गोदान (भाग 1)

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होरी की फसल सारी -की सारी डांड की भेंट हो चुकी थी.वैशाख तो किसी तरह कटा, मगर जेठ
लगते-लगते घर में अनाज का एक दाना न रहा. पांच-पांच पेट खानेवाले और घर में अनाज
नदारद.दोनों जून न मिले,एक जून तो मिलना चाहिए.भर पेट न मिले, आधा पेट तो मिले.
निराहार कोई कै दिन रह सकता हैं. उधार ले, तो किससे? गांव के छोटे -बड़े महाजनों से
तो मुंह चुराना पड़ता था मजूरी भी करे तो किसकी? जेठ में अपना ही काम ढेरों था. ऊख
की सिंचाई लगी हुई थी, लेकिन खाली पेट मेहनत भी कैसे हो?
सांझ हो गयी थी. छोटा बच्चा रो रहा था मां को भोजन न मिले, तो दूध कहां से निकले?
सोना परिस्थिति समझती थी, मगर रूपा क्या समझे? बार-बार रोटी-रोटी चिल्ला रही थी.
दिन-भर तो कच्ची अमिया से जी बहला, मगर अब तो कोई ठोस चीज चाहिए. होरी
दुलारी सहुआईन से अनाज उधार मांगने गया था, पर वह दुकान बन्द करके पैठ चली गयी थी.
मंगरू साह ने केवल इन्कार ही न किया, लताड़ भी दी-उधार मांगने चले हैं, तीन साल से
धेला सूद नहीं दिया, पर उधार दिये जाओ. अब आकबत में देंगे. खोटी नीयत हो जाती है,
तो यही हाल होता है. भगवान से भी यह अनीति नहीं देखी जाती. कारकुन की डांट पड़ी, तो
कैसे चुपके से रुपये उगल दिये मेरे रुपये ही नहीं हैं. और मेहरिया है कि उसका मिजाज
ही नहीं मिलता.
वहअं से रुआंसा होकर उदास बैठा था कि पुन्नी आग लेने आयी. रसोई के द्वार पर जाकर
देखा, तो अंधेरा पड़ा हुआ था. बोली-आज रोटी नहीं बना रही हो क्या भाभीजी? अब तो
बेला हो गयी.
जब से गोबर भागा था, पुन्नी और धनिया में बोलचाल हो गयी थी. होरी का एहसान भी मानने
लगी थी. हीरा को अब वह गालियां देती थी- हत्यारा, गऊ-हत्या करके भागा. मुंह में
कालिख लगी है, घर कैसे आये और आये भी, तो घर के अन्दर पांव न रखने दूं. गऊ-हत्या
करते इसे लाज भी न आयी. बहुत अच्छा होता, पुलिस बांधकर ले जाती और चक्की पिसवाती
धनिया कोई बहाना न कर सकी, बोली-रोटी कहां से बने, घर में दाना तो है नहीं. तेरे
महतो ने बिरादरी का पेट भर दिया,बाल-बच्चे मरें या जियें.अब बिरादरी झांकती तक नहीं
पुन्नी की फसल अच्छी हुई थी, और वह स्वीकार करती थी कि यह होरी का पुरूषार्थ है.
हीरा के साथ कभी इतनी बरक्कत न हुई थी.
बोली- अनाज मेरे घर से क्यों नहीं मंगवा लिया? वह भी तो महतो ही की कमाई है कि किसी
और की? सुख के दिन आये, तो लड़ लेना, दुःख तो साथ रोने ही से कटता है. मैं क्या ऐसी
अन्धी हूं कि आदमी का दिल नहीं पहचानती? महतो ने न संभाला होता,तो आज मुझे कहां सरन
मिलती? वह उलटे पांव लौटी और सोना को भी साथ लेती गयी. एक क्षण में दो डल्ले अनाज
से भरे लाकर आंगन में रख दिये. दो मन से कम जौ न था. धनिया अभी कुछ कहने न पायी थी
कि वह फिर चल दी और एक क्षण में एक बढ़ी-सी टोकरी अरहर की दाल से भरी हुई लाकर रख
दी और बोली-चलो, मैं आग जलाये देती हूं
धनिया ने देखा, तो जौ के ऊपर एक चौटी-सी डलिया में चार-पांच सेर आटा भी था. आज
जीवन में पहली बार वह परास्त हुई. आंखों में प्रेम और कृतज्ञता के मोती भरकर बोली-
सब-का-सब ऊठा लायी कि घर में भी कुछ छोड़ा? कहीं भागा जाता था.
आंगन में बच्चा खटोले पर पड़ा रो रहा था. पुनिया उसे गोद में लेकर दुलराती हुई बोली
तुम्हारी दया से अभी बहुत है भाभीजी. पन्द्रह मन तो जौ हुआ है और दस मन गेहूं. पांच
मन मटर हुआ, तुमसे क्या छिपाना है. दोनों घरों का काम चल जायेगा. दो-तीन महीने में
फिर मकई हो जायेगी.आगे भगवान मालिक है.

झुनिया ने आकर अञ्चल से छोटी सास के चरण छुए.पुनीया ने असीस दिया.सोना आग जलाने चली
रूपा ने पानी के लिए कलसा उठाया. रुकी हुई गाड़ी चल निकली. जल में अवरोध के कारण जो
चक्कर था, फेन था, गति की तीव्रता थी, वह अवरोध के हट जाने से शान्त मधुर-धवनि के
साथ सम, धीमी, एक -रस धार में बहने लगी.
पुनिया बोली-महतो को डांड देने की ऐसी जल्दी क्या पड़ी थी?
धनिया ने कहा- बिरादरी मैं सुरखरू कैसे होते?
`भाभी, बुरा न मानो, तो एक बात कहूं?’
`कह बुरा क्यों मानूंगी?’
`न कहूंगी, कहीं तुम बिगड़ने न लगो?’
`कहती हूं, कुछ न बोलूंगी, कह तो.’
`तुम्हें झुनिया को घर में रखना न चाहिए था.’
`तब क्या करती? वह डूबी मरती थी.’
मेरे घर में रख देती. तब तो कोई कुछ न कहता.’
`यह तो तू आज कहती है. उस दिन भेज देती, तो झाड़ू लेकर दौड़ती.’
`इतने खरच में तो गोबर का ब्याह हो जाता.’
`होनहार को कौन टाल सकता है पगली? अभी इतने ही से गला नहीं छूटा, भोला अब अपनी गाय
के दाम मांग रहा है. तब तो गाय दी कि मेरी सगाई कहीं ठीक कर दो. अब कहता है, मुझे
सगाई नहीं करनी, मेरे रुपये दे दो. उसके दोनों बेटे लाठी लिये फिरते हैं हमारे कौन
बैठा है, जो उससे लड़े? इस सत्यानासी गाय ने आकर चौपट कर दिया.’

कुछ और बातें करके पुनीया आग लेकर चली गई होरी सब कुछ देख रहा था. भीतर आकर बोला-
पुनिया दिल की साफ है.
`हीरा भी तो दिल का साफ था ?’
धनिया ने अनाज तो रख लिया था, पर मन में लज्जित और अपमानित हो रही थी. यह दिनों का
फेर है कि आज उसे यह नीचा देखना पड़ा.
`तू किसी का औसान नहीं मानती, यही तुझमें बुराई है.’
`औसान क्यों मानूं? मेरा आदमी उसकी गिरस्ती के पीछे जान नहीं दे रहा है? फिर मैंने
दान थोड़े ही लिया है. उसका एक-एक दाना भर दूंगी.’
मगर पुनिया अपनी जिठानी के मनोभाव समझकर भी होरी का एहसान चुकाती जाती थी. जब यहां
अनाज चुक जाता, मन दो मन दे जाती, मगर जब चौमासा आ गया और वर्षा न हुई, तो समस्या
अत्यन्त जटिल हो गयी. सावन का महीना आ गया था और बगूले उठ रहे थे. कुओं का पानी भी
सूख गया था और ऊख ताप से जली जा रही थी. नदी से थोड़ा-थोड़ पानी मिलता था,मगर उसके
पीछे आये दिन लाठियां निकलती थी. यहां तक कि नदी ने भी जबाब दे दिया. जगह-जगह
चोरियां होने लगी, डाके पड़ने लगे, सारे प्रान्त में हाहाकार मच गया. बारे कुशल हुई
कि भादों में वर्षा हो गयी और किसानों के प्राण हरे हुए. कितना उछाह था उस दिन.
प्यासी पृथ्वी जैसे अघाती ही न थी और प्यासे किसान ऐसे उछल रहे थे, मानों पानी नहीं
अशर्फियां बरस रही हो. बटोर लो, जितना बटोरते बने. खेतों में जहां बगूले उठते थे,
वहां हल चलने लगे. बालवृन्द निकल-निकलकर तालाबों और पोखरों और गड़हियों का मुआयना
कर रहे थे.ओहो! तालाब तो आधा भर गया, और वहां से गड़हिया की तरफ दौड़े.
मगर अब कितना ही पानी बरसे, ऊख तो विदा हो गयी. एक-एक हाथ ही होके रह जायगी,
मक्का और जुआर और कोदों से लगान थोड़े ही चुकेगा, महाजन का पेट थोड़े ही भरा
जायेगा. हां, गौऔं के लिए चारा हो गया और आदमी जी गया.
जब माघ बीत गया और भोला के रुपये न मिले, तो एक दिन वह झल्लाया हुआ होरी के घर
आ धमका और बोला-यही है तुम्हारा कौल?इसी मुंह से तुमने ऊख पेरकर मेरे रुपये देने का
वादा किया था? अब तो ऊख पेर चुके.लाओ रुपये मेरे हाथ में.
होरी जब अपनौ विपत्ति सुनाकर और सब तरह से चिरोरी करके हार गया और भोला द्वार से न
हटा, तो उसने झुंझलाकर कहा- तो महतो इस वखत तो मेरे पास रुपये नहीं है, और न मुझे
कहीं उधार ही मिल सकते हैं. मैं कहां से लाऊं? दाने दाने की तंगी हो रही है.
विश्वास न हो, घर में आकर देख लो. जो कुछ मिले, उठा ले जाओ.
भोला ने निर्मम भाव से कहा- मैं तुम्हारे घर में क्यों तलासी लेने जाऊं और न मुझे
इससे मतलब है कि तुम्हारे पास रुपये हैं या नहीं. तुमने ऊख पेरकर रुपये देने का कहा
था. ऊख पेर चुके. अब मेरे रुपये मेरे हवाले करो.
`फिर जो कहो, वह करूं?’
`मै क्या कहूं?’
`मैं तुम्ही पर छोड़ता हूं.’
`मैं तुम्हारे दोनौं बैल खोल ले जाऊंगा.’
होरी ने उसकी ओर विस्मय -भरी आंखों से देखा, मानों अपने कानों पर विश्वास न आया हो.
फिर हतबुद्धि-सा सिर झुका कर रह गया. भोला क्या उसे भिखारी बनाकर छोड़ देना चाहते
हैं? दोनों बैल चले गये, तब तो उसके दोनों हाथ ही कट जायेंगे.
दीन स्वर में बोला-दोनों बैल ले लोगे, तो मेरा सर्वनाश हो जायेगा. अगर तुम्हारा धरम
यही कहता है, तो खोल ले जाओ.’
`तुम्हारे बनने-बिगड़ने की मुझे परवा नहीं है. मुझे अपने रुपये चाहिए.’
` और जो मैं कह दूं, मैंने रुपये दे दिये?’
भोला सन्नाटे में आ गया. उसे अपने कानों पर विश्वास न आया. होरी इतनी बड़ी बेईमानी
कर सकता है, यह सम्भव नहीं.
उग्र होकर बोला-अगर तुम हाथ में गंगाजली लेकर कह दो कि मैंने रुपये दे दिये, तो सबर
कर लूं.
`कहने का मन तो चाहता है, मरता क्या न करता, लेकिन, कहूंगा नहीं.’
`तुम कह ही नहीं सकते.’
`हां भैया, मैं नहीं कह सकता. हंसी कर रहा था.’ एक क्षण तक वह दुविधा में पड़ा रहा.
फिर बोला-तुम मुझसे इतना बैर क्यों पाल रहे हो भोला भाई? झुनिया मेरे घर में आ गयी,
तो मुझे कौन सा सरग मिल गया? लड़का अलग हाथ से गया, दो सौ रुपये ड़ांड अलग भरना
पड़ा.मैं तो कहीं का न रहा और अब तुम भी मेरी जड़ खोद रहे हो. भगवान् जानते हैं,
मुझे बिलकुल मालूम न था कि लौंडा क्या कर रहा है. मैं तो समझता था, गाना सुनने जाता
होगा. मुझे तो उस दिन पता चला, जब आधी रात को झुनिया घर में आ गयी. उस बखत मैं घर
में न रखता, तो सोचो, कहां जाती? किसकी होकर रहती?
झुनिया बरौटे के द्वार पर छिपे खड़ी यह बातें सुन रही थी. बाप को अब वह बाप नहीं,
शत्र समझती थी.डरी, कहीं होरी बैलों को दे न दें.जाकर रूपा से बोली-अम्मां को जल्दी
से बुला. कहना, बड़ा काम है, बिलम न करो.
धनिया खेत में गोबर फेंकने गयी थी, बहू का सन्देश सुना, तो आकर बोली- काहे बुलाया
बहू, मैं तो घबरा गयी. 119
`काका को तुमने देखा है न?’
`हां देखा, कसाई की तरह द्वार पर बैठा हुआ है. मैं तो बोली भी नहीं.’
`हमारे दोनों बैल मांग रहे हैं दादा से.’
धनिया के पेट की आंते भीतर सिमट गयीं.
`दोनों बैल मांग रहे है?’
`हां,कहते हैं या तो हमारे रुपये दो या हम दोनों बैल खोल ले जायेंगे.’
`तेरे दादा ने क्या कहा?’
`उन्होने कहा, तुम्हारा धरम कहता हो, तो खोल ले जाओ.’
`तो खोल ले जाये,लेकिन इसी द्वार पर आकर भीख न मांगे, तो मेरे नाम पर थूक देना
हमारे लहू से उसकी छाती जुड़ाती हो, तो जुड़ा ले.’
वह इसी तेश में आकर होरी से बोली-महतो दोनों बैल मांग रहे हैं, तो दे क्यों नहीं
देते? उनका पेट भरे, हमारे भगवान मालिक हैं. हमारे हाथ तो नहीं काट लेंगे! अब तक
अपनी मजूरी करते थे, अब दूसरों की मजूरी करेंगे. भगवान की मरजी होगी, तो फिर बैल-
बधिये हो जायेंगे, और मजूरी ही करते रहें, तो कौन बुराई है. बूढ़े-सूखे और पोत-लगान
का बोझ तो न रहेगा. मैं न जानती थी, यह हमारे बैरी हैं, नहीं गाय लेकर अपने सिर पर
विपत्ति क्यों लेती? उस निगोड़ी का पौरा जिस दिन से आया, घर तहस-नहस हो गया.
भोला ने अब तक जिस शस्त्र को छिपा कर रखा था, अब उसे निकालने का अवसर आ गया. उसे
विश्वास होगया, बैलों के सिवा इन सबों के पास कोई अवलम्ब नहीं है.
बैलों को बचाने के लिए ये लोग सब कुछ करने को तैयार हो जायेंगे. अच्छे निशानेबाज की
तरह मन को साधकर बोला-अगर तुम चाहते हो कि हमारी बेइज्जती हो और तुम चैन से बैठो,
तो यह न होगा. तुम अपने दो सौ को रोते हो.यहां लाख रुपये की आबरू बिगड़ गयी.
तुम्हारी कुशल इसी में है कि जैसे झुनिया को घर में रखा था , वैसे ही घर से उसे
निकाल दो, फिर न हम बैल मांगेंगे, गाय का दाम मांगेंगे. उसने हमारी नाक कटवायी है,
तो मैं भी उसे ठोकरें खाते देखना चाहता हूं. वह यहां रानी बनी बैठी रहे और हम मुंह
में कालिख लगाये उसके नाम को रोते रहें, यह नहीं देख सकता. वह मेरी बेटी है, मैंने
उसे गोद में खिलाया हे,और भगवान् साखी है, मैंने उसे कभी बेटों से कम नहीं समझा,
लेकिन आज उसे भीख मांगते और घूर पर दाने चुनते देखकर मेरी छाती सीतल हो जायगी. जब
बाप होकर मैंने अपना हिरदा इतना कठोर बना लिया है, तब सोचो, मेरे दिल पर कितनी बड़ी
चोट लगी होगी? इस मुंह जली ने सात पुस्त का नाम डुबा दिया, और तुम उसे घर में रखे
हुए हो, यह मेरी छाती पर मूंग दलना नहीं तो और क्या है!
धनिया ने जैसे पत्थर की लकीर खींचते हुए कहा-तो महतो, मेरी भी सुन लो. जो बात तुम
चाहते हो, वह न होगी. सौ जनम न होगी. झुनिया हमारी जान के साथ है. तुम बैल ही तो
ले जाने को कहते हो,ले जाओ.अगर इसे तुम्हारी कटी हुई नाक जुडती हो, तो जोड़ लो,
पुरखों की आबरु बचती हो, तो बचा लो. झुनिया से बुराई जरूर हुई. जिस दिन उसने मेरे
घर में पांव रखा था, मैं झाड़ू लेकर मारने उठी थी, लेकिन जब उसकी आंखों से झर-झर
आंसू बहने लगे, तो मुझे उस पर दया आ गयी. तुम अब बूढ़े हो गये महतो. पर आज भी
तुम्हें सगाई की धुन सवार है. फिर वह तो अभी बच्चा है.
भोला ने अपील भरी आंखों से होरी को देखा- सुनते हो होरी इसकी बातें? अब मेरा दोष
नहीं. मैं बिना बैल लिये न जाऊंगा.
होरी ने दृढ़ता से कहा- ले जाओ.
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`फिर रोना मत कि मेरे बैल खोल ले गये.’
`नहीं रोऊंगा.’
भोला बैलों की पगहिया खोल ही रहा था कि झुनिया चकतियोंदार साड़ी पहने, बच्चे को गोद
में लिये, बाहर निकल आयी और कम्पित स्वर में बोली- काका, लो मैं इस घर से निकल जाती
हूं और जैसी तुम्हारी मनोकामना है, उसी तरह भीख मांगकर अपना और बच्चे का पेट
पालूंगी और जब भीख भी न मिलेगी, तो कहीं डूब मरूंगी.
भोला खिसियाकर बोला-दूर हो मेरे सामने से. भगवान् न करे , मुझे तेरा मुंह देखना
पड़े. कुलच्छिनी, कुल-कलंकिनी कहीं की. अब तेरे लिए डूब मरना ही उचित है.
झुनिया ने उसकी और ताका भी नहीं. उसमें वह क्रोध था, जो अपने को खा जाना चाहता है,
जिसमें हिंसा नहीं, आत्मसमर्पण है. धरती इस वक्त मुंह खोलकर उसे निगल लेती, तो वह
कितना धन्य मानती! उसने आगे कदम उठाया.
लेकिन वह दो कदम भी न गयी थी कि धनिया ने दौड़कर उसे पकड़ लिया और हिंसा से भरे
स्नेह से बोली- तू कहां जाती है बहू, चल घर में. यह तेरा घर है, हमारे जीते भी और
हमारे मरने के पीछे भी. डूब मरे वह जिसे अपनी सन्तान से बैर हो. इस भले आदमी को
मुंह से ऐसी बात कहते लाज नहीं आती. मुझ पर धौंस जमाता है नीच. ले जा, बैलों का
रक्त पी…
झुनिया रोती हुई बोली- अम्मां, जब अपना बाप होके मुझे धिक्कार रहा है,
तो मुझे डूब ही मरने दो. मुझ अभागिनी के कारन तो तुम्हें दुःख ही मिला. जब से आयी,
तुम्हारा घर मिट्टी में मिल गया. तुमने इतने दिन मुझे जिस परेम से रखा, मां भी न
रखती. भगवान् मुझे फिर जनम दें, तो तुम्हारी कोख से दें, यही मेरी अभिलाषा है.
धनिया उसको अपनी ओर खींचती हुई बोली-यह तेरा बाप नहीं है, तेरा बेरी है, हत्यारा.
मां होती, तो अलबत्ते उसे कलक होती. ला सगाई, जूतों से न पीटे, तो कहना.
झुनिया सास के पीछे-पीछे घर में चली गयी. उधर भोला ने जाकर दोनों बैलों को खूंटों
से खोला और हांकता हुआ घर चला, जैसे किसी नेवते में जाकर पूरियों के बदले जूते
पड़े हों-अब करो खेती और बजाओ बंसी. मेरा अपमान करना चाहते हैं सब, न जाने कब का
बैर निकाल रहे हैं, नहीं ऐसी लड़की को कौन भला आदमी अपने घर में रखेगा? सब-के सब
ये बेसरम हो गये हैं.लौंडे का कहीं ब्याह न होता था इसी से. और इस रांड झुनिया की
ढिठाई देखो कि आकर मेरे सामने खड़ी हो गयी दूसरी लड़की होती, तो मुंह न दिखाती.
आंखो का पानी मर गया है. सबके सब दुष्ट और मूरख भी हैं समझते हैं, झुनिया अब हमारी
हो गयी. यह नहीं समझते, जो अपने बाप के घर न रही, वह किसी के घर नहीं रहेगी. समय
खराब है, नहीं बीच बाजार में इस चुड़ेल धनिया के झोंटे पकड़कर घसीटता. मुझे कितनी
गालियां देती थी!
फिर उसने दोनों बैलों को देखा, कितने तैयार हैं. अच्छी जोड़ी है. जहां चाहूं, सौ
रुपये में बेच सकता हूं. मेरे अस्सी रुपये खरे हो जायेंगे.
वह अभी गांव के बाहर भी न निकला था कि पीछे से दातादीन, पटेश्वरी, शोभा और दस-बीस
आदमी और दौड़े आते दिखाई दिये. भोला का लहू सर्द हो गया. अब फौजदारी हुई, बैल भी
छिन जायेंगे, मार भी पड़ेगी. वह रुक गया कमर कसकर. मरना ही है, तो लड़कर मरेगा.
दातादीन ने समीप आकर कहा-यह तुमने क्या अनर्थ किया भोला ऐं? उसके बैल खोल लाये, वह
कुछ बोला नहीं, इसी से सेर हो गये. सब लोग अपने-अपने काम में लगे थे, किसी को खबर
भी न हुई. होरी ने जरा-सा इशारा कर दिया होता, तो तुम्हारा एक-एक बाल नुच जाता. भला
चाहे हो, तो ले चलो बैल, जरा भी भलमंसी नही है तुममें?
पटेश्वरी बोले-यह उसके सीधेपन का फल है. तुम्हारे उस पर आते हैं, तो जाकर दिवानी
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में दावा करो, डिग्री कराओ. बैल खोल लाने का तुम्हें क्या अख्तियार है? अभी फौजदारी
में दावा कर दें, तो बंधे-बंधे फिरो.
भोला ने दबकर कहा-तो लाला साहब, कुछ जबरदस्ती थोड़े ही खोल लाये. होरी ने खुद दिये
पटेश्वरी ने भोला से कहा- तुम बैलों को लौटा दो भोला! किसान अपने बैल खुशी से तो
देता नहीं. इन्हें हल में जोतेगा.
भोला बैलों के सामने खड़ा हो गया. हमारे रुपये दिलवा दो, हमें बैलों को लेकर क्या
करना है?
`हम बैल लिये जाते हैं, अपने रुपये के लिए दावा करो और नहीं तो मारकर गिरा दिये
जाओगे. रुपये नगद दिये थे तुमने? एक कुलच्छिनि गाय बेचारे के सिर मढ़ दी और अब उसके
बैल खोले लिये जाते हो,
भोला बैलों के सामने से न हटा खड़ा रहा गुमसुम, दृढ़, मानों मरकर ही हटेगा. पटवारी
से दलील करके वह कैसे पेश पाता?
दातादीन ने एक कदम अअगे बढ़कर अपनी झुकी कमर को सीधा करके ललकारा-तुम सब खड़े ताकते
क्या हो, मार के भगा दो इसको, हमारे गांव से बैल खोल ले जायेगा?
बंसी बलिष्ठ युवक था. उसने भोला को जोर से धक्का दिया. भोला संभल न सका, गिर पड़ा.
उठना चाहता था कि बंसी ने फिर एक घूंसा दिया. होरी दौड़ता हुआ आ रहा था. भोला ने
उसकी ओर दस कदम बढ़कर पूछा-ईमान से कहना होरी महतो, मैंने बैल जबरदस्ती खोल लिये?
दातादीन ने इसका भावार्थ किया-यह कहते हैं कि होरी ने अपने खुशी से बैल मुझे दे
दिये. हमीं को उल्लू बनाते हैं.
होरी ने सकुचाते हुए कहा- यह मुझसे कहने लगे या तो झुनिया को घर से निकाल दो, या
मेरे रुपये दो, नहीं तो मैं बैल ले जाऊंगा. मैंने कहा, मैं बहू को तो न निकालूंगा,
न मेरे पास रुपये हैं, अगर तुम्हारा धरम कहे, तो बैल खोल लो. बस,मैंने इनके धरम पर
छोड़ दिया और इन्होंने बैल खोल लिये.
पटेश्वरी ने मुंह लटकाकर कहा- जब तुमने धरम छोड़ दिया, तब काहे की जबरदस्ती. उसके
धरम ने कहा, लिये जाता है. जाओ भैया, बैल तुम्हारे हैं. दातादीन ने समर्थन किया-हां
जब धरम की बात आ गयी, तो कोई क्या कहे. सब-के-सब होरी को तिरस्कार की आंखो से
देखते परास्त होकर लौट पड़े और विजयी भोला शान से गर्दन ऊठाये बैलों को ले चला.

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