गोदान (भाग 1)

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सेमरी और बेलारी दोनों अवध प्रांत के गाँव हैं. जिले का नाम बताने की कोई जरूरत
नहीं. होरी बेलारी में रहता है,रायसाहब अमरपाल सिंह सेमरी में. दोनों गावों में
केवल पांच मील का अन्तर है.पिछले सत्याग्रह-संग्राम में रायसाहब ने बड़ा यश कमाया
था. कौंसिल की मेम्बरी छोड़कर जेल चले गये थे. तब से उनके इलाके के असामियों को
उनसे बड़ी श्रद्धा हो गई थी. यह नहीं कि उनके इलाके में असामियों के साथ कोई खास
रियायत की जाती हो या डांड़ और बेगार की कड़ाई कुछ कम हो,मगर यह सारी बदनामी
मुख्तारों के सिर जाती.राय साहब की कीर्ति पर कोई कलंक न लग सकता था.वह बेचारे भी
तो उसी व्यवस्था के गुलाम थे. जाब्ते का काम तो जैसे होता चला आया है,वैसा ही होगा,
रायसाहब की सज्जनता उस पर कोई असर न डाल सकती थी, इसलिए आमदनी और अधिकार
में जौ-भर की भी कमी न होने पर भी उनका यश मानो बढ़ गया था. असामियों से वह हँसकर
बोल लेते थे, यही क्या कम है? सिंह का काम तो शिकार करना है. अगर वह गरजने और
गुर्राने के बदले मीठी बोली बोल सकता,तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता. शिकार
की खोज में जंगल में न भटकना पड़ता.
रायसाहब राष्टृवादी होने पर भी हुक्काम से मेल-जोल बनाये रखते थे, उनकी नजरें और
डालियाँ और कर्मचारियों की दस्तूरियां जैसी की तैसी चली आती थीं. साहित्य-संगीत के
प्रेमी थे,ड्रामा के शौकीन,अच्छे वक्ता थे, अच्छे लेखक,अच्छे निशानेबाज़.उनकी पत्नि
को मरे आज दस साल हो चुके थे ! मगर दूसरी शादी न की थी। हँस-बोलकर अपने विधुर जीवन को बहलाते थे।

होरी ड्योढ़ी पर पहुँचा तो देखा, जेठ के दशहरे के अवसर पर होनेवाले धनुष यज्ञ की बड़ी जोरों से तैयारियाँ हो रही हैं ; कहीं रंग-मंच बन रहा था, कहीं मंडप, कहीं मेहमानों का आतिथ्यगृह, कहीं दूकानदारों के लिए दुकानें। धूप तेज हो गई थी ; पर राय साहब खुद काम में लगे हुए थे। अपने पिता से सम्पत्ति के साथ-साथ उन्होंने राम की भक्ति भी पाई थी और धनुष-यज्ञ को नाटक का रूप देकर उसे शिष्ट मनोरंजन का साधन बना दिया था। इस अवसर पर उनके यार-दोस्त, हाकिम-हुक्काम सभी निमन्त्रित होते थे। और दो-तीन दिन इलाके में बड़ी चहल-पहल रहती थी। राय साहब का परिवार बहुत विशाल था। कोई डेढ़ सौ सरदार एक साथ भोजन करते थे। कई चचा थे। दरजनों चचेरे भाई, कई सगे भाई, बीसियों नाते के भाई। एक चचा साहब राधा के अनन्य उपासक थे और बराबर वृंन्दावन में रहते थे। भक्ति-रस के कितने ही कवित्त रच डाले थे और समय-समय पर उन्हें छपवाकर दोस्तों की भेंट कर देते थे। एक दूसरे चचा था, जो राम के परम भक्त थे और फारसी भाषा में रामायण का अनुवाद कर रहे थे। रियासत से सबके वसीके बँधे हुए थे। किसी को कोई काम करने की जरूरत न थी।

होरी मंडप में खड़ा सोच रहा था कि अपने आने की सूचना कैसे दे कि सहसा रायसाहब उधर ही आ निकले और उसे देखते ही बोले-अरे ! तू आ गया होरी, मैं तो तुझे बुलानेवाला था। देख, अबकी तुझे राजा जनक का माली बनना पड़ेगा। समझ गया न, जिस वक्त श्री जानकी जी मन्दिर में पूजा करने जाती हैं, उसी वक्त तू एक गुलदस्ता लिए खड़ा रहेगा और जानकीजी को भेंट करेगा, गलती न करना देख, असामियों से ताकीद करके कह देना कि सब-के-सब शगुन करने आएँ। मेरे साथ कोठी में आ, तुझसे कुछ बातें करनी हैं।

वह आगे-आगे कोठी की ओऱ चले, होरी पीछे-पीछे चला। वहीं एक घने वृक्ष की छाया में एक कुर्सी पर बैठ गये और होरी को जमीन पर बैठने का इशारा करके बोले-समझ गया, मैंने क्या कहा। कारकुन को तो जो कुछ करना है, वह करेगा ही ; लेकिन असामी जितने मन से असामी की बात सुनता है, कारकुन नहीं सुनता। हमें इन्हीं पाँच-सात दिनों में बीस हजार का प्रबन्ध करना है। कैसे होगा, समझ में नहीं आता। तुम सोचते होगे, मुझ टके के आदमी से मालिक क्यों अपना दुखड़ा ले बैठे। किससे अपने मन की कहूँ ? न जाने क्यों, तुम्हारे ऊपर विश्वास होता है। इतना जानता हूँ कि तुम मन में मुझ पर हँसोगे नहीं। और हँसो भी, तो तुम्हारी हँसी मैं बरदाश्त कर सकूँगा। नहीं सह सकता उनकी हँसी, जो अपने बराबर के हैं, क्योंकि उनकी हँसी में ईर्ष्या, व्यंग और जलन है। औऱ वे क्यों न हँसगे ? मैं भी तो उनकी दुर्दशा और विपत्ति और पतन पर हँसता हूँ, दिल खोलकर, तालियाँ बजाकर। सम्पत्ति सह्रदयता में बैर है।

हम भी दान देते हैं, धर्म करते हैं। लेकिन जानते हो ? क्यों ? केवल अपने बराबरवालों को नीचा दिखाने के लिए। हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है, विशुद्ध अहंकार। हममें से किसी पर डिग्री हो जाए, कुर्की आ जाए, बकाया मालगुजारी की इल्लत में हवालात हो जाए, किसी का जवान बेटा मर जाए, किसी की विधवा बहू निकल जाए, किसी के घर में आग लग जाए, कोई वैश्या के हाथों उल्लू बन जाए, या अपने असामियों के हाथों पिट जाए, तो उसके और सभी भाई उस पर हँसेंगे, बगलें बजाएँगे, मानो सारे संसार की सम्पदा मिल गई है। और मिलेंगे तो इतने प्रेम से, जैसे हमारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार हैं। अरे, और तो औऱ, हमारे चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई जो इसी रियासत की बदौलत मौज उड़ा रहे हैं, कविता कर कर रहे हैं और जुए खेल रहे हैं, शराब पी रहे हैं और ऐयाशी कर रहे हैं, वह भी मुझसे जलते हैं, आज मर जाऊं तो घी के चिराग जलाएँ। मेरे दुःख को दुःख समझने वाला कोई नहीं। उनकी नजरों में मुझे दुखी होने का कोई अधिकार ही नहीं है। मैं अगर होता हूँ, तो दुःख की हँसी उड़ाता हूँ। अगर मैं बीमार होता हूँ, तो मुझे सुख होता है। मैं अगर अफना ब्याह करके घर में कलह नहीं बढ़ाता, तो यह
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मेरी नीच स्वार्थपरता है, अगर ब्याह कर लूं, तो यह विलासान्धता होगी. अगर शराब नहीं
पीता,तो मेरी कंजूसी है.शराब पीने लगूं,तो वह प्रजा का रक्त होगा. अगर ऐयाशी नहीं
करता, तो अरसिक हूँ, ऐयाशी करने लगूं, तो फिर कहने ही क्या!इन लोगों ने मूझे भोग-
विलास में फँसाने के लिये कम चालें नहीं चली और अब तक चलते जाते हैं. उनकी यही
इच्छा है कि मैं अंधा हो जाऊँ, और ये लोग मुझे लूट लें, और मेरा धर्म यह है कि सब
कुछ देखकर भी कुछ न देखूं. सब कुछ जानकर भी गधा बना रहूँ.
रायसाहब ने गाड़ी को आगे बढ़ने के लिये दो बीड़े पान खाये और होरी के मुंह की ओर
ताकने लगे, जैसे उसके मनो भावों को पढ़ना चाहते हों.
होरी ने साहस बटोरकर कहा-हम समझते थे कि ऐसी बातें हमीं लोगों में होती है,पर जान
पड़ता है,बड़े आदमियों में भी उनकी कमी नहीं है.
रायसाहब ने मुँह पान से भरकर कहा-तुम हमें बढ़ा आदमी समझते हो? हमारे नाम बड़े हैं,
पर दर्शन थोड़े. गरीबों में अगर ईर्ष्या या वैर है, तो स्वार्थ के लिये या पेट के
लिए. ऐसी ईर्ष्या और वैर को में क्षम्य समझता हूँ. हमारे मुँह की रोटी कोई छीन ले,
तो उसके गले में उंगली डालकर निकालना हमारा धर्म हो जाता है. अगर हम छोड़ दें,
तो देवता हैं. बड़े आदमियों की ईर्ष्या और वैर केवल आनन्द के लिए है.
हम इतने बड़े आदमी हो गये हैं कि हमें नीचता और कुटिलता मे ही निःस्वार्थता और परम
आनन्द मिलता है.हम देवतापन के उस दर्जे पर पहुंच गए हैं, जब हमें दूसरों के रोने पर
हंसी आती है. इसे तुम छोटी साधना मत समझो. जब इतना बड़ा कुटुम्ब है, तो कोई-
न-कोई तो हमेशा बीमार तो रहेगा ही. और बड़े आदमियों को रोग भी होते हैं.वह बड़ा
आदमी ही क्या जिसे कोई छोटा रोग हो.मामूली ज्वर भी आ जाये, तो हमें सरसाम की दवा दी
जाती है,मामूली फुंसी भी निकल आये,तो वह ज़हरबाद बन जाती है. अब छोटे
सर्जन और मझोले सर्जन और बड़े सर्जन तार मे बुलाये जा रहें हैं,मसीहुलमुल्क को लाने
के लिए दिल्ली आदमी भेजा जा रहा है, भिषगाचार्य को लाने के लिए कलकत्ता.उधर देवालय
में दुर्गापाठ हो रहा है और ज्योतिषाचार्य कुण्डली का विचार कर रहें हैं और तंन्त्र
के आचार्य अपने अनुष्ठान में लगे हुए हैं. राजासाहब को यमराज के मुंह से निकालने
के लिए दौड़ लगी हुई है. वैद्य और डाक्टर इस ताक में रहते हैं कि कब इनके सिर में
दर्द हो और कब उनके घर में सोने की वर्षा हो. और ये रुपया तुमसे और तुम्हारे भाइयों
से वसूल किये जाते हैं, भाले की नोक पर. मुझे तो यही आश्चर्य होता है कि क्यों
तुम्हारी आहों का दावानल हमें भस्म नहीं कर डालता, मगर नहीं, आश्चर्य करने की कोई
बात नहीं,भस्म होने में तो बहुत देर नहीं लगती,वेदना भी थोड़ी ही देर की होती है.हम
जौ-जौ और पोर-पोर भस्म हो रहे हैं. उस हाहाकार से बचने के लिये हम पुलिस की,
हुक्काम की,अदालत की, वकीलों की शरण लेते हैं और रूपवती स्त्री की भांति सभी के
हाथों का खिलौना बनते हैं. दुनिया समझती है, हम बड़े सुखी हैं,हमारे पास इलाके, महल
सवारियां, नौकर चाकर, कर्ज ,वैश्याएं,क्या नहीं है, लेकिन जिसकी आत्मा में बल नहीं
अभिमान नहीं, वह और चाहे कुछ हो, आदमी नहीं है, जिसे दुश्मन के भय के मारे रात
को नींद न आती हो,जिसके दुःख पर सब हँसे और रोने वाला कोई न हो, जिसकी चोटी
दूसरों के पैरों के नीचे दबी हो,जो भोग-विलास के नशे में अपने को बिलकुल भूल गया
हो,जो हुक्काम के तलवे चाटता हो और अपने अधीनों का खून चूसता हो, उसे मैं सुखी
नहीं कहता. वह तो संसार का सबसे अभागा प्राणी है साहब शिकार खेलने आयें या दौरे
पर, मेरा कर्तव्य है कि उनकी दुम के पीछे लगा रहूँ. उनकी भौहों पर शिकन पड़ी और
हमारे प्राण सूखे. उन्हें प्रसन्न करने के लिये हम क्या नहीं करते? मगर वह पचड़ा
सुनाने लगूं, तो शायद तुम्हें विश्वास न आये. डालियों और रिश्वतों तक तो खैर गनीमत
है,हम सिजदे करने को भी तैयार रहते हैं. मुफ्तखोरी ने हमें अपंग बना दिया है,
हमें अपने पुरुषार्थ पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं, केवल अफसरों के सामने दुम
हिला-हिलाकर किसी तरह उनके कृपापात्र बने रहना और उनकी सहायता से अपनी प्रजा पर
आतंक जमाना ही हमारा उद्यम है. पिछलग्गुओं की खुशामद ने हमें इतना अभिमानी और
तुनकमिजाज बना दिया है कि हममें शील, विनय और सेवा का लोप हो गया है. मैं तो कभी-
कभी सोचता हूं कि अगर सरकार हमारे इलाके छीनकर हमें अपनी रोजी के लिए मेहनत करना
सिखा दे, तो हमारे साथ महान् उपकार करे, और यह तो निश्चय है कि अब सरकार भी हमारी
रक्षा न करेगी. हमसे अब उसका कोई स्वार्थ नहीं निकलता. लक्षण कह रहें हैं कि बहुत
जल्द हमारे वर्ग की हस्ती मिट जाने वाली है. मैं उस दिन का स्वागत करने को तैयार
बैठा हूँ. ईश्वर वह दिन जल्द लाये. वह हमारे उद्धार का दिन होगा. हम परिस्थितियों
के शिकार बने हुए हैं. यह परिस्थिति ही हमारा सर्वनाश कर रही है. और जब तक
सम्पत्ति की यह बेड़ी हमारे पैरों से न निकलेगी, जब तक यह अभिशाप हमारे सिर पर
मंडराता रहेगा, हम मानवता का वह पद न पा सकेंगे, जिस पर पहुँचना ही जीवन का अन्तिम
लक्ष्य है.
रायसाहब ने फिर गिलौरीदान निकाला और कई गिलौरियां निकालकर मुंह में भर लीं. कुछ और
कहने वाले थे कि एक चपरासी ने आकर कहा सरकार, बेगारों ने काम करने से इन्कार कर
दिया है, कहते हैं,जब तक हमें खाने को न मिलेगा, हम काम न करेंगे.हमने धमकाया,तो
सब काम छोड़कर अलग हो गये.
राय साहब के माथे पर बल पड़ गये. आंखें निकाल कर बोले-चलो, मैं इन दुष्टों को ठीक
करता हूं. जब कभी खाने को नहीं दिया, तो आज यह नयी बात क्यों? एक आने रोज
के हिसाब से मजूरी मिलेगी,जो हमेशा मिलती रही है, और इस मजूरी पर उन्हें काम करना
होगा, सीधे करें या टेढ़े.
फिर होरी की ओर देख कर बोले-तुम अब जाओ होरी, अपनी तैयारी करो. जो बात मैंने कही है
है, उसका खयाल रखना. तुम्हारे गांव से मुझे कम-से-कम पांच सौ की आशा है.
रायसाहब झल्लाते हुए चले गये. होरी ने मनमें सोचा, अभी यह कैसी-कैसी नीति और धरम
की बातें कर रहे थे और एकाएक इतने गरम हो गये
सूर्य सिर पर आ गया था. उसके तेज से अभिभूत होकर वृक्षों ने अपना पसार समेट लिया.
आकाश पर मटियाली गर्द छायी हुई थी और सामने की पृथ्वी कांपती हुई जान पड़ती थी.
होरी ने अपना डण्डा उठाया और घर चला. शगुन के रुपये कहां से आयेंगे, यही चिन्ता
उसके सिर पर सवार थी.

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