गोदान (भाग 1)

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होरी अपने गांव के समीप पहुँचा तो देखा, अभी तक गोबर खेत में ऊख गोड़ रहा है और
दोनों लड़कियां भी उसके साथ काम कर रही हैं. लू चल रही थी, बगूले उठ रहे थे, भूतल
धधक रहा था. जैसे प्रकृति ने वायु में आग घोल दी हो. यह सब अभी तक खेत में क्यों
हैं? क्या काम के पीछे सब जान देने पर तुले हुए हैं? वह खेत की ओर चला और दूर ही से
चिल्लाकर बोला-आता क्यों नहीं गोबर,क्या काम ही करता रहेगा? दोपहर ढल गयी, कुछ
सूझता है कि नहीं?
उसे देखते ही तीनों ने कुदालें उठा लीं और उसके साथ हो लिये. गोबर सांवला, लम्बा,
एकहरा युवक था, जिसे इस काम में रुचि न मालूम होती थी. प्रसन्नता की जगह मुख
पर असन्तोष और विद्रोह था. वह इसलिये काम में लगा हुआ था कि वह दिखाना चाहता था,
उसे खाने पीने की कोई फिक्र नहीं है. बड़ी लड़की सोना लज्जाशील कुमारी थी, सांवली,

सुडौल, प्रसन्न और चपल. गाढ़े की लाल साड़ी, जिसे वह घुटनों से मोड़कर कमर में
बांधे हुए थी, उसके हलके शरीर पर कुछ लदी हुई-सी थी और उसे प्रोढ़ता की गरिमा दे
रही थी. छोटी रूपा पांच साल की छोकरी थी, मैली, सिर पर
बालों का एक घोसला-सा बना हुआ,एक लंगोटी कमर में बांधे,बहुत ही ढ़ीठ और रोनी.
रूपा ने होरी की टांगो में लिपट कर कहा-काका! देखो, मैंने एक ढेला भी नहीं छोड़ा.
बहिन कहती है, जा पेड़ तले बैठ. ढेले न तोड़े जायेंगे काका, तो मिट्टी कैसे बराबर
होगी? होरी ने उसे गोद में उठाकर प्यार करते हुए कहा-तूने बहुत अच्छा किया बेटी,
चल, घर चलें. कुछ देर अपने विद्रोह को दबाये रखने के बाद गोबर बोला-यह तुम रोज-रोज
मालिकों की खुशामद करने क्यों जाते हो? बाकी न चुके, तो प्यादा आकर गालियाँ सुनाता
है, बेगार देनी ही पड़ती है,नजर नजराना सब तो हमसे भराया जाता है. फिर किसी की
क्यों सलामी करो?
इस समय यही भाव होरी के मन में आरहे थे, लेकिन लड़के के इस विद्रोह-भाव को
दबाना जरुरी था. बोला- सलामी करने न जायें, तो रहें कहां? भगवान ने जब गुलाम बना
बना दिया है, तो अपना क्या बस है? यह इसी सलामी की बरकत है कि द्वार पर मड़ैया डाल
ली और किसी ने कुछ नहीं कहा. घूरे ने द्वार पर खूंटा गाड़ा था, जिस पर कारिन्दों ने
दो रुपये डांड़ ले लिये थे. तलैया से कितनी मिट्टी हमने खोदी, कारिन्दा ने कुछ नहीं
कहा, दूसरा खोदे, तो नजर देनी पड़े. अपने मतलब के लिये सलामी करने जाता हूं, पांव
में सनीचर नहीं है और न सलामी करने में कोई बड़ा सुख मिलता है. घण्टों खड़े रहो,तब
जाकर मालिक को खबर होती है. कभी बाहर निकलते हैं, कभी कहला देते हैं कि
फुरसत नहीं है.
गोबर ने कटाक्ष किया-बड़े आदमियों की हां में हां मिलाने में कुछ न कुछ आनन्द तो
मिलता ही है. नहीं लोग मेम्बरी के लिये क्यों खड़े हों?
`जब सिर पर पड़ेगी, तब मालूम होगा बेटा, अभी जो चाहे कह लो. पहले मैं भी
यही सब बातें सोचा करता था, पर अब मालूम हुआ कि हमारी गरदन दूसरों के पैरो के
नीचे दबी हुई है,अकड़कर निबाह नहीं हो सकता.’
पिता पर अपना क्रोध उतार कर गोबर कुछ शान्त हो गया और चुपचाप चलने लगा. सोना ने
देखा, रूपा बाप की गोद में चढ़ी बैठी है, तो ईर्ष्या हुई. डांटकर बोली-अब गोद से
उतरकर पांव- पांव क्यों नहीं चलती,क्या पांव टूट गये हैं?
रूपा ने बाप की गरदन में हाथ डालकर ढिठाई से कहा- न उतरेंगे, जाओ. काका, बहिन
हमको रोज चिढ़ाती है कि तू रूपा है, मैं सोना हूं. मेरा नाम कुछ और रख दो.
होरी ने सोना को बनावटी रोष से देखकर कहा-तू इसे क्यों चिढाती है सोनिया? सोना तो
देखने को है. निबाह तो रूपा से होता है. रूपा न हो, तो रुपये कहां से बनें, बता?
सोना ने अपने पक्ष का समर्थन किया-सोना न हो, तो मोहनमाला कैसे बने,नथुनियां कहां
से आये, कण्ठा कैसे बने?
गोबर भी इस विनोदमय विवाद में शरीक हो गया. रूपा से बोला-तू कह दे कि सोना तो सूखी
पत्ती की तरह पीला होता है, रूपा तो उजला होता है, जैसे सूरज.
सोना बोली-शादी-ब्याह में पीली साड़ी पहनी जाती है,उजली साड़ी कोई नहीं पहनता.
रूपा इस दलील से परास्त हो गई. गोबर और होरी की कोई दलील इसके सामने न ठहर
सकी. उसने क्षुब्ध आंखों से होरी को देखा.
होरी को एक नयी युक्ति सूझ गयी. बोला-सोना बड़े आदमियों के लिये है. हम गरीबों के
लिये तो रूपा ही है.जैसे जौ को राजा कहते हैं,गेहूं को चमार, इसलिये न कि गेहूं
बड़े आदमी खाते हैं, जौ हम लोग खाते हैं.
सोना के पास इस सबल युक्ति का कोई जबाब न था. परास्त होकर बोली-तुम सब जने एक
ओर हो गये, नहीं रुपिया को रुलाकर छोड़ती.
रूपा ने उंगली मटकाकर कहा-ए राम, सोना चमार-ए राम, सोना चमार.
इस विजय का उसे इतना आनंद हुआ कि बाप की गोद में रह न सकी. जमीन पर
कूद पड़ी और उछल-उछलकर यही रट लगाने लगी-रूपा राजा, सोना चमार-रूपा राजा,सोना चमार!
ये लोग घर पहुँचे, तो धनिया द्वार पर खड़ी इनकी बाट जोह रही थी. रुष्ट होकर बोली-आज
इतनी देर क्यौं की गोबर? काम के पीछे कोई परान थोड़े ही देता है.
फिर पति से गरम होकर कहा- तुम भी वहां से कमाई करके लौटे, तो खेत में पहुंच गये.
खेत कहीं भागा जाता था?
द्वार पर कुआं था. होरी और गोबर ने एक एक कलसा पानी सिर पर उड़ेला, रूपा को नहलाया
और भोजन करने गये. जौ की रोटियां थीं, पर गेहूं जैसी सफेद और चिकनी. अरहर की दाल
थी,जिसमें कच्चे आम पड़े हुए थे. रूपा बाप की थाली में खाने बैठी. सोना ने उसे
ईर्ष्या-भरी आंखों से देखा, मानो कह रही ती ,वाह रे दुलार.
धनिया ने पूछा- मालिक से क्या बातचीत हुई?
होरी ने लोटा-भर पानी चढ़ाते हुए कहा-यही तहसील-वसूल की बात थी, और क्या! हम
लोग समझते हैं,बड़े आदमी बहुत सुखी होंगे, लेकिन सच पूछो,तो वह हमसे भी ज्यादा
दुखी हैं. हमें अपने पेट की चिन्ता हैं, उन्हें हजारों चिन्ताएं घेरे रहती हैं.
रायसाहब ने और क्या -क्या कहा था, कुछ होरी को याद न था. उस सारे कथन का
खुलासा-मात्र उसके स्मरण में चिपका रह गया था.
गोबर ने व्यंग किया-तो फिर अपना इलाका हमें क्यों नहीं दे देते? हम अपने खेत, बैल,
हल, सब उन्हें देने को तैयार हैं. करेंगे बदला? यह सब धूर्तता है,निरी मोटमरदी.
जिसे दुःख होता है,वह दरजनों मोटरें नहीं रखता, महलों में नहीं रहता, हलवा-पूरी
नहीं खाता और न नाच- रंग में लिप्त रहता है. मजे से राज का सुख भोग रहे हैं, उस पर
दुखी हैं!
होरी ने झुंझलाकर कहा- अब तुमसे बहस कौन करे भाई? जैजात किसी से छोड़ी जाती है कि
वही छोड़ देंगे. हमीं को खेती से क्या मिलता है? एक आने नफरी की मजूरी भी तो नहीं
पड़ती. जो दस रुपये महीने का भी नौकर है,वह भी हमसे अच्छा खाता-पहनता है, लेकिन
खेतों को छोड़ा तो नहीं जाता. खेती छोड़ दें ,तो क्या?नौकरी कहीं मिलता है? फिर मर
जाद भी तो पालना पड़ता है. खेती में जो मरजाद है, वह नौकरी में तो नहीं है. इसी तरह
जमींदारों का हाल भी समझ लो. उनकी जान को भी तो सैकड़ों रोग लगे हुए हैं,
हाकिमों को रसद पहुँचाओ,उनकी सलामी करो, अमलों को खुश करो. तारीख पर मालगुजारी न
चुका दें, तो हवालात हो जाय, कुड़की आ जाय, हमें तो कोई हवालात नहीं ले जाता. दो
चार गालियां-घुड़कियां ही तो मिलकर रह जाती हैं.
गोबर ने प्रतिवाद किया-यह सब कहने की बातें हैं. हम लोग दाने दाने को मुहताज हैं,
देह पर साबित कपड़े नहीं हैं, चोटी का पसीना एड़ी तक आता है,तब भी गुजर नहीं होता.
उन्हें क्या, मजे से गद्दी-मसनद लगाये बैठे हैं, सैकड़ों नौकर-चाकर हैं,हजारों आद
मियों पर हुकुमत है. रुपये न जमा होते हों, पर सुख तो सभी तरह का भोगते हैं.
धन लेकर आदमी और क्या करता हैं?
`तुम्हारी समझ में हम और वह बराबर हैं?’
`भगवान ने तो सबको बराबर ही बनाया है’
`यह बात नहीं है बेटा छोटे -बड़े भगवान के घर से बनकर आते हैं.सम्पत्ति बड़ी तपस्य
से मिलती है. उन्होने पूर्व जन्म में जैसे कर्म किये हैं, उनका आनंद भोग रहें हैं.
हमने कुछ नहीं संचा, तो भोगें क्या?’
यह सब मन को समझाने की बातें हैं.भगवान सबको बराबर बनाते हैं. यहां जिसके हाथ
में लाठी है,वह गरीबों को कुचल कर बड़ा आदमी बन जाता है.’
`यह तुम्हारा भरम है. मालिक आज भी चार घण्टे रोज भगवान का भजन करते हैं.’
`किसके बल पर यह भजन-भाव और दान- धरम होता है?’
`अपने बल पर.’
`नहीं, किसानों के बल और मजदूरों के बल पर. यह पाप का धन पचे कैसे? इसीलिये
दान धरम करना पड़ता है,भगवान् का भजन भी इसीलिये होता है. भूखे नंगे रहकर भगवान का
भजन करें, तो हम भी देखें. हमें कोई दोनों जून काने को दे, तो हम आठों पहर भगवान्
का जाप ही करते रहें. एक दिन खेत में उख गोड़ना पड़ें, तो सारी भक्ति भूल जायें.’
होरी ने हार कर कहा-अब तुम्हारे मुंह कौन लगे भाई, तुम तो भगवान् की लीला में भी
टांग अड़ाते हो.

तीसरे पहर गोबर कुदाल लेकर चला, तो होरी ने कहा- जरा ठहर जाओ बेटा, हम भी चलते
हैं.तब तक थोड़ा-सा भूसा निकालकर रख दो. मैंने भोला को देने को कहा है. बेचारा आजकल
बहुत तंग है
गोबर ने अवज्ञा-भरी आँखों से देखकर कहा- हमारे पास बेचने को भूसा नहीं है.
`बेचता नहीं हूँ भाई,यों ही दे रहा हूं वह संकट में है,उसकी मदद तो करनी ही पड़ेगी’
`हमें तो उन्होने कभी एक गाय नहीं दे दी.’
`दे तो रहा था, पर हमने ली ही नहीं.’
धनिया मटक कर बोली-गाय नहीं. वह दे रहा था इन्हे गाय दे देगा! आंख में अञ्जन लगाने
को कभी चिल्लू- भर दूध तो भेजा नहीं, गाय दे देगा!
होरी ने कसम खायी-नहीं, जवानी कसम, अपनी पछांई गाय दे रहे थे, हाथ तंग है,भूसा-चारा
नहीं रख सके. अब एक गाय बेचकर भूसा लेना चाहते हैं. मैंने सोचा, संकट में पड़े
आदमी की गाय क्या लूंगा. थोड़ा- सा भूसा दिये देता हूं, कुछ रुपये हाथ आ जायेंगे,
तो गाय ले लूंगा. थोड़ा- थोड़ा करके चुका दूंगा. अस्सी रुपये की है, मगर ऐसी कि
आदमी देखता रहे.
गोबर ने आड़े हाथों लिया-तुम्हारा यही धर्मात्मापन तो तुम्हारी दुर्गत कर रहा है.
साफ-साफ तो बात है. अस्सी रुपये की गाय है, हमसे बीस रुपये का भूसा ले लें
और गाय हमें दे दें. साठ रुपये रह जायेंगे. वह हम धीरे -धीरे दे देंगे.
होरी रहस्यमय ढंग से मुस्कराया- मैंने ऐसी चाल सोची है कि गाय सेंत-मेंत में हाथ आ
जाय.कहीं भोला की सगाई ठीक करनी है, बस. दो चार मन भूसा तो खाली अपना रंग जमाने
को देता हूँ.
गोबर ने तिरस्कार किया- तो तुम अब सब की सगाई ठीक करते फिरोगे?
धनिया ने तीखी आंखों से देखा- अब यही एक उद्दम तो रह गया है. नहीं देना है हमें
भूसा किसी को. यहाँ भोला- भाली किसी का करज नहीं खाया है.
होरी ने सफाई दी-अगर मेरे जतन से किसी का घर बस जाय,तो इसमें कौन सी बुराई है?
गोबर ने चिलम उठायी और आग लेने चला गया. उसे यह झमेला बिलकुल नहीं भाता था.
धनिया ने सिर हिलाकर कहा-जो उनका घर बसायेगा, वह अस्सी रुपये की गाय लेकर चुप
न होगा. एक थैली गिनवायेगा.
होरी ने पुचारा दिया- यह मैं जानता हूँ, लेकिन उनकी भलमानसी को भी तो देखो.
मुझसे जब मिलता है,तेरा बखान ही करता है-ऐसी लक्ष्मी है, ऐसी सलीकेदार है
धनिया के मुख पर स्निग्धता झलक पड़ी. `मन मन भाये मुड़िया हिलाये’ वाले भाव से
बोली-मैं उनके बखान की भूखी नहीं हूँ,अपना बखान धरे रहें.
होरी ने स्नेह- भरी मुस्कान के साथ कहा-मैंने तो कह दिया, भैया वह नाक पर मक्खी
भी नहीं बैठने देती, गालियों से बात करती है, लेकिन वह यही कहे जाय कि वह औरत नहीं
लक्ष्मी है. बात यह है कि उसकी घरवाली जबान की बड़ी तेज थी. बेचारा उसके डर के मारे
भागा-भागा फिरता था. कहता था जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुंह सबेरे देख लेता हूं,
उस दिन कुछ-न-कुछ जरूर हाथ लगता है. मैंने कहा-तुम्हारे हाथ लगता होगा, यहां तो रोज
देखते हैं, कभी पैसे से भेंट नहीं होती.
`तुम्हारे भाग ही खोटे हैं तो मैं क्या करूं.’
`लगा अपनी घर वाली की बुराई करने- भिखारी को भीख तक नहीं देती थी,झाड़ू लेकर
मारने दौड़ती थी, लालचिन ऐसी थी कि नमक तक दूसरों के घर से मांग लाती थी.’
`मरने पर किसी की क्या बुराई करूं, मुझे देखकर जल उठती थी.’
`भोला बड़ा गमखोर था कि उसके साथ निबाह कर दिया. दूसरा होता तो जहर खाके मर जाता.
मुझसे दस साल बड़े होंगे भोला, पर राम-राम पहले ही करते हैं.’
`तो क्या कहते थेकि जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुंह देख लेता हूं,तो क्या होता है’
‘उस दिन भगवान कहीं-न -कहीं से कुछ भेज देते हैं.’
`बहुएं भी तो वैसी ही चटोरिन आयी हैं. अबकी सबों ने दो रुपये के खरबूजे उधार खा
डाले. उधार मिल जाये, फिर उन्हें चिन्ता नहीं होती कि देना पड़ेगा या नहीं.’
`अरे! भोला रोते काहे को हैं?’

गोबर आकर बोला-भोला दादा आ पहुंचे. मन-दो-मन भूसा है, वह उन्हें दे दो,फिर
उनकी सगाई ढूंढ़ने निकलो.
धनिया ने समझाया-आदमी द्वार पर बैठा है, उसके लिये खाट-वाट तो डाल नहीं दी,ऊपर से
लगे भुनभुनाने. कुछ तो भलमनसी सीखो.कलसा ले जाओ,पानी भरकर रख दो, हाथ-मुंह धोयें,
कुछ रस-पानी पिला दो. मुसीबत में ही आदमी दूसरों के सामने हाथ फैलाता है.
होरी बोला-रस-वस का काम नहीं है, कौन कोई पाहुने हैं.
धनिया बिगड़ी-पाहुने और कैसे होते हैं. रोज-रोज तो तुम्हारे द्वार पर नहीं आते हैं?
इतनी दूर से धूप-घाम में आये हैं, प्यास लगी ही होगी. रुपिया, देख डब्बे में तमाखू
है कि नहीं, गोबर के मारे काहे को बची होगी. दौड़कर एक पैसे का तमाखू सहुआइन की
दूकान से ले लो.
भोला की आज जितनी खातिर हुई, और कभी नहीं होगी. गोबर ने खाट डाल दी, सोना रस
घोल लायी, रूपा तमाखू भर लायी. धनिया दार पर किवाड़ की आड़ में खड़ी अपने कानों से
अपना बखान सुनने के लिए अधीर हो रही थी.

भोला ने चिलम हाथ में लेकर कहा- अच्छी घरनी घर में आ जाय ,तो समझ लो लक्ष्मी आ
गयी. वही जानती है, छोटे-बड़े का आदर-सत्कार कैसे करना चाहिए.
धनिया के हृदय में उल्लास का कम्पन हो रहा था. चिन्ता और निराशा और अभाव से आहत
आत्मा इन शब्दों में एक कोमल शीतल स्पर्श का अनुभव कर रही थी.
होरी जब भोला का खांचा उठाकर भूसा लाने अन्दर चला, तो धनिया भी पीछै-पीछै चली. होरी
ने कहा-जाने कहाँ से इतना बड़ा खांचा मिल गया . किसी भड़भूजे से मांग लिया होगा.मन
भर से कम में न भरेगा. दो खांचे भी दिये, तो दो मन निकल जायेंगे.
धनिया फूली हुई थी. मलामत की आंखों से देखती हुई बोली-या तो किसी को नेवता न दो
और दो, तो भरपेट खिलाओ. तुम्हारे पास फूल-पत्र लेने थोड़े ही आये हैं कि चंगेरी
लेकर चलते. देते ही हो, तो तीन खांचे दे दो. भला आदमी लड़कों को क्यों नहीं लाया?
अकेले कहां तक ढोयेगा? जान निकल जायेगी.
`तीन खांचे तो मेरे दिये न दिये जायेंगे.’

तब क्या एक खांचा देकर टालोगे? गोबर से कह दो, अपना खंचा भरकर उनके साथ चला जाय.’
`गोबर ऊख गोड़ने जा रहा है.’
`एक दिन न गोड़ने से ऊख न सूख जायेगी.’
`यह तो उनका काम था कि किसी को अपने साथ ले लेते. भगवान् के दिये दो-दो बेटे हैं.’
`न होगें घर पर .दूध लेकर बाजार गये होंगे.’
`यह तो अच्छी दिल्लगी है कि अपना माल भी दो और उसे घर तक पहुँचा भी दो. लाद दे
लदा दे,लादने वाला साथ कर दे.’
`अच्छा भाई, कोई मत जाय. मैं पहुँचा दूंगी. बड़ों की सेवा करने में लाज नहीं है.’
और तीन खांचे उन्हें दे दूं, तो अपने बैल क्या खायेंगे?’
`यह सब तो नेवता देने के पहले ही सोच लेना था. न हो,तुम और गोबर दोनों जने चले जाओ.
`मुरौवत मुरौवत की तरह की जाती है, अपना घर उठाकर नहीं दे दिया जाता’
`अभी जमींदार का प्यादा आ जाय, तो अपने सिर पर भूसा लादकर पहुँचाओगे, तुम, तुम्हारा
लड़का, लड़की सब.और वहां साइत मन-दो-मन लकड़ी भी फाड़नी पड़े.’
`जमींदार की बात और है.’
`हाँ वह डण्डे के जोर से काम लेता है न.’
`उसके खेत नहीं जोतते?’
`खेत जोतते हैं, तो लगान नहीं देते?’
अच्छा भाई, जान न खा, हम दोनों चले जायेंगे. कहां- से- कहाँ मैंने इन्हें भूसा देने
को कह दिया. या तो चलेगी नहीं या चलेगी, तो दौड़ने लगेगी.’
तीनों खांचे भूसे से भर दिये गये. गोबर कुढ़ रहा था. उसे अपने बाप के व्यवहार में
जरा भी विश्वास न था. वह समझता था, वह जहां जाते हैं, वहीं कुछ-न कुछ घर से खो
आते हैं. धनिया प्रसन्न थी. रहा होरी, वह धर्म और स्वार्थ के बीच में डूब उतरा रहा
था.
होरी और गोबर मिलकर एक खांचा बाहर लाये. भोला ने तुरंत अपने अंगोछे का बीड़ा बना
कर सिर पर रखते हुए कहा-मैं इसे रखकर अभी भागा आता हूं. एक खांचा और लूंगा
होरी बोला- एक नहीं, अभी दो और भरे धरे हैं. और तुम्हें न आना पड़ेगा. मैं और गोबर
एक -एक खांचा लेकर तुम्हारे साथ ही चलते हैं.
भोला स्तम्भित हो गया. होरी उसे अपना भाई, बल्कि उससे भी निकट जान पड़ा. उसे अपने
भीतर एक ऐसी तृप्ति का अनुभव हुआ, जिसने मानो उसके सम्पूर्ण जीवन को हरा कर दिया.
तीनों भूसा लेकर चले, तो राह में बातें होने लगीं.
भोला ने पूछा- दशहरा आ रहा है,मालिकों के द्वार पर तो बड़ी धूमधाम होगी?
`हां, तम्बू-सामियाना गड़ गया है. अबकी लीला में मैं भी काम करूंगा. रायसाहब ने
कहा है, तुम्हें राजा जनक कअ मअली बनना पड़ेगा.’
`मालिक तुमसे बहुत खुश हैं.’
`उनकी दया है.’
एक क्षण के बाद भोला ने फिर पूछा- सगुन के लिये रुपये का कुछ जुगाड़ कर लिया है?
माली बन जाने से तो गला न छूटेगा.
होरी ने मुंह का पसीना पोंच कर कहा- उसी की चिन्ता तो मारे डालती है दादा. अनाज तो
सब-का-सब खलिहान में ही तुल गया. जमींदार ने अपना लिया, महाजन ने अपना लिया.मेरे
लिये पांच सेर अनाज बच रहा. यह भूसा तो मैंने रातों-रात ढोकर छिपा दिया था, नहीं
तिनका भी न बचता. जमींदार तो एक ही है, मगर महाजन तीन तीन हैं, सहुआइन
अलग, मंगरू अलग और दातादीन पण्डित अलग. किसी का ब्याज भी पूरा न चुका. जमींदार
के भी आधे रुपये बाकी पड़ गये. सहुआइन से फिर रुपये उधार लिये, तो काम चला.सब तरह
किफायत करके देख लिया भैया, कुछ नहीं होता.हमारा जनम इसीलिये हुआ है कि अपना रक्त
बहायें और बड़ों का घर भरें. मूल का दुगना सूद भर चुका, पर मूल ज्यों का-त्यों सिर
पर सवार है. लोग कहते हैं, खुशी-गमीं में, तीरथ-बरत में हाथ बांधकर खरच करो. मुदा
रास्ता कोई नहीं दिखाता. रायसाहब ने बेटे के ब्याह में तीस हजार लुटा दिये. उनसे
कोई कुछ नहीं कहता. मंगरू ने अपने बाप के क्रिया -करम में पांच हजार लगाये उनसे कोई
कुछ नहीं पूछता. वैसी हि मरजाद तो सबकी है.
भोला ने करुण भाव से कहा- बड़े आदमियों की बराबरी तुम कैसे कर सकते हो भाई?
`आदमी तो हम भी हैं’
`कौन कहता है कि हम- तुम आदमी हैं. हममें आदमियत कहां? आदमी वह है, जिसके पास धन
है, अख्तियार है, इलम है. हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं. उस पर
एक दूसरे को देख नहीं सकता. एका का नाम नहीं. एक किसान दूसरे के खेत पर न चढ़े, तो
कोई जाफा कैसे करे, प्रेम तो संसार से उठ गया.’९
बूढ़ों के लिये अतीत के सुखों और वर्तमान के दुःखों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा
मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता. दोनों मित्र अपने-अपने दुखड़े रोते रहे. भोला ने
अपने बेटों के करतूत सुनाये, होरी ने अपने भाइयों का रोना रोया और तब एक कुएं पर
बोझ रखकर पानी पीने के लिए बैठ गये.गोबर ने बनिये से लोटा मांगा और पानी खींचने लगा
भोला ने सहृदयता से पूछा- अलगौझे के समय तो तुम्हें बड़ा रंज हुआ होगा. भाइयों को
तो तुमने बेटों की तरह पाला था.
होरी आर्द्र कण्ठ से बोला- कुछ न पूछो दादा, यही जी चाहता था कि कहीं जाके डूब
मरूं मेरे जीते जी सब कुछ हो गया. जिनके पीछे अपनी जवानी धूल में मिला दी, वही
मेरे मुद्दई हो गये, और झगड़े की जड़ क्या थी? यही कि मेरी घरवाली हार में काम करने
क्यों नहीं जाती. पूछो, घर देखने वाला भी कोई चाहिए कि नहीं. लेना-देना, धरना-उठाना
संभालना-सहेजना, यह कौन करें फिर वह घर बैठी तो नहीं रहती थी, झाडू-बहारू,
रसोइ, चौका-बरतन, लड़कों की देख-भाल यह कोई थोड़ा काम है? सोभा की औरत घर
संभाल लेती कि हीरा की औरत में यह सलीका था? जब से अलगौझा हुआ है, दोनों घरों में
एक जून रोटी पकती है. नहीं सबको दिन में चार बार भूख लगती थी. अब खायें चार दफे,
तो देखूं. इस मालिकपन में गोबर की मां की जो दुर्गति हुई है, वह मैं ही जानता हूं,
बेचारी अपनी देवरानियों के फटे-पुराने कपड़े पहनकर दिन काटती थी, खुद भूखी सो रही
होगी, लेकिन बहुओं के लिये जलपान तक का ध्यान रखती थी. अपनी देह पर गहने के नाम
पर कच्चा धागा भी न था, देवरानियों के लिये दो चार गहने बनवा दिये. सोने के न सही,
चांदी के तो हैं. जलन यही थी कि यह मालिक क्यों है. बहुत अच्छा हुआ कि अलग हो
गये. मेरे सिर से बला टली.
भोला ने एक लोटा पानी चढ़ाकर कहा- यही हाल घर-घर है भैया! भाइयों की बात ही क्या,
यहां तो लड़कों से भी नहीं पटती और पटती इसीलिये नहीं कि मैं किसी की कुचाल देखकर
मुंह नहीं बन्ध कर सकता. तुम जुआ खेलोगे, चरस पीओगे, गांजे के दम लगाओगे, मगर आये
किसके घर से? खरचा करना चाहते हो तो कमाओ, मगर कमाई तो किसी से न होगी. खरच
दिल खोल कर करेंगे. जेठा कामता सौदा लेकर बाजार जायेग, तो आधे पैसे गायब. पूछो, तो
कोई जवाब नहीं.छोटा जंगी है, वह संगत के पीछे मतवाला रहता है. सांझ हुई और ढोल
मजीरा लेकर बैठ गये. संगत को मैं बुरा नहीं कहता. गाना बजाना ऐब नहीं, लेकिन यह सब
काम फुरसत के हैं यह नहीं कि घर का तो कोई काम न करो,आठों पहर उसी धुन में पड़े रहो
जाती है मेरे सिर, सानी-पानी मैं करूं,
गाय भैंस मैं दुहूं, दूध लेकर बाजार मैं जाऊं.यह गृहस्थी जी का जञ्जाल है, सोने की
हंसिया, जिसे न उगलते बनता है, न निगलते. लड़की है झुनिया, वह भी नसीब की खोटी
तुम तो उसकी सगाई में आये थे. कितना अच्छा घर- वर था. उसका आदमी बम्बई में दूध की
दुकान करता था. उन दिनों वहां हिन्दू- मुसलमानों में दंगा हुआ, तो किसी ने उसके पेट
में छुरा भोंक दिया. घर ही चोपट हो गया. वहां अब उसका निबाह नहीं. जाकर लिवा लाया
कि दूसरी सगाई कर दूंगा, मगर वह राजी ही नहीं होती. और दोनों भावजें हैं कि रात-दिन
उसे जलाती रहती हैं. घर में महाभारत मचा रहता है. विपत की मारी यहां आयी, यहां भी
चैन नहीं.

इन्ही दुखड़ों में रास्ता कट गया. भोला का पुरवा था तो छोटा, मगर बहुत गुलजार.
अधिकतर अहीर ही बसते थे और किसानों के देखते इनकी दशा बहुत बुरी न थी. भोला गांव का
मुखिया था.द्वार पर बड़ी सी चरनी थी,जिस पर दस-बारह-गायें-भैंसे खड़ी सानी खा रही
थी. ओसारे में एक बड़ा-सा तख्त पड़ा था, जो शायद दस आदमियों से भी न उठता. किसी
खूंटी पर ढोलक लटक रही थी, किसी पर मजीरा. एक ताख पर कोई पुस्तक बस्ते में बँधी
रखी हुई थी, जो शायद रामायण हो.दोनों बहुएं सामने बैठी गोबर पाथ रही थी और झुनिया
चौखट पर खड़ी थी. उसकी आंखे लाल थी और नाक के सिरे पर भी सुर्खी थी. मालूम होता था,

अभी रोकर उठी है.उसके मांसल, स्वस्थ,सुगठित अंगों में,मानों यौवन लहरें मार रहा था.
मुंह बड़ा और गोल था, कपोल फूले हुए, आंखे छोटी और भीतर धंसी हुई,माथा पतला, पर
वक्ष का उभार और गात का वही गुदगुदापन आंखों को खींचता था.उस पर छपी हुई गुलाबी
साड़ी उसे और भी शोभा प्रदान कर रही थी.
भोला को देखते ही उसने लपक कर उनके सिर से खांचा उतरवाया. भोला ने गोबर और
होरी के खांचे उतरवाये और झुनिया से बोले- पहले एक चिलम भर ला,फिर थोड़ा-सा रस
बना ले. पानी न हो, तो गगरा ला, मैं खींच दूं.होरी महतौ को पहचानती है न?
फिर होरी से बोला- घरनी बिना घर नहीं रहता भैया! पुरानी कहावत है-नाटन खेती
बहुरियन घर. नाटे बैल क्या खेती करेंगे और बहुएं क्या घर संभालेंगी? जब से इसकी
मां मरी है, जैसे घर की बरकत ही उठ गयी. बहुएं आटा पाथ लेती हैं,पर गृहस्थी चलाना
क्या जानें. हां, मुंह चलाना खूब जानती हैं. लौंडे कहीं फड़ पर जमें होंगे. सब के
सब आलसी हैं, कामचोर. जब तक जीता हूं, इनके पीछै मरता हूं. मर जाऊंगा, तो
आप सिर पर हाथ धरकर रोयेंगे. लड़की भी वैसी ही है. चोटा-सा अढ़ौना भी करेगी ,
तो भुनभुनाकर. मैं तो सह लेता हूँ, खसम थोड़े ही सहेगा.
झुनिया एक हाथ में भरी हुई चिलम, दूसरे में रस का लोटा लिये बड़ी फुर्ती से आ
पहुंची. फिर रस्सी और कलस लेकर पानी भरने चली. गोबर ने उसके हाथ से कलसा लेने के
लिये हाथ बढ़ाकर झेंपते हुए कहा-तुम रहने दो, मैं भरे लाता हूं.
झुनिया ने कलसा न दिया. कुएं के जगत पर जाकर मुस्कराती हुई बोली-तुम हमारे मेहमान
हो. कहोगे, एक लोटा पानी भी किसी ने न दिया.
`मेहमान काहे से हो गया. तुम्हारा पड़ोसी ही तो हूं.’
`पड़ोसी साल-भर में एक बार भी सूरत न दिखाये, तो मेहमान ही है.’
`रोज-रोज आने में मरजाद भी तो नहीं रहती.’
झुनिया हंसकर तिरछी नजरों से देखती हुऐ बिली-वही मरजाद तो दे रही हूं.महीने
में एक बेर आओगे, ठण्डा पानी दूंगी. पन्द्रहवें दिन आओगे, चिलम पाओगे.सातवें दिन
आओगे, खाली बैठने को माची दूंगी. रोज -रोज आओगे, कुछ न पाओगे.
`दरसन तो दोगी?’
`दरसन के लिये पूजा करनी पड़ेगी.’

यह कहते-कहते जैसे उसे कोई भूली हुई बात याद आ गयी. उसका मुंह उदास हो गया.वह
विधवा है. उसके नारीत्व के द्वार पर पहले उसका पति रक्षक बना बैठा रहता था.वह
निश्चिन्त थी. अब उस द्वार पर कोई रक्षक न ,इसलिए उस द्वार को सदैव बन्द रखती है.
कभी-कभी घर के सूनेपन से उकताकर वह द्वार खोलती है,पर किसी को आते देखकर
भयभीत होकर दोनों पट भेड़ लेती है.
गोबर ने कलसा भरकर निकाला. सबों ने रस पिया और एक चिलम तमाखू और पीकर लौटे.
भोला ने कहा-कल तुम आकर गाय ले जाना गोबर,इस बखत तो सानी खा रही है.
गोबर की आंखे उसी गाय पर लगी हुई थीं और मन-ही-मन वह मुग्ध हुआ जाता था.
गाय इतनी सुन्दर और सुडौल है, इसकी उसने कल्पना भी न की थी
होरी ने लोभ को रोककर कहा-मंगवा लूंगा, जल्दी क्या है?
`तुम्हें जल्दी न हो, हमें तो जल्दी है. उसे द्वार पर देखकर तुम्हें वह बात याद
रहेगी.’
`उसकी मुझे बड़ी फिकर है दादा.’
`तो कल गोबर को भेज देना.’
दोनों ने अपने-अपने खांचे सिर पर रखे और आगे बढ़े. दोनों इतने प्रसन्न थे,मानों
ब्याह करके लौटे हों. होरी को तो अपनी चिरसञ्चित अभिलाषा के पूरे होने का हर्ष था
और बिना पैसे के. गोबर को इससे भी बहुमूल्य वस्तु मिल गयी थी. उसके मन में अभिलाषा
जाग उठी थी. अवसर पाकर उसने पीछे की तरफ देखा. झुनिया द्वार पर खड़ी थी,मत्त आशा की
भांति अधीर, चञ्चल.

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