गोदान (भाग 1)

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गोबर अंधेरे ही मुंह उठा और कोदई से विदा मांगी.सबको मालूम हो गया कि उसका ब्याह हो
चुका है, इसलिए उससे कोई विवाह-सम्बन्धी चर्चा नहीं की. उसके शील-स्वभाव ने सारे घर
को मुग्ध कर दिया था. कोदई की माता को उसने ऐसे मीठे शब्दों में और उसके मातृपद
की रक्षा करते हुए, ऐसा उपदेश दिया कि उसने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया था.
`तुम बड़ी हो माताजी, पूज्य हो. पुत्र माता के रिन से सौ जन्म लेकर भी उरिन नहीं हो
सकता, लाख जन्म लेकर भी उरिन नहीं हो सकता. करोड़ जन्म लेकर भी नहीं.’
बुढ़िया इस संख्यातीत श्रद्धा पर गद्गद हो गयी. इसके बाद गोबर ने जो कुछ कहा, उसमें
बुढ़िया को अपना मंगल ही दिखाई दिया.वैद्य एक बार रोगी को चंगा कर दे, फिर रोगी
उसके हाथों विष भी खुशी से पी लेगा-अब जैसे आज ही बहू घर से रूठकर चली गयी, तो
किसकी हेठी हुई, बहू को कौन जानता है? किसकी लड़की है, किसकी नातिन है, कौन जानता
है? सम्भव है उसका बाप घसियारा ही रहा हो….
बुढ़िया ने निश्चयात्मक भाव से कहा- धसियारा तो है ही बेटा, पक्का घसियारा. सबेरे
उसका मुंह देख लो, तो दिन-भर पानी न मिले.
गोबर बोला- तो ऐसे आदमी की क्या हंसी हो सकती है?हंसी हुई तुम्हारी, और तुम्हारे
आदमी की. जिसने पूछा,यही पूछा कि किसकी बहू है? फिर वह अभी लड़की है,अबोध, अल्हढ़.
नीच माता-पिता की लड़की है, अच्छी कहां से बन जाये? तुमको तो बूढ़े तोते को राम-नाम
पढ़ाना पड़ेगा.मारने से तो वह पढ़ेगा नहीं, उसे तो सहज स्नेह ही से पढ़ाया जा सकता
है. ताड़ना भी दो, लेकिन उसके मुंह मत लगो. उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता, तुम्हारा
अपमान होता है.
जब गोबर चलने लगा, तो बुढ़िया ने खांड और सत्तू मिलाकर उसे खाने को दिया. गांव के
और कई आदमी मजूरी की टोह में शहर जा रहे थे. बातचीत में रास्ता कट गया और नौ
बजते-बजते सब लोग अमीनाबाद के बाजार में जा पहुंचे. गोबर हैरान था, इतने आदमी नगर
में कहां से आ गये? आदमी पर आदमी गिरा पड़ता था.
उस दिन बाजार में चार-पांच सौ मजदूरों से कम न थे. राज और बढ़ई और लुहार और बेलदार
और खाट बुनने वाले और टोकरी ढोने वाले और संगतराश सभी जमा थे. गोबर यह जमघट देखकर
निराश हो गया. इतने सारे मजूरों को कहां काम मिल जाता है. और उसके हाथ तो कोई औजार
भी नहीं है.कोई औजार भी नहीं है. कोई क्या जानेगा कि वह क्या काम कर सकता है?
कोई उसे क्यों रखने लगा? बिना औजार के उसे कौन पूछेगा?
धीरे-धीरे एक-एक करके मजूरों को काम मिलता जा रहा था. कुछ लोग निराश होकर घर
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लौटे जा रहे थे. अधिकतर वह बूढ़े और निकम्मे बच रहे थे,जिनका कोई पुछत्तर न था,
और उन्हीं में गोबर भी था. लेकिन अभी आज उसके पास खाने को है. कोई गम नहीं.
सहसा मिर्जा खुर्शेद ने मजदूरों के बीच आकर ऊंची आवाज से कहा-जिसको छः आने रोज
पर काम करना हो, वह मेरे साथ आये. सबको छः आने मिलेंगे. पांच बजे छुट्टी मिलेगी.
दस-पांच राजों और बढ़इयों को छोड़कर सब-के-सब उनके साथ चलने को तैयार हो गये.
चार सौ फटेहालों की एक विशाल सेना सज गयी. आगे मिर्जा थे, कन्धे पर मोटा सोटा रखे
हुए. पीछे भुखमरों की लम्बी कतार थी, जैसे भेड़ें हों.
एक बूढ़े ने मिर्जा से पूछा- कौन काम करना है मालिक?
मिर्जा ने जो काम बतलाया, उस पर सब और भी चकित हो गये. केवल एक कबड्डी खेलना.
यह कैसा आदमी है, जो कबड्डी खेलने के छः आना रोज दे रहा है.सनकी तो नहीं है कोई?
बहुत धन पाकर आदमी सनक ही जाता है. बहुत पढ़ लेने से भी आदमी पागल हो जातें हैं.
कुछ लोगों को सन्देह होने लगा, कहीं यह कोई मखौल तो नहीं है? यहां से घर पर ले जाकर
कह दे, कोई काम नहीं है, तो कौन उसका क्या कर लेगा? वह चाहे कबड्डी खिलाये, चाहे
आंखमिचौनी, चाहे गुल्ली-डण्डा, मजूरी पेशगी दे दे. ऐसे झक्कड़ आदमी का क्या भरोसा?
गोबर ने डरते-डरते कहा-मालिक, हमारे पास कुछ खाने को नहीं है. पैसे मिल जायें, तो
कुछ लेकर खा लूं.
मिरजा ने झट छः आने पैसे उसके हाथ में रख दिये और ललकार कर बोले-मजूरी सबको चलते-
चलते पेशगी दे दी जायेगी. इसकी चिन्ता मत करो.
मिर्जा साहब ने शहर के बाहर थोड़ी-सी जमीन ले रखी थी.मजूरों ने जाकर देखा, तो एक
बड़ा अहाता घिरा हुआ था और उसके अन्दर केवल एक छोटी -सी फूंस की झोंपड़ी थी,
जिसमें तीन-चार कुर्सियां थीं, एक मेज. थोड़ी-सी किताबें मेज पर रखी हुई थीं.
झोंपड़ी बेलों और लताओं से घिरी हुई बहुत सुन्दर लगती थी. अहाते में एक तरफ आम
और नीबू और अमरूद के पौधे लगे हुए थे, दूसरी तरफ कुछ फूल. बड़ा हिस्सा परती था.
मिर्जा ने सबको कतार में खड़ा करके ही मजूरी बांट दी. अब किसी को उनके पागलपन में
सन्देह न रहा.
गोबर पैसे पहले ही पा चुका था, मिर्जा ने उसे बुलाकर पौधे सींचने का काम सौंपा. उसे
कबड्डी खेलने को न मिलेगी. मन में ऐंठकर रह गया. इन बुड्ढों को उठा-उठाकर पटकता,
लेकिन कोई परवाह नहीं. बहुत कबड्डी खेल चुका है. पैसे तो पूरे मिल गये.
आज युगों के बाद इन जराग्स्तों को कबड्डी खेलने का सौभाग्य मिला. अधिकतर तो ऐसे थे,
जिन्हें याद भी न आता था कि कभी कबड्डी खेली है या नहीं. दिनभर शहर में पिसते थे.
पहर रात गये घर पहुंचते थे और जो कुछ रूखा-सूखा मिल जाता था, खाकर पड़े रहते थे.
प्रातःकाल फिर वही चरखा शुरू हो जाता था. जीवन नीरस, निरानन्द, केवल एक ढर्रा मात्र
हो गया था.आज जो यह अवसर मिला, तो बूढ़े भी जवान हो गये. अधमरे बूढ़े ठठरियां लिए,
मुंह में दांत न पेट में आंत,जांघ के ऊपर धोतियां या तहमद चढ़ाये, ताल ठोक-ठोककर
उछल रहे थे, मानों उन बूढ़ी हड्डियों में जवानी धंस पड़ी हो. चटपट पाली बन गयी, दो
नायक बन गये. गोइयों का चुनाव होने लगा और बारह बजते-बजते खेल शुरु हो गया. जाड़ों
की ठण्डी धूप ऐसी क्रीड़ाओं के लिए आदर्श ऋतु है. इधर अहाते के फाटक पर मिर्जा साहब
तमाशाइयों को टिकट बांट रहे थे. उनपर इस तरह कोई-न-कोई सनक हमेशा सवार रहती थी.
अमीरों से पैसा लेकर गरीबों को बांट देना. इस बूढ़ी कबड्डी का विज्ञापन कई दिन से
हो रहा था.बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाये गये थे. नोटिस बांटे थे. यह खेल अपने ढंग का
निराला होगा, बिलकुल अभूतपूर्व. भारत के बूढ़े आज भी कैसे पोढ़े हैं, जिन्हें यह
देखना हो आयें, और अपनी आंखें तृप्त कर लें. जिसने यह तमाशा न देखा, वह पछतायेगा.
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ऐसा सुअवसर फिर न मिलेगा. टिकट दस रुपये से लेकर दो आने तक के थे. तीन बजते-
बजते सारा अहाता भर गया. मोटरों और फिटनों का तांतां लगा हुआ था. दो हजार से कम की
भीड़ न थी. रईसों के लिए कुर्सियों और बेंचों का इन्तजाम था. साधारण जनता के लिए
साफ-सुथरी जमीन.
मिस मालती मेहता, खन्ना,तंखा और रायसाहब सभी विराजमान थे.
खेल शुरु हुआ, तो मिर्जा ने मेहता से कहा-आइये डाक्टर साहब, एक गोई हमारी और आपकी
हो जाये.
मिस मालती बोली-फिलासफर का जोड़ तो फिलासफर ही हो सकता है.
मिर्जा ने मूंछो पर ताव देकर कहा- तो क्या आप समझते हैं, मैं फिलासफर नहीं हूं?
मेरे पास पुछल्ला नहीं है, लेकिन हूं मैं फिलासफर. आप मेरा इम्तिहान ले सकते हैं
मेहताजी!
मालती ने पूछा- अच्छा बतलाइये, आप आइडियलिस्ट हैं या मेटिरियलिस्ट?
`मैं दोनों हूं.’
`यह क्योंकर?’
`बहुत अच्छी तरह. जब जैसा मौका देखा, वैसा बन गया.’
`आपका अपना कोई निश्चय नहीं है.’
`जिस बात का आज तक कभी निश्चय न हुआ, और न कभी होगा, उसका निश्चय
मैं भला क्या कर सकता हूं. और लोग आंखें फोड़कर और किताबें चाटकर जिस नतीजे पर
पहुंचते हैं, वहां मैं यों ही पहुंच गया. आप बता सकती हैं, किसी फिलासफर ने
अक्लीगद्दे लड़ाने के सिवाय और कुछ किया है?’
डाक्टर मेहता ने अचकन के बटन खोलते हुए कहा- तो चलिए हमारी और आपकी बाजी हो
ही जाये. और कोई माने या न माने, मैं आपको फिलासफर मानता हूं.
मिर्जा ने खन्ना से पूछा- आपके लिए भी कोई जोड़ ठीक करूं?
मालती ने पुचारा दिया- हां,हां, इन्हें जरूर ले जाईये मिस्टर तंखा के साथ.
खन्ना झेंपते हुऐ बोले- जी नहीं, मुझे क्षमा कीजिये.
मिर्जा ने रायसाहब से पूछा-आपके लिए कोई जोड़ लाऊं?
रायसाहब बोले-मेरा जोड़ तो ओंकारनाथ का है, मगर वह आज नजर नहीं आते.
मिर्जा और मेहता भी नंगी देह, केवल जांधिये पहने हुए मैदान में पहुंच गये. एक इधर,
दूसरा उधर. खेल शुरू हो गया.
जनता बूढ़े कुलेलों पर हंसती थी, तालियां बजाती थी, गालियां देती थी, ललकारती थी,
बाजियां लगाती थी. वाह! जरा इन बूढ़े बाबा को देखो. किस शान से जा रहे हैं, जैसे सब
को मारकर ही लौटेंगे. अच्छा, दूसरी तरफ से भी उन्हीं के बड़े भाई निकले. दोनों कैसे
पैंतरे बदल रहें हैं? इन हड्डियों में अभी बहुत जान है.इन लोगों ने जितना घी खाया
है, उतना अब हमें पानी भी मयस्सर नहीं. लोग कहते हैं, भारत धनी हो रहा है. होता
होगा. हम तो यही देखते हैं कि इन बुड्ढों जैसे जीवट के जवान भी आज मुश्किल से
निकलेंगे. वह उधर वाले बुड्ढे ने इसे दबोच लिया. बेचारा छूट निकलने के लिए कितना
जोर मार रहा है, मगर अब नहीं जा सकते बच्चा.एक को तीन लिपट गये.इस तरह लोग अपनी
अपनी दिलचस्पी जाहिर कर रहे थे.उनका सारा ध्यान मैदान की ओर था. खिलाड़ियों के
आघात-प्रतिघात, उछल-कूद, धर-पकड़ और उनके मरने-जीने में तन्मय हो रहे थे.कभी
चारों तरफ से कहकहे पड़ते, कभी कोई अन्याय या धांधली देखकर लोग `छोड़ दो, छोड़ दो,
का गुल मचाते. कुछ लोग तैश में आकर पाली की तरफ दौड़ते, लेकिन जो थोड़े-से सज्जन
शामियाने में ऊंचे दर्जे के टिकट लेकर बैठे थे, उन्हे इस खेल मैं विशेष आनन्द न मिल
रहा था. वे इससे अधिक महत्त्व की बातें कर रहे थे.
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खन्ना ने जिंजर का गिलास खाली करके सिगार सुलगाया और रायसाहब से बोले- मैंने आपसे
कह दिया, बैंक इससे कम सूद पर किसी तरह राजी न होगा और यह रियासत भी मैंने आपके साथ
की है, क्योंकि आपके साथ घर का मुआमला है.
रायसाहब ने मूंछों में मुस्कराहट को लपेटकर कहा-आपकी नीति में घरवालों को ही उलटे
छुरे से हलाल करना चाहिए?
`यह आप क्या फरमा रहे हैं?’
`ठीक कह रहा हूं. सूर्यप्रताप सिंह से आपने केवल सात फीसदी लिया है, मुझसे नौ फीसदी
मांग रहे हैं, और उस पर एहसान भी रखते हैं क्यों न हो?’
`उन शर्तों पर मैं आपसे भी वही सूद ले लूंगा. हमने उनकी जायदाद रेहन रख ली है और
शायद यह जायदाद फिर उनके हाथ न जायेगी.’
मैं अपणी कोई जायदाद निकाल दूंगा. नौ परसेन्ट देने से यह अच्छा है कि फालतू
जायदाद अलग करदूं. मेरी जेकसन रोडवाली कोठी आप निकलवा दें कमीशन ले लीजियेगा.’
`उस कोठी का सुभीते से निकलना जरा मुश्किल है. आप जानते हैं, वह जगह बस्ती से कितनी
दूर है, मगर खैर, देखूंगा. आप उसकी कीमत का क्या अन्दाजा करते हैं?’
रायसाहब ने एक लाख पच्चीस हजार बताये. पन्द्रह बीघे जमीन भी तो है उसके साथ.
खन्ना स्तम्भित रह गये. बोले-आप आज के पन्द्रह साल पहले का स्वप्न देख रहे हैं
रायसाहब! आपको मालूम होना चाहिए कि इधर जायदादों के मूल्य में पचास परसेन्ट की कमी
हो गयी है.
रायसाब ने बुरा मानकर कहा-जी नहीं, पन्द्रह साल पहले उसकी कीमत डेढ़ लाख थी.
`मैं खरीददार की तलाश मैं रहूंगा, मगर मेरा कमीशन पांच प्रतिशत होगा आपसे.’
`औरौं से शायद दस प्रतिशत हो,क्यों , क्या करोगे इतने रुपये लेकर?’
`आप जो चाहे दे दीजियेगा. अब तो राजी हुए. शुगर मिल के हिस्से अभी तक आपने न खरीदे?
अब बहुत थोड़े-से हिस्से बच रहें हैं. हाथ मलते रह जाइयेगा इंश्योरेंस की पालिसी भी
आपने न ली. आपमें टाल-मटोल की बुरी आदत है. जब अपने लाभ की बातों का इतने
टालमटोल, तब दूसरों को आप लोगों से क्या लाभ हो सकता है! इसी से कहते हैं, रियासत
आदमी की अक्ल चर जाती है. मेरा बस चले, तो मैं ताल्लुकेदारों की रियासतें जब्त कर
लूं.’
मिस्टर तंखा मालती पर जाल फेंक रहे थे. मालती ने साफ कह दिया था कि वह इलेक्शन
के झमेले में नहीं पड़ना चाहती, पर तंखा इतनी आसानी से हार मानने वाले व्यक्ति न थे
आकर कुहनियों के बल मेज पर टिककर बोले-आप जरा उस मुआमले पर फिर विचार करें.
मैं कहता हूं,ऐसा मौका शायद फिर आपको न मिले. रानी साहब चन्दा को आपके मुकाबले में
रुपये में एक आना भी चांस नहीं है. मेरी इच्छा केवल यह है कि कौंसिल में ऐसे लोग
जायें, जिन्होंने जीवन में कुछ अनुभव प्राप्त किया है और जनता की कुछ सेवा की है.
जिस महिला ने भोग विलास के सिवा कुछ जाना ही नहीं, जिसने जनता को हमेशा अपनी कार
का पेट्रोल समझा, जिसकी सबसे मूल्यवान् सेवा वे पार्टियां है, जो वह गवर्नरों और
सेक्रेटरियों को दिया करती हैं, उनके लिए इस कौंसिल में स्थान नहीं है,नयी कौंसिल
में बहुत कुछ अधिकार प्रतिनिधियों के हाथ में होगा, और मैं नहीं चाहता कि वह अधिकार
अनधिकारियों के हाथ में जाये. मालती ने पीछा छुड़ाने के लिए कहा- लेकिन साहब, मेरे
पास दस-बीस हजार इलेक्शन पर खर्च करने के लिए कहां है? रानी साहब तो दो चार लाख
खर्च कर सकती हैं. मुझे भी साल में हजार पांच सौ रुपये उनसे मिल जाते हैं,यह रकम भी
हाथ से निकल जायगी.
`पहले आप यह बता दें कि आप जाना चाहती हैं या नहीं?’
`जाना तो चाहती हुं, मगर फ्री पास मिल जाये तो.’

`तो यह मेरा जिम्मा रहा, आपको फ्री पास मिल जायेगा.’

`जी नहीं, क्षमा कीजिये. मैं हार की जिल्लत न उठाना चाहती. जब रानी साहब रुपये
की थैलियां खोल देंगी और एक-एक वोट पर एक-एक अशर्फी चढ़ने लगेगी, तो शायद आप
भी उधर वोट देंगे.’
`आपके खयाल में इलेक्शन महज रुपये से जीता जा सकता है?’
`जी नहीं, व्यक्ति भी एक चीज है. लेकिन मैंने केवल एक बार जेल जाने के सिवा और क्या
जन-सेवा की है?’ और सच पूछिये, तो उस बार भी मैं अपने मतलब ही से गयी थी, उसी तरह
जैसे रायसाहब और खन्ना गये थे. इस नयी सभ्यता का आधार धन है. विद्या और सेवा और कुल
और जाति सब धन के सामने हेय हैं. कभी-कभी इतिहास में ऐसे अवसर आ जाते हैं, जब धन को
आन्दोलन के सामने नीचा देखना पड़ता है, मगर इसे अपवाद समझिये. मैं अपनी ही बात कहती
हूं.कोई गरीब औरत दवा खाने में आ जाती है, तो घन्टों उससे बोलती नहीं, पर कोई महिला
कार पर आ गयी, तो द्वार तक जाकर उसका स्वागत करती हूं और उसकी ऐसी उपासना करती
हूं, मानों साक्षात् देवी है. मेरा और रानी साहब का कोई मुकाबला नहीं. जिस तरह
कौंसिल बन रहें हैं, उनके लिए रानी साहब ही ज्यादा उपयुक्त हैं.
उधर मैदान में मेहता की टींम कमजोर पड़ती जाती थी.आधे से ज्यादा खिलाड़ी मर चुके
थे.मेहता ने अपने जीवन में कभी कबड्डी न खेली थी. मिर्जा इस फन के उस्ताद थे. मेहता
की तातीलें अभिनय के अभ्यास में कटती थीं. रूप भरने में वह अच्छे-अच्छे को चकित कर
देतै थे,और मिर्जा के लिए सारी दिलचस्पी अखाड़े में थी, पहलवानों के भी और परियों
के भी.
मालती का ध्यान उधर भी लगा हुआ था. उठकर रायसाहब से बोली-मेहता की पार्टी तो बुरी
तरह पिट रही है.
रायसाहब और खन्ना में इंश्योरेन्स की बातें हो रही थीं. रायसाहब उस प्रसंग से ऊबे
हुऐ मालूम होते थे. मालती ने मानों उन्हें एक बण्धन से मुक्त कर दिया. उठकर बोले-
जी हां, पिट तो रही है. मिर्जा पक्का खिलाड़ी है.
`मेहता को यह क्या सनक सूझी? व्यर्थ अपनी भद्द करा रहे हैं.’
`इसमें काहे की भद्द? दिल्लगी तो है.’
`मेहता की तरफ से जो बाहर निकलता है, वही मर जाता है.’
एक क्षण के बाद उसने पूछा-क्या इस खेल में हाफ टाइम नहीं होता?
खन्ना को शरारत सूझी. बोले-आप चले थे मिर्जा से मुकाबला करने. समझते थे, यह भी
फिलासफी है.
`मैं पूछती हूं इस खेल में हाफ टाईम नहीं होता?’
खन्ना ने फिर चिढ़ाया-अब खेल ही खतम हुआ जाता है. मजा आयेगा तब, जब मिर्जा मेहता को
दबोचकर रगड़ेंगे और मेहता साहब `चीं’ बोलेंगे.
मैं तुमसे नहीं पूछती. रायसाहब से पूछती हूं.’
रायसाहब बोले- इस खेल में हाफ टाइम? एक ही एक आदमी तो सामने आता है.
`अच्छा, मेहता का एक आदमी और मर गया.’
खन्ना बोले-आप देखती रहिये.इस तरह सब मर जायेंगे और आखिर में मेहता साहब भी मरेंगे.
मालती जल गई- आपकी हिम्मत न पड़ी बाहर निकलने की?
मैं गंवारों के खेल नहीं खेलता. मेरे लिए टेनिस है.’
`टेनिस में भी मैं तुम्हें सैंकड़ों गेम दे चुकी हूं.’
`आपसे जीतने का दावा ही कब है?’
`अगर दावा हो, तो मैं तैयार हूं.’
मालती उन्हें फटकार बताकर फिर अपनी जगह आ बैठी. किसी को मेहता से हमदर्दी नहीं है.
कोई यह नहीं कहता कि अब खेल खत्म कर दिया जाये. मेहता भी अजीभ बुद्धू आदमी हैं, कुछ
धांधली क्यों नहीं कर बैठते?यहां अपनी न्याय प्रियता दिखा रहें हैं. अभी हारकर
लौटेंगे, तो चारों तरफ से तालियां पड़ेगीं. अब शायद बीस आदमी उनकी तरफ और होंगे,
और लोग कितने खुश हो रहे हैं!
ज्यों-ज्यों अन्त समीप आता जाता था, लोग अधीर होते जाते थे और पाली की तरफ बढ़ते
जाते थे. रस्सी का जो कठघरा-सा बनाया गया था, वह तोड़ दिया गया. स्वयंसेवक रोकने की
चेष्टा कर रहे थे, पर उस उत्सुकता के उन्माद में उनकी एक न चलती थी. यहां तक कि
ज्वार अन्तिम बिन्दु तक आ पहुंचा और मेहता अकेले बच गये और अब उन्हें गूंगे का
पार्ट खेलना पड़ेगा. अब सारा दारमदार उन्हीं पर है, अगर वह बचकर अपनी पाली में लौट
आते हैं, तो उनका पक्ष बचता है. नहीं हार का सारा अपमान और लज्जा लिये हुए उन्हें
लौटना पड़ता है.वह दूसरे पक्ष के जितने आदमियों को छूकर अपनी पाली में आयेंगे,
वह सब मर जायेंगे और उतने ही आदमी उनकी तरफ जी उठेंगे. सबकी आंखे मेहता की ओर लगी
हुई थीं. वह मेहता चले. जनता ने चारों ओर से आकर पाली को घेर लिया. तन्मयता अपनी
पराकाष्टा पर थी. मेहता कितने शान्त भाव से शत्रुओं की ओर जा रहे हैं. उनकी
प्रत्येक गति जनता पर प्रतिबिम्बित हो जाती है, किसी की गर्दन टेढ़ी हुई जाती है,
कोई आगे को झुका पड़ता है.वातावरण गरम हो गया,पारा ज्वाला-बिन्दु पर आ पहुंचा है.
मेहता शत्रु-दल में घुसे. दल पीछे हटता जाता है. उनका संगठन इतना दृढ़ है कि मेहता
की पकड़ या स्पर्श में कोई नहीं आ रहा है.बहुतों को आशा थी, मेहता कम-से-कम अपने
पक्ष के दस-पांच आदमियों को तो जिला ही लेंगे, वे निराश होते जा रहे हैं.
सहसा मिर्जा एक छलांग मारते है और मेहता की कमर पकड़ लेते हैं. मेहता अपने को
छुड़ाने के लिए जोर मार रहें हैं मिर्जा को पाली की तरफ खींचे लिये आ रहें है. लोग
उन्मत्त हो जाते हैं अब इसका पता चलना मुश्किल है कि कौन खिलाड़ी, कौन तमाशाई
सब एक गडमड हो गये हैं. मिर्जा और मेहता में मल्लयुद्ध हो रहा है. मिर्जा के कई
बुड्ढे मेहता की तरफ लपके और उनसे लिपट गये. मेहता जमीन पर चुपचाप पड़े हुए हैं.
अगर वह किसी तरह कींच-खांच कर दो हाथ और ले जायें, तो उनके पचासों आदमी जी उठते हैं
मगर वह एक इञ्च भी नहीं खिसक सकते. मिर्जा उनकी गर्दन पर बैठे हुए हैं.मेहता का मुख
लाल हो रहा है. आंखे बीर-बहूटी बनी हुई हें. पसीना टपक रहा है, और मिर्जा अपने
स्थूल शरीर का भार उनकी पीठ पर हुमच रहें हैं.
मालती ने समीप जाकर उत्तेजित स्वर में कहा मिर्जा खुर्शेद, यह फेयर नहीं है. बाजी
ड्रान रही.
खुर्शेद ने मेहता की गर्दन पर एक घस्सा लगाकर कहा-जब तक यह `चीं’ न बोलेंगे, मैं
हरगिज न छोड़ूंगा. क्यों नहीं `चीं’ बोलते?
मालती और आगे बढ़ी-`चीं’ बुलाने के लिए आप इतनी जबरदस्ती नहीं कर सकते.
मिर्जा ने मेहता की पीठ पर हुमचकर कहा बेशक कर सकता हूं. आप इनसे कह दें,
`चीं’ बोले, मैं अभी उठा जाता हूं.
मेहता ने एक बार फिर उठने की चेष्टा की, पर मिर्जा ने उनकी गर्दन दबा दी.
मालती ने उनका हाथ पकड़कर घसीटने की कोशीस करके कहा- यह खेल नहीं, अदावत है.
`अदावत ही सही.’
`आप न छोड़ेंगे?’ 114
उसी वक्त जैसे भूकम्प आ गया मिर्जा साहब जमीन पर पड़े हुए थे और मेहता दौड़े हुए
पाली की ओर भागे जा रहे थे और हजारौं आदमी पागलों की तरह टोपियां और पगड़ियां और
छड़िया उछाल रहे थे. कैसे यह काया पलट हुई, कोई समझ न सका.
मिर्जा ने मेहता को गोद में उठा लिया और लिये हुए शामियाने तक आये. प्रत्येक मुख पर
यह शब्द थे-डाक्टर साहब ने बाजी मार ली. और प्रत्येक आदमी इस हारी हुई बाजी के एक
बारगी पलट जाने पर विस्मित था. सभी मेहता के जीवट और धैर्य का बखान कर रहे थे.
मजदूरों के लिए पहले से नारंगियां मंगा ली गई थी. उन्हें एक-एक नारंगी देकर विदा
किया गया. शामियाने में मेहमानों के चाय-पानी का आयोजन था. मेहता और मिर्जा एक ही
मेज पर आमने सामने बैठे. मालती मेहता के बगल में बैठी.
मेहता ने कहा-मुझे आज एक नया अनुभव हुआ.महिला की सहानुभुति हार को जीत बना सकती है.
मिर्जा ने मालती की ओर देखा- अच्छा. यह बात थी जभी तो मुझे हेरत हो रही थी कि आप
एकाएक कैसे ऊपर आ गये.
मालती शर्म से लाल हुई जाती थी. बोली-आप बड़े बेमुरौवत आदमी हैं मिर्जाजी, मुझे आज
मालूम हुआ.
`कुसूर इनका था. यह क्यों `चीं’नहीं बोलते थे?’
मैं तो `चीं’ न बोलता, चाहे आप मेरी जान ही ले लेते.’
कुछ देर मित्रों में गप-शप होती रही. फिर धन्यवाद के और मुबारकबाद के भाषण हुए और
मेहमान लोग विदा हुए. मालती को एक विजीट करनी थी. वह भी चली गयी. केवल मेहता और
मिर्जा रह गये. उन्हे अभी स्नान करना था. मिट्टी में सने हुए थे. कपड़े कैसे पहनते?
गोबर पानी खींच लाया और दोनों दोस्त नहाने लगे.
मिर्जा ने पूछा-शादी कब तक होगी?
मेहता ने अचम्भे में आकर पूछा-किसकी?’
`आपकी.’
`मेरी शादी! किसके साथ हो रही है?’
`वाह! आप तो ऐसा उड़ रहे हैं, गोया यह भी छिपाने की बात है.’
`नहीं-नहीं,मैं सच कहता हूं,मुझे बिलकुल खबर नहीं है.क्या मेरी शादी होने जा रही है
`और आप क्या समझते हैं, मिस मालती आपकी कम्पेनियन बनकर रहेंगी?’ मेहता गम्भीर भाव
में बोले-आपका खयाल बिलकुल गलत है मिर्जाजी! मिस मालती हसीन हैं, खुशमिजाज हैं,
समझदार हैं, रोशनखयाल हैं और भी उनमें कितनी खूबियां हैं. लेकिन मैं अपनी जीवन-
संगनी में जो बात देखना चाहता हूं, वह उनमें नहीं है और न शायद हो सकती है. मेरे
जेहन में औरत वफा और त्याग की मूर्ति है, जो अपनी बेजबानी से, अपनी कुर्बानी से,
अपने को बिलकुल मिटाकर पति की आत्मा का एक अंश बन जाती है. देह पुरुष की रहती है,
पर आत्मा स्त्री की होती है. आप कहेंगे, मर्द अपने को क्यों नहीं मिटाता? औरत ही
से क्यों इसकी आशा करता है? मर्द में वह सामर्थ्य ही नहीं है. वह अपने को मिटायेगा,
तो शून्य हो जायेगा. वह किसी खोह में जा बैठेगा और सर्वात्मा में मिल जाने का
स्वप्न देखेगा. वह तेजप्रधान जीव है, और अहंकार में यह समझकर कि वह ज्ञान का पुतला
है, सीधा ईश्वर में लीन होने की कल्पना किया करता है.स्त्री पृथ्वी की भांति
धैर्यवान है, शान्ति-सम्पन्न है, सहिष्णु है. पुरूष में नारी के गुण आ जाते हैं, तो
वह महात्मा बन जाता है. नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं, तो वह कुलटा हो जाती है.
पुरूष आकर्षित होता है स्त्री की ओर, जो सर्वांश में स्त्री हो. मालती ने अभी तक
मुझे आकर्षित नहीं किया. मैं आपसे किन शब्दों में कहूं कि

स्त्री मेरी नजर में क्या है. संसार में जो कुछ सुन्दर है, उसी की प्रतिमा को मैं
स्त्री कहता हूं.मैं उससे यह आशा रखता हूं कि उसे मार ही डालूं,तो भी प्रतिहिंसा का
भाव उसमें न आये. अगर मैं उसकी आंखों के सामने किसी स्त्री को प्यार करुं, तो भी
उसकी ईर्ष्या न जागे. ऐसी नारी पाकर मैं उसके चरणों में गिर पडूंगा और उस पर अपने
को अर्पण कर दूंगा.
मिर्जा ने सिर हिलाकर कहा- ऐसी औरत आपको इस दुनिया में तो शायद ही मिले.
मेहता ने हाथ मारकर कहा एक नहीं, वरना दुनिया वीरान हो जाती.
`ऐसी एक ही मिसाल दीजिये.’
`मिसेज खन्ना को ही ले लीजिये.’
`लेकिन खन्ना.’
`खन्ना अभागे हैं, जो हीरा पाकर कांच का टुकड़ा समझ रहें हैं. सोचिये, कितना त्याग
है, उसके साथ ही कितना प्रेम है. खन्ना के रूपासक्त मन में. शायद उसके लिए रत्ती-भर
भी स्थान नहीं है, लेकिन आज खन्ना पर कोई आफत आ जाये, तो वह अपने को उन पर न्योछावर
कर देगी. खन्ना आज अन्धे या कोढ़ी हो जायें, तो भी उसकी वफादारी में फर्क न आयेगा.
अभी खन्ना उसकी कद्र नहीं कर सकते हैं ,मगर आप देखेंगे, एक दिन यही खन्ना उसके चरण
धो-धोकर पियेंगे. मैं ऐसी बीवी नहीं चाहता, जिससे मैं आइंस्टीन के सिद्धान्त पर बहस
कर सकूं,या जो मेरी रचनाओं के प्रूफ देखा करे. ऐसी औरत चाहता हूं, जो मेरे
जीवन को पवित्र और उज्जवल बना दे, अपने प्रेम और त्याग से.’
खुर्शेद ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए जैसे कोई भूली हुई बात याद करके कहा-आपका ख्याल
बहुत ठीक है मिस्टर मेहता! ऐसी औरत अगर कहीं मिल जाये, तो मैं भी शादी कर लूं,
लेकिन मुझे उम्मीद नहीं है कि मिले.
मेहता ने हंसकर कहा-आप भी तलाश मे रहिये, मैं भी तलाश में हूं.शायद कभी तकदीर जागे.
`मगर मिस मालती आपको छोड़ने वाली नहीं. कहिये लिख दूं.’
`ऐसी औरतों से मैं केवल मनोरमजन कर सकता हूं, ब्याह नहीं. ब्याह तो आत्मसमर्पण है.’
`अगर ब्याह आत्मसमर्पण है, तो प्रेम क्या है?’
`प्रेम जब आत्मसमर्पण का रूप लेता है, तभी ब्याह है, उसके पहले ऐयाशी है.’
मेहता ने कपड़े पहने और विदा हो गये. शाम हो गई. मिर्जा ने जाकर देखा, तो गोबर अभी
तक पेड़ों को सींच रहा था. मिर्जा ने प्रसन्न होकर कहा-जाओ, अब तुम्हारी छुट्टी है.
कल फिर आओगे?
गोबर ने कातर भाव से कहा, मैं कहीं नौकरी चाहता हूं मालिक!
`नौकरी करना है, तो हम तुझे रख लेंगे.’
`कितना मिलेगा हुजूर?’
`जितना तू मांगे.’
`मैं क्या मांगू? आप जो चाहे दे दें .
`हम तुम्हें पन्द्रह रुपये देंगे और खूब कसकर काम लेंगे.’
गोबर मेहनत से नहीं डरता. उसे रुपये मिलें, तो वह आठों पहर काम करने को तैयार है.
पन्द्रह रुपये मिलें, तो फिर क्या पूछना? वह तो प्राण भी दे देगा.
बोला- मेरे लिए कोठरी मिल जाये, वहीं पड़ा रहूंगा.
`हां-हां,जगह का इन्तजाम मैं कर दूंगा.इसी झोंपड़ी में एक किनारे तुम भी पड़ जाना.’
गोबर को जैसे स्वर्ग मिल गया.

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