जाये. दातादीन ने पचास का
प्रस्ताव किया.झिंगुरीसिंह के अनुमान में सौ से कम पर सौदा न होगा.नोखेराम भी सौ के
पक्ष में थे.और होरी के लिए सौ और पचास में कोई अन्तर न था. इस तलाशी का संकट उसके
सिर से टल जाये. पूजा चाहे कितनी ही चढ़ानी पड़े. मरे को मन-भर लकड़ी से जलाओ या
दस मन से, उसे क्या चिन्ता?
मगर पटेश्वरी से यह अन्याय न देखा गया. कोई डाका या कतल तो हुआ नहीं. केवल तलाशी हो
रही है. इसके लिए बीस रुपये बहुत हैं.
नेताओं ने धिक्कारा-तो फिर दारोगाजी से बातचीत करना. हम लोग नगीच न जायेंगे. कौन
घुड़कियां खाये?
होरी ने पटेश्वरी के पांव पर अपना सिर रख दिया- भैया, मेरा उध्दार करो.जब तक जिऊंगा,
तुम्हारी ताबेदारी करुंगा.
दारोगाजी ने फिर अपने विशाल वक्ष और विशालतर उदर की पूरी शक्ति से कहा-कहां है हीरा
का घर? मैं उसके घर की तलाशी लूंगा.

पटेश्वरी ने आगे बढ़कर दारोगाजी के कान में कहा-तलासी लेकर क्या करोगे हुजूर, उसका
भाई आपकी ताबेदारी के लिए हाजिर है.
दोनों आदमी जरा अलग जाकर बातें करने लगे.
`कैसा आदमी है?’
`बहुत ही गरीब हुजुर. भोजन का ठिकाना भी नहीं.’
`सच?’
`हां हुजुर, ईमान से कहता हूं’
`अरे! तो क्या एक पचासे का डौल भी नहीं है?’
`कहां की बात हुजूर? दस मिल जायें, तो हजार समझिए. पचास तो पचास जनम में भी मुमकिन
नहीं और वह भी जब कोई महाजन खड़ा हो जायेगा.’
दारोगाजी ने एक मिनट तक विचार करके कहा-तो फिर उसे सताने से फायदा? मैं ऐसों को
नहीं सताता,जो आप ही मर रहें हों.
पटेश्वरी ने देखा, निशाना और आगे जा पड़ा. बोले-नहीं हुजूर, ऐसा न कीजिये, नहीं फिर
हम कहां जायेंगे.हमारे पास दूसरी और कौन- सी खेती है?
`तुम इलाके के पटवारी हो जी, कैसी बातें करते हो?’
`जब ऐसा ही कोई अवसर आ जाता है तो आपकी बदौलत हम भी कुछ पा जाते हैं, नहीं पटवारी
को कौन पूछता है?’
`अच्छा जाओ, तीस रुपये दिलवा दो. बीस रुपये हमारे, दस रुपये तुम्हारे.’
`चार मुखिया हैं, इसका ख्याल कीजिये.’
`अच्छा, आधे-आध पर रखो, जल्दी करो. मुझे देर हो रही है.’
पटेश्वरी ने झिंगुरी से कहा. झिंगुरी ने होरी को इशारे से बुलाया, अपने घर ले गये,
तीस रुपये गिनकर उसके हवाले किये और एहसान से दबाते हुए बोले-आज ही कागज लिखा लेना.
तुम्हारा मुंह देखकर रुपये दे रहा हूं, तुम्हारी भलमंसी पर.
होरी ने रुपये लिये और अंगोछे के कोर में बांधे प्रसन्न-मुख आकर दारोगाजी की ओर चला
सहसा धनिया झपटकर आगे आयी और अंगोछी एक झटके के साथ उसके हाथ से छीन ली.
गांठ पक्की न थी. झटका पाते ही खुल गयी और सारे रुपये जमीन पर बिखर गये. नागिन की
तरह फुंकारकर बोली- ये रुपये कहां लिये जा रहे है, बता? भला चाहता है, तो सब रुपये
लौटा दे, नहीं कहे देती हूं. घर के परानी रात-दिन मरें और दाने-दाने को तरसें,
लत्ता भी पहनने को मयस्सर न हो और अंजुरी-भर रुपये लेकर चला है इज्जत बचाने. ऐसी
बड़ी है तेरी इज्जत .जिसके घर में चूहे लोटें , वह भी इज्जत वाला है? दारोगा तलासी
ही तो लेगा. ले-ले जहां चाहे तलासी. एक तो सौ रुपये की गाय गयी,उसपर यह पलेथन. वाह
री तेरी इज्जत!
होरी खून का घूंट पीकर रह गया. सारा समूह जैसे थर्रा उठा. नेताओं के सिर झुक गये.
दारोगा का मुंह जरा-सा निकल आया. अपने जीवन में उसे ऐसी लताड़ न मिली थी.
होरी स्तम्भित-सा खड़ा रहा. जीवन में पहली बार धनिया ने उसे भरे अखाड़े में पटकनी
दी ,आकाश तका दिया. अब वह कैसे सिर उठाये?
मगर दारोगाजी इतनी जल्दी हार माननेवाले न थे. खिसियाकर बोले-मुझे ऐसा मालूम होता है
कि इस शैतान की खाला ने हीरा को फंसाने के लिए खुद गाय को जहर दे दिया.
धनिया हाथ मटकाकर बोली-हां, दे दिया. अपनी गाय थी, मार डाली, फिर किसी दूसरे का जान
वर तो नहीं मारा? तुम्हारे तहकीकात में यही निकलता है, तो यही लिखो. पहना दो मेरे
हाथ में हथकड़ियां. देख लिया तुम्हारा न्याय और तुम्हारे अक्कल की दौड़. गरीबों का
गला काटना दूसरी बात है, दूध का दूध और पानी का पानी करना दूसरी बात.
होरी आंखों से अंगारे बरसाता धनिया की ओर लपका, पर गोबर सामने आकर खड़ा हो गया और
उग्र भाव से बोला-अच्छा दादा, अब बहुत हुआ. पीछे हट जाओ,नहीं मै कहे देता हूं,मेरा
मुंह न देखोगे.तुम्हारे ऊपर हाथ न उठाऊंगा. ऐसा कपूत नहीं हूं. यहीं गले में फांसी
लगा लूंगा.
होरी पीछे हट गया और धनिया शेर होकर बोली-तू हट जा गोबर, देखूं तो क्या
करता है मेरा? दरोगाजी बैठे हैं. इसकी हिम्मत देखूं. घर में तलासी लेने से इसकी
इज्जत जाती है. अपनी मेहरिया को सारे गांव के सामने लतियाने से इसकी इज्जत नहीं
जाती. यही तो बीरों का धरम है. बड़ा बीर है, तो किसी मरद से लड़. जिसकी बांह पकड़कर
लाया, उसे मारकर बहादुर न कहलायेगा. तू समझता होगा, मैं इसे रोटी-कपड़ा देता हूं.
आज से अपना घर संभाल. देख तो, इसी गांव में तेरी छाती पर मूंग दलकर रहती हूं कि
नहीं, और उससे अच्छा खाऊं-पहनूंगी. इच्छा हो, देख ले. होरी परास्त हो गया. उसे अब
ज्ञात हुआ स्त्री के सामने पुरुष कितना निर्बल, कितना निरुपाय है.
नेताओं ने रुपये चुनकर उठा लिये थे और दारोगाजी को वहां से चलने का इशारा कर रहे थे
धनिया ने एक ठोकर और जमायी-जिसके रुपये हों, ले जाकर उसे दे दो. हमें किसी से उधार
नहीं लेना है.और जो देना है, तो उसी से लेना. मैं दमड़ी भी न दूंगी. चाहे मुझे
हाकिम के इजलास तक ही चढ़ना पड़े.हम बाकी चुकाने को पच्चीस रुपये मांगते थे, किसी
ने न दिया. आज अंजुरी-भर रुपये ठनाठन निकाल के दे दिये. मैं सब जानती हूं. यहां तो
बांट-बखरा होने वाला था, सभी के मुंह मीठे होते. ये हत्यारे गांव के मुखिया हैं,
गरीबों का खून चूसनेवाले. सूद-ब्याज, डेढ़ी-सवाई, नजर-नजराना,घूस-घास जैसे भी हो,
गरीबों को लूटो. उस पर सुराज चाहिए. जेल जाने से सुराज न मिलेगा, सुराज मिलेगा धरम
से, न्याय से.
नेताओं के मुंह में कालिख-सी लगी हुई थी. दारोगाजी के मुंह पर झाड़ू-सी फिरी हुई थी
इज्जत बचाने के लिए हीरा के घर की ओर चले.
रास्ते में दरोगा ने स्वीकार किया-औरत है बड़ी दिलेर.
पटेश्वरी बोले-दिलेर नहीं है हुजूर,कर्कश है. ऐसी औरत को तो गोली मार दे.
`तुम लोगों का काफिया तंग कर दिया उसने. चार-चार तो मिलते ही.’
`हुजूर के भी तो पन्द्रह रुपये गये.’
`मेरे कहां जा सकते हैं? वह न देगा, गांव के मुखिया देंगे, और पन्द्रह रुपये की जगह
पूरे पचास रुपये. आप लोग चटपट इन्तजाम कीजिये.’
पटेश्वरीलाल ने हंसकर कहा-हुजूर बड़े दिल्लगीबाज हैं.
दातादीन बोले-बड़े आदमियों के यही लक्षण हैं.ऐसे भाग्यवानों के दर्शन कहां होते हैं
दारोगाजी ने कठोर स्वर में कहा-यह खुशामद फिर कीजियेगा. इस वक्त तो मुझे पचास रुपये
दिलवाइये, नकद, और यह समझ लो कि आनाकाना की, तो मैं तुम चारों के घर की तलाशी
लूंगा. बहुत मुमकिन है कि तुमने हीरा और होरी को फंसाकर- उनसे सौ-पचास ऐंठने के लिए
यह पाखण्ड रचा हो.
नेतागण अभी तक यह समझ रहे हैं, दारोगाजी विनोद कर रहे हैं.
झिंगुरीसिंह ने आंखें मारकर कहा-निकालो पचास रुपये पटवारी साहब!
नोखेराम ने उनका समर्थन किया-पटवारी साहब का इलाका हे. उन्हें जरूर आपकी खातिर करनी
चाहिए.

पण्डित नोखेराम की चौपाल आ गयी. दारोगाजी एक चारपाई पर बैठ गये और बोले-तुम लोगों
ने क्या निशचय किया? रुपये निकालते हो या तलाशी करवाते हो?
दातादीन ने आपत्ति की- मगर हुजूर…
`मै अगर-मगर कुछ नहीं सुनना चाहता.’
झिंगुरीसिंह ने साहस किया-सरकार यह तो सरासर….
`मैं पन्द्रह मिनट का समय देता हूं.अगर इतनी देर में पूरे पचास रुपये न आये, तो तुम
चारों के घर की तलाशी होगी, और गण्डासिंह को जानते हो. उसका मारा पानी भी नहीं
मांगता.’
पटेश्वरीलाल ने तेज स्वर से कहा-आपको अख्तियार है, तलाशी ले लें. यह अच्छी दिल्लगी
है, काम कौन करे, पकड़ा कौन जाये.
`मैने पच्चीस साल थानेदारी की है, जानते हो?’
`लेकिन ऐसा अन्धेर तो कभी नहीं हुआ.’
`तुमने अभी अन्धेर नहीं देखा. कहो तो वह भी दिखा दूं. एक -एक को पांच-पांच साल के
लिए भेजवा सकता हूं. यह मेरे बायें हाथ का खेल है. डाके में सारे गांव को काले पानी
भेजवा सकता हूं. इस धोखे में न रहना.’
चारों सज्जन चौपाल के अन्दर जाकर विचार करने लगे.
फिर क्या हुआ किसी को मालूम नहीं, हां, दारोगाजी प्रसन्न दिखाई दे रहे थे,और चारों
सज्जनों के मुंह पर फटकार बरस रही थी.
दारोगाजी घोड़े पर सवार होकर चले, तो चारों नेता दौड़ रहे थे. घोड़ा दूर निकल गया,
तो चारों सज्जन लौटे.इस तरह, मानो किसी प्रियजन कासंस्कार करके श्मशान से
लौट रहे हों.
सहसा दातादीन बोले-मेरा सराप न पड़े, तो मुंह न दिखाऊं.
नोखेराम ने समर्थन किया-ऐसा धन कभी फलते नहीं देखा.
पटेश्वरी ने भविष्यवाणी की-हराम की कमाई हराम में जायगी.
झिंगरी को आज ईश्वर की न्यायपरता में सन्देह हो गया था. भगवान न जाने कहां है कि
यह अन्धेर देखकर भी पापियों को दण्ड नहीं देते.
इस वक्त इन सज्जनों की तस्वीर खींचने लायक थी.

Leave a Reply

Are you human? *