गोदान (भाग 1)

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मालती बाहर से तितली है, भीतर से मधुमक्खी. उसके जीवन में हंसी ही हंसी नहीं है.
केवल गुड़ खाकर कौन जी सकता है! और जिये भी, तो वह कोई सुखी जीवन न होगा. वह
हंसती है,इसलिए कि उसे इसके भी दाम मिलते हैं, या उसने निजत्व को अपनी आंखों में
इतना बढ़ा लिया है कि जो कुछ करे, अपने ही लिये करे. नहीं, वह इसलिए चहकती है और
विनोद करती है कि इससे उसके कर्तव्य का भार कुछ हलका हो जाता है. उसके बाप उन
विचित्र जीवों में थे, जो केवल जबान की मदद से लाखों के वारे-न्यारे करते थे. बड़े-
बड़े जमींदारों और रईसों की जायदादें बिकवाना, उन्हें कर्ज दिलाना या उनके मुआमलों
को अफसरों से मिलकर तय करा देना, यही उनका व्यवसाय था. दूसरे शब्दों में दलाल थे.

इस वर्ग के लोग बड़े प्रतिभावान होते हैं. जिस काम से कुछ मिलने की आशा हो, वह उठा
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लेंगे, किसी-न-किसी तरह से उसे निभा भी देंगे. किसी राजा की शादी किसी राजकुमारी से
ठीक करवा दी और दस-बीस हजार उसी में मार लिये.यही दलाल जब छोटे-छोटे सौदे करते हैं,
तो टाउट कहे जाते हैं और हम उनसे घृणा करते हैं.बड़े-बड़े काम करके वही टाउट राजाओं
के साथ शिकार खेलता है,और गवर्नरों की मेज पर चाय पीता है. मिस्टर कौल उन्हीं
भाग्यवानों में थे. उनके तीन लड़कियां ही लड़किया थीं. उनका विचार था कि तीनों को
इंगलैंड भेजकर शिक्षा के शिखर पर पहुंचा दें. अन्य बहुत से बड़े आदमियों की तरह
उनका भी ख्याल था कि इंगलैण्ड में शिक्षा पाकर आदमी कुछ और हो जाता है. शायद वहां
की जलवायु में बुद्धि की तेज कर देने की कोई शक्ति है, मगर उनकी यह कामना एक तिहाई
से ज्यादा पूरी न हुई.
मालती इंगलैण्ड में ही थी कि उन पर फालिज गिरा और बेकाम कर गया.अब बड़ी मुश्किल से
दो आदमियों के सहारे उठते -बैठते थे.जबान तो बिलकुल बन्द ही हो गई,और जब जबान ही
बन्द हो गई, तो आमदनी भी बन्द हो गयी. जो कुछ थी, जबान ही की कमाई थी. कुछ बचा रखने
की उनकी आदत न थी. अनियमित आय थी, और अनियमित खर्च था, इसलिए इधर कई साल से
बहुत तंगहाल हो रहे थे. सारा दायित्व मालती पर आ पड़ा. मालती के चार पांच सौ रुपये
में वह भोग विलास और ठाट-बाट तो क्या निभता, हां इतना था कि दोनों लड़कियों की
शिक्षा होती जाती थी और भले मानसों की तरह जिन्दगी बसर होती थी. मालती सुबह से पहर
रात तक दौड़ती रहती थी. चाहती थी कि पिता सात्त्विकता के साथ रहें, लेकिन पिताजी को
शराब-कबाब का ऐसा चस्का पड़ा थी कि किसी तरह गला न छोड़ता था. कहीं से कुछ न मिलता,
तो एक महाजन से अपने बंगले पर प्रोनोट लिखकर हजार-दो हजार ले लेते थे. महाजन उनका
पुराना मित्र था, जिसने उनकी बदोलत लेन देन में लाखों कमाये थे, और मुरोवत के मारे
कुछ बोलता न था. उसके पच्चीस हजार चढ़ चुके थे, और जब चाहता, कुर्की करा सकता था,
मगर मित्रता की लाज निभाता जाता था. आत्मसेवियौं में जो निर्लज्जता आ जाती है, वह
कौल में भी थी. तकाजे हुआ करें, उन्हें परवा न थी. मालती उनके अपव्यय पर झुंझलाती
रहती थी, लेकिन उसकी माता, जो साक्षात् देवी थी और इस युग में पति की सेवा को
नारी-जीवन का मुख्य हेतु समझती थीं, उसे समझाती रहती थीं, इसलिए गृहयुद्ध न होने
पाता था.
सन्ध्या हो गई थी. हवा में अभी तक गरमी थी. आकाश में धुन्ध छाया हुआ था. मालती और
उसकी दोनों बहिने बंगले के सामने घास पर बैठी हुई थी. पानी न पाने के कारण वहां की
दूब जल गयी थी और भीतर की मिट्टी निकल आयी थी.
मालती ने पूछा- माली क्या बिलकुल पानी नहीं देता?
मंझली बहिन सरोज ने कहा- पड़ा-पड़ा सोया करता है सूअर! जब कहो, तो बीस बहाने
निकालने लगता है.
सरोज बी. ए.में पड़ती थी,दुबली-सी, लम्बी, पीली. रूखी, कटु. उसे किसी की कोई बात
पसन्द न आती थी. हमेशा ऐब निकालती रहती थी. डाक्टरों की सलाह थी कि वह कोई परिश्रम
न करे ऊर पहाड़ पर रहे, लेकिन घर की स्थिति ऐसी न थी कि उसे पहाड़ पर भेजा जा सकता.
सबसे छोटी वरदा को सरोज से इसलिए द्वेष था कि सारा घर सरोज को हाथों में लिये रहता
था. वह चाहती थी जिस बीमारी में इतना स्वाद है, वह उसे ही क्यों नहीं हो जाती. गोरी
-सी, गर्वशील, स्वस्थ, चङ्चल आंखों वाली बालिका थी, जिसके मुख पर प्रतिभा की झलक थी
सरोज के सिवा उसे सारे संसार से सहानुभूति थी. सरोज के कथन का विरोध करना उसका
स्वभाव था. बोली- दिन भर दादाजी बाजार भेजते रहते हैं, फुर्सत ही कहां पाता है?
मरने को छुट्टी तो मिलती नहीं, पड़ा-पड़ा सोयेगा?
सरोज ने डांटा-दादाजी उसे कब बाजार भेजते हैं री, झूठी कहीं की.
`रोज भेजते हैं रोज. अभी तो आज ही भेजा था. कहो तो बुलाकर पुछवा दूं.’
`पुछवायेगी, बुलाऊं?’
मालती डरी. दोनों गुंथ जायेंगी,तो बैठना मुश्किल कर देंगी. बात बदलकर बोली-अच्छा
खैर होगा. आज डाक्टर मेहता का तुम्हारे यहां भाषण हुआ था सरोज?
सरोज ने नाक सिकोड़कर कहा-हां,हुआ तो था, लेकिन किसी ने पसन्द नहीं किया. आप
फर्माने लगे-संसार में स्त्रियों का क्षेत्र पुरुषों से बिलकुल अलग है. स्त्रियों
का पुरुषोंके क्षेत्र में आना इस युग का कलंक है. सब लड़कियों ने तालियां और
सीटियां बजानी शुरु कीं. बेचारे लज्जित होकर बैठ गये. कुछ अजीब से आदमी मालूम होते
हैं. आपने यहां तककह डाला कि प्रेम कवियों की कल्पना है. वास्तविक जीवन में इसका
कहीं निशान नहीं. लेडी हुक्कू ने उनका खूब मजाक उड़ाया.
मालती ने कटाक्ष किया- लेडी हुक्कू ने? इस विषय में वह भी कुछ बोलने का साहस रखती
है? तुम्हें डाक्टर साहब का भाषण आदि से अन्त तक सुनना चाहिए था.उन्होंने लड़कियों
को क्या समझा होगा?
`पूरा भाषण सुनने का सब्र किसे था? वह तो जैसे घाव पर नमक छिड़कते थे’.
`फिर उन्हें बुलाया ही क्यों? आखिर उन्हें औरतों से कोई बैर तो है नहीं. जिस बात को
हम सत्य समझते हैं, उसी का तो प्रचार करते हैं औरतों को खुश करने के लिए वह उनकी-सी
कहने वालों में नहीं हैं और फिर अभी यह कौन जानता है कि स्त्रियां जिस रास्ते पर
चलना चाहती हैं, वही सत्य है.बहुत सम्भव है, आगे चलकर हमें अपनी धारणा बदलनी पड़े.’
उसने फ्रांस, जर्मनी और इटली की महिलाओं के जीवन आदर्श बतलाये और कहा- शीघ्र ही
वीमेन्स लीग की ओर से मेहता का भाषण होने वाला है.
सरोज को कुतुहल हुआ.
`मगर आप भी तो कहती हैं कि स्त्रियों और पुरुषों के अधिकार समान होने चाहिए.’
`अब भी कहती हूं, लेकिन दूसरे पक्षवाले क्या कहते हैं, यह भी तो सुनना चाहिए.सम्भव
है हम ही गलती पर हो.’
यह लीग इस नगर की नयी संस्था है और मालती के उद्योग से खुली है. नगर की सभी शिक्षित
महिलाएं उसमें शरीक हैं. मेहता के पहले भाषण ने महिलाओं में बड़ी हलचल मचा दी थी और
लीग ने निश्चय किया था कि उनका खूब दन्दाशिकन जवाब दिया जाये. मालती ही पर यह भार
डाला गया. मालती कई दिन तक अपने पक्ष के समर्थन में युक्तियां और प्रमाण खोजती रही.
और भी कई देवियां अपने भाषण लिख रही थीं. उस दिन जब मेहता शाम को लीग के हाल में
पहुंचें, तो जान पड़ता था, हाल फट जायेगा.उन्हे गर्व हुआ.उनका भाषण सुनने के लिए
इतना उत्साह! और वह उत्साह केवल मुख पर और आंखों में न था. आज सभी देवियां सोने और
रेशम से लदी हुई थीं, मानों किसी बरात में आयी हों. मेहता को परास्त करने के लिए
शक्ति से काम लिया था और यह कौन कह सकता है कि जगमगाहट शक्ति का अंग नहीं है.
मालती ने तो आज के लिए नये फेशन की साड़ी निकाली थी, काट के जम्पर बनवाये थे और
रंग रोगन और फूलों से खूब सजी हुई थी, मानों उसका विवाह हो रहा हो.वीमेन्स लीग में
इतना समारोह और कभी न हुआ था. डाक्टर मेहता अकेले थे, फिर भी देवियों के दिल
कांप रहे थे. सत्य की एक चिनगारी असत्य के एक पहाड़ को भस्म कर सकती है.
सबसे पीछे की सफ में मिर्जा और खन्ना और सम्पादकजी भी विराज रहे थे. रायसाहब भाषण
शुरु होने के बाद आये और पीछे खड़े हो गये.
मिर्जा ने कहा- आ जाइये आप भी, कब तक रहियेगा?
रायसाहब बोले-नहीं भाई, यहां मेरा दम घुटने लगेगा.
`तो मैं खड़ा होता हूं. आप बैठिये.’
रायसाहब ने उनके कन्धे दबाये-तकल्लुफ, नहीं, बैठे रहिये. मैं थक जाऊंगा, तो आपको
उठा दूंगा और बैठ जाऊंगा. अच्छा, मिस मालती सभानेत्री हुई.खन्ना साहब कुछ इनाम
दिलवाइये. खन्ना ने रोनी सूरत बनाकर कहा-अब मिस्टर मेहता पर ही निगाह है. मैं तो
गिर गया. मिस्टर मेहता का भाषण शुरू हुआ-
`देवियों! जब मैं इस तरह आपको सम्बोधित करता हूं, तो आपको कोई बात खटकती नहीं. आप
इस सम्मान को अपना अधीकार समझती हैं, लेकिन आपने किसी महिला को पुरूषों के प्रति
`देवता’ का व्यवहार करते सुना है? उसे आप देवता कहें,तो वह समझेगा, आप उसे बना रही

हैं. आपके पास दान देने के लिए दया है, श्रद्धा र्है,त्याग है. पुरुष के पास दान के
लिए क्या है? वह देवता नहीं, लेवता है. वह अधिकार के लिए हिंसा करता है, संग्राम
करता है, कलह करता है.
तालियां बजी. रायसाहब ने कहा- औरतों को खुश करने का इसने कितना अच्छा ढंग निकाला?
`बिजली’ संपादक को बुरा लगा-कोई नयी बात नहिं. मै कितनी ही बार यह भाव व्यक्त कर
चुका हूं.
मेहता आगे बढ़े- इसलिये जब मैं देखता हूं, हमारि उन्नत विचारोंवाली देवियां उस दया
और श्रद्धा और त्याग के जीवन से असन्तुष्ट होकर संग्राम और हिंसा के जीवन की ओर
दौड़ रही हैं और समझ रही है कि यही सुख का स्वर्ग है, तो मैं उन्हें बधाई नहीं दे
सकता. मिसेज खन्ना ने मालती की ओर सगर्व नेत्रों से देखा.मालती ने गर्दन झुका ली.
खुर्शेद बोले- अब कहिये. मेहता दिलेर आदमी है. सच्ची बात कहता है और मुंह पर
`बिजली’ सम्पादक ने नाक सिकोड़ी- अब वह दिन लद गये, जब देवियां इन चकमों मैं आ जाती
थीं. उनके अधिकार हड़पते जाओ और कहते जाओ, अअप तो देवी हैं, लक्ष्मी हैं, माता हैं.
मेहता आगे बढ़े-स्त्री को पुरुष के रूप में पुरुष के कर्म में रत देखकर मुझे उसी
तरह वेदना होती है, जैसे पुरुष को स्त्री के कर्म करते देखकर. मुझे विश्वास है, ऐसे
पुरुषों को आप अपने विश्वास और प्रेम का पात्र नहीं समझती और मैं आपको विश्वास
दिलाता,हूं ऐसी स्त्री भी पुरुष के प्रेम और श्रद्धा का पात्र नहीं बन सकती.
खन्ना के चेहरे पर दिल की खुशी चमक उठी.
रायसाहब ने चुटकी ली-आप बहुत खुश हैं खन्ना जी?
खन्ना बोले- मालती मिले, तो पूछूं, अब कहिये.
मेहता आगे बड़े- मैं प्राणियों के विकास में स्त्री के पद को पुरुषों के पद से
श्रेष्ठ समझता हूं. इसी तरह, जैसे प्रेम और त्याग और श्रद्धा को हिंसा और कलह से
श्रेष्ठ समझता हूं. अगर हमारी देवियां सृष्टि और पालन के देव-मन्दिर से हिंसा और
कलह के दानव क्षेत्र में आना चाहता हैं, तो उससे समाज का कल्याण न होगा. मैं इस
विषय में दृढ़ हूं. पुरूष ने अपने अभिमान में अपनी कीर्ति को अधिक महत्व दिया.वह
अपने भाई का स्वत्व छिनकर और उसका रक्त बहाकर समझने लगा, उसने बहुत बड़ी विजय पायी.
जिन शिशुओं को देवियों ने अपने रक्त से सिरजा और पाला, उन्हे बम और मशीनगन और
सहस्त्रों टैंकों का शिकार बनाकर वह अपने को विजेता समझता है.और जब हमारी ही माताएं
उसके माथे पर केसर का तिलक लगाकर और उसे अपनी असीसों का कवच पहनाकर हिंसा-क्षेत्र
में भेजती हैं, तो आश्चर्य है कि पुरुष ने विनाश को ही संसार के कल्याण की वस्तु सम
जा और उसकी हिंसा-प्रवृत्ति दिन-दिन बढ़ती गयी और आज हम देख रहे हैं कि यह दानवता
प्रचण्ड होकर समस्त संसार को रौंदती, प्राणियों को कुचलती, हरी-भरी खेतियों को
जलाती और गुलजार बस्तियों को वीरान करती चली जाती है. देवियों, मैं आपसे पूछता
हूं, क्या आप इस दानवलीला में सहयोग देकर, इस संग्रामक्षेत्र में उतर कर संसार का
कल्याण करेंगी? मैं आपसे विनती करता हूं, नाश करने वालों को अपना काम करने दीजिये,
आप अपने धर्म का पालन किये जाइये.
खन्ना बोले- मालती की तो गर्दन नहीं उठती.
रायसाहब ने इस विचारों का समर्थन किया-मेहता कहते तो यथार्थ ही हैं.
`बिजली’ सम्पादक बिगड़े-मगर कोई बात तो नहीं कही. नारी-आन्दोलन के विरोधी इन्ही
ऊटपटांग बातों की शरण लिया करते हैं. मैं इसे मानता ही नहीं कि त्याग और प्रेम से
संसार ने उन्नति की. संसार ने उन्नति की पौरुष से, पराक्रम से , बुद्धि-बल से, तेज
से. खुर्शेद ने कहा- अच्छा सुनने दीजियेगा या अपनी गाये जाइयेगा?
मेहता का भाषण जारी था- देवियों, मैं उन लोगों में नहीं हूं, जो कहते हैं स्त्री और
पुरुष में समान शक्तियां हैं, समान प्रवृत्तियां हैं,और उनमें कोई विभिन्नता नहीं
है. इससे भयंकर असत्य की मैं कल्पना नहीं कर सकता. यह वह असत्य है, जो युग-
युगान्तरों से सञ्चित अनुभव को उसी तरह ढंक लेना चाहाता है, जैसे बादल का टुकड़ा
सूर्य को ढंक लेता है. मैं आपको सचेत किये देता हूं कि आप इस जाल में न फंसे.
स्त्री पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अंधेरे से. मनुष्य के लिए क्षमा
और त्याग और अहिंसा जीवन के उच्चतम आदर्श हैं.नारी इस आदर्श को प्राप्त कर चुकी है.
पुरुष धर्म और अध्यात्म और ऋषियों का आश्रय लेकर उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए
सदियों से जोर मार रहा है, पर सफल नहीं हो सका. मैं कहता हूं, उसका सारा अध्यात्म
और योग एक तरफ और नारियों का त्याग एक तरफ.
तालियां बजी. हाल हिल उठा. रायसाहब ने गद्गद होकर कहा- मेहता वही कहते हैं, जो इनके
दिल में है.
ओंकारनाथ ने टीका की- लेकिन बातें सभि पुरानी हैं, सड़ी हुई.
`पुरानी बात भी आत्मबल के साथ कही जाती है, तो नयी हो जाती हे.’
`जो एक हजार रुपये हर महीने फटकारकर विलास में उड़ाता हो, उसमें आत्मबल जैसी वस्तु
नहीं रह सकती. यह केवल पुराने विचार की नारियों और पुरुषों को प्रसन्न करने के ढंग
हैं.’खन्ना ने मालती की ओर देखा-यह क्यों फूली जा रही हैं?इन्हें तो शर्माना चाहिए.
खुर्शेद ने खन्ना को उकसाया-अब तुम भी एक तकरीर कर डालो खन्ना, नहीं मेहता तुम्हें
उखाड़ फेंकेगा. आधा मैदान तो उसने अभी मार लिया है.
खन्ना खिसियाकर बोले- मेरी न कहिये, मैंने कितनी चिड़ियां फंसाकर छोड़ दी हैं.
रायसाहब ने खुर्शेद की तरफ आंख मारकर कहा-आजकल आप महिला समाज की तरफ आते-जाते हैं.
सच बताना, कितना चन्दा दिया?
खन्ना पर झेंप छा गयी- मैं ऐसे समाजों को चन्दे नहीं दिया करता, जो कला का ढोंग
रचकर दुराचार फैलाते हें.
मेहता का भाषण जारी था.
`पुरुष कहता है, जितने दार्शनिक , वैज्ञानिक और आविष्कारक हुए हैं वह सब पुरुष थे.
जितने बड़े-बड़े महात्मा हुए हैं, वह सब पुरुष थे. सभी योद्धा, सभी राजनीति के
आचार्य, बड़े-बड़े नाविक, बड़े -बड़े सब कुछ पुरुष थे, लेकिन इन बड़ों-बड़ों के
समूहों ने मिलकर किया क्या? महात्माओं और धर्म-प्रवर्तकों ने संसार में रक्त की
नदियां बहाने और वैमनस्य की आग भड़काने के सिवा और क्या किया, योद्धाओं ने भाइयों
की गर्दनें काटने के सिवा और क्या यादगार छोड़ी, राजनीतिज्ञों की निशानी अब केवल
लुप्त साम्राज्यों के खण्डहर रह गये हैं, और आविष्कारकों ने मनुष्य को मशीन का
गुलाम बना देने के सिवा और क्या समस्या हल कर दी? पुरुषों की रची हुई इस संस्कृति
में शान्ति कहां है? सहयोग कहां है?’
ओंकारनाथ उठकर जाने को हुए-विलासियों के मुंह से बड़ी बड़ी बातें सुनकर मेरी देह
भस्म हो जाती है.
खुर्शेद ने उनका हाथ पकड़ कर बैठाया आप भी सम्पादकजी निरे पोंगा ही रहे. अजी यह
दुनिया है, जिसके जी में जो आता है, बकता है. कुछ लोग सुनते हैं और तालियां बजाते
हैं. चलिये, किस्सा खत्म. ऐसे-ऐसे बेशुमार मेहते आयेंगे और चले जायेंगे और दुनिया
अपनी रफ्तार से चलती रहेगी. बिगड़ने की कौन-सी बात है?
`असत्य सुनकर मुझसे सहा नहीं जाता.’
‘रायसाहब ने इन्हें और चढ़ाया- कुलटा के मुंह से सतियों की-सी बात सुनकर किसका जी
न जलेगा.
ओंकारनाथ फिर बैठ गये. मेहता का भाषण जारी था-
`मैं आपसे पूछता हूं, क्या बाज को चिड़ियों का शिकार करते देखकर हंस को यह शोभा
देगा कि वह मानसरोवर की आनन्दमयी शान्ति को छोड़कर चिड़ियों का शिकार करने लगे? और
अगर वह शिकारी बन जाये, तो आप उसे बधाई देंगी? हंस के पास उतनी तेज चोंच नहीं है,
उतने तेज चंगुल नहीं हैं,उतनी तेज आंखें नहीं हैं,उतने तेज पंख नहीं हैं और उतनी
तेज रक्त की प्यास नहीं है. उन अस्त्रों का सञ्चय करने में उसे सदियां लग जायेंगी,
फिर भी वह बाज बन सकेगा या नहीं, इसमें सन्देह है. मगर बाज बने या न बने, वह हंस
न रहेगा, वह हंस जो मोती चुगता है.
खुर्शेद ने टीका की- यह तो शाइरों की -सी दलीलें है. मादा बाज भी उसी तरह शिकार
करती है, जैसे नर बाज.
ओंकारनाथ प्रसन्न हो गये- उसपर आप फिलासफर बनते हैं, इसी तर्क के बल पर.
खन्ना ने दिल का गुबार निकाला- फिलासफर की दुम हैं. फिलासफर वह है जो…..
ओंकारनाथ ने बात पूरी की-जो सत्य से जौ-भर भी न टले.
खन्ना को यह समस्या-पूर्ति नहीं रुची-मैं सत्य-वत्य नहीं जानता . मैं तो फिलासफर
उसे कहता हूं, जो फिलासफर हो सच्चा.
खुर्शेद ने दाद दी-फिलासफर की आपने कितनी सच्ची तारीफ की है. वाह सुभानल्ला!
फिलासफर वह, जो फिलासफर हो. क्यों न हो?
मेहता आगे चले- मैं नहीं कहता, देवियों को विद्या की जरुरत नहीं है. है और पुरुषों
से अधिक. मैं नहीं कहता, देवियों को शक्ति की जरुरत नहीं है. है और पुरुषों से अधिक
लेकिन वह विद्या और वह शक्ति नहीं, जिससे पुरूष ने संसार को हिंसा क्षेत्र बना डाला
है. अगर वही विद्या और वही शक्ति आप भी ले लेंगी, तो संसार मरुस्थल हो जायेगा. आपकी
विद्या और आपका अधिकार हिंसा और विध्वंस में नहीं, सृष्टि और पालन में है. क्या आप
समझती हैं, वोटों से मानव जाति का उद्धार होगा, दफ्तरों में और अदालतों में जबान और
कलम चलाने से? इन नकली, अप्राकृतिक, विनाशकारी अधिकारों के लिए आप वह अधिकार छोड़
देना चाहती हैं, जो आपको प्रकृति ने दिये हैं?
सरोज अब तक बड़ी बहन के अदब से जब्त किये बैठी थी. अब न रहा गया. फुफकार उठी
हमें वोट चाहिए, पुरुषों के बराबर.
और कई युवतियों ने हांक लगायी-वोट-वोट.
ओंकारनाथ ने खड़े होकर ऊंचे स्वर से कहा- नारी जाति के विरोधियों की पगड़ी नीची हो.
मालती ने मेज पर हाथ पटककर कहा-शान्त रहो,जो लोग पक्ष या विपक्ष में कुछ कहना
चाहेंगे, उन्हें पूरा अवसर दिया जायेगा.
मेहता बोले वोट नये युग का मायाजाल है, मरीचिका है, कलंक है, धोखा है, उसके चक्कर
में पड़कर आप न इधर की होंगी, न उधर की. कौन कहता है कि आपका क्षेत्र संकुचित है और
उसमें आपको अभिव्यक्ति का अवकाश नहीं मिलता? हम सभी पहले मनुष्य हैं, पीछे और कुछ.
हमारा जीवन हमारा घर है. वहीं हमारी सृष्टि होती है, वहीं हमारा पालन होता है, वहीं
जीवन के सारे व्यापार होते हैं अगर वह क्षेत्र परिमित है, तो अपरिमित कौन-सा
क्षेत्र है?क्या वह संघर्ष, जहां संगठित अपहरण है? जिस कारखाने में मनुष्य और उसका
भाग्य बनता है, उसे छोड़कर आप उन कारखानों में जाना चाहती हैं, जहां मनुष्य पीसा
जाता है, जाता है, जहां उसका रक्त निकाला जाता है?
मिर्जा ने टोका-पुरुषों के जुल्म ने ही तो उनमें बगावत की यह स्पिरिट पैदा की है
मेहता बोले-बेशक, पुरुषों ने अन्याय किया है, लेकिन उसका यह जवाब नहीं है
अन्याय को मिटाइये, लेकिन अपने को मिटाकर नहीं.
मालती बोली-नारियां इसलिए अधिकार चाहती हैं कि उनका सदुपयोग करें और पुरुषों
को उनका सदुपयोग करने से रोकें.
मेहता ने उत्तर दिया-संसार में सबसे बड़े अधिकार सेवा और त्याग से मिलते हैं, और वह
आपको मिले हुऐ हैं. उन अधिकारों के सामने वोट कोई चीज नहीं. मुझे खेद है, हमारी
बहिनें पश्चिम का आदर्श ले रहीं है, जहां नारी ने अपना पद खो दिया है, और स्वामिनी
से गिरकर विलास की वस्तु बन गयी है. पश्चिम की स्त्री स्वच्छन्द होना चाहती है,
इसलिए कि वह अधिक-से-अधिक विलास कर सके. हमारी माताओं का आदर्श कभी विलास नहीं
रहा. उन्होने केवल सेवा के अधिकार से सदैव गृहस्थी का सञ्चालन किया है. पश्चिम में
जो चीजें अच्छी हैं, वह उनसे लीजिये. संस्कृति में सदैव आदान-प्रदान होता आया है,
लेकिन अन्धी नकल तो मानसिक दुर्बलता का ही लक्षण है. पश्चिम की स्त्री आज गृह-
स्वामिनी नहीं रहना चाहती. भोग की विदग्ध लालसा ने उसे उच्छृंखल बना दिया है. वह
अपनी लज्जा और गरिमा को, जो उसकी सबसे बड़ी विभूति थी, चञ्चलता और आमोद-
प्रमोद पर होम कर रही है.जब मैं वहां की शिक्षित बालिकाओं को अपने रूप का या भरी
हुई गोल बांहों या अपनी नग्नता का प्रदर्शन करते देखता हूं. तो मुझे उन पर दया आती
है. उनकी लालसाओं ने उन्हे इतना पराभूत कर दिया है कि वे अपनी लज्जा की भी रक्षा
नहीं कर सकतीं. नारी की इससे अधिक और क्या अधोगति हो सकती है?
रायसाहब ने तालियां बजाई. हाल तालियों से गूंज उठा, जैसे पटाखों की टट्टियां छूट
रही हों. मिर्जा साहब ने सम्पादकजी से कहा-जवाब तो आपके पास भी न होगा?
सम्पादकजी ने विरक्त मन से कहा-सारे व्याख्यान में इन्होंने यही एक बात सत्य कही है.
तब तो आप भी मेहता के मुरीद हुए.’
`जी नहीं, अपने लोग किसी के मुरीद नहीं होते.मैं इसका जवाब ढूंढ़ निकालुंगा,`बिजली’
में देखियेगा.’
`इसके माने यह हैं कि आप हक की तलाश नहीं करते, सिर्फ अपने पक्ष के लिए लड़ना चाहते
हैं. रायसाहब ने आड़े हाथों लिया- इसी पर आपको अपने सत्य-प्रेम का अभिंमान है?
सम्पादकजी अविचल रहे- वकील का काम अपने मुवक्किल का हित देखना है,सत्य या
असत्य का निराकरण नहीं.
`तो यों कहिये कि आप औरतों के वकील है.’
`मैं उन सभी लोगों का वकील हूं, जो निर्बल है ,निसहाय हैं.’पीड़ित हैं.,
`बड़े बेहया हो यार’
मेहता जी कह रहे थे- और यह पुरुषों का षड़्यंत्र है. देवियों को ऊंचे शिखर से खींच
कर अपने बराबर बनाने के लिए, उन पुरुषों का, जो कायर हैं, जिनमें वैवाहिक जीवन का
दायित्व संभालने की क्षमता नहीं है, जो स्वच्छन्द काम-क्रीड़ा की तरंगों में सांडों
की भांति दूसरों की हरी-भरी खेती में मुंह डालकर अपनी कुत्सित लालसाओं को तृप्त
करना चाहते हैं. पश्चिम में इनका षड़यंत्र सफल हो गया और देवियां तितलियां बन गयीं.
मुझे यह कहते हुए शर्म आती है कि इस त्याग और तपस्या की भूमि भारत में भी कुछ वही
हवा चलने लगी है. विशेषकर हमारी शिक्षित बहिनों पर वह जादू बड़ी तेजी से चढ़ रहा
है.वह गृहिणी का आदर्श त्यागकर तितलियों का रंग पकड़ रही हैं.
सरोज उत्तेजित होकर बोली-हम पुरूषों से सलाह नहीं मांगती.अगर वह अपने बारे में
स्वतंत्र हैं,तो स्त्रियां भी अपने विषय में स्वतंत्र हैं, युवतियां अब विवाह को
पेशा नहीं बनाना चाहतीं. वह केवल प्रेम के आधार पर विवाह करेंगी.
जोर से तालियां बजीं, विशेषकर अगली पंक्तियों में, जहां महिलाएं थीं.
मेहता ने जवाब दिया- जिसे तुम प्रेम कहती हो वह धोखा है, उद्दीप्त लालसा का विकृत
रूप, उसी तरह, जैसे सन्यास केवल भीख मांगने का संस्कृत रूप है. वह प्रेम अगर
वैवाहिक जीवन में कम है, तो मुक्त विलास मैं बिलकुल नहीं है. सच्चा आनन्द, सच्ची
शान्ति केवल सेवा-व्रत में है. वही अधिकार का स्त्रोत है, वही शक्ति का उद्गम है.
सेवा ही वह सीमेण्ट है, जो दम्पति को जीवनपर्यन्त स्नेह और साहचर्य में जोड़े रख
सकता है, जिस पर बड़े-बड़े आघातों का कोई असर नहीं होता. जहां सेवा का अभाव है,
वहीं विवाह-विच्छेद है, परित्याग है, अविश्वास है, और आपके ऊपर, पुरूष-जीवन की नौका
की कर्णधार होने के कारण जिम्मेदारी ज्यादा है. आप चाहें, तो नौका को आंधी और
तूफानों में पार लगा सकती हैं, और आपने असावधानी की, तो नौका डूब जायेगी और उसके
साथ आप भी डूब जायेंगी.
भाषण समाप्त हो गया. विषय विवाद -ग्रस्त था और कई महिलाओं ने जवाब देने की अनुमति
मांगी, मगर देर बहुत हो गयी थी. इसलिए मालती ने मेहता को धन्यवाद देकर सभा भंग कर
दी. हां, यह सूचना दे दी गई कि अगले रविवार को इसी विषय पर कई देवियां अपने
विचार प्रकट करेंगी.
रायसाहब ने मेहता को बधाई दी- आपने मन की बातें कहीं मिस्टर मेहता! मैं आपके एक-एक
शब्द से सहमत हूं.
मालती हंसी- आप क्यों न बधाई देंगे, चोर-चोर मौसेरे भाई जो होते हैं, मगर यह सारा
उपदेश गरीब नारियों ही के सिर क्यों थोपा जाता है? उन्ही के सिर क्यों आदर्श और
मर्यादा और त्याग सब कुछ पालन करने का भार पटका जाता है?
मेहता बोले-इसलिए कि वह बात समझती हैं.
खन्ना ने मालती की ओर अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से देखकर मानों उसके मन की बात समझने की
चेष्टा करते हुए कहा- डाक्टर साहब के ये विचार मुझे तो कोई सौ साल पिछड़े हुऐ मालूम
होते है.
मालती ने कटु होकर पूछा-कौन से विचार?
`यही सेवा और कर्तव्य आदि.’
`तो आपको यह विचार सौ साल पिछड़े हुए मालूं होते हैं, तो कृपा करके अपने ताजे विचार
बतलाइये. दम्पति कैसे सुखी रह सकते हैं,इसका ताजा नुस्खा आपके पास है?’
खन्ना खिसिया गये. बात कही मालती को खुश करने के लिए, वह तिनक उठी. यह नुस्खा तो
मेहता साहब को मालूम होगा.
डाक्टर साहब ने तो बतला दिया और आपके ख्याल में वह सौ साल पुराना है, तो नया नुस्खा
आपको बतलाना चाहिए. आपको ज्ञात नहीं कि दुनिया में ऐसी बहुत सी बातें हैं, जो कभी
पुरानी हो ही नहीं सकती. समाज में इस तरह की समस्याएं हमेशा उठती रही हैं और हमेशा
उठती रहेंगी.
मिसेज खन्ना बरामदे में चली गयी थीं. मेहता ने उनके पास जाकर प्रणाम करते हुए पूछा- 129
मेरे भाषण के विषय में आपकी क्या राय है?
मिसेज खन्ना ने आंखे झुकाकर कहा- अच्छा था, बहुत अच्छा, मगर अभी आप अविवाहित हें,
जभी नारियां देवियां हैं, श्रेष्ठ हैं, कर्णधार हैं.विवाह कर लीजिये, तो पूछूंगी,
अब नारियां क्या है? और विवाह आपको करना पड़ेगा, क्योंकि आप विवाह से मुंह चुराने
वाले मर्दों को कायर कह चुके हैं.
मेहता हंसे- उसी के लिए तो जमीन तैयार कर रहा हूं.
` मिस मालती से जोड़ा भी अच्छा है.’
`शर्त यही है कि कुछ दिन आपके चरणों में बैठकर आपसे नारी-धर्म सीखें.’
`वही स्वार्थी पुरुषों की बात! आपने पुरूष-कर्तव्य सीख लिया है?’
`यही सोच रहा हूं, किससे सीखूं?’
`मिस्टर खन्ना आपको बहुत अच्छी तरह सिखा सकते हैं.’
मेहता ने कहकहा मारा- नहीं, मैं पुरुष कर्तव्य भी आप ही से सीखूंगा.
`अच्छी बात है, मुझी से सीखिये. पहली बात यही कि भूल जाइये कि नारी श्रेष्ठ और सारी
जिम्मेदारी उसी पर है. श्रेष्ठ पुरुष है और उसी पर गृहस्थी का सारा भार है. नारी
में सेवा और संयम और कर्तव्य सब कुछ वही पैदा कर सकता है. अगर उसमें इन बातों का
अभाव है, तो नारी में भी अभाव रहेगा. नारियों में आज जो यह विद्रोह है, इसका कारण
पुरूष का इन गुणों से शून्य हो जाना है.’
मिर्जा साहब ने आकर मेहता को गोद में उठा लिया और बोले- मुबारक.
मेहता ने प्रश्न की आंखों से देखा- आपको मेरी तकरीर पसन्द आयी?
`तकरीर तो खैर जैसी थी, मगर कामयाब खूब रही. आपने परी को शीशे में उतार लिया
अपनी तकदीर सराहिये कि जिसने आज तक किसी को मुंह नहीं लगाया, वह आपका कलमा पढ़
रही है.’
मिसेज खन्ना दबी जबान से बोली- जब नशा ठहर जाये, तो कहिये.
मेहता ने विरक्त भाव से कहा- मेरे जैसे किताब के कीड़ों को कौन औरत पसन्द करेगी
देवीजी? मैं तो पक्का आदर्श वादी हूं.
मिसेज खन्ना ने अपने पति को कार की तरफ जाते देखा, तो उधर चली गयीं मिर्जा भी बाहर
निकल गये. मेहता ने मञ्च पर से छड़ी उठायी और बाहर जाना चाहते थे कि मालती ने आकर
उनका हाथ पकड़ लिया और आग्रह-भरी आंखों से बोली-आप अभी नहीं जा सकते. चलिये, पापा
से आपकी मुलाकात कराऊं, और आज वहीं खाना खाइये.
मेहता ने कान पर हाथ रखकर कहा-नहीं, मुझे क्षमा कीजिए. वहां सरोज मेरी जान खायेगी.
मैं इन लड़कियों से बहुत घबराता हूं.
`नहीं -नहीं, मैं जिम्मा लेती हूं, जो वह मुंह भी खोले तो.’
`अच्छा आप चलिये, मैं थोड़ी देर में आऊंगा.’
`जी नहीं, यह न होगा. मेरी कार सरोज को लेकर चलदी. आप मुझे पहुंचाने तो चलेंगे ही.’
दोनों मेहता की कार में बैटे. कार चली.
एक क्षण बाद मेहता ने पूछा- मैंने सुना है, खन्ना साहब अपनी बीवी को मारा करते हैं.
तब से मुझे इनकी सूरत से नफरत हो गई. जो आदमी इतना निर्दयी हो, उसे मैं आदमी नहीं
समझता. उस पर नारी-जाति के बड़े हितेषी बनते हैं. तुमने उन्हें कभी समझाया नहीं?
मालती उद्विग्न होकर बोली-ताली हमेशा दो हथेलियों से बजती है, यह आप भूल जाते हैं.
मैं तो ऐसे किसी कारण की कल्पना ही नहीं कर सकता कि कोई पुरुष अपनी स्त्री को मारे’ 130
`चाहे स्त्री कितनी ही बदजबान हो?’
`हां, कितनी ही.’
`तो आप एक नये किस्म के आदमी हैं.’
`अगर मर्द बदमिजाज है, तो तुम्हारी राय में उस मर्द पर हण्टरों की बौछार करनी चाहिए,
क्यों?’
`स्त्री जितनी क्षमाशील हो सकती है, पुरुष नहीं हो सकता. आपने खुद आज यह बात
स्वीकार की है.’
`तो औरत की क्षमाशीलता का यही पुरस्कार है? मैं समझता हूं, तुम खन्ना को मुंह लगाकर
उसे और भी शह देती हो. तुम्हारा वह जितना आदर करता है, तुमसे उसे जितनी भक्ति है,
उसके बलपर तुम आसानी से उसे सीधा कर सकती हो, मगर तुम उसकी सफाई देकर
सवयं उस अपराध में शरीक हो जाती हो.’
मालती उत्तेजित होकर बोली-तुमने इस समय यह प्रसंग व्यर्थ ही छेड़ दिया. मैं किसी को
बुराई नहीं करना चाहती, मगर अभी आपने गोविन्दी देवी को पहचाना नहीं. आपने उनकी
भोली-भाली शान्त मुद्रा देखकर समझ लिया, वह देवी हैं. मैं उन्हें इतना ऊंचा स्थान
नहीं देना चाहती. उन्होने मुझे बदनाम करने का जितना प्रयत्न किया है, मुझ पर जैसे –
जैसे आघात किये हैं, वह बयान करूं, तो आप दंग रह जायेंगे और तब आपको मानना पड़ेगा
कि ऐसी औरत के साथ यही व्यवहार होना चाहिए.
`आखिर उन्हें आपसे इतना द्वेष है, इसका कोई कारण तो होगा?’
`कारण उनसे पूछिये. मुझे किसी के दिल का हाल क्या मालूम?’
`उनसे बिना पूछे भी अनुमान किया जा सकता है और वह यह है-अगर कोई पुरुष मेरे
और मेरी स्त्री के बीच में आने का साहस करे, तो मैं उसे गोली मार दूंगा, और उसे न
मार सकूंगा, तो अपनी छाती मैं मार लूंगा. इसी तरह अगर मैं किसी स्त्री को अपने और
अपनी स्त्री के बीच में लाना चाहूं, तो मेरी पत्नी को भी अधिकार है कि वह जो चाहे,
करे. इस विषय में कोई समझौता नहीं कर सकता. यह अवैज्ञानिक मनोवृति है, जो हमने अपने
बनैले पूर्वजों से पायी है और आजकल कुछ लोग इसे असभ्य और असामाजिक व्यवहार कहेंगे,
लेकिन मैं अभी तक उस मनोवृति पर विजय नहीं पा सका और न पाना चाहता हूं. इस विषय में
मैं कानून की परवाह नहीं करता. मेरे घर में मेरा कानून है.’
मालती ने तीव्र स्वर मैं पूछा-लेकिन आपने यह अनुमान कैसे कर लिया कि मैं आपके
शब्दों में खन्ना और गोविन्दी के बीच आना चाहती हूं?आप ऐसा अनुमान करके मेरा अपमान
कर रहे हैं. मैं खन्ना को अपनी जूतियों के बराबर भी नहीं समझती
मेहता ने अविश्वास भरे स्वर से में कहा- यह आप दिल से नहीं कह रही हैं मिस मालती!
क्या आप सारी दुनिया को बेवकूफ समझती हैं? जो बात सभी समझ रहें हैं, अगर वही बात
मिसेज खन्ना भी समझे, तो मैं उन्हें दोष नहीं दे सकता.
मालती ने तिनक कर कहा- दुनिया को दूसरों को बदनाम करने में मजा आता है. यह उसका
स्वभाव है. मैं उसका स्वभाव कैसे बदल दूं, लेकिन यह व्यर्थ का कलंक है. हां, मैं
इतनी बेमुरोबत नहीं हूं कि खन्ना को अपने पास आते देखकर दुत्कार देती. मेरा काम ही
ऐसा है कि मुझे सभी का स्वागत और सत्कार करना पड़ता है. अगर कोई इसका कुछ और
अर्थ निकालता है, तो वह…..वह…
मालथी का गला भर्रा गया और उसने मुंह फेरकर रुमाल से आंसू पोंछे. फिर एक मिनट बाद
बोली-औरों के शाथ तुम भी मुझे… मुझे…इसका दुख है….मुझे तुमसे ऐसी आशा न थी.
फिर कदाचित उसे अपनी दुर्बलता पर खेद हुआ. वह प्रचण्ड होकर बोली-आपको मुझ पर आक्षेप
करने का कोई अधिकार नहीं है. अगर आप भी उन्हीं मरदों में हैं, जो किसी स्त्री-पुरुष
को साथ देखकर उंगली उठाये बिना नहीं रह सकते, तो शौक से उठाइये. मुझे रत्ती-भर परवा
नहीं. अगर कोई स्त्री आपके पास बार-बार किसी-न- किसी बहाने से आये, आपको अपना
देवता समझे,हरएक बात में आपसे सलाह ले, आपके चरणों के नीचे आंखें बिछाये आपका इशारा
पाते ही आग में कूदने को तैयार हो, तो मैं दावे से कह सकती हूं, आप उसकी उपेक्षा न
करेंगे. अगर आप उसे ठुकरा सकते हैं, तो आप मनुष्य नहीं हैं. उसके विरुद्ध आप कितने
ही तर्क और प्रमाण लाकर रख दें, लेकिन मैं मानूंगी नहीं. मैं तो कहती हूं, उपेक्षा
तो दूर रही, ठुकराने की बात ही क्या,आप उस नारी के पांव धो-धोकर पियेंगे,और बहुत
दिन गुजरने के पहले वह आपकी हृदयेश्वरी होगी. मैं आपसे हाथ जोड़कर कहती हूं,
मेरे सामने खन्ना का कभी नाम न लीजियेगा.
मेहता ने इस ज्वाला में मानों हाथ सेंकते हुए कहा-शर्त यही है कि खन्ना को आपके साथ
न देखूं.
`मैं मानवता की हत्या नहीं कर सकती. वह आयेंगे, तो मैं उन्हें दुरदुराऊंगी नहीं.’
`उनसे कहिये, अपनी स्त्री के साथ सज्जनता से पेश आयें.’
`मैं किसी के निजी मामले में दखल देना उचित नहीं समझती. न मुझे इसका अधिकार है.’
`तो आप किसी की जबान नहीं बन्द कर सकती.’ मालती का बंगला आ गया. कार रुक गयी. मालती
उतर पड़ी और बिना हाथ मिलाये चली गयी. वह यह भी भूल गयी कि उसने मेहता को भोजन की
दावत दी है. वह एकान्त में जाकर खूब रोना चाहती है. गोविन्दी ने पहले भी आघात किये
हैं, पर आज उसने जो आघात किया है, वह बहुत गहरा, बड़ा चौड़ा और बढ़ा मर्मभेदी है.

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