गोदान (भाग 1)

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रायसाहब को खबर मिली कि इलाके में एक वारदात हो गयी है और होरी के गांव के पंचों ने
जुर्माना वसूल कर लिया है, तो फौरन नोखेराम को बुलाकर जवाब-तलब किया- क्यों उन्हें
इसकी इत्तला नहीं दी गयी? ऐसे नमकहराम दगाबाज आदमी के लिए उनके दरबार में जगह नहीं
है.नोखेराम ने इतनी गालियां खायीं, तो जरा गरम होकर बोले- मैं अकेला थोड़ा ही था.
गांव के और पञ्च भी तो थे. मैं अकेला क्या कर लेता?
रायसाहब ने उनकी तोंद की तरफ भाले जैसी नुकीली दृष्टि से देखा- मत बको जी! तुम्हें
उसी वक्त कहना चाहिए था. जब तक सरकार को इत्तला न हो जाये, मैं पञ्चों को जुर्माना
न वसूल करने दूंगा. पञ्चों को मेरे और मेरी रिआया के बीच में दखल देने का हक क्या
है? इस डांड-बांध के सिवा इलाके मै और कौन-सी आमदनी है? वसूली सरकार के घर गयी.
बकाया असामियों ने दबा लिया. तब मैं कहां जाऊं? क्या खाऊं, तुम्हारा सिर? यह लाखों
रुपये साल का खर्च कहां से आये? खेद है कि दो पुश्तों से कारिन्दगीरी करने पर मुझे
आज तुम्हें यह बात बतलानी पड़ती है. कितने रुपये वसूल हुए थे होरी से?
नोखेराम ने सिटपिटाकर कहा-अस्सी रुपये.
`नकद.’
`नकद उसके पास कहां थे हुजूर? कुछ अनाज दिया, बाकी में अपना घर लिख दिया.’
रायसाहब ने स्वार्थ का पक्ष छोड़कर होरी का पक्ष लिया-अच्छा, तो आपने और बगुलाभगत
पञ्चों ने मिलकर मेरे एक मातबर असामी को तबाह कर दिया मैं पूछता हूं, तुम लोगों को
क्या हक था कि मेरे इलाके में मुझे इत्तिला दिये बगैर मेरे असामी से जुर्माना वसूल
करते? इसी बात पर अगर मैं चाहूं, तो आपको, उस जालिम पटवारी और उस धूर्त पण्डित को
सात-साल के लिए जेल भिजवा सकता हूं. आपने समझ लिया कि आप ही इलाके के बादशाह हैं?
मैं कहे देता हूं, आज शाम तक जुर्माने की पूरी रकम मेरे पास पहुंच जाये, वरना बुरा
होगा.मैं एक एक से चक्की पिसवाकर छोड़ूंगा. जाइये, हां, होरी को और उसके लड़के को
मेरे पास भेज दीजियेगा.
नोखेराम ने दबी जबान से कहा- उसका लड़का तो गांव छोड़कर भाग गया. जिस रात कि यह
वारदात हुई, उसी रात को भागा.
रायसाहब ने रोष से कहा- झूठ मत बोलो. तुम्हे मालूम है, झूठ से मेरे बदन में आग लग
जाती है. मैंने आज तक कभी नहीं सुना कि कोई युवक अपनी प्रेमिका को उसके घर से लाकर
फिर खुद भाग जाये. अगर उसे भागना ही होता, तो वह उस लड़की को लाता क्यों? तुम लोगौं
की इसमें भी कोई शरारत है. तुम गंगा मैं डूबकर भी अपनी सफाई दो, तो मानने का नहीं.
तुम लोगों ने अपने समाज की प्यारी मर्यादा की रक्षा के लिए उसे धमकाया होगा. बेचारा
भाग न जाता, तो क्या करता?
नोखेराम इसका प्रतिवाद न कर सके. मालिक जो कुछ कहें, वह ठीक है. वह यह भी न कह
सके कि आप खुद चलकर झूठ-सच की जांच कर लें. बड़े आदमियों का क्रोध पूरा समर्पण
चाहता है. अपने खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुन सकता.
पञ्चों ने रायसाहब का यह फैसला सुना, तो नशा हिरन हो गया. अनाज तो अभी तक ज्यों- का
त्यों पड़ा था, पर रुपये तो कब के गायब हो गये. होरी का मकान रेहन लिखा गया था, पर
उस मकान को देहात मैं कौन पूछता था? जैसे हिन्दू स्त्री पति के साथ घर की स्वामिनी
है, और पति त्याग दे, तो कहीं की नहीं रहती, उसी तरह यह घर होरी के लिये लाख रुपये
का है, पर उसखी असली कीमत कुछ भी नहीं. और इधर रायसाहब बिना रुपये लिये मानने के
नहीं. यही होरी जाकर रो आया होगा. पटेश्वरी लाल सबसे ज्यादा भयभीत थे उनकी तो नौकरी
ही चली जायेगी. चारों सज्जन इस गहन समस्या पर विचार कर रहे थे, पर किसी की अक्ल काम
न करती थी एक दूसरे पर दोष रखता था. फिर खूब झगड़ा हुआ.
पटेश्वरी ने अपनी लम्बी संकाशील गर्दन हिलाकर कहा- मैं मना करता था कि होरी के विषय
में हमें चुप्पी साधकर रह जाना चाहिए. गाय के मामले में सबको तावान देना पड़ा.इस
मामले में तावान ही से गला न छुटेगा, नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा, मगर तुम लोगों को
रुपये की पड़ी थी निकालो बीस-बीस रुपये. अब भी कुशल है. कहीं रायसाहब ने रपट करदी,
तो सब जने बंध जाओगे.
दातादीन ने ब्रह्मतेज दिखाकर कहा-मेरे पास बीस रुपये की जगह बीस पैसे भी नहीं हैं.
ब्राह्मणों को भोज दिया गया, होम हुआ. क्या इसमें कुछ खरच ही नहीं हुआ? रायसाहब
की हिम्मत है कि मुझे जेल ले जायें? ब्रह्म बनकर घर-का घर मिटा दूंगा. अभी उन्हें
किसी ब्राह्मण से पाला नहीं पड़ा
झिंगुरीसिंह ने भी कुछ इसी आशय के शब्द कहे. वह रायसाहब जे नौकर नहीं हैं.उन्होंने
होरी को मारा नहीं, पीटा नहीं, कोई दवाब नहीं डाला. होरी अगर प्रायश्चित करना चाहता
था, तो उन्होंने इसका अवसर दिया. इसके लिए कोई उन पर अपषाध नहीं लगा सकता, मगर
नोखेराम की गर्दन इतनी आसानी से न छूट सकती थी. यहां मजे से बैठे राज करते थे. वेतन
तो दस रुपये से ज्यादा न था, पर एक हजार साल की ऊपर की आमदनी थी, सैकड़ों आदमियों
पर हुकूमत,चार-चार प्यादे हाजिर. बेगार में सारा काम हो जाता था.थानेदार तक कुरसी
देते थे, यह चैन उन्हें और कहां था? और पटेश्वरी तो नौकरी के बदौलत महाजन बने हुए
थे. कहां जा सकतै थे? दो तीन दिन इसी चिन्ता में पड़े रहे कि इस विपत्ति से निकलें.
आखिर उन्हें एक मार्ग सूझ ही गया. कभी-कभी कचहरी में उन्हें `बिजली’ देखने को मिल
जाती थी.यदि एक गुमनाम पत्र उसके सम्पादक की सेवा में भेज दिया जाये कि रायसाहब किस
तरह असामियों से जुर्माना वसूल करते हैं, तो बच्चा को लेने के देने पड़ जायें.
नोखेराम भी सहमत हो गये. दोनों ने मिलकर किसी तरह एक पत्र लिखा और रजिस्ट्री से
भेज दिया.
सम्पादक ओंकारनाथ तो ऐसे पत्रों की ताक में रहतै थे. पत्र पाते ही तुरन्त रायसाहब
को सूचना दी. उन्हे एक ऐसा समाचार मिला है, जिसपर विश्वास करने की उनकी इच्छा
नहीं होती, पर संवाददाता ने ऐसे प्रमाण दिये हैं कि सहसा अविश्वास नहीं किया जा
सकता. क्या यह सच है कि रायसाहब ने अपने इलाके के एक असामी से अस्सी रुपये तावान इस
लिए वसूल किये कि उसके पुत्र ने एक विधवा को घर में डाल लिया था?सम्पादक का कर्तव्य
उन्हें मजबूर करता है कि वह मुआमले की जांच करें और जनता के हितार्थ उसे प्रकाशित
कर दें.रायसाहब इस विषय में जो कुछ कहना चाहें,सम्पादकजी उसे भी प्रकाशित कर देंगे.
सम्पादकजी दिल से चाहते हैं कि वह खबर गलत हो, लेकिन उसमें कुछ भी सत्य हुआ
तो वह उसे प्रकाश में लाने के लिए विवश हो जायेंगे. मैत्री उन्हें कर्तव्य-पथ से
नहीं हटा सकती.
यायसाहब ने यह सूचना पायी, तो सिर पीट लिया. पहले तो उनको ऐसी उत्तेजना हुई कि जाकर
ओंकारनाथ को गिनकर पचास हण्टर जमाये और कह दे जहां पर पत्र छापना, वहां यह समाचार
भी छाप देना, लेकिन उसका परिणाम सोचकर मन को शान्त किया और तुरन्त उनसे मिलने चले
अगर देर की और ओंकारनाथ ने वह संवाद छाप दिया, तो उनके सारे यश में कालिमा पुत
जायगी. ओंकारनाथ सैर करके लौटे थे और आज के पत्र के लिए सम्पादकीय लेख लिखने की
चिन्ता में बैठे हुए थे, पर मन पक्षी की भांति अभी उड़ा-उड़ा फिरता था. उनकी धर्म
पत्नी ने रात में उन्हें कुछ ऐसी बातें कह डाली थीं, जो अभी तक कांटों की तरेह चुभ
रही थीं.उन्हें कोई दरिद्र कह ले, अभागा कह ले, , बुद्धू कह ले, वह जरा भी बुरा न
मानते थे, लेकिन यह कहना कि उनमें पुरुषत्व नहीं है, यह उनके लिए असह्य था. और फिर
अपनी पत्नी को यह कहने का क्या हक है? उससे तो यह आशा की जाती है कि कोई इस तरह का
आक्षेप करे, तो उसका मुंह बन्द कर दे. बेशक वह ऐसी खबरें नहीं छापते, ऐसी
टिप्पणियां नहीं करते कि सिर पर कोई आफत आ जाये. फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं. इन
काले कानूनों के युग में वह और कर ही क्या सकते हैं, मगर वह क्यों सांप के बिल में
हाथ नहीं डालते? इसलिए तो कि उनके घरवालों को कष्ट न उठाने पड़े. और उनकी सहिष्णुता
का उन्हें यह पुरस्कार मिल रहा है? अन्धेर है. उनके पास रुपये नहीं है, तो बनारसी
साड़ी कैसे मंगा दें? डाक्टर, सेठ और प्रोफेसर भाटिया और न जाने किस-किस की
स्त्रियां बनारसी साड़ी पहनती हैं, तो क्या करें? क्यों उनकी पत्नी इन साड़ीवालियों
को अपनी खद्दर की साड़ी से लज्जित नहीं करती?उनकी खुद तो आदत है कि किसी बड़े
आदमी से मिलने जाते हैं,तो मोटे कपड़े पहन लेते हैं और कोई कुछ आलोचना करें,तो उसका
मुंह तोड़ जवाब देने को तैयार रहते हैं.उनकी पत्नी में क्यों वही आत्माभिमान नहीं
हैं?वह क्यों दूसरों का ठाठ-बाट देखकर विचलित हो जाती है? उसे समझना चाहिए कि वह
देश-भक्त पुरूष की पत्नी है. देश-भक्त के पास अपनी भक्ति के सिवा और क्या सम्पत्ति
है? इसी विषय को आज के अग्रलेख का विषय बनाने की कल्पना करते-करते उनका ध्यान
रायसाहब के मुआमले की ओर जा पहुंचा. रायसाहब सूचना का क्या उत्तर देते हैं, यह
देखना है. अगर वह अपनी सफाई देने में सफल हो जाते हैं, तब तो कोई बात नहीं,
लेकिन अगर वह यह सनझें कि ओंकारनाथ दबाव, भय या मुलाहजे में आकर अपने कर्तव्य
से मुंह फेर लेंगे तो यह उनका भ्रम है.इस सारे तप और साधना का पुरस्कार उन्हें इसके
सिवा और क्या मिलता है कि अवसर पड़ने पर वह कानूनी डकैतों का भण्डाफोड़ करें.उन्हें
खूब मालूम है कि रायसाहब बड़े प्रभाव शाली जीव हैं. कौंसिल के मेम्बर तो हैं ही.
अधिकारियों में भी उनका काफी रुसूख है. वह चाहे, तो उन पर झूठे मुकदमे चलवा
सकते हैं, अपने गुण्डों से राह चलते पिटवा सकते हैं,लेकिन ओंकार इन बातों से नहीं
डरता. जब तक उसकी देह में प्राण हैं, वह आततायियों की खबर लेता रहेगा.
सहसा मोटरकार की आवाज सुनकर वह चौंके. तुरन्त कागज लेकर अपना लेख आरम्भ कर दिया.
और एक ही क्षण में रायसाहब ने उनके कमरे में कदम रखा.
ओंकारनाथ ने न उनका स्वागत किया, न कुशल-क्षेम पूछा, न कुरसी दी. उन्हे इस तरह देखा
मानों कोई मुलजिम उनकी अदालत में आया हो और रोब से मिले हुए स्वर में पूछा- आपको
मेरा पुरजा मिल गया था? मैं वह पत्र लिखने के लिए बाध्य नहीं था, मेरा कर्तव्य यह
था कि स्वयं उसकी तहकीकात करता, लेकिन मुरोवत में सिद्धान्तों की कुछ -न- कुछ हत्या
करनी पड़ती है. क्या उस संवाद में कुछ सत्य है.
रायसाहब उसका सत्य होना अस्वीकार न कर सके. हालांकि अभी तक उन्हें जुर्माने के
रुपये नहीं मिले थे और वह उनके पाने से साफ इन्कार कर सकते थे, लेकिन वह देखना
चाहते थे कि यह महाशय किस पहलू पर चलते हैं.
ओंकारनाथ ने खेद प्रकट करते हुए कहा-तब तो मेरे लिए उस संवाद को प्रकाशित करने के
सिवा और कोई मार्ग नहीं है. मुझे इसका दुःख है कि मुझे अपने एक परम हितेषी मित्र की
आलोचना करनी पड़ रही है, लेकिन कर्तव्य के आगे व्यक्ति कोई चीज नहीं. सम्पादक अगर
अपना कर्तव्य न पूरा कर सके, तो उसे इस आसन पर बैठने का कोई हक नहीं है.
रायसाहब कुरसी पर डट गये और पान की गिलोरिया मुंह में भरकर बोले-लेकिन यह आपके हक
में अच्छा न होगा. मुझे जो कुछ होना है, पीछे होगा, आपको तत्काल दण्ड मिल जायगा.
अगर आप मित्रों की परवाह नहीं करते, तो मैं भी उसी कैंडे का आदमी हूं.
ओंकारनाथ ने शहीद का गौरव धारण करके कहा इसका तो मुझे कभी भय नहीं हुआ. जिस
दिन मैंने पत्र-संपादक का भार लिया,उसी दिन प्राणौं का मोह छोड़ दिया, और मेरे समीप
एक सम्पादक की सबसे शानदार मौत यही है कि वह न्याय और सत्य की रक्षा करता हुआ अपना
बलिदान कर दे.
अच्छी बात है.मैं आपकी चुनौती स्वीकार करता हूं मैं अब तक आपको मित्र समझता आया था.
मगर अब आप लड़ने ही पर तैयार हैं, तो लड़ाई ही सही. आखिर मैं आपके पत्र का पञ्चगुना
चन्दा क्यों देता हूं? केवल इसलिए कि वह मेरा गुलाम बना रहे. मुझे परमात्मा ने रईस
बनाया है. पचहत्तर रुपया देता हूं, इसलिए कि आपका मुंह बन्द रहे. जब आप घाटे का
रोना रोते हैं और सहायता की अपील करते हैं, और ऐसी शायद ही कोई तिमाही जाती हो, जब
आपकी अपील न निकलती हो, तो मैं ऐसे मौके पर आपकी कुछ-न-कुछ मदद कर देता हूं.
किसलिए? दीपावली, दशहरा, होली में आपके यहां बैना भेजता हूं, और साल में पच्चीस बार
आपकी दावत करता हूं, किसलिए? आप रिश्वत और कर्तव्य दोनों साथ-साथ नहीं निभा सकते.’
ओंकारनाथ उत्तेजित होकर बोले- मैंने कभी रिश्वत नहीं ली. रायसाहब ने फटकारा-अगर यह
व्यवहार रिश्वत नहीं है, तो रिश्वत क्या है, जरा मुझे समझा दीजिये? क्या आप समझते
हैं, आपको छोड़कर और सभी गधे हैं, जो निःस्वार्थ-भाव से आपका घाटा पूरा करते हैं?
निकालिये अपनी बही और बतलाइये, अब तक आपको मेरी रियासत से कितना मिल चुका है?
मुझे विश्वास है हजारों की रकम निकलेगी. अगर आपको स्वदेशी-स्वदेशी चिल्लाकर विदेशी
दवाओं और वस्तुओं का विज्ञापन छापने में शरम नहीं आती, तो मै अपने असामियों से
डांड़, तावान और जुर्माना लेते क्यों शरमाऊं? यह न समझिये कि आप ही किसानों के हित
का बीड़ा उठाये हुए हैं. मुझे किसानों के साथ जलना-मरना है, मुझसे बढ़कर दूसरा उनका
हितेच्छु नहीं हो सकता, लेकिन मेरी गुजर कैसे हो? अफसरों को दावतें कैसे दूं,
सरकारी चन्दे कहां से दूं,खानदान के सैकड़ों आदमियों की जरूरतें कैसे पूरी करूं?
मेरे घर का क्या खर्च है, यह शायद आप जानते हैं.तो क्या मेरे घर में रुपये फलते हैं
आयेगा, तो असामियों ही के घर से. आप समझते होंगे, जमींदार और ताल्लुकेदार सारे
संसार का सुख भोग रहे हैं. उनकी असली हालत का आपको ज्ञान नहीं. अगर वह धर्मात्मा
बनकर रहें, तो उनका जिन्दा रहना मुश्किल हो जाये. अफसरों को डालियां न दे, तो जेल
खाना घर हो जाये. हम बिच्छू नहीं है कि अनायास ही सबको डंक मारते फिरें. न गरीबों
का गला दबाना कोई बड़े आनन्द का काम है, लेकिन मर्यादाओं का पालन तो करना ही पड़ता
है. जिस तरह आप मेरी रईसी का फायदा उठाना चाहते हैं, उसी तरह और सभी हमें सोने की
मुर्गी समझते हैं. आइये मेरे बंगले पर, तो दिखाऊं कि सुबह से शाम तक कितने निशाने
मुझ पर पड़ते हैं. कोई काश्मीर से शाल-दुशाला लिये चला आ रहा है, कोई इत्र और
तम्बाकूं का एजेन्ट है, कोई पुस्तकों और पत्रिकाओं का, कोई जीवन-बीमा का, कोई
ग्रामोफोन लिये सिर पर सवार है, कोई कुछ. चन्दे वाले तो अनगिनती. क्या सबके सामने
अपना दुखड़ा लेकर बैठ जाऊं?ये लोग मेरे द्वार पर दुखड़ा सुनाने आते हैं. आते हैं
मुझे उल्लू बनाकर मुझसे कुछ ऐंठने के लिए. आज मर्यादा का विचार छोड़ दूं, तो
तालियां पिटने लगें. हुक्काम को डालियां न दूं तो बागी समझा जाऊं. तब आप अपने
लेखों से मेरी रक्षा न करेंगे. कांग्रेस मे शरीक हुआ, उसका तावान अभी तक देता जाता
हूं. काली किताब में दर्ज हो गया. मेरे सिर पर कितना कर्ज है, यह भी कभी आपने पूछा
है?अगर सभी महाजन डिग्रियां करा लें, तो मेरे हाथ की यह अंगूठी तक बिक जायेगी आप
कहेंगे, क्यों यह आडम्बर पालते हो? कहिये, सात पुश्तों से वातावरण में पला हूं,उससे
उससे अब निकल नहीं सकता. घास छीलना मेरे लिए असंभव है. आपके पास जमीन नहीं, जायदाद
नहीं, मर्यादा का झमेला नहीं, आप निर्भीक हो सकते हैं, लेकिन आप भी दुम दबाये बैठे
रहते हैं. आपको कुछ खबर है, अदालतों में कितनी रिश्वतें चल रही है, कितने गरीबों का
खून हो रहा है, कितनी देवियां भ्रष्ट हो रही है?है बूता लिखने का? सामग्री मैं देता
हूं, प्रमाण सहित.
ओंकारनाथ कुछ नरम होकर बोले-जब कभी अवसर आया है, मैंने कदम पीछे नहीं हटाया
रायसाहब भी कुछ नरम हुए-हां ,मैं स्वीकार करता हूं कि दो-एक मौकों पर आपने जवां
मर्दी दिखायी है,लेकिन आपकी निगाह हमेशा अपने लाभ की ओर रही है,प्रजाहित की ओर
नहीं. आंखें न निकालिये और न मुंह लाल कीजिये. जब कभी आप मैदान में आये हैं, उसका
शुभ परिणाम यही हुआ कि आपके सम्मान और प्रभाव और आमदनी में इजाफा हुआ है. अगर मेरे
साथ भी आप भी आप वही चाल चल रहें हों, तो आपकी खातिर करने को तैयार हूं. रुपये न
दूंगा, क्योंकि वह रिश्वत है आपकी पत्नीजी के लिए कोई आभूषण बनवा दूंगा. है मंजूर?
अब मैं आप से सत्य कहता हूं कि आपको जो संवाद मिला, वह गलत है,मगर यह भी कह देना
चाहता हूं कि अपने और सभी भाइयों की तरह मैं भी असामियों से जुर्माना लेता हूं, और
साल में दस पांच हजार रुपये मेरे हाथ लग जाते है, और अगर आप मेरे मुंह से यह कौर
छीनना चाहेंगे, तो आप घाटे में रहेंगे. आप भी संसार में सुख से रहना चाहते हैं,मैं
भी चाहता हूं. इससे क्या फायदा कि आप न्याय और कर्तव्य का ढोंग रचकर मुझे भी जेरबार
करें, खुद भी जेरबार हों. दिल की बात कहिये. मैं आपका बैरी नहीं हूं आपके साथ कितनी
ही बार एक चौके में, एक मेच पर खा चुका हूं. मैं यह भी जानता हूं कि आप तकलीफ में
हैं. आपकी हालत शायद मेरी हालत से भी खराब है. हां, अगर आपने हरीश्चन्द्र बनने की
कसम खाली है, तो आपकी खुशी. मैं चलता हूं.
रायसाहब कुर्सी से उठ खड़े हुए.ओंकारनाथ ने उनका हाथ पकड़ कर सन्धिभाव से कहा- नहीं
नहीं, अभी आपको बैठना पड़ेगा. मैं अपनी पोजीशन साफ कर देना चाहता हूं. आपने मेरे
साथ जो सलूक किये हैं उनके लिए मैं आपका आभारी हूं, लेकिन यहां सिद्धान्त की बात आ
गयी है और आप जानते हैं, सिद्धान्त प्राणों से प्यारे होते हैं.

रायसाहब कुर्सी पर बैठकर जरा मीठे स्वर मैं बोले-अच्छा भाई, जो चाहो लिखो. मैं
तुम्हारे सिद्धान्त को तोड़ना नहीं चाहता. और तो क्या होगा, बदनामी होगी. हां, कहां
तक नाम के पीछे-पीछे मरूं? कौन ऐसा ताल्लुकेदार है, जो असामियों को थोड़ा-बहुत नहीं
सताता ?कुत्ता हड्डी की रखवाली करे , तो खाये क्या? मैं इतना ही कर सकता हूं कि आगे
आपको इस तरह की कोई शिकायत न मिलेगी. अगर आपको मुझ पर कुछ विश्वास है, तो
इस बार क्षमा कीजिये. किसी दूसरे सम्पादक से मैं इस तरह की खुशामद न करता. उसे सरे
बाजार पिटवाता,लेकिन मुझसे आपकी दोस्ती है, इसलिए दबना ही पड़ेगा. यह समाचार –
पत्रों का युग है. सरकार तक उनसे डरती है, मेरी हस्ती क्या? आप जिसे चाहे, बना दें.
खैर, यह झगड़ा खत्म कीजिये. कहिये, आजकल पत्र की क्या दशा है? कुछ ग्राहक बढ़े?
औंकारनाथ ने अनिच्छा के भाव से कहा- किसी-न किसी तरह काम चल जाता है और वर्तमान
परिस्थिति में मैं इससे अधिक आशा नहीं रखता. मैं इसतरफ तरफ धन और भोग खी लालसा लेकर
नहीं आया था, इसलिये मुझे शिकायत नहीं है. मैं जनता की सेवा करने आया था और वह
यथाशक्ति किये जाता हूं.राष्ट्र का कल्याण हो, यही मेरी कामना है. एक व्यक्ति के
सुख-दुःख का कोई मूल्य नहीं.
रायसाहब ने जरा और सहृदय होकर कहा-यह सब ठीक है भाई साहब, लेकिन सेवा करने
के लिए भी जीना जरूरी है. आर्थिक चिन्ताओं में आप एकाग्रचित्त होकर सेवा भी तो नहीं
कर सकते. क्या ग्राहक संख्या बिलकुल नहीं बढ़ रही है?
`बात यह है कि मैं अपने पत्र का आदर्श गिराना नहीं चाहता,अगर मैं आज सिनेमा-स्टारों
के चित्र और चरित्र छापने लगूं, तो मेरे ग्राहक बढ़ सकते हैं, लेकिन अपनी तो वह
नीति नहीं और भी कितने ही ऐसे हथकण्डें हैं, जिनसे पत्रों द्वारा धन कमाया जा सकता
है, लेकिन मैं उन्हें गर्हित समझता हूं.’
`इसी का यह फल है कि आज आपका इतना सम्मान है. मैं एक प्रस्ताव करना चाहता हूं.

मालूम नहीं, आप उसे स्वीकार करेंगे या नहीं. आप मेरी ओर से सौ आदमियों के नाम फ्री
जारी कर दीजिये. चन्दा मैं दूंगा.’
ओंकारनाथ ने कृतज्ञता से सिर झुकाकर कहा-मैं धन्यवाद के साथ आपका दान स्वीकार करता
हूं खेद है कि पत्रों की ओर से जनता कितनी उदासीन है. स्कूल और कालिजों और
मन्दिरों के लिए धन की कमी नहीं है, पर आज तक एक भी ऐसा दानी न निकला, जो पत्रों के
प्रचार के लिए दान देता, हांलाकि जन-शिक्षा का उद्देश्य जितने कम खर्च में पत्रों
से पूरा हो सकता है, और किसी तरह नहीं हो सकता. जैसे शिक्षालयों को संस्थाओं द्वारा
सहायता मिला करती है, ऐसे ही अगर पत्रकारों को मिलने लगे, तो इन बेचारों को अपना
जितना समय और स्थान विज्ञापनों की भेंट करना पड़ता है, वह क्यों करना पड़े? मैं
आपका बड़ा अनुग्रहित हूं.
रायसाहब विदा हो गये. ओंकारनाथ के मुख पर प्रसन्नता की झलक न थी. रायसाहब ने किसी
तरह की शर्त न की थी, कोई बन्धन न लगाया था, पर ओंकारनाथ आज इतनी करारी फटकार पाकर
भी इस दान को अस्वीकार न कर सके. परिस्थिति ऐसी आ पड़ी थी कि उन्हे उबरने का कोई
उपाय ही न सूझ रहा था. प्रेस के कर्मचारियों का तीन महीने का वेतन बाकी पड़ा हुआ था
कागजवाले के एक हजार से ऊपर आ रहे थे. यही क्या कम था कि उन्हें हाथ नहीं फैलाना
पड़ा. उनकी स्त्री गोमती ने आकर विद्रोह के स्वर में कहा- क्या अभी भोजन का समय
नहीं आया या यह भी कोई नियम है कि जब तक एक न बज जाये, जगह से न उठो?
कब तक कोई चूल्हा अगोरता रहे?
ओंकारनाथ ने दुखी आंखों से पत्नी की ओर देखा. गोमती का विद्रोह उड़ गया. वह उनकी
कठिनाइयों को समझती थी दूसरी महिलाओं के वस्त्राभूषण देखकर कभी-कभी उसके मन में
विद्रोह के भाव जाग उठते थै और वह पति को दो चार जली कटी सुना जाती थी, पर वास्तव
मैं यह क्रोध उनके प्रति नहीं, अपने दुर्भाग्य के प्रति था, और इसकी थोड़ी-सी आंच
अनायास ही ओंकारनाथ तक पहुंच जाती थी.वह उनका तपस्वी जीवन देखकर मन में कुढ़ती थी
और उनसे सहानुभूति भी रखती थी. बस, उन्हें थोड़ा-सा सनकी समझती थी. उनका उदास

मुंह देखकर पूछा-क्यों उदास हो, पेट में कुछ गड़बड़ है क्या?
ओंकारनाथ को मुस्कराना पड़ा-कौन उदास है, मैं? मुझे तो आज जितनी खुशी है, उतनी अपने
विवाह के दिन भी न हुई थी. आज सबेरे पन्द्रह सौ की बोहनी हुई. किसी भाग्यवान का
मुंह देखा था. गोमती को विश्वास न आया, बोली- झूठे हो. पन्द्रह सौ कहां मिल जाते
हैं? हां पन्द्रह रुपये कहो, मान लेती हूं.
`नहीं-नहीं तुम्हारे सिर की कसम, पन्द्रह सौ मारे. अभी रायसाहब आये थे. ग्राहकों का
चन्दा अपनी तरफ से देने का वचन दे गये हैं.’
गोमती का चेहरा उतर गया- तो मिल चुके.
`नहीं रायसाहब वादे के पक्के हैं.’
`मैंने किसी ताल्लुकेदार को वादे का पक्का देखा ही नहीं. दादा एक ताल्लुकेदार के
नौकर थे. साल-साल भर तलब नहीं मिलती थी.उसे छोड़कर दूसरे की नौकरी की. उसने दोसाल
तक एक पाई न दी. एक बार दादा गरम पड़े तो, मारकर भगा दिया. इनके वादों का कोई करार
नहीं.’
`मैं आज ही बिल भेजता हूं.’
`भेजा करो.कह देंगे, कल आना.कल अपने इलाके पर चले जायेंगे, तीन महीने में लौटेंगे.’
ओंकारनाथ संशय में पड़ गये. ठीक तो है, कहीं रायसाहब पीछे से मुकर गये, तो वह क्या
कर लेंगे? फिर भी दिल मजबूत करके कहा-ऐसा नहीं हो सकता. कम-से कम रायसाहब को मैं
इतना धोखेबाज नहीं समझता. मेरा उनके यहां कुछ बाकी नहीं है.
गोमती ने उसी सन्देह के भाव से कहा-इसी से तो मैं तुम्हें बुद्धू कहती हूं. जरा
किसी ने सहानुभूति दिखायी और तुम फूल उठे. मोटे रईस हैं इनके पेट में ऐसे कितने
वादे हजम हो सकते हैं.जितने वादे करते हैं,अगर सब पूरा करने लगें तो भीख मांगने की
नौबत आ जाये. मेरे गांव के ठाकुर साहब तो दो तीन साल तक बनियों का हिसाब न करते थे.
नौकरों का हिसाब तो नाम के लिए देते थे. साल-भर काम लिया, जब नौकर ने वेतन मांगा,
मारकर निकाल दिया.कई बार इसी नादिहेन्दी में स्कूल से उनके लड़कों के नाम कट गये.
आखिर उन्होंने लड़कों को घर बुला लिया. एक बार रेल का टिकट उधार मांगा था.यह राय
साहब भी तो उन्हीं के भाई बन्द हैं.चलो,भोजन करो और चक्की पीसो, जो तुम्हारे भाग्य
में है. यह समझ लो कि ये बड़े आदमी तुम्हें फटकारते रहें,वही अच्छा है.यह तुम्हें
पैसा देंगे, तो उसका चौगुना अपने असामियों से वसूल कर लेंगे.अभी उनके विषय मै जो
कुछ चाहते हो,लिखते हो,तब तो ठकुरसोहाती ही करनी पड़ेगी.
पण्डितजी भोजन कर रहे थे, पर कौर मुंह में फंसा हुआ जान पड़ता था. आखिर बिना दिल

बोझ हलका किये, भोजन करना कठिन हो गया. बोले-अगर रुपये न दिये, तो ऐसी खबर लूंगा कि
याद करेंगे. उनकी चोटी मेरे हाथ में हैं. गांव के लोग झूठी खबर नहीं दे सकते. सच्ची
खबर देते, तो उनकी जान निकलती है, झूठी खबर क्या देंगे? रायसाहब के खिलाफ एक
रिपोर्ट मेरे पास आयी है. छाप दूं, तो बचा को घर से निकलना मुश्किल हो जाये. मुझे
यह खैरात नहीं दे रहें हैं, बड़े दबसट में पड़कर इस राह पर आयें हैं. पहले धमकियां
दिखा रहे थे. जब देखा, इससे काम न चलेगा, तो यह चारा फेंका. मैंने भी सोचा, एक इनके
ठीक हो जाने से तो देश से अन्याय मिटा जाता नहीं, फिर क्यौं न इस दान को स्वीकार कर
लूं मैं अपने आदर्श से गिर गया हूं जरूर, लेकिन इतने पर भी रायसाहब ने दगा की तो
मैं भी शठता पर उतर जाऊंगा. जो गरीबों को लुटता है, उसको लूटने के लिए अपनी आत्मा
को बहुत समझाना न पड़ेगा.

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