गोदान (भाग 1)

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रात को गोबर झुनिया के साथ चला, तो ऐसा कांप रहा था, जैसे उसकी नाक कटी हुई हो.
झुनिया को देखते ही सारे गांव में कुहराम मच जायेगा, लोग चारों ओर से कैसी हाय-हाय
मचायेंगे, धनिया कितनी गालियां देंगी,यह सोच-सोच कर उसके पांव पीछे रह गये थे. होरी
का तो उसे भय न था. वह केवल एक बार धाड़ेंगें, फिर शान्त हो जायेंगे. डर था धनिया
का, जहर खाने लगेगी, घर में आग लगाने लगेगी. नहीं, इस वक्त झुनिया के साथ घर नहीं
जा सकता.
लेकिन कहीं धनिया ने झुनिया को घर में घुसने न दिया और झाड़ू लेकर मारने दौड़ी, तो
वह बेचारी कहां जायेगी? अपने घर तो लौट नहीं सकती. कहीं कुएं में कूद पड़े या गले
में फांसी लगा ले, तो क्या हो? उसने लम्बी सांस ली. किसकी शरण लें?
मगर अम्मां इतनी निर्दयी नहीं हैं कि मारने दौड़ें.क्रोध में दो चार गालियां देंगी.
लेकिन जब झुनिया उनके पांव पकड़कर रोने लगेगी, तो उन्हें जरूर दया आ जायेगी.
तब तक वह खुद कहीं छिपा रहेगा. जब उपद्रव शान्त हो जायेगा, तब वह एक दिन धीरे से
आयेगा और अम्मां को मना लेगा. अगर इस बीच उसे कहीं मजूरी मिल जाये और दो-चार
रुपये लेकर घर लौटे, तो फिर धनिया का मुंह बन्द हो जायेगा.
झुनिया बोली- मेरी छाती धक्-धक् कर रही है. मैं क्या जानती थी, तुम मेरे गले यह रोग
मढ़ दोगे? न जाने किस बुरी साइत में तुमको देखा. न तुम गाय लेने आते, न यह सब कुछ
होता. तुम आगे- आगे जाकर जो कुछ कहना-सुनना हो, कह-सुन लेना. मैं पीछे से आऊंगी.
गोबर ने कहा–नहीं-नहीं, पहले तुम जाना और कहना, मैं बाजार से सौदा बेचकर घर जा रही
थी. रात हो गयी है, अब कैसे जाऊं? तब तक मैं आ जाऊंगा.
झुनिया ने चिन्तित मन से कहा- तुम्हारी अम्मां बड़ी गुस्सेल; हैं. मेरा तो जी
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कांपता है. कहीं मुझे मारने लगें, तो क्या करूंगी?
गोबर ने धीरज दिलाया-अम्मां की आदत ऐसी नहीं. हम लोगों तक को तो कभी तमाचा मारा
नहीं, तुम्हें क्या मारेंगी? उनको जो कुछ कहना होगा, मुझे कहेंगी, तुमसे तो बोलेंगी
भी नहीं.
गांव समीप आ गया. गोबर ने ठिठककर कहा- अब तुम जाओ.
झुनिया ने अनुरोध किया- तुम भी देर न करना.
`नहीं-नहीं, छन-भर में आता हूं, तू चल तो.’
`मेरी जी जाने कैसा हो रहा है? तुम्हारे ऊपर क्रोध आता है.’
`तुम इतना डरती क्यों हो? मैं तो आ ही रहा हूं.’
`इससे तो कहीं अच्चा था कि किसी दूसरी जगह भाग चलते.’
`जब अपना घर है, तो क्यों कहीं भागें? तुम नाहक डर रही हो.’
`जल्दी से आओगे न?’
`हां- हां, अभी आता हूं.’
`मुझसे दगा तो नहीं कर रहे हो? मुझे घर भेजकर आप कहीं चलते बनों?’
`इतना नीच नहीं हूं झूना.. जब तेरी बांह पकड़ी है, तो मरतेत दम तक निभाऊंगा.’
झुनिया घर की ओर चली. गोबर एक क्षण दुविधा में पड़ा रहा. फिर एकाएक सिर पर मंडराने
वाली धिक्कार की कल्पना भयंकर रूप धारण करके उसके सामने खड़ी हो गयी. कहीं सचमुच
अम्मां मारने दौड़े, तो क्या हो? उसके पांव जैसे धरती से चिमट गये. उसके और उसके घर
के बीच केवल आमों का छोटा- सा बाग था. झुनिया की काली परछाई धीरे-धीरे जाती हुई दीख
रही थी. उसकी ज्ञानेन्द्रियां बहुत तेज हो गयी थीं. उसके कानों में ऐसी भनक पड़ी,
जैसे अम्मां झुनिया को गाली दे रही है. उसके मन की कुछ ऐसी दशा हो रही थी, मानों
सिर पर गडांसे का हाथ पड़ने वाला हो. देह का सारा रक्त जैसे सूख गया हो. एक क्षण
के बाद उसने देखा, जैसे धनिया घर से निकलकर कहीं जा रही हो. दादा के पास जाती होगी.
साइत दादा खा-पीकर मटर अगोरने चले गये हैं.वह मटर के खेत की ओर चला.जौ-गेहूं के
खेतों को रौंदता हुआ वह इस तरह भागा जा रहा था, मानों पीछे दौड़ आ रही है. वह है
दादा की मड़ैया. वह रुक गया और दबे पांव आकर मड़ैया के पीछे बैठ गया.उसका अनुमान
ठीक निकला. वह पहुंचा ही था कि धनिया की बोली सुनाई दी. ओह! गजब हो गया!अम्मां
इतनी कठोर है. एक अनाथ लड़की पर इन्हें तनिक भी दया नहीं आती. और जो मैं सामने
जाकर फटकार दूं कि तुमको झुनिया से बोलने की कोई मजाल नहीं है, तो सारी सेखी निकल
जाये. अच्छा! दादा भी बिगड़ रहे हैं. केले के लिए आज ठीकरा भी तेज हो गया. मैं जरा
अदब करता हूं, उसी का फल है. यह तो दादा भी वहीं जा रहे हैं.अगर झुनिया को इन्होंने
मारा पीटा तो मुझसे न सहा जायेगा. भगवान! अब तुम्हारा ही भरोसा है. मैं न जानता था,
इस विपत में जान फंसेगी. झुनिया मुझे अपने मन में कितना धूर्त, कायर और नीच समझ रही
होगी,मगर उसे मार कैसे सकते हैं? क्या घर में मेरा हिस्सा नहीं है? अगर झुनिया पर
किसी ने हाथ उठाया, तो आज महाभारत हो जायेगा. मां-बाप जब तक लड़कों की रक्षा करें,
तब तक मां-बाप हैं.जब उनमें ममता ही नहीं है, तो कैसे मां-बाप?
होरी ज्यों ही मड़ैया से निकला, गोबर भी दबे पांव धीरे-धीरे चला, लेकिन द्वार पर
प्रकाश देखकर उसके पांव बंध गये. उस प्रकाश-रेखा के अन्दर वह पांव नहीं रख सकता.
वह अंधेरे में ही दीवार से चिमटकर खड़ा हो गया. उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया. हाय!
बेचारी झुनिया पर निरपराध यह लोग झल्ला रहे हैं, और वह कुछ नहीं कर सकता. उसने
खेल-खेल में जो एक चिनगारी फेंक दी थी, वह सारे खलिहान को भस्म कर देगी, यह उसने
न समझा था, और अब उसमें इतना साहस न था कि सामने आकर कहे- हां मैने चिनगारी फेंकी

थी. जिन टिकौनों से उसने अपने मन को संभाला था, वे सब इस भूकम्प में नीचे आ रहे और
वह झोंपड़ा नीचे गिर पड़ा. वह पीछै लौटा. अब वह झुनिया को क्या मुंह दिखाये?
वह सौ कदम चला, पर इस तरह जैसे कोई सिपाही मैदान से भागे. उसने झुनिया से प्रीति और
विवाह की जो बातें की थीं, वह सब याद आने लगीं.वह अभिसार की मीठी स्मृतियां याद आयी
जब वह अपने उन्मत्त उसांसों में, अपनी नशीली चितवनों में, मानो अपने प्राण निकाल कर
उसके चरणों पर रख देता था. झुनिया किसी वियोगी पक्षी की भांति अपने छोटे-से घोंसले
में एकान्त जीवन काट रही थी. वहां नर का मत्त आग्रह न था, न वह उदीप्त उल्लास,
न शावकों की मीठी आवाजें, मगर बहेलिये का जाल और छल भी तो वहां न था. गोबर ने उसके
एकान्त घोसलें में जाकर उसे कुछ आनन्द पहुंचाया या नहीं, कौन जाने, पर उसे विपत्ति
में तो डाल ही दिया. वह संभल गया. भागता हुआ सिपाही मानो अपने एक साथी का
बढ़ावा सुनकर पीछे लौट पड़ा.
उसने द्वार पर आकर देखा, तो किवाड़ बन्द हो गये थे. किवाड़ों के दराजों से प्रकाश
की रेखाएं बाहर निकल रही थी.उसने एक दराज से बाहर झांका. धनिया उसे समझा रही थी-
बेटी, तू चलकर घर में बैठ.मैं तेरे काका और भाइयों को देख लूंगी. जब तक हम जीते हैं
किसी बात की चिन्ता नहीं है. हमारे रहते कोई तुझे तिरछी आंखों देख भी न सकेगा. गोबर
गद्गद हो गया. आज वह किसी लायक होता, तो दादा और अम्मां को सोने से मढ़ देता और
कहता- अब तुम कुछ परवा न करो, आराम से बैठे खाओ और जितना दान-पुन चाहो,करो. झुनिया
के प्रति अब उसे कोई शंका नहीं है. वह उसे जो आश्रय देना चाहता था, वह मिल गया.
झुनिया उसे दगाबाज समझती है, तो समझे.वह तो अब तभी घर आयेगा, जब वह पैसे के बल से
सारे गांव का मुंह बन्द कर सके और दादा और अम्मा उसे कुल का कलंक न समझकर कुल का
तिलक समझें.
मन पर जितना ही गहरा होता है, उसकी प्रतिक्रिया भी उतनी ही गहरी होती है. इस
अपकीर्ति और कलंक ने गोबर के अन्तस्तल को मथकर वह रत्न निकाल लिया, जो अभी तक छिपा
पड़ा था. आज पहली बार उसे अपने दायित्व का ज्ञान हुआ और उसके साथ ही संकल्प भी. अब
तक वह कम-से-कम करना और ज्यादा-से-ज्यादा खाना अपना हक समझता था. उसके मन में कभी
यह विचार ही नहीं उठा कि घरवालों के साथ उसका भी कुछ कर्तव्य है. आज माता-पिता की
उदात्त क्षमा ने जैसे उसके हृदय में प्रकाश डाल दिया. जब धनिया और झुनिया भीतर चली
गयीं, तो वह होरी की उसी मड़ैया में जा बैठा और भविष्य के मन्सूबे बांधने लगा.
शहर के बेलदारों को पांच-छः आने रोज मिलते हैं, यह उसने सुन रखा था.
बाहर उसे छः आने रोज मिलें और वह एक आने में गुजर कर ले, तो पांच आने रोज बच जायें
महीने में दस रुपये होते हैं, और साल-भर में सवा सौ. वह सवा-सौ की थैली लेकर घर आये
तो किसकी मजाल है, जो उसके सामने मुंह खोल सके? यही दातादीन और यही पटेसरी आकर उसकी
हां-में- हां मिलायेंगे, और झुनिया तो मारे गर्व के फूल जाये.दो-चार साल वह इसी तरह
कमाता रहे, तो घर का सारा दलिद्दर मिट जाय. अभी तो सारे घर की कमाई भी सवा सौ नहीं
होती. अब वह अकेला सवा सौ कमायेगा. यही तो लोग कहेंगे कि मजूरी करता है. कहने दो.
मजूरी करना कोई पाप तो नहीं है.और सदा छः आने ही थोड़े मिलेंगे. जैसे-जैसे वह काम
में होशियार होगा, मजूरी भी तो बढ़ेगी. तब वह दादा से कहेगा.अब तुम घर बैठकर भगवान
का भजन करो. इस खेती में जान-खपाने के सिवा और क्या रखा है? सबसे पहले वह एक पछाई
गाय लायेगा, जो चार-पांच सेर दूध देगी और दादा से कहेगा, तुम गऊ माता की सेवा करो.
इससे तुम्हारा लोक बनेगा, परलोक भी.
और क्या, एक आने में उसका गुजर आराम से न होगा? घर-द्वार लेकर क्या करन है?
किसी के ओसारे में पड़ा रहेगा. सैकड़ों मन्दिर हैं, धरमसाले हैं और फिर जिसकी वह
मजूरी करेगा, क्या वह उसे रहने के लिए जगह न देगा? आटा रूपये का दस सेर आता है.
एक आने में ढाई पाव हुआ. 105
एक आने का तो वह आटा ही खा जायेगा. लकड़ी, दाल,नमक, साग यह सब कहां से आयेगा, दोनों
जून के लिए पेट-भर तो आटा ही चाहिए. ओह! खाने की तो कुछ न पूछो. मुट्ठी-भर चने में
भी काम चल सकता है. हलुआ और पूरी खाकर भी काम चल सकता है.जैसी कमाई हो. वह आध सेर
आटा खाकर दिन भर-मजे से काम कर सकता है. इधर-उधर से उपले चुन लिये, लकड़ी का काम चल
गया. कभी एक पैसे की दाल लेली, कभी आलू. आलू भूनकर भुरता बनाया और मजे से खाकर सो
रहे. घर ही पर कौन दोनों जून रोटी मिलती है, एक जून चबेना ही मिलता है. यहां भी एक
जून चबेने पर काटेंगे.
उसे शंका हुई. अगर कभी मजूरी न मिली, तो वह क्या करेगा? मगर मजूरी क्यों न मिलेगी?
जब जी तोड़कर काम करेगा, तो सौ आदमी उसे बुलायेंगे. काम सबको प्यारा होता है, चाम
नहीं प्यारा होता. यहां भी तो सूखा पड़ता है, पाला गिरता है, ऊख में दीमक लगते हैं
जौ में गेरुई लगती है, सरसों में लाही लग जाती है. उसे रात को कोई काम मिल जायेगा,
तो उसे भी न छोड़ेगा. दिन भर मजूरी की, रात कहीं चौकीदारी कर लेगा. दो आने भी रात
के कां में मिल जायें, तो चांदी है. जब वह लौटेगा, तो सबके लिए साड़ियां लायेगा.
झुनिया के लिए हाथ का कंगन जरूर बनवायेगा और दादा के लिये एक मुंडासा लायेगा.
इन्ही मनमोदकों का स्वाद लेता हुआ वह सो गया, लेकिन ठण्ड में नींद कहां? किसी तरह
रात काटी और तड़के उठकर लखनऊ की सड़क पकड़ ली. बीस कोस ही तो है. सांझ तक पहुंच
जायेगा. गांव का कौन-सा आदमी वहां आता-जाता है और वह अपना ठिकाना नहीं लिखेगा, नहीं
दादा दूसरे ही दिन सिर पर सवार हो जायेंगे. उसे कुछ पछतावा था, तो यही कि झुनिया से
क्यों न साफ-साफ कह दिया-अभी तू घर जा, मैं थोड़े दिनों में कुछ कमाकर लौटूंगा
लेकिन तब वह घर जाती ही क्यों? कहती-मैं भी तुम्हारे साथ लौटूंगी. वह कहां-कहां
बांधे फिरता?
दिन चढ़ने लगा. रात को कुछ न खाया था. भूख मालूम होने लगी. पांव लड़खड़ाने लगे.
कहीं बैठकर दम लेने की इच्छा होती थी. बिना कुछ पेट में डाले, वह अब नहीं चल सकता,
लेकिन पास में एक पैसा भी नहीं है. सड़क के किनारे झड़-बेरियों के झाड़ थे. उसने
थोड़े-से बेर तोड़ लिये और उदर को बहलाता हुआ चला. एक गांव में गुड़ पकने की सुगन्ध
आयी. अब मन न माना.कोल्हाड़ में जाकर लोटा-डोर मांगा और पानी भरकर चुल्लू से पीने
बैठा कि एक किसान ने कहा-अरे भाई, क्या निराला ही पानी पियोगे? थोड़ा-सा मीठा खा
लो. अबकी और चला लें कोल्हू और बना लें खांड. अगले साल तक मिल तैयार हो जायेगी.सारी
ऊख खड़ी बिक जायेगी. गुड़ और खांड के भाव चीनी मिलेगी,तो हमारा गुड़ कौन लेगा? उसने
एक कटोरे में गुड़ की कई पिण्डियां लाकर दीं. गोबर ने गुड़ खाया, पानी पिया. तमाखू
तो पीते होगे? गोबर ने बहाना किया. अभी चिलम नहीं पीता. बुड्ढे ने प्रसन्न होकर कहा
बड़ा अच्छा करते हो भैया! बुरा रोग है. एक बेर पकड़ ले, तो जिन्दगी-भर नहीं छोड़ता.
इंजन को कोयला-पानी भी मिल गया, चाल तेज हुई. जाड़े के दिन,न जाने कब दोपहर हो गया.
एक जगह देखा, एक युवती एक वृक्ष के नीचे पति से सत्याग्रह किये बैठी थी, पति सामने
खड़ा उसे मना रहा था. दो-चार राहगीर तमाशा देखने खड़े हो गये थे. गोबर भी खड़ा हो
गया. मानलीला से रोचक और कौन जीवन-नाटक होगा.
युवती ने पति की ओर घूरकर कहा- मैं न जाऊंगी, न जाऊंगी, न जाऊंगी.
पुरुष ने जैसे अल्टीमेटम दिया-न जायेगी?
`न जाऊंगी.’
`न जायेगी.’
`न जाऊंगी.’ 106
पुरुष ने उसके केश पकड़कर घसीटना शुरू किया. युवती भूमि पर लोट गयी.
पुरुष ने हारकर कहा-मैं फिर कहता हूं, उठकर चल.
स्त्री ने उसी दृढ़ता से कहा- मैं तेरे घर साथ जनम न जाऊंगी, बोटी-बोटी काट डाल.
`मैं तेरा गला काट लूंगा.’
`तो फांसी पाओगे.’
पुरुष ने उसके केश छोड़ दिये और सिर पर हाथ रखकर बैठ गया. पुरुषत्व अपनी चरम सीमा
तक पहुंच गया. उसके आगे अब उसका कोई बस नहीं था.
एक क्षण में वह फिर खड़ा हुआ और परास्त होकर बोला-आखिर तू क्या चाहती है?
युवती भी उठ बैठी और निश्चल भाव से बोली-मैं यही चाहती हूं, तू मुझे छोड़ दे.
`कुछ मुंह से कहेगी, क्या बात हुई?’
`मेरे भाई-बाप को कोई गाली दे?’
`किसने गाली दी, तेरे भाई-बाप को?’
`जाकर अपने घर में पूछ.’
`चलेगी तभी तो पूछूंगा?’
`तू क्या पूछेगा? कुछ दम भी है. जाकर अम्मां के आंचल में मुंह ढ़ांक कर सो. वह तेरी
मां होगी. मेरी कोई नहीं है. तू उसकी गालियां सुन. मैं क्यों सुनूं? एक रोटी खाती
हूं, तो चार रोटी का काम करती हूं. क्यों किसी की धौंस सहूं? मैं तेरा एक पीतल का
छल्ला भी तो नहीं जानती.’
राहगीरों को इस कलह में अभिनय का आनन्द आ रहा था, मगर उसके जल्द समाप्त होने
की कोई आशा न थी. मंजिल खोटी होती थी. एक-एक करके लोग खिसकने लगे. गोबर को पुरूष
की निर्दयता बुरी लग रही थी. भीड़ के सामने तो कुछ न कह सकता था. मैदान खाली हुआ तो
बोला-भाई, मर्द और औरत के बीच में बोलना तो नहीं चाहिए, मगर इतनी बेदर्दी भी अच्छी
नहीं होती. पुरूष ने कौड़ी की-सी आंखें निकाल कर पूछा-तुम कौन हो?
गोबर ने निःशंक भाव से कहा-मैं कोई हूं,लेकिन अनुचित बात देखकर सभी को बुरा लगता है
पुरूष ने सिर हिला कर कहा-मालूम होता है अभी मेहरिया नहीं आयी, तभी इतना दर्द है.
`मेहरिया आयेगी, तो भी उसके झोंटे पकड़कर न खींचूंगा.’
`अच्छा तो अपनी राह लो. मेरी औरत है, मैं उसे मारूंगा-काटूंगा, तुम कौन होते हो
बोलने वाले? चले जाओ सीधे से, यहां मत खड़े हो.’
गोबर का गरम खून और गरम हो गया. वह क्यों चला जाये? सड़क सरकार की है. किसी के बाप
की नहीं है वह जब तक. वह जब तक चाहे वहां खड़ा रह सकता है. वहां से हटाने का किसी
को अधिकार नहीं है.
पुरुष ने होंठ चबाकर कहा-तो तुम न जाओगे? आऊं?
गोबर ने अंगोछा कमर में बांध लिया और समर के लिए तैयार होकर बोला-तुम आओ या न आओ.
मैं तो तभी जाऊंगा, जब मेरी इच्छा होगी.
`तो मालूम होता है, हाथ पैर तुड़ा के जाओगे?’
`यह कौन जानता है, किसके हाथ-पांव टूटेंगे.’
`तो तुम न जाओगे?’
`ना.’
पुरुष मुट्ठी बांध गोबर की ओर झपटा. उसी क्षण युवती ने उसकी धोती पकड़ ली और उसे
अपनी ओर खीचती हुई गोबर से बोली-तुम क्यों लड़ाई करने पर उतारू हो रहे हो जी,
अपनी राह क्यों नहीं जाते? यहां कोई तमाशा है? हमारा आपस का झगड़ा है. कभी वह मुझे
मारता है, कभी मै उसे डांटती हूं. तुमसे मतलब?
गोबर यह धिक्कार पाकर चलता बना. दिल में कहा- यह औरत मार खाने ही लायक है.
गोबर आगे निकल गया, तो युवती ने पति को डांटा-तुम सबसे लड़ने क्यों लगते हो? उसने
कौन सी बुरी बात कही थी कि तुम्हें चोट लग गयी? बुरा काम करोगे, तो दुनिया बुरा
कहेगी ही, मगर है किसी भले घर का और अपनी बिरादरी का ही जान पड़ता है. क्यों न उसे
उसे अपनी बहन के लिए ठीक कर लेते?
पति ने सन्देह के स्वर में कहा-क्या अब तक कुंवारा बैठा होगा?
`तो पूछ ही क्यों न लो?’
पुरूष ने दस कदम दौड़कर आवाज दी और हाथ से ठहर जाने का इशारा किया.
गोबर ने समझा, शायद फिर इसके सिर भूत सवार हुआ, तभी ललकार रहा है. मार
खाये बिना न मानेगा.अपने गांव में कुत्ता भी शेर हो जाता है, लेकिन आने दो.
लेकिन उसके मुख पर समर की ललकार न थी, मेत्री का निमन्त्रण था. उसने गांव नाम और
जाति पूछी. गोबर ने ठीक-ठाक बता दिया. उस पुरूष का नाम कोदई था.
कोदई ने मुसखराकर कहा- हम दोनों में लड़ाई होते-होते बची. तुम चले आये, तो मैंने
सोचा- तुमने ठीक ही कहा. मैं नाहक तुमसे तन बैठा. कुछ खेती-बारी घर में होती है ना?
गोबर ने बताया, उसके मौरुसी पांच बीघे खेत हैं और एक हल की खेती होती है.
`मैंने तुम्हें जो भला-बुरा कहा है, उसकी माफी दे दो भाई! क्रोध में आदमी अन्धा हो
जाता है. औरत गुन-सहूर में लक्ष्मी है, मुदा कभी-कभी ना जाने कौन-सा भूत इस पर सवार
हो जाता है.अब तुम्ही बताओ माता पर मेरा क्या बस है? जनम तो उन्होने दिया है,
पाला पोसा तो उन्होने है. जब कोई बात होगी, तो मैं जो कुछ कहूंगा, लुगाई ही से
कहूंगा. उस पर अपना बस है. तुम्ही सोचो, मैं कुपद तो नहीं कह रहा हूं? हां, मुझे
उसका बाल पकड़ कर घसीटना न था, लेकिन औरत जात बिना कुछ ताड़ना दिये काबू में भी
तो नहीं रहती. चाहती है, मां से अलग हो जाऊं. तुम्ही सोचो, कैसे अलग हो जाऊं और
किससे अलग हो जाऊं?अपनी मां से?जिसने जन्म दिया? यह मुझसे ना होगा.औरत रहे या जाये.
गोबर को भी अपनी राय बदलनी पड़ी. माता का आदर करना तो सब का धर्म है भाई! माता से
कौन उरिन हो सकता है?
कोदई ने उसे अपने घर चलने का नेवता दिया. आज वह किसी रह लखनऊ नहीं पहुंच सकता. कोस
दो-कोस जाते-जाते सांझ हो जायेगी. रात को कहीं टिकना ही पड़ेगा.
गोबर ने विनोद किया-लुगाई मान गयी?
`न मानेगी, तो क्या करेगी.’
`मुझे तो उसने ऐसी फटकार बतायी कि मैं लजा गया.’
`वह खुद पछता रही है. चलो, जरा माताजी को समझा देना. मुझसे तो कुछ कहते नहीं बनता.
उन्हें भी सोचना चाहिए कि बहू को बाप-भाई की गाली क्यों देती हैं. हमारी ही बहिन है
चार दिन में उसकी सगाई हो जायेगी. उसकी सास हमें गालियां देगी, तो उससे सुना जायेगा
सब दोस लुगाइ का ही नहीं है. माता का भी दोष है. जब हर बात में वह अपनी बेटी का
पक्ष करेगी, तो हमें बुरा लगेगा ही. इसमें इतनी बात अच्छी है कि घर से रूठकर चली
जाये, पर गाली का जवाब गाली से नहीं देती.’
गोबर को रात के लिए कोई ठिकाना चाहिए था ही. कोदई के साथ हो लिया. दोनों फिर उसी
जगह आये, जहां युवती बैठी थी. वह अब गृहणी बन गयी थी. जरा- सा घूंघट निकाल लिया था
और लजाने लगी थी.
कोदई ने मुस्कराकर कहा-यह तो आते ही न थे. कहते थे, ऐसी डांट सुनने के बाद
उनके घर कैसे जायें? युवती ने घूंघट की आढ़ से गोबर को देखकर कहा-इतनी
ही डांट में डर गये? लुगाई आ जायेगी, तब कहां भागोगे?
गांव समीप ही था. गांव क्या था, पुरवा था,दस बारह घरों का, जिसमें आधे खपरैल के थे,
आधे फूंस के. कोदई ने अपने घर पहुंच कर खाट निकाली, उस पर एक दरी डाल दी,
शरबत बनाने को कह, चिलम भर लाया. और एक क्षण में वही युवती लोटे में शरबत लेकर आयी
और गोबर को पानी का एक छींटा मारकर, मानों क्षमा मांग ली. वह अब उसका ननदोई हो रहा
था. फिर क्यों न अभी से छेड़-छाड़ शुरू कर दे?

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