गोदान (भाग 1)

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होरी को रात- भर नींद नहीं आयी. नीम के पेड़-तले अपनी बांस की खाट पर पड़ा बार-
बार तारों की ओर देखता था. गाय के लिए एक नांद गाड़नी है. बैलों से अलग उसकी नांद
रहें, तो अच्छा. अभी तो रात को बाहर ही रहेगी; लेकिन चौमासे में उसके लिए कोई दूसरी
जगह ठीक करनी होगी. बाहर लोग नजर लगा देते हैं. कभी-कभी तो ऐसा टोना-टोटका कर देते
हैं कि गाय का दूध ही सूख जाता है. थन में हाथ ही नहीं लगाने देती. लात मारती है.
नहीं, बाहर बांधना ठीक नहीं. और बाहर नांद भी कौन गाड़ने देगा. कारिन्दा साहब नजर
के लिए मुंह फुलायेंगे. छोटी-छोटी बात के लिए रायसाहब के पास फरियाद ले जाना भी
उचित नहीं. और कारिन्दे के सामने मेरी सुनता कौन है. भीतर ही बांधूगा. आंगन है तो
छोटा-सा,लेकिन एक मड़ैया डाल देने से काम चल जायेगा. अभी पहला ही ब्यात है.पांच
सेर से कम क्या दूध देगी? सेर-भर तो गोबर ही को चाहिए. रुपिया दूध देखकर कैसी

ललचाती रहती है.अब पिये जितना चाहे. कभी-कभी दो चार सेर मालिकों को दे आया करूंगा.
कारिन्दा साहब की पूजा भी करनी ही होगी. और भोला के रुपये भी दे देना चाहिये.
सगाई के ढकोसले में उसे क्यों डालूं. जो आदमी अपने ऊपर इतना विश्वास करे,उससे दगा
करना नीचता है. अस्सी रुपये की गाय मेरे विश्वास पर दे दी. नहीं यहा तो कोई एक पैसे
को नहीं पतियाता. सन में क्या कुछ मिलेगा? अगर पच्चीस रुपये भी दे दूं, तो भोला को
ढाढ़स हो जाय. धनिया से नाहक बता दिया. चुपके से गाय लाकर बांध देता, तो चकरा जाती.
लगती पूछने, किसकी गाय है? कहां से लाये हो? खूब दिक करके तब बताता, लेकिन जब पेट
में बात पचे भी. कभी दो-चार पैसे ऊपर से आ जाते हैं, उनको भी तो नहीं छिपा सकता.
और यह अच्छा भी है. उसे घर की चिन्ता रहती है, अगर उसे मालूम हो जाय कि इनके पास
भी पैसे रहते हैं, तो फिर नखरे बघारने लगे. गोबर जरा आलसी है. नहीं, मैं गऊ की ऐसी
सेवा करता कि जैसी चाहिए. आलसी-वालसी कुछ नहीं.इस उमिर में कौन आलसी नहीं होता.
मैं भी दादा के सामने मटरगश्ती ही किया करता था. बेचारे पहर रात से कुट्टी काटने
लगते.कभी जगा देते, तो मैं बिगड़ जाता और घर छोड़कर भाग जाने की धमकी
देता था. लड़के जब अपने मां-बाप के सामने भी जिन्दगी का थोड़ा-सा सुख न भोगेंगे, तो
फिर जब अपने सिर पड़ गयी, तो क्या भोगेंगे ? दादा के मरते ही क्या मैंने घर नहीं
संभाल लिया? सारा गांव यही कहता था कि होरी घर बरबाद कर देगा, लेकिन सिर पर बोझ पड़
ते ही मैंने ऐसा चोला बदला कि लोग देखते रह गये.सोभा और हीरा अलग हो गये,नहीं आज
इस घर की और ही बात होती. तीन हल एक साथ चलते अब तीनों अलग-अलग चलते हैं.
बस, समय का फेर है. धनिया का क्या दोष था! बेचारी जब से घर में आयी, कभी तो
आराम से न बैठी. डोली से उतरते ही सारा काम सिर पर उठा लिया. अम्मा को पान की
तरह फेरती रहती थी. जिसने घर के पीछै अपने को मिटा दिया, देवरानियों से काम करने को
कहती थी, तो क्या बुरा करती थी. आखिर उसे भी तो आराम मिलना चाहिये, लेकिन भाग्य में
आराम लिखा होता, तब तो मिलता. तब देवरों के लिए मरती थी, अब अपने बच्चों के लिए
मरती हैं. वह इतनी सीधी,गमखोर,निश्छल न होती,तो आज सोभा और हिरा जो मूंछो पर ताव
देते फिरते हैं, कहीं भीख मांगते होते. आदमी कितना स्वार्थी हो जाता है. जिसके लिए
लड़ो, वही जान का दुश्मन हो जाता है.
होरी ने फिर पूर्व की ओर देखा. साइत भिनसार होरहा है. गोबर काहे को जागने लगा.
नहीं, कहके तो यही सोया था कि मैं अंधेरे ही चला जाऊंगा. जाकर नांद गाड़ दूं, लेकिन
नहीं, जब तक गाय द्वार पर न आ जाय, नांद गाड़ना ठीक नहीं. कहीं भोला बदल गये और
किसी कारन से गाय न दी, तो सारा गांव तालियां पीटने लगेगा, चले थे गाय लेने. पट्ठे
ने इतनी फुर्ती से नांद गाड़ दी, मानो इसी की कसर थी. भोला है तो अपने घर का मालिक,
लेकिन जब लड़के सयाने हो गये, तो बाप की कौन चलती है! कामता और जंगी अकड़ जाये,तो
क्या भोला अपने मन से गाय मुझे दे देंगे, कभी नहीं.
सहसा गोबर चौंककर उठ बैठा और आखें मलता हुआ बोला- अरे! यह तो भोर हो गया.
तुमने नांद गाड़ दी दादा?
होरी गोबर के सुगठित शरीर और चौड़ी छाती की ओर गर्व से देखकर और मन में यह सोचते
हुए कि कहिं इसे गोरस मिलता, तो कैसा पट्ठा हो जाता, बोला-नहीं, अभी नहीं गाड़ी.
सोचा, कहीं न मिले तो, तो नाहक भद्द हो.
गोबर ने त्यौरी चढ़ाकर कहा-मिलेगी क्यों नहीं?
`उसके मन में कोई चोर पैठ जाय?’
`चोर पैठे या डाकू, गाय तो उन्हें देनी ही पड़ेगी.’
गोबर ने और कुछ न कहा लाठी कन्धे पर रखी और चल दिया. होरी उसे जाते देखता हुआ
अपना कलेजा ठण्डा करता रहा. अब लड़के की सगाई में देर न करनी चाहिए. सत्रहवां लग
गया, मगर करें कैसे? कहीं पैसे के भी दरसन हो, जब से तीनौं भाइयों में अलगौझा हो
गया, घर की साख जाती रही. महतो लड़का देखने आते हैं,पर घर की दशा देखकर मुंह फीका
करके चले जाते हैं. दो-एक राजी हुए, तो रुपये मांगते हैं. दो-एक राजी हुए, तो रुपये
मांगते हैं. दो तीन सौ लड़की का दाम चुकायें और इतना ही ऊपर से खर्च करें, तब जाकर
ब्याह हो. कहां से आयें इतने रुपये? रास खलिहान मैं तुल जाती है. खाने-भर को भी
नहीं बचता. ब्याह कहां से हो? और अब तो सोना ब्याहने योग्य हो गयी. लड़के का ब्याह
न हुआ, न सही. लड़की का ब्याह न हुआ, तो सारी बिरादरी में हंसी होगी. पहले तो उसी
की सगाई करनी है, पीछे देखी जायेगी.
एक आदमी ने आकर राम राम किया और पूछा- तुम्हारी कोठी में कुछ बांस होंगे महतो?
होरी ने देखा,दमड़ी बंसोर खड़ा है, नाटा,काला,खूब मोटा,चौड़ा मुंह,बड़ी-बड़ी मूंछें
लाल आंखे, कमर में बांस काटने की कटार खोंसे हुए. साल में एक-दो बार आकर चिकें,
कुरसियां, मोढ़े, टोकरियां आदि बनाने के लिये कुछ बांस काट ले जाता था.
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होरी प्रसन्न हो गया. मुट्ठी गरम होने की कुछ आशा बंधी. चौधरी को ले जाकर अपनी
तीनों कोठियां दिखायीं. मोल-भाव किया और पच्चीस रुपये सैकड़े में पचास बांस का
बयाना ले लिया.फिर दोनों लौटे. होरी ने उसे चिलम पिलायी, जलपान कराया और तब रहस्यमय
भाव से बोला-मेरे बांस कभी तीस रुपये से कम में नहीं जाते, लेकिन तुम घर के आदमी
हो,तुमसे क्या मोल–भाव करता? तुम्हारा वह लड़का, जिसकी सगाई हुई थी, अभी परदेस से
लौटा कि नहीं?
चौधरी ने चिलम का दम लगा कर खांसते हुए कहा- उस लौंडे के पीछे तो मर मिटा महतो!
जवान बहू घर में बैठी थी और वह बिरादरी की एक दूसरी औरत के साथ परदेस में मौज करने
चल दिया. बहू भी दूसरे के साथ निकल गयी. बड़ी नाकिस जात है महतो,किसी की नहीं होती.
कितना समझाया कि तू जो चाहे खा, जो चाहे पहन, मेरी नाक न कटवा,मुदा कौन सुनता है,
औरत को भगवान् सब कुछ दे, रूप न दे, नहीं वह काबू में नहीं रहती. कोठियां तो बंट
गयी होंगी?
होरी ने आकाश की ओर देखा और मानो उसकी महानता में उड़ता हुआ बोला-सब कुछ बंट गया
चौधरी! जिनको लड़कों की तरह पाला-पोसा, वह अब बराबर के हिस्सेदार हैं, लेकिन भाई का
हिस्सा खाने की अपनी नीयत नहीं है. इधर तुमसे रुपये मिलेंगे,उधर दोनों भाइयों को
बांट दूंगा.चार दिन की जिन्दगी में क्यों किसी से छल-कपट करूं? नहीं कह दूं कि बीस
रुपये सैकड़े में बेचे हैं, तो उन्हें क्या पता लगेगा. तुम उनसे कहने थोड़े ही
जाओगे. तुम्हें तो मैंने बराबर अपना भाई समझा है.
व्यवहार में हम `भाई’ के अर्थ का कितना ही दुरुपयोग करें, लेकिन उसकी भावना में जो
पवित्रता है, वह हमारी कालिमा से कभी मलिन नहीं होती
होरी ने अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रस्ताव करके चौधरी के मुंह की ओर देखा कि वह
स्वीकार करता है या नहीं, उसके मुख पर कुछ ऐसा मिथ्या विनीत भाव प्रकट हुआ जो
भिक्षा मांगते समय मोटे भिक्षुकों पर आ जाता है.
चौधरी ने होरी का आसन पाकर चाबुक जमाया-हमारा-तुम्हारा भाईचारा है महतो,
ऐसी बात है भला, लेकिन बात यह है कि आदमी ईमान बेचता है, तो किसी लालच से.
बीस रुपये नहीं, मैं पन्द्रह रुपये कहूंगा, लेकिन जो बीस के दाम लो.
होरी ने खिसियाकर कहा-तुम तो छौधरी अन्धेर करते हो, बीस रुपये में कहीं ऐसे बांस
जाते हैं?
`ऐसे क्या, इससे अच्छे बांस जाते हैं दस रुपये पर. हां, दस कोस और पश्चिम चले जाओ.
मोल बांस का नहीं, शहर के नगीच होने का है. आदमी सोचता है, जितनी देर वहां जाने
में लगेगी, उतनी देर में तो दो- चार रुपये का काम हो जायगा.’
सौदा पट गया. चौधरी ने मिरजई उतारकर छान पर रख दी और बांस काटने लगा.
ऊख की सिंचाई हो रही थी .हीरा-बहू कलेवा लेकर कुएं पर जा रही थी. चौधरी को
बांस काटते देख कर घूंघट के अन्दर से बोली- कौन बांस काटता है? यहां बांस न कटेंगे.
चौधरी ने हाथ रोककर कहा-बांस मोल लिये हैं, पन्द्रह रुपये सैकड़े का बयाना हुआ है.
सेंत में नहीं काट रहे हैं.
हीरा बहू अपने घर की मालकिन थी. उसी के विद्रोह से भाइयों में अलगौझा हुआ था

धनिया को परास्त करके शेर हो गयी थी. हीरा कभी-कभी उसे पीटता था. अभी हाल में
इतना मारा था कि वह कई दिन तक खाट से न उठ सकी, लेकिन अपना पदाधिकार वह किसी तरह
न छोड़ती थी, हीरा क्रोध में उसे मारता था, लेकिन चलता था उसी के इशारों पर, उस
घोड़े की भांति जो कभी-कभी स्वामी को लात मारकर भी उसी के आसन के नीचे चलता है.
कलेवे की टोकरी सिर से उतार कर बोली- पन्द्रह रुपये में हमारे बांस न जायेंगे.
चौधरी औरतजात से इस विषय में बातचीत करना नीति-विरुद्ध समझते थे. बोले-जाकर अपने
आदमी को भेज दो. जो कुछ कहना हो, आकर कहें.
हीरा बहू का नाम था पुन्नी. बच्चे दो ही हुए थे. लेकिन ढल गयी थी. बनाव सिंगार से
समय के आघात का शमन करना चाहती थी, लेकिन गृहस्थी में भोजन ही का ठिकाना न था
सिंगार के लिए पैसे कहां से आते? इस अभाव और विवशता ने उसखी प्रकृति का जल सुखा कर
कठोर और शुष्क बना दिया, जिस पर एक बार फावड़ा भी उचट जाता था.
समीप आकर चौधरी का हाथ पकड़ने की चेष्टा करती हुई बोली-आदमी को क्यों भेज दूं?
जो कुछ कहना हो, मुझसे कहो .मैंने कह दिया, मेरे बांस न कटेंगे.
चौधरी हाथ छुड़ाता था, और पुन्नी बार-बार पकड़ लेती थी. एक मिनट तक यही हाथा-पाई
होती रही.अन्त में चौधरी ने उसे जोर से पीछे ढकेल दिया. पुन्नी धक्का खाकर गिर
पड़ी, मगर फिर संभली और पांवसे तल्ली निकालकर चौधरी के सिर,मुंह, पीठ पर अन्धाधुन्ध
जमाने लगी. बंसोर होकर उसे धकेल दे? उसका यह अपमान! मारती जाती थी और रोती जाती
थी. चौधरी उसे धक्का देकर- नारी जाति पर बल प्रयोग करके- गच्चा खा चुका था. खड़े-
खड़े मार खाने के सिवा इस संकट से बचने की उसके पास और कोई दवा न थी.
पुन्नी का रोना सुनकर होरी भी दौड़ा हुआ आया. पुन्नी ने उसे देखकर और जोर से
चिल्लाना शुरू किया. होरी ने समझा, चौधरी ने पुनिया को मारा है. खून ने जोश मारा और
अलगौझे की ऊंची बांध को तोड़ता हुआ,सब कुछ अपने अन्दर समेटने के लिये बाहर निकल
पड़ा. चौधरी को जोर से एक लात जमाकर बोला-अब अपना भला चाहते हो चौधरी, तो यहां से
चले जाओ, नहीं तुम्हारी लहास उठेगी. तुमने अपने को समझा क्या है? तुम्हारी इतनी
मजाल कि मेरी बहू पर हाथ उठाओ.
चौधरी कसमें खा-खाकर अपनी सफाई देने लगा. तल्लियों की चोट में उसकी अपराधी
आत्मा मौन थी. यह लात उसे निरपराध मिली और उसके फूले हुए गाल आंसुओं से भीग गये.
उसने तो बहू को छुआ भी नहीं. क्या वह इतना गंवार है कि महतो के घर की औरतों पर हाथ
उठायेगा?
होरी ने अविश्वास करके कहा- आंखों मे धूल मत झोंको चौधरी, तुमने कुछ कहा नहीं, तो
बहू झूठ-मूठ रोती है? रुपये की गरमी है तो वह निकाल दी जायगी. अलग हैं, तो क्या
हुआ. है तो एक खून. कोई तिरछी आंख से देखे, तो आंख निकाल लें.
पुन्नी चण्डी बनी हुई थी. गला फाड़कर बोली- तूने मुझे धक्का देकर गिरा नहीं दिया?
खा जा अपने बेटे की कसम!
हीरा को भी खबर मिली कि चौधरी और पुनिया में लड़ाई हो रही है. चौधरी ने पुनिया को
धक्का दिया. पुनिया ने उसे तल्लियों से पीटा. उसने पुर वहीं छोड़ा और औंगी लिये
घटनास्थल की ओर चला. गांव में अपने क्रोध के लिये प्रसिद्ध था. छोटा डील, गठा हुआ
शरीर, आंखें कौड़ी की तरह निकल आयी थीं और गर्दन की नसें तन गयी थीं,मगर
उसे चौधरी पर क्रोध न था, क्रोध था पुनिया पर.वह क्यों चौधरी से लड़ी? क्यों उसकी
इज्जत मिट्टी में मिला दी? बंसोर से लड़ने, झगड़ने का उसे क्या प्रयोजन था? उसे
जाकर हीरा से सारा समाचार कह देना चाहिए था. हीरा जैसा उचित समझता, करता.
वह उससे लड़ने क्यों गयी? उसका बस होता, तो वह पुनिया को परदे में रखता
पुनिया किसी बड़े से मुंह खोल बातें करे,यह उसे असह्य था. वह खुद जितना उद्दण्ड
था, पुनिया को उतना ही शान्त रखना चाहता था. जब भैया ने पन्द्रह रुपये में सौदा कर
लिया, तो वह बीच में कूदने वाली कौन?
आते ही उसने पुन्नी का हाथ पकड़ लिया और घसीटता हुआ अलग ले जाकर लगा लातें
जमाने- हरामजादी, तू हमारी नाक कटाने पर लगी हुई है! तू छोटे-छोटे आदमियों से
लड़ती फिरती है, किसकी पगड़ी नीची होती है, बता?(एक लात और जमाकर) हम तो वहां
कलेऊ की बाट देख रहे हैं, तू यहां लड़ाई ठाने बैठी है. इतनी बेसर्मी? आंख का पानी
ऐसा गिर गया? खोद कर गाड़ दूंगा. पुन्नी हाय-हाय करती जाती थी और कोसती जाती थी
तेरी मिट्टी उठे, तुझे हैजा हो जाय, तुझे मरी आये, देवी मैया तुझे लील जायें. तुझे
इफ्लुएंजा हो जाय.भगवान् करे, तू कोढ़ी हो जाय.हाथ-पांव कट-कट गिरें.
और गालियां तो हीरा खड़ा-खड़ा सुनता रहा, लेकिन यह पिछली गाली उसे लग गयी.हैजा,
मरी आदि में विशेष कष्ट न था.इधर बीमार पड़े, उधर विदा हो गये, लेकिन कोढ़! यह
घिनौनी मौत, और उससे भी घिनौना जीवन. वह तिलमिला उठा, दांत पीसता हुआ पुनिया
पुनीया पर झपटा और झोंटे पकड़कर फिर उसका सिर जमीन पर रगड़ता हुआ बोला- हाथ-पांव
कटकर गिर जायेंगे, तो मैं तुझे लेकर चाटूंगा? तू ही मेरे बाल-बच्चौं को पालेगी? तू
ही इतनी बड़ी गिरस्ती चलायेगी? तू तो दूसरा भतार करके किनारे खड़ी हो जायेगी.
चौधरी को पुनीया की इस दुर्गति पर दया आ गयी. हीरा को उदारतापूर्वक समझाने लगा-हीरा
महतो, अब जाने दो, बहुत हुआ. क्या हुआ, बहू ने मुझे मारा.मैं तो छोटा नहीं हो गया.
धन्य भाग कि भगवान् ने यह दिन तो दिखाया.
हीरा ने चौधरी को डांटा-तुम चुप रहो चौधरी, नहीं मेरे क्रोध में पड़ जाओगे, तो बुरा
होगा. औरतजात इसी तरह बकती है. आज को तुमसे लड़ गयी, कल को दूसरों से लड़ जायेगी
तुम भलेमानस हो, हंसकर टाल गये, दूसरा तो बरदास न करेगा. कहीं उसने भी हाथ छोड़
दिया, तो कितनी आबरू रह जायेगी, बताओ.
इस खयाल ने उसके क्रोध को फिर भड़काया.लपका था कि होरी ने दौड़कर पकड़ लिया और उसे
पीछे हटाते हुए बोला- अरे,हो तो गया. देख तो लिया दुनिया ने कि बहादुर हो. अब क्या
उसे पीसकर पी जाओगे?
हीरा अब भी बड़े भाई का अदब करता था. सीधे-सीधे न लड़ता था. चाहता, तो एक
झटके में अपना हाथ छुड़ा लेता, लेकिन इतनी बेअदबी न कर सका. चौधरी की ओर देखकर
बोला-अब खड़े क्या ताकते हो? जाकर अपने बांस काटो, मैंने सही कर दिया पन्द्रह रुपये
सैकड़े मे तय है.
कहां तो पुन्नी रो रही थी. कहां झमककर उठी और अपना सिर पीटकर बोली
लगा दे घर में आग, मुझे क्या करना है. भाग फूट गया कि तुम जैसे कसाई के पाले पड़ी.
लगा दे घर में आग. उसने कलेउ की टोकरी वही छोड़ दी और घर की ओर चली. हीरा गरजा-
वहां कहां जाती है, चल कुऐं पर, नहीं खून पी जाऊंगा.
पुनिया के पांव रुक गये. इस नाटक का दूसरा अंक न खेलना चाहती थी. चुपके से टोकरी
उठाकर रोती हुई कुऐं की ओर चली. हीरा भी पीछे-पीछे चला.
होरी ने कहा- अब फिर मारधाड़ न करना. इससे औरत बेसरम हो जाती है.
धनिया ने द्वार पर आकर हांक लगायी-तुम वहां खड़े-खड़े क्या तमासा देख रहे हो?
कोई तुम्हारी सुनाता भी है कि यों ही शिक्षा दे रहे हो. उस दिन इसी बहू ने तुम्हें
घूंघट की आड़ में दाढ़ीजार कहा था, भूल गये. बहुरिया होकर पराये मरदों से लड़ेगी
तो डांटी न जायेगी.
होरी द्वार पर आकर नटखटपन के साथ बोला- और जो मैं इसी तरह तुझे मारूं?
`क्या कभी मारा नहीं है, जो मारने की साध बनी हुई है?’
`इतनी बेदरदी से मारता, तो तू घर छोड़कर भाग जाती! पुनिया बड़ी गमखोर है.’
`ओहो! ऐसे ही तो बड़े दरदवाले हो. अभी तक मार का दाग बना हुआ है. हीरा मारता
है, तो दुलारता भी है. तुमने खाली मारना सीखा, दुलार करना सीखा ही नहीं. मै ही ऐसी
हूं कि तुम्हारे साथ निबाह हुआ.’
अच्छा रहने दे, बहुत अपना बखान न कर, तू ही रूठ-रूठकर नैहर भागती थी. जब महीनों
खुशामद करता था, तब जाकर आती थी.’
`जब अपनी गरज सताती थी, तब मनाने जाते थे लाला. मेरे दुलार से नहीं जाते थे.’
`इसी से तो मैं सबसे तेरा बखान करता हूं.’
वैवाहिक जीवन के प्रभात में लालसा अपनी गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और हृदय
के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रञ्जित कर देती है. फिर मध्यान्ह

का प्रखर ताप आता है, क्षण-क्षण पर पर बगूले उठते हैं और पृथ्वी कांपने लगती है.
लालसा का सुनहरा आवरण हट जाता है और वास्तविकता अपने नग्न रूप में सामने आ खड़ी
होती है. उसके बाद विश्राममय सन्ध्या आती है, शीतल और शान्त, जब हम थके हुए पथिकों
की भांति दिन-भर की यात्रा का वृत्तान्त कहते और सुनते हैं, तटस्थ भाव से, मानो हम
किसी ऊंचे शिखर पर जा बैठे हैं, जहां नीचे का जन- रव हम तक नहीं पहुंचता.
धनिया ने आंखों में रस भर कर कहा-चलो-चलो, आये बड़े बखान करने वाले.जरा-सा कोई काम
बिगड़ जाय, तो गरदन पर सवार हो जाते हो.
होरी ने मीठे उलाहने के साथ कहा-ले, अब यही तेरी बेइन्साफी मुझे अच्छी नहीं लगती
धनिया. भोला से पूछा, मैंने उनसे तेरे बारे में क्या कहा था?
धनिया ने बात बदल कर कहा-देखो,गोबर गाय लेकर आता है कि खाली हाथ.
चौधरी ने पसीने से लथ-पथ आकर कहा-महतो, चलकर बांस गिन लो. कल ठेला लाकर उठा ले
जाऊंगा. होरी ने बांस गिनने की जरुरत न समझी. चौधरी ऐसा आदमी नहीं है.फिर एकाध बांस
बेसी ही काट लेगा, तो क्या. रोज ही तो मंगनी बांस कटते रहते हैं सहालगों में तो
मण्डप बनाने के लिए लोग दरजनों बांस काट ले जाते हैं.
चौधरी ने साढ़े सात रुपये निकाल के उसके हाथ में रख दिये. होरी ने गिनकर कहा-और
निकालो.हिसाब से ढ़ाई और होते हैं.
चौधरी ने बेमुरौवती से कहा- पन्द्रह रुपये में तय हुए हैं कि नहीं? हीरा महतो ने
तुम्हारे सामने पन्द्रह रुपये कहे थे. कहो, तो बुला लाऊं.
तय तो बीस रुपये में ही हुए थे चौधरी! अब तुम्हारी जीत हैं जो चाहो कहो ढ़ाई रुपये
निकलते हैं, तुम दो ही दे दो.
मगर चौधरी कच्ची गोलियां न खेला था. अब उसे किसका डर? होरी के मुंह में तो ताला
पड़ा हुआ था. क्या कहे,माथा ठोककर रह गया. बस, इतना बोला-यह अच्छी बात नहीं है
चौधरी, दो रुपये दबाकर राजा न हो जाओगे.
चौधरी तीक्ष्ण स्वर में बोला- और तुम क्या भाइयों के थोड़े से पैसे दबाकर राजा हो
जाओगे? ढ़ाई रुपये पर अपना ईमान बिगाड़ रहे थे, उस पर मुझे उपदेस देते हो! अभी परदा
खोल दूं, तो सिर नीचा हो जाय.
होरी पर मानो सैकड़ों जूते पड़ गये. चौधरी तो रुपये सामने जमीन पर रखकर चला गया, पर
वह नीम के नीचे बैठा बड़ी देर तक पछताता रहा. वह कितना लोभी और स्वार्थी है, इसका
उसे आज पता चला. चौधरी ने ढ़ाई रुपये दे दिये होते, तो वह खुशी से कितना फूल उठता.
अपनी चालाकी को सराहता कि बैठे-बैठाये ढाई रुपये मिल गये. ठोकर खाकर ही तो हम
सावधानी के साथ पग उठाते है.
धनिया अन्दर चली गयी ती. बाहर आयी, तो रुपये जमीन पर पड़े देखे, गिनकर बोली-
और रुपये क्या हुए, दस न चाहिए?
होरी ने लम्बा मुंह बना कर कहा- हीरा ने पन्द्रह रुपये में दिये, तो मैं क्या करता?
`हीरा पांच रुपये में दे दे. हम नहीं देते इन दामों.’
वहां मार पीट हो रही थी. मैं बीच में क्या बोलता.’
होरी ने अपनी पराजय अपने मन में ही डाल ली,जैसे कोई चोरी से आम तोड़ने के लिए पेड़
पर चढ़े और गिर पड़ने पर धूल झाड़ता हुआ उठ खड़ा हो कि कोई देख न ले. जीत कर आप
अपनी धोखेबाजियों की डींग मार सकते हैं, जीत में सब कुछ माफ है.हार की लज्जा तो पी
जाने की ही वस्तु है.
धनिया पति को फटकारने लगी. ऐसे अवसर उसे बुत कम मिलते थे. होरी उससे चतुर था,
पर आज बाजी धनिया के हाथ थी.हाथ मटकाकर बोली-क्यों नहो,भाई ने पन्द्रह रुपये कह
दिये, तो तुम कैसे टोकते? अरे राम-राम! लाड़डे भाई का दिल छोटा हो जाता कि नहीं.
फिर जब इतना बड़ा अनर्थ हो रहा था कि लाड़ली बहू के गले पर छुरी चल रही थी, तो भला
कैसे न बोलते? उस बखत कोई तुम्हारा सरबस लूट लेता, तो भी तुम्हें सुध न होती.
होरी चुपचाप सुनता रहा. मिनका तक नहीं.झुंझलाहट हुई,क्रोध आया,खून खोला,आंख जली,
दांत पिसे, लेकिन बोला नहीं. चुपके से कुदाल उठायी और ऊख गोड़ने चला.
धनिया ने कुदाल छीनकर कहा-क्या अभी सबेरा है, जो ऊख गोड़ने चले?
सूरज देवता माथे पर आ गये. नहाने-धोने जाओ.रोटी तैयार है.
होरी ने घुन्नाकर कहा-मुझे भूख नहीं है.
धनिया ने जले पर नोन छिड़का- हां, काहे को भूख लगेगी.भाई ने बड़े-बड़े लड्डू खिला
दिये है न! भगवन ऐसे सपूत सबको दें.
होरी बिगड़ा क्रोध अब रस्सियां तुड़ा रहा था-तू आज मार खाने पर लगी हुई है.
धनिया ने नकली विनय का नाटक करके कहा-क्या करूं,तुम दुलार ही इतना करते हो कि
मेरा सिर फिर गया है.
`तू घर में रहने देगी कि नहीं?’
`घर तुम्हारा, मालिक तुम, मैं भला कौन होती हूं तुम्हें घर से निकालने वाली?’
होरी आज धनिया से किसी तरह पेश नहीं पा सकता. उसकी अक्ल जैसे कुन्द हो गई है.
इन व्यंग बाणों को रोकने के लिए उसके पास कोई ढ़ाल नहीं है.धीरे से कुदाल रख दी और
गमचा लेकर नहाने चला गया. लौटा कोई आध घण्टे में,मगर गोबर अभी तक न आया था.अकेले
कैसे भोजन करे? लौंडा वहां जाकर सो रहा. भोला की वह मदमाती छोकरी न है झुनिया उसके
साथ हंसी-दिल्लगी कर रहा होगा. कल भी तो उसके पीछे लगा हुआ था. नहीं गाय दी,तो लौट
क्यों नहीं आया.क्या वहां ढई देगा?
धनिया ने कहा-अब खड़े क्या हो? गोबर सांझ को आयेगा.
होरी ने और कुछ न कहा. कहीं धनिया फिर से न कुछ कह बैठे.
भोजन करके नीम की छांह में लेट रहा.
रूपा रोती हुई आयी, नंगे बदन एक लंगोटी लगाये,झबरे बाल इधर-उधर बिखरे हुए. होरी
की छाती पर लोट गयी उसकी बड़ी बहन सोना कहती है-गाय आयेगी, तो उसका गोबर मैं
पाथूंगी.रूपा यह नहीं बरदाश्त कर सकती. सोना ऐसी कहां की बड़ी नारी है कि सारा गोबर
आप पाथ डाले. रूपा उससे किस बात में कम है? सोना रोटी पकाती है,तो क्या रूपा बरतन
नहीं मांजती? सोना पानी लाती है, तो क्या रूपा कुएं पर रस्सी नहीं ले जाती? सोना तो
कलसा भर कर इठलाती चली आती है.रस्सी समेटकर रूपा ही लाती है. गोबर दोनों साथ पाथती
हैं सोना खेत गोड़ने जाती है तो, रूपा बकरी चराने नहीं जाती? फिर सोना क्यों अकेली
गोबर पाथेगी? यह अन्याय रूपा कैसे सहे?
होरी ने उसके भोलेपन पर मुग्ध होकर कहा-नहीं, गाय का गोबर तू पाथना.
सोना गाय के पास जाय, तो भगा देना
रूपा ने पिता के गले में हाथ डालकर कहा- दूध भी मैं ही दुहूंगी.
`हां-हां, तू न दुहेगी, तो और कौन दुहेगा?’
`वह मेरी गाय होगी.’
`हां, सोलहों आने तेरी.’
रूपा प्रसन्न होकर अपनी विजय का शुभ समाचार पराजित सोना को सुनाने चली गयी.
गाय मेरी होगी, उसका दूध मैं दुहूंगी, उसका गोबर मैं पाथूंगी, तुझे कुछ न मिलेगा.
सोना उम्र से किशोरी, देह के गठन में युवती और बुद्धि से बालिका थी, जैसे उसका यौवन
उसे आगे खींचता था,बालपन पीछे. कुछ बातों में इतनी चतुर कि ग्रेजुएट युवतियों को
पढ़ाये, कुछ बातों में इतनी अल्हड़ कि शिशुओं से भी पीछे.लम्बा,रूखा,किन्तु प्रसन्न
मुख ठोढ़ी नीचे को खिंची हुई, आंखों में एक प्रकार की तृप्ति, न बालों में तेल, न
आंखों में काजल, न देह पर कोई आभूषण, जैसे गृहस्थी के भार ने यौवन को दबा कर बौना
कर दिया हो.
सिर को एक झटका देकर बोली-जा, तू गोबर पाथ. तु दूध दुहकर रखेगी,तो मैं पी जाऊंगी
`मैं दूध की हांडी ताले में बन्द करके रखूंगी,’
`मैं ताला तोड़ कर दूध निकाल लाऊंगी’
यह कहती हुई वह बाग की तरफ चल दी. आम गदरा गये थे. हवा के झोंकों से एकाध जमीन पर
गिर पड़ते थे,लू के मारे चुचके, पीले, लेकिन बाल-वृन्द उन्हे टपके समझ कर बाग को
घेरे रहते थे. रूपा भी बहन के पीछे हो ली. जो काम सोना करे, वह रूपा जरूर करेगी.
सोना के विवाह की बातचीत हो रही थी, रूपा के विवाह की कोई चर्चा नहीं करता,इसलिए वह
स्वयं अपने विवाह के लिए आग्रह करती है. उसका दूल्हा कैसा होगा, क्या-क्या लायेगा,
उसे कैसे रखेगा, उसे क्या खिलायेगा क्या पहनायेगा, इसका वह बड़ा विशद वर्णन करती है
जिसे सुनकर कदाचित् कोई बालक उससे विवाह करने पर राजी न होता.
सांझ हो रही थी. होरी ऐसा अलसाया कि ऊख गोड़ने न जा सका. बैलों को नांद में लगाया,
सानी-खली दी और एक चिलम भरकर पीने लगा.इस फसल में सब कुछ खलिहान में तौल देने पर भी
अभी उस पर कोई तीन सौ कर्ज था, जिस पर कोई सौ रुपये सूद के बढ़ते जाते थे. मंगरू
साह से आज पांच साल हुए, बैल के लिए साठ रुपये लिये थे,उसमें साठ दे चुकाथा, पर वह
साठ रुपये ज्यों-के-त्यों बने हुए थे. दातादीन पण्डित से तीस रुपये लेकर आलू बोये
थे. आलू तो चोर खोद ले गये, और उस तीस के इन तीन बरसों में सौ हो गये थे,दुलारी
विधवा सहुआइन थी, जो गांव में नोन, तेल, तमाखू की दुकान रखे हुए थी. बंटवारे के समय
उससे चालीस रुपये लेकर भाइयों को देना पड़ा था. उसके भी लगभग सौ रुपये हो गये थे,
क्योंकि आने रुपये का ब्याज था. लगान के भी अभी पच्चीस रुपये बाकी पड़े हुए थे और
दशहरे के दिन शगुन के रुपयों का भी कोई प्रबन्ध करना था. बासों के रुपये बड़े अच्छे
समय पर मिल गये. शगुन की सम्स्या हल हो जायगी, लेकिन कौन जाने. यहां तो एक धेला
हाथ में आ जाय, तो गांव में शोर मच जाता है, और लेनदार चारों तरफ से नोचने लगते हैं
ये पांच रुपये तो वह शगुन में देगा, चाहे कुछ हो जाय, मगर अभी जिन्दगी के दो बड़े-
बड़े काम सिर पर सवार थे. गोबर और सोना का विवाह. बहुत हाथ बांधने पर भी तीन सौ
से कम खर्च न होंगे. ये तीन सौ किसके घर से आयेंगे? कितना चाहता है कि किसी से एक
पैसा कर्ज न ले, जिसका आता है उसका पाई-पाई चुका दे, लेकिन हर तरह का कष्ट उठाने पर
भी गला नहीं छूटता. इसी तरह सूद बढ़ता जायेगा और एक दिन उसका घर-द्वार सब नीलाम हो
जायेगा, उसके…

बाल-बच्चे निराश्रय होकर भीख मांगते फिरेंगे. होरी जब काम धन्धे से छुट्टी पाकर
चिलम पीने लगता था, तो यह चिन्ता एक काली दीवार की भांति चारों ओर से घेर लेती थी,
जिसमें से निकलने की उसे कोई गली न सूझती थी. अगर सन्तोष था, तो यही कि यह विपत्ति
अकेले उसी के सिर न थी. प्रायः सभी किसानों का यही हाल था. अधिकांश की दशा तो इससे
भी बदतर थी. शोभा और हीरा को उससे अलग हुए अभी कुल तीन साल हुए थे, मगर दोनों पर
चार -चार सौ का बोझ लद गया. झींगुर दो हल की खेती करता है. उस पर एक हजार से कुछ
बेसी ही देना है. जियावन महतो के घर भिखारी भीख भी नहीं पाता, लेकिन करजे का कोई
ठिकाना नहीं. यहं कौन बचा है?
सहसा सोना और रूपा दोनों दौड़ी हुई आयी और एक साथ बोलीं- भैया गाय ला रहें हैं.
आगे- आगे गाय ,पीछे पीछे भैया हैं.
रूपा ने पहले गोबर को आते देखा था.यह खबर सुनाने की सुर्ख रूई उसे मिलनी चाहिये थी.
सोना बराबर की हिस्सेदार हुई जाती है, यह उससे कैसे सहा जाता.
उसने आगे बढ़ कर कहा- पहले मैंने देखा था. तभी दौड़ी. बहिन ने तो पीछे देखा.
सोना इस दावे को स्वीकार न कर सकी. बोली- तूने भैया को कहां पहचाना? तू तो कहती थी,
कोई गाय भागी आ रही है. मैने ही कहा, भैया हैं.
दोनों फिर बाग की तरफ दौड़ी, गाय का स्वागत करने के लिए.
धनिया और होरी दोनों गाय बांधने का प्रबंध करने लगे. होरी बोला- चलो, जल्दी से नांद
गांड़ दें.
धनिया के मुख पर जवानी चमक उठी थी- नहीं, पहले थाली मैं थोड़ा-सा आटा और गुड़
घोलकर रख दें. बेचारी धूप में चली होगी. प्यासी होगी. तुम जाकर नांद गाड़ो,मैं
घोलती हूं
`कहीं एक घण्टी पड़ी थी. उसे ढ़ूंढ़ ले. उसके गले में बांधेगे’

`सोना कहां गयी? सहुआइन की दुकान से थोड़ा-सा काला डोरा मंगवा लो, गाय को
नजर बहुत लगती है.’

`आज मेरे मेरे मन की बड़ी भारी लालसा पूरी हो गयी’
धनिया अपने हार्दिक उल्लास को दबाये रखना चाहती थी. इतनी बड़ी सम्पदा अपने साथ
कोई नयी बाधा न लाये, यह शंका उसके निराश हृदय में कम्पन डाल रही थी. आकास की ओर
देखकर बोली- गाय के आने का आनन्द तो जब है कि उसका पौरा भी अच्छा हो. भगवान् के मन
की बात है.
मानो वह भगवान् को भी धोखा देना चाहती थी. भगवान् को भी दिखाना चाहती थी कि इस गाय
के आने से उसे इतना आनन्द नहीं हुआ कि ईर्ष्यालु भगवान् सुख का पलड़ा ऊंचा करने के
लिए कोई नयी विपत्ति भेज दें.
वह अभी आटा घोल ही रही थी कि गोबर गाय को लिये बालकों के एक जुलूस के साथ द्वार पर
आ पहुंचा. होरी दौड़ कर गाय के गले से लिपट गया. धनिया ने आटा छोड़ दिया और जल्दी
से एक पुरानी साड़ी का काला किनारा फाड़कर गाय के गले में बांध दिया.
होरी श्रद्धा-विह्वल नेत्रों से गाय को देख रहा था, मानो साक्षात देवीजी ने घर में
पदार्पण किया हो. आज भगवान् ने यह दिन दिखाया कि उसका घर गऊ के चरणौं से पवीत्र हो
गया. यह सौभाग्य! न जाने किसके पुण्य-प्रताप से.
धनिया ने भयातुर होकर कहा-खड़े क्या हो, आंगन में नांद गाड़ दो.
`आंगन में जगह कहां है?’
`बहुत जगह है.’
`मैं तो बाहर ही गाड़ता हूं.’
` पागल न बनो. गांव का हाल जान कर भी अनजाने बनते हो.’
अरे! बित्ते-भर के आंगन में गाय कहां बंधेगी भाई?
`जो बात नहीं जानते,उसमें टांग मत अड़ाया करो.संसार भर की विद्या तुम्हीं नहीं पढ़े
हो. होरी सचमुच आपे में न था. गऊ उसके लिये केवल भक्ति और श्रद्धा की वस्तु नहीं,
सजीव सम्पत्ति भी थी. वह उससे अपने द्वार की शोभा और अपने घर का गौरव बढ़ाना चाहता
था. वह चाहता था, लोग गाय को द्वार पर बंधे देखकर पूछें-यह किसका घर है? लोग कहें-
होरी महतो का. तभी लड़की वाले भी उसकी विभूति से प्रभावित होंगे.आंगन में बंधी, तो
कौन देखेगा? धनिया इसके विपरीत सशंक थी. वह गाय को सात परदों के अन्दर छिपाकर
रखना चाहती थी. अगर गाय आठों पहर कोठरी में रह सकती, तो शायद वह उसे बाहर न
निकलने देती. यों हर बात में होरी की जीत होती थी. वह अपने पक्ष पर अड़ जाता था और
धनिया को दबना पड़ता था, लेकिन आज धनिया के सामने होरी की एक न चली. धनिया लड़ने
पर तैयार हो गई. गोबर,सोना और रूपा सारा घर होरी के पक्ष में था. पर धनिया ने अकेले
सबको परास्त कर दिया. आज उसमें एक विचित्र आत्मविश्वास और होरी में एक विचित्र विनय
का उदय हो गया था.
मगर तमाशा कैसे रुक सकता था? गाय डोली में बैठ कर तो आयी न थी. कैसे सम्भव था कि
गांव में इतनी बड़ी बात हो जाये और तमाशा न लगे? जिसने सुना, सब काम छोड़ कर देखने
दौड़ा. यह मामूली देशी गऊ नही है. भोला के घर से अस्सी रुपये में आयी है. होरी
अस्सीरुपये क्या देंगे, पचास साठ रुपये में लाये होंगे.गाव के इतिहास में पचास-साठ
रुपये की गाय का आना भी अभूतपूर्व बात थी. बैल तो पचास रुपये के भी आये,सौ के भी
आये, लेकिन गाय के लिये इतनी बड़ी रकम किसान क्या खा के खर्च करेगा? वह तो ग्वालों
ही का कलेजा है कि अंजुलियों रुपये गिन आते हैं. गाय क्या है, साक्षात देवी का रूप
है. दर्शकों, आलोचकों का तांता लगा हुआ था, और होरी दौड़-दौड़ कर सबका सत्कार कर
रहा था.इतना विनम्र, इतना प्रसन्नचित्त वह कभी न था,
सत्तर साल के बूढ़े पण्डित दातादीन लठिया टेकते हुए आये और पोपले मुंह से बोले-
कहां हो होरी,तनिक हम भी तुम्हारी गाय देख लें. सुना, बड़ी सुन्दर है.
होरी ने दौड़ कर पालागन किया और मन में अभिमानमय उल्लास का आनन्द उठाता हुआ

बड़े सम्मान से पण्डित जी को आंगन में ले गया. कहाराज ने गऊ को अपनी पुरानी अनुभवी
आंखों से देखा, सींग देखै, थन देखा पुट्ठा देखा और घनी सफेद भौहों के नीचे छिपी हुई
आंखों में जवानी की उमंग भरकर बोले- कोई दोष नहीं है बेटा, बाल, भौंरी सब ठीक.
भगवान चाहेंगे, तो तुम्हारे भाग खुल जायेंगे, ऐसे अच्छे लच्छन हे कि वाह, बस रातिबन
न कम होने पाये. एक-एक बाछा सौ-सौ का होगा.
होरी ने आनन्द के सागर में डुबकियां खाते हुए कहा- सब आपका असीरबाद है, दादा?
दातादीन ने सुरती की पीक थूकते हुए कहा-मेरा असीरबाद नहीं है बेटा, भगवान् की
दया है. यह सब प्रभु की दया है. रुपये नगद दिये?
होरी ने बे-पर की उड़ायी. अपने महाजन के सामने भी अपनी समृद्धि-प्रदर्शन का ऐसा
अवसर पाकर वह कैसे छोड़े. टके की नयी टोपी सिर पर रखकर जब हम अकड़ने लगते हैं,
जरा देर के लिए भी सवारी पर बैठ कर जब हम आकाश में उड़ने लगते हैं, तो इतनी बड़ी
विभूति पाकर क्यों न उसका दिमाग आसमान पर चढ़े. बोला-भोला ऐसा भलमानस नहीं है
महाराज !नगद गिनाये, पूरे चौकस.
अपने महाजन के सामने यह डींग मारकर होरी ने नादानी तो की थी, पर दातादीन के मुख पर
असन्तोष का कोई चिन्ह न दिखाई दिया. इस कथन में कितना सत्य है, यह उनकी उन बूढ़ी
आंखों से छिपा न रह सका, जिनमें ज्योति की जगह अनुभव छिपा बैठा था.
प्रसन्न होकर बोले- कोई हरज नहीं बेटा, कोई हरज नहीं. भगवान् सब कल्यान करेंगे.
पांच सेर दूध है इसमें बच्वे के लिए छोड़कर.
धनिया ने तुरन्त टोका- अरे नहीं महाराज, इतना दूध कहां? बुढ़िया तो हो गयी है. फिर
यहां रातिब कहां धरा है?
दातादीन ने मर्म-भरी आंखो से देखकर उसकी सतर्कता को स्वीकार किया, मानो कह रहे हों,
`गृहणी का यही धर्म है, सीटना मरदों का काम है, उन्हे सीटने दो.’ फिर रहस्य-भरे
स्वर में बोले- बाहर न बांधना, इतना कहे देते हैं.
धनिया ने पति की ओर विजयी आंखो से देखा, मानो कह रही हो-लो, अब तो मानोगे.
दातादीन से बोली- नहीं महाराज, बाहर क्या बांधेंगे, भगवान् दें,तो इसी आंगन में तीन
गायें और बंध सकती हैं.
सारा गांव गाय देखने आया.नहीं आये, तो सोभा और हीरा, जो अपने सगे भाई थे. होरी के
हृदय में भाइयों के लिए, अब भी कोमल स्थान था. वह दोनों आकर देख लेते और
प्रसन्न हो जाते, तो उसकी मनोकामना पूरी हो जाती. सांझ हो गयी. दोनों पुर लेकर लौट
आये. इसी द्वार से निकले, पर पूछा कुछ नहीं.
होरी ने डरते-डरते धनिया से कहा- न सोभा आया, न हीरा. सुना न होगा?
धनिया बोली- तो यहां कौन उन्हें बुलाने जाता है?
`तू बात तो समझती नहीं, लड़ने के लिये तैयार रहती है. भगवान् ने जब यह दिन दिखाया
है, तो हमें सिर झुकाकर चलना चाहिए. आदमी को अपने सगों के मुंह से अपनी भलाई-बुराई
सुनने की जितनी लालसा होती है, बाहरवालों के मुंह से नहीं. फिर अपने भाई लाख बुरे
हों हैं तो अपने भाई ही. अपने हिस्से-बखरे के लिए सभी लड़ते हैं, पर इससे खून थोड़े
ही बंट जाता है. दोनों को बुलाकर दिखा देना चाहियए. नहीं कहेंगे, गाय लाये, हमसे
कहा तक नहीं.’
धनिया ने नाक सिकोड़कर कहा- मैंने तुमसे सौ बार, हजार बार कह दिया, मेरे मुंह पर
भाइयों का बखान न किया करों, उनका नाम सुनकर मेरी देह में आग लग जाती है. सारे गांव
ने सुना, क्या उन्होने न सुना होगा? कुछ इतनी दूर भी तो नहीं रहते. सारा गांव देखने
आया, उन्ही के पांवों मैं मेंहदी लगी हुई थी, मगर आयें कैसे? जलन हो रही होगी कि
इसके घर गाय आ गयी. छाती फटी जाती होगी.
दीया बत्ती का समय आ गया था. धनिया ने जाकर देखा, तो बोतल में मिट्टी काश तेल न था.
बोतल उठाकर तेल लाने चली गयी. पैसे होते, तो रूपा को भेजती. उधार लाना था, कुछ मुंह
मुंह देखी कहेगी, कुछ लल्लो-चप्पो करेगी, तभी तो तेल उधार मिलेगा.
होरी ने रूपा को बुलाकर प्यार से गोद में बैठाया और कहा- जरा जाकर देख, हीरा काका
आ गये हैं कि नहीं. सोभा काका को भी देखती आना. कहना, दादा ने तुम्हें बुलाया है,
न आये, हाथ पकड़कर खींच लाना.
रूपा ठुनक कर बोली- छोटी काकी मुझे डांटती है.
`काकी के पास क्या करने जायेगी? फिर सोभा-बहू तो तुझे प्यार करती है’
सोभा काका मुझे चिढ़ाते हैं… मैं न कहूंगी.’
`क्या कहते हैं बता?’
`चिढ़ाते हैं.’
`क्या कहकर चिढ़ाते हैं?’
कहते हैं, तेरे लिए मूस पकड़ कर रखा है. ले जा, भूनकर खा ले.’
होरी के अन्तस्तल में गुदगुदी हुई.
`तू कहती नहीं, पहले तुम खा लो, तो मैं खाऊंगी.’
`अम्मा मने करती हैं. कहती हैं, उन लोगों के घर न जाया करो.’
`तू अम्मां की बेटी है कि दादा की?’
रूपा ने उसके गले में हाथ डालकर कहा- अम्मां की, और हंसने लगी.
`तो फिर गोद से उतर जा. आज मैं तुझे अपनी थाली में न खिलाऊंगा.’
घर में एक ही फूल की थाली थी, होरी उसी थाली में खाता था. थाली में खाने का गौरव
पाने के लिए रूपा होरी के साथ खाती थी. इस गौरव का परित्याग कैसे करे? हुमकर बोली-
अच्छा,तुम्हारी.
`तो फिर मेरा कहना मानेगी कि अम्मां का?’
`तुम्हारा.’
`तो जाकर हीरा और सोभा को खींच ला.’
`और जो अम्मा बिगड़े?’
`अम्मा से कहने कौन जायेगा.’
रूपा कूदती हुई हीरा के घर चली. द्वेष का मायाजाल बड़ी-बड़ी मछलियों को ही फंसाता
है. छोटी मछलियां या तो उसमें फंसती ही नहीं या तुरन्त निकल जाती हैं. उनके लिये यह
घातक जाल क्रीड़ा की वस्तु है,भय की नहीं. भाइयों से होरी की बोलचाल बन्द थी, पर
रूपा दोनों घरों में आती जाती थी. बच्चों से क्या वैर!
लेकिन रूपा घर से निकली ही थी कि धनिया तेल लिये मिल गयी. उसने पूछा-सांझ की
बेला कहां जाती है, चल घर. रूपा मां को प्रसन्न करने के प्रलोभन को न रोक सकी.
धनिया ने डांटा- चल घर, किसी को बुलाने नहीं जाना है.
रूपा का हाथ पकड़े हुए वह घर आयी और होरी से बोली-मैंने तुमसे हजार बार कह दिया,
मेरी लड़की को किसी के घर न भेजा करो.किसी ने कुछ कर-करा दिया, तो मैं तुम्हें लेकर
चाटूंगी?ऐसा ही बड़ा परेम है,तो आप क्यौं नहीं जाते?अभी पेट नहीं भरा जान पड़ता है.
होरी नांद जमा रहा था. हाथों में मिट्टी लपेटे हुए अज्ञान का अभिनय करके बोला- किस
बात पर बिगड़ती है भाई? यह तो अच्छा नहीं लगता कि अन्धे कूकर की तरह हवा को भूंका
करो.
धनिया को कुप्पी में तेल डालना था, इस समय झगड़ा न बढ़ाना चाहती थी. रूपा भी
लड़कों में जा मिली.
पहर रात से ज्यादा जा चुकी थी. नांद गड़ चुकी थी. सानी और खली डाल दी गयी थी. गाय
मनमारे उदास बैठी थी, जैसे कोई वधू ससुराल आयी हो. नांद में मुंह तक न डालती थी.
होरी और गोबर खाकर आधी-आधी रोटियां उसके लिए लाये, पर असने सूंघा तक नहीं. मगर
यह कोई नयी बात न थी. जानवरों को भी बहुधा घर छूट जाने का दुख होता है.
होरी बाहर खाट पर बैठकर चिलम पीने लगा, तो फिर भाइयों की याद आयी. नहीं, आज
इस शुभ अवसर पर वह भाइयों की उपेक्षा नहीं कर सकता उसका हृदय यह विभूति पाकर विशाल
हो गया था. भाइयौं से अलग हो गया है, तो क्या हुआ. उनका दुश्मन तो नहीं है. यही गाय
तीन साल पहले आयी होती, तो सभी का उस पर बराबर अधिकार होता. और कल को यही गाय दूध
देने लगेगी, तो क्या वह भाइयों के घर दूध न भेजेगा या दही न भेजेगा? ऐसा तो उसका
धरम नहीं है. भाई उसका बुरा चेतें? अपनी-अपनी करनी, तो अपने अपने साथ है.
उसने नारियल खाट के पाये से लगाकर रख दिया और हीरा के घर की ओर चला. सोभा का
घर भी उधर ही था. दोनों अपने-अपने द्वार पर लेटे हुए थे.काफी अंधेरा था. होरी पर
उनमें से किसी की निगाह नहीं पड़ी. दोनों में कुछ बातें हो रही थीं. होरी ठिठक गया
और उनकी बातें सुनने लगा.ऐसा आदमी कहां है, जो अपनी चर्चा सुन कर टाल जाये?
हीरा ने कहा- जब तक एक में थे, एक बकरी भी नहीं ली. अब पछांई गाय ली जाती है. भाई
का हक मार कर किसी को फलते-फूलते नहीं देखा.
सोभा बोला-यह तुम अन्याय कर रहे हो हीरा! भैया ने एक-एक पैसे का हिसाब दे दिया था
यह मैं कभी न मानूंगा कि उन्होंने पहले की कमाई छिपा रखी थौ.
`तुम मानों चाहे न मानो,है यह पहले की कमाई.’
`किसी पर झूठा इल्जाम न लगाना चाहिए.’
` अच्छा, तो यह रुपये कहां से आ गये? कहां से हुन बरस पड़ा? उतने ही खेत तो हमारे
पास भी हैं. उतनी ही उपज हमारी भी है. फिर क्यों हमारे पास कफन को कौड़ी नहीं और
उनके घर नयी गाय आती है?’
`उधार लाये होंगे.’
`भोला उधार देने वाला आदमी नहीं है.’
`कुछ भी हो, गाय है बड़ी सुन्दर, गोबर लिये जाता था, तो मैंने रास्ते में देखा.’
`बेईमानी का धन जैसे आता है ,वैसे ही जाता है. भगवान् चाहेंगे, तो बहुत दिन गाय घर
में न रहेगी.
होरी से और न सुना गया. वह बीती बातों को बिसार कर अपने हृदय में
स्नेह और सौहार्द्र भरे भाइयों के पास आया था. इस आघात ने जैसे उसके हृदय में छेद
कर दिया और वह रस-भाव उसमें किसी तरह नहीं टिक रहा था. लत्ते और चिथड़े ठूंसकर अब
उस प्रवाह को नहीं रोक सकता. जी में एक उबाल आया कि उसी क्षण इस आक्षेप का जबाब दे,
लेकिन बात बढ़ जाने के भय से चुप रह गया. अगर उसकी नीयत साफ है, तो कोई कुछ नहीं कर
सकता. भगवान् के सामने वह निर्दोष है. दूसरौं की उसे परवाह नहीं. उलटे पांव लौट आया
और वही जला हुआ तम्बाकू पीने लगा. लेकिन जैसे वह विष प्रतिक्षण उसकी धमनियों में
फैलता जाता था. उसने सो जाने का प्रयास किया, पर नींद न आयी. बैलों के पास जाकर
उन्हें सहलाने लगा, विष शान्त न हुआ. दूसरी चिलम भरी, लेकिन उसमें भी कुछ रस न था.
विष ने जैसे चेतना को आक्रान्त कर दिया हो. जैसे नशे में चेतना एकांगी हो जाती है,
जैसे फैला हुआ पानी एक दिशा में बहकर वेगवान हो जाता है, वही मनोवृति उसकी हो
रही थी. उसी उन्माद की दशा में वह अन्दर गया. अभी द्वार खुला हुआ था आंगन में एक
किनारे चटाई पर लेटी हुई धनिया सोना से देह दबवा रही थी और रूपा जो रोज सांझ होते
ही सो जाती थी, आज खड़ी गाय का मुंह सहला रही थी. होरी ने जाकर गाय को खूंटे से
खोल लिया और द्वार की ओर ले चला. वह इसी बक्त गाय को भोला के घर पहुंचाने का दृढ़
निश्चय कर चुका था. इतना बढ़ा कलंक सिर पर लेकर वह अब गाय को घर में नहीं रख सकता.
किसी तरह नहीं.
या ने पूछा- कहां लिये जाते हो रात को?
होरी ने एक पग बढ़ाकर कहा- ले जाता हूं भौला के घर. लौटा दूंगा.
धनिया को विस्मय हुआ, उठकर सामने आ गयी और बोली- लौटा क्यों दोगे?
लौटाने के लिए ही लाये थे?
`हां, उसके लौटा देने में ही कुशल है.’
क्यों, बात क्या है? उतने अरमान से लाये और अब लौटाने जा रहे हो? क्या भोला रुपये
मांगते हैं?’
`नहीं भोला यहां कब आया?’
`तो फिर क्या बात हुई?’
`क्या करोगी पूछकर?’
धनिया ने लपककर पगहिया उसके हाथ से छीन ली. उसकी चपल बुद्धि ने जैसे उड़ती हुई
वह गरज रही थी-तू हमें देखकर क्यों जलता है? हमें देखकर क्यों तेरी छाती फटती है?
पाल-पोसकर जवान कर दिया, यह उसका इनाम है? हमने न पाला होता,तो आज कहीं भीख मांगते
होते. रूख की छांह भी न मिलती.
होरी को ये शब्ध जरुरत से ज्यादा कठोर जान पड़े भाइयों का पालना-पोसना तो उसका धर्म
था. उनके हिस्से कि जायदाद, तो उसके हाथ में थी कैसे न पालता-पोसता? दुनिया में
कहीं मुंह दिखाने लायक रहता?
हीरा ने जबाब दिया-हम किसी का कुछ नहीं जानते? तेरे घर में कुत्तों की तरह एक
टुकड़ा खाते थे और दिन-भर काम करते थे जानाश ही नहीं कि लड़कपन और जवानी कैसी होती
दिन-दिन भर सूखा गोबर बीना करते थे. उस पर भी तू बिना दस गाली दिये रोटी न देती थी
तेरी जैसी राच्छसिन के हाथ में पड़कर जिन्दगी तलख हो गयी.
धनिया और भी तेज हुई- जबान संभाल, नहीं जीभ खींच लूंगी. राच्छसिन होगी तेरी औरत. तू
है किस फेर में मूंडी-काटे, टुकड़-खोर, नमक-हराम.
दातादीन ने टोका-इतना कटुवचन क्यों कहती है धनिया? नारी का धरम है कि गम खाये.वह
तो उजड्ड है, क्यों उसके मुंह लगती है.

लाला पटेश्वरी पटवारी ने उसका समर्थन किया- बात का जबाब बात है, गाली नहीं. तूने
लड़कपन में उसे पाला-पोसा, लेकिन यह क्यों भूल जाती है कि उसकी जायदाद तेरे
हाथ में थी.
धनिया ने समझा, सब- के सब मिलकर मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं. चौमुख लड़ाई के लिए
तैयार हो गयी-अच्छा, रहने दो लाला! मैं सबको पहचानती हूं.इस गांव में रहते बीस साल
हो गये एक- एक की नस पहचानती हूं.मैं गाली दे रही हूं वह फूल बरिसा रहा है,क्यों?
दुलारी सहुआइन ने आग पर घी डाला- वाकई बड़ी गाल-दराज औरत है भाई! मरद के
मुंह लगती है. होरी ही जैसा मरद है कि इसका निबाह होता है. दूसरा मरद होता, तो
एक दिन न पटती.
अगर हीरा इस समय जरा नरम हो जाता, तो उसकी जीत हो जाती, लेकिन ये गालिया सुनकर
आपे से बाहर हो गया.औरों को अपने पक्ष में देखकर वह कुछ शेर हो रहा था. गला फाड़कर
बोला-चली जा मेरे द्वार से, नहीं जूतों से बात करूंगा. झोंटा पकड़कर उखाड़ लूंगा.
गाली देती है डाइन! बेटे का घमण्ड हो गया है. खून….
पांसा पलट गया. हौरी का खून खौल उठा. बारूद में जैसे चिनगारी पड़ गयी हो आगे
आकर बोला बस, अब चुप हो जाओ हीरा, अब नहीं सुना जाता,मैं इस औरत को क्या कहूं?
जब मेरी पीठ में धूल लगती है, तो इसी के कारन. न जाने क्यों इससे चुप नहीं रहा जाता
चारों ओर से हीरा पर बौछार पड़ने लगी दातादीन ने निर्लज्ज कहा, पटेश्वरी ने गुण्डा
बनाया, झिंगुरीसिंह ने शैतान की उपाधि दी. दुलारी सहुआइन ने कपूत कहा. एक उद्दण्ड
शब्द ने धनिया का पल्ला हलका कर दिया था. दूसरे उग्र शब्द ने हीरा को गच्चे में डाल
दिया. उस पर होरी के संयत वाक्य ने रही-सही कसर भी पूरी.

हीरा संभल गया. सारा गांव उसके विरूद्ध हो गया.अब चुप रहने में ही उसकी कुशल है
क्रोध के नशे में भी इतना होश उसे बाकी था.
धनिया का कलेजा दूना हो गया. होरी से बोली-सुन लो कान खोल के. भाइयों के लिए मरते
रहते हो. ये भाई हैं, ऐसे भाई का मुंह न देखे. यह मुझे जूतों से मारेगा. खिला-पिला.
होरी ने डांटा- फिर क्यों बक-बक करने लगी तू? घर क्यों नहीं जाती?
धनिया जमीन पर बैठ गयी और आर्त स्वर में बोली-अब तो इसके जूते खा के जाऊंगी.
जरा इसकी मरदूमी देख लूं, कहां है गोबर? अब किस दिन काम आयेगा? तू देख रहा है बेटा,
तेरी मां को जूते मारे जा रहे हैं.
यों विलाप करके उसने अपने क्रोध को भी क्रियाशील बना डाला. आग को फूंक-फूंककर उसमें
ज्वाला पैदा कर दी. हीरा पराजित- सा पीछे हट गया. पुन्नी उसका हाथ पकड़ कर घर की ओर
खीच रही थी. सहसा धनिया ने सिंहनी की भांति झपटकर हीरा को इतने जोर का धक्का दिया
कि वह धम से गिर पड़ा और बोली- कहां जाता है, जूते मार, मार जूते, देखू तेरी मरदूमी
होरी ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया और घसीटता हुआ घर ले चला.

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