गोदान (भाग 1)

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हीरा का कहीं पता न चला और दिन गुजरते जाते थे. होरी से जहां तक दौड़-धूप हो सकी,
की, फिर हारकर बैठ रहा. खेती-बारी की भी फिक्र करनी थी. अकेला आदमी क्या-क्या
करता? और अब अपनी खेती से ज्यादा फिक्र थी पुनिया की खेती की. पुनिया अब अकेली होकर
और भी प्रचण्ड हो गयी थी. होरी को अब उसकी खुशामद करते बीतती थी. हीरा था, तो वह
पुनिया को दबाये रहता था. उसके चले जाने से अब पुनिया पर कोई अंकुश न रह गया था.
होरी की पट्टीदारी हीरा से थी. पुनिया अबला थीं. उससे वह क्या तनातनी करता? और
पुनिया उसके स्वभाव से परिचित थी और उसकी सज्जनता का उसे खूब दण्ड देती थी.खैरियत
यही हुई कि कारकुन साहब ने पुनिया से बकाया लगान वसूल करने की कोई सख्ती न की, केवल
थोड़ी-सी पूजा लेकर राजी हो गये. नहीं, होरी अपनी बकाया के साथ उसकी बकाया चुकाने
के लिए भी कर्ज लेने को तैयार था. सावन में धान की रोपाई की. ऐसी धूम रही कि मजूर
न मिले और होरी अपने खेतों में धान न रोप सका, लेकिन पुनिया के खेतों में कैसे न
रोपाई होती ? होरी ने पहर रात-रात तक काम करके उसके धान रोपे. अब होरी ही तो
उसका रक्षक है.अगर पुनिया को कोई कष्ट हुआ, तो दुनिया उसी को तो हंसेगी. नतीजा
यह हुआ कि होरी की फसल में बहुत थोड़ा अनाज मिला और पुनिया के बखार में धान रखने की
जगह न रही.
होरी और धनिया में उस दिन से बराबर मनमुटाव चला आता था.गोबर से भी होरी की बोलचाल
बन्द थी. मां-बेटे ने मिलकर उसका बहिष्कार कर दिया था. अपने घर में परदेसी बना हुआ
था. दो नावों पर सवार होने वालों की जो दुर्गति होती है, वही उसकी हो रही थी. गांव
में भी अब उसका उतना आदर न था. धनिया ने अपने साहस से स्त्रियों का ही नहीं, पुरुषो
का नेतृत्व भी प्राप्त कर लिया था. महीनों तक आसपास के इलाकों में इस काण्ड की खूब
चर्चा रही. यहां तक कि वह अलौकिक रूप तक धारण करता जाता था-`धनिया नाम है उसका
जी. भवानी का इष्ट है उसे. दारोगाजी ने ज्यों ही उसके आदमी के हाथ में हथकड़ी डाली
कि धनिया ने भवानी का सुमिरन किया. भवानी उसके सिर आ गयी. फिर तो उसमें इतनी शक्ति
आ गयी कि उसने एक झटके में पति की हथकड़ी तोड़ डाली और दारोगा की मूंछे पकड़कर
उखाड़ लीं, फिर उसकी छाती पर चढ़ बैठी. दारोगा ने जब बहुत मानता की, तब जाकर उसे
छोड़ा.’कुछ दिन तक तो लोग धनिया के दर्शनों को आते रहे. वह बात अब पुरानी पड़ गयी
थी, लेकिन गांव में धनिया का सम्मान बहुत बढ़ गया. उसमें अद्भुत साहस है और समय
पड़ने पर वह मरद के भी कान काट सकती है.
मगर धीरे-धीरे धनिया में एक परिवर्तन हो रहा था. होरी को पुनिया की खेती में लगे
देखकर भी वह कुछ न बोलती थी. और यह इसलिए नहीं कि वह होरी से विरक्त हो गयी थी,
बल्कि इसलिए कि पुनिया पर अब उसे भी दया आती थी. हीरा का घर से भाग जाना उसकी
प्रतिशोध-भावना की तुष्टि के लिए काफी था.
इसी बीच में होरी को ज्वर आने लगा. फसली बुखार फैला था ही. होरी उसकी चपेट में
आ गया. और कई साल के बाद जो ज्वर आया, तो उसने सारी बकाया चुका ली.एक
महीने तक होरी खाट पर पड़ा रहा. इस बीमारी ने होरी को तो कुचल डाला ही, पर
धनिया पर भी विजय पा गयी.पति जब मर रहा है, तो उससे कैसा बैर? ऐसी दशा में तो
बैरियों से भी बैर नहीं रहता, वह तो अपना पति है.
लाख बुरा हो, पर उसी के साथ जीवन के पच्चीस साल कटे हैं, सुख किया है, तो उसी के
साथ, दुःख भोगा है, तो उसी के साथ,अब तो चाहे वह अच्छा है या बुरा, अपना है. दाढ़ी
जार ने मुझे सबके सामने मारा, सारे गांव के सामने मेरा पानी उतार लिया, लेकिन तब से
कितना लज्जित है कि सीधे ताकता नहीं. खाने आता है, तो सिर झुकाये खाकर उठ जाता है,
डरता रहता है कि मैं कुछ कह न बैठूं.

होरी जब अच्छा हुआ, तो पति-पत्नी में मेल हो गया था.
एक दिन धनिया ने कहा- तुम्हें इतना गुस्सा कैसे आ गया? मुझे तो तुम्हारे ऊपर कितना
ही गुस्सा आये, मगर हाथ न उठाऊंगी.
होरी लजाता हुआ बोला-अब उसकी चर्चा न कर धनिया.मेरे ऊपर कोई भूत सवार था.
इसका मुझे कितना दुःख हुआ है, इसे मैं ही जानता हूं.
`और जो मैं भी उस क्रोध में डूब मरी होती?’
`तो क्या मैं रोने के लिए बैठा रहता? मेरी लहास भी तेरे साथ चिता पर जाती.’
`अच्छा चुप रहो,बेबात की बात मत करो.’
`गाय गई सो गई, मेरे सिर पर एक विपत्ति डाल गयी. पुनिया की फिकर मुझे मारे डालती है
`इसीलिए तो कहते हैं, भगवान् घर का बड़ा न बनाये. छोटों को कोई नहीं हंसता. नेकी-
बदी सब बड़ों के सिर जाती है.’
माघ के दिन थे. मघावट लगी हुई थी.घटाटोप अंधेरा छाया हुआ था. एक तो जाड़ों की रात,
दूसरे माघ की वर्षा. मौत का-सा सन्नाटा छाया हुआ था. अन्धेरा तक न सूझता था. होरी
भोजन करके पुनिया के मटर के खेत की मेड़ पर अपनी मड़ैया में लेटा हुआ था. चाहता था,
शीत को भूल जाये और सो रहे, लेकिन तार-तार कम्बल और फटी हुई मिरजई और शीत के झोंकों
से गीली पुआल. इतने शत्रुओं के सम्मुख आने का नींद में साहस न था.आज तमाखू भी न
मिला कि उसी उसी से मन बहलाता. उपला सुलगा लाया था, पर शीत में वह भी बुझ गया.
बिवाई फटे पैरों को पेट में डालकर और हाथों को जांघों के बीच में दबाकर और कम्बल
में मुंह छिपाकर अपनी ही गरम सांसों से अपने को गरम करने की चेष्टा कर रहा था.पांच
साल हुए, यह मिरजई बनवायी थी. धनिया ने एक प्रकार से जबरदस्ती बनवा दी थी, वही जब
एक बार काबुली से कपड़े लिए थे, जिसके पीछे कितनी सांसत हुई, कितनी गालियां खानी
पड़ी.और कम्बल उसके जन्म से भी पहले का है.बचपन में अपने बाप के साथ वह इसी मे सोता
था, जवानी में गोबर को लेकर इसी कम्बल में उसके जाड़े कटे थे और बुढ़ापे में आज वही
कम्बल उसका साथी है, पर अब वह भोजन को चबाने वाला दांत नहीं, दुखने वाला दांत है.
जीवन में ऐसा तो कोई दिन ही नहीं आया कि लगान और महाजन को देकर कभी कुछ बचा हो,
और बैठे-बैठाये यह एक नया जञ्जाल पड़ गया. न करो, तो दुनिया हंसे,करो, तो यह संशय
बना रहे कि लोग क्या कहते हैं. सब यह समझते कि वह पुनिया को लूट लेता है, उसकी सारी
उपज घर में भर लेता है. एहसान तो क्या होगा,उलटा कलंक लग रहा है.और उधर भोला
कई बेर याद दिला चुके हैं कि कहीं कोई सगाई का डौल करो, अब काम नहीं चलता. सोभा
उससे कई बार कह चुका है कि पुनिया के विचार उसकी ओर से अच्छे नहीं हैं.न हो, पुनिया
की गृहस्थी तो उसे संभालनी ही पड़ेगी, चाहे हंसकर संभाले या रोकर.
धनिया का दिल भी अभी तक साफ नहीं हुआ. अभी तक उसके मन में मलाल बना हुआ
है. मुझे सब आदमियों के सामने उसको मारना न चाहिए था.जिसके साथ पच्चीस साल गुजर
गये, उसे मारना और सारे गांव के सामने, मेरी नीचता थी, लेकिन धनिया ने भी तो मेरी
आबरू उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
मेरे सामने से कैसा कतराकर निकल जाती है, जैसे कभी की जान-पहचान ही नहीं. कोई बात
कहनी होती है,तो सोना या रूपा से कहलाती है. देखता हूं, उसकी साड़ी फट गयी है, मगर
कल मुझसे कहा भी, तो सोना की साड़ी के लिए,अपनी साड़ी का नाम तक न लिया.सोना की
साड़ी अभी दो-एक महीने थेगलियां लगाकर चल सकती है. उसकी साड़ी तो मारे पैबन्दों के
बिलकुल कथरी हो गयी है. और फिर मैं ही कौन उसका मनुहार कर रहा हूं? अगर मैं ही
उसके मन की दो-चार बातें करता रहता, तो कौन छोटा हो जाता? यही तो होता,वह
थोड़ा-सा अदरावन कराती, दो-चार लगनेवाली बात कहती, तो क्या मुझे चोट लग जाती,
लेकिन मैं बुड्ढा होकर भी उल्लू बना रह गया. वह तो कहो, इस बीमारी ने आकर उसे नरम
कर दिया, नहीं जाने कब तक मुंह फुलाये रहती.
और आज उन दोनों में जो बातें हुई थीं, वह मानो भूखे का भोजन थीं. वह दिल से बोली थी
और होरी गद्गद हो गया था. उसके जी में आया, उसके पैरों पर सिर रख दे और कहे-मैंने
तुझे मारा है, तो ले, मैं सिर झुकाये लेता हूं, जितना चाहे मार ले, जितनी गालियां
देना चाहे, दे ले.
सहसा उसे मड़ैया के सामने चूड़ियों की झंकार सुनाई दी. कान लगाकर सुना. हां, कोई है
पटवारी की लड़की होगी, चाहे पण्डित की घरवाली हो. मटर उखाड़ने आयी होगी. न जाने
क्यों इन लोगों की नीयत खोटी है. सारे गांव से अच्छा खाते हैं, घर में हजारों रुपये
गड़े हैं, लेन-देन करते हैं, ड्यौढ़ी-सवाई चलाते हैं, घूस लेते हैं, दस्तूरी लेते
हैं,एक-न-एक मामला खड़ा करके हमा-सुमा को पीसते रहते हैं, फिर भी नीयत का यह हाल!
बाप जैसा होगा,वैसी ही सन्तान भी होगी. और आप नहीं आते, औरतों को भेजते हैं.अभी
उठकर हाथ पकड़ लूं, तो क्या पानी रह जाये? नीच कहने को नीच हैं, जो ऊंचे हैं उनका
मन तो और नीचा है.औरत जात का हाथ पकड़ते भी तो नहीं बनता, आंखों देखकर मक्खी
निगलनी पड़ती है? उखाड़ ले भाई, जितना तेरा जी चाहे. समझ ले , मैं नहीं हूं. बड़े
आदमी अपनी लाज न रखें, छोटों को तो उनकी लाज रखनी ही पड़ती है.
मगर नहीं, यह तो धनिया है, पुकार रही है.
धनिया ने पुकारा- सो गये कि जागते हो?
होरी झटपट उठा और मड़ैया के बाहर निकल आया. आज मालूम होता है, देवी प्रसन्न हो गयी,
उसे वरदान देने आयी है, उसके साथ ही इस बादल-बूंदी और जाड़े-पाले में इतनी रात गये
उसका आना भी शंकाप्रद भी था. जरूर कोई-न कोई बात हुई है.
बोला-ठण्डी के मारे नींद भी आती है? तू इस जाड़े-पाले में कैसे आयी? कुसल तो है?
`हां, सब कुसल है.’
गोबर को भेजकर मुझे क्यों नहीं बुलवा लिया?’
धनिया ने कोई उत्तर न दिया. मड़ैया में आकर पुआल पर बैठती हुई बोली-गोबर ने तो मुंह
में कालिख लगा दी,उसकी करनी क्या पूछते हो. जिस बात को डरती थी, वह होकर रही.
`क्या हुआ? किसी से मार-पीट कर बैठा?’
अब मैं क्या जानूं, क्या कर बैठा, चलकर पूछो उसी रांड़ से?’
`किस रांड़ से? क्या कहती है तू? बौरा तो नहीं गयी?’
`हां, बौरा क्यों न जाऊंगी? बात ही ऐसी हुइ है कि छाती दुगुनी हो जाये.’
होरी के मन में प्रकाश कि एक लम्बी रेखा ने प्रवेश किया.
`साफ-साफ क्यों नहीं कहती. किस रांड़ को कह रही है?’
उसी झुनिया को, और किसको.’
`तो झुनिया क्या यहां आयी है.’
`और कहां जाती, पूछता कौन?’
`गोबर क्या घर में नहीं है?’
`गोबर का कहीं पता नहीं. जाने कहां भाग गया? इसे पांच महीने का पेट है.’
होरी सब कुछ समझ गया. गोबर को बार-बार अहिराने जाते देखकर वह खटका था जरूर,
मगर उसे ऐसा खिलाड़ी न समझता था. युवकों में कुछ रसिकता होती ही है, इसमें कोई नयी
बात नहीं.मगर जिस रूई के गाले को उसने नीले आकाश में हवा के झोंके से उड़ते देखकर
केवल मुस्करा दिया था, वह सारे आकाश में छाकर उसके मार्ग को इतना अन्धकारमय बना
देगा,यह तो कोई देवता भी न जान सकता था. गोबर ऐसा लम्पट! वह सरल गंवार, जिसे वह अभी
बच्चा समझता था, लेकिन उसे भोज की चिन्ता न थी, पंचायत का भय न था, झुनिया घर में
कैसे रहेगी, इसकी चिन्ता भी उसे न थी. उसे चिन्ता थी गोबर की. लड़का लज्जाशील है,
अनाड़ी है, आत्माभिमानी है, कहीं कोई नादानी न कर बैठे.
घबराकर बोला-झुनिया ने कुछ कहा नहीं, गोबर कहां गया? उससे कहकर ही गया होगा?
धनिया झुंझलाकर बोली- तुम्हारी अक्कल तो घास खा गयी है, उसकी चहेती तो यहां बैठी
है, भागकर जायेगा कहां? यही कहीं छिपा बैठा होगा. दूध थोड़े ही पीता है कि खो जायगा
मुझे तो इस कलमुंही झुनिया की चिन्ता है कि इसे क्या करूं? अपने घर में मैं छन-भर
भी न रहने दूंगी. जिस दिन से गाय लाने गया है, उसी दिन से दोनों में तक-झक होने
लगी. पेट न रहता, तो अभी बात न खुलती. मगर जब पेट रह गया, तो झुनिया लगी घबराने.
कहने लगी , कहीं भाग चलो. गोबर टालता रहा. एक औरत को साथ लेके कहां जाये, कुछ
न सूझा. आखिर जब आज वह सिर हो गयी कि मुझे यहां से ले चलो, नहीं मैं परान दे दूंगी
तो बोला- तू चलकर मेरे घर में रह, कोई कुछ न बोलेगा, अम्मा को मना लूंगा.यह गधी
उसके साथ चल पड़ी. कुछ दूर तो आगे-आगे आता रहा, फिर न जाने किधर सरक गया. यह
खड़ी-खड़ी उसे पुकारती रही. जब रात भीग गयी और वह न लौटा, भागी यहां चली आयी. मैंने
तो कह दिया, जैसा किया है, वैसा फल भोग. चुड़ैल ने ले के मेरे लड़के को चौपट कर
दिया.तब से बैठी रो रही है. उठती ही नहीं. कहती है,अपने घर कौन मुंह लेकर जाऊं.
भगवान् ऐसी सन्तान से तो बांझ ही रखे, तो अच्छा. सबेरा होते-होते सारे गांव में
कांव-कांव मच जायेगी. ऐसा जी होता है, माहुर खा लूं.तुमसे कहे देती हूं,मैं अपने घर
में न रखूंगी. गोबर को रखना हो, अपने सिर पर रखे. घर में ऐसी धत्तीसियों के लिए
जगह नहीं है और अगर तुम बीच में बोले,तो फिर या तो तुम्ही रहोगे या मैं ही रहूंगीं.
होरी बोला-तुझसे बना नहीं, उसे घर में आने ही नहीं देना चाहिए था.
`सब कुछ कहके हार गयी. टलती नहीं. धरणा दिये बैठी है.’
`अच्छा चल ,देखूं कैसे नहीं उठती, घसीटकर बाहर निकाल दूंगा.’
`दाढ़ीजार भोला सब कुछ देख रहा था, पर चुप्पी साधे बैठा रहा. बाप भी ऐसे बेहया
होते हैं?’
`वह क्या जानता था, इनके बीच में क्या खिचड़ी पक रही है.’
`जानता क्यों नहीं था? गोबर रात-दिन घेरे रहता था, तो क्या उसकी आंखें फूट गयी थी?
सोचना चाहिये था न कि यहां क्यों दौड़-दौड़ आता है.’
`चल मैं झुनिया से पूछता हूं न.’
दोनों मड़ैया से निकलकर गांव की ओर चले. होरी ने कहा-पांच घड़ी रात के ऊपर गयी होगी
धनिया बोली- हां, और क्या, मगर कैसा सोता पड़ गया है? कोई चोर आये, तो सारे गांव को
मूस ले जाये.
`चोर ऐसे गांव में नहीं आते. धनियों के घर जाते हैं.’
धनिया ने ठिठककर होरी का हाथ पकड़ लिया और बोली- देखौ, हल्ला न मचाना, नहीं सारा
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गांव जाग उठेगा और बात फैल जायगी
होरी ने कठोर स्वर में कहा-मैं यह कुछ नहीं जानता. हाथ पकड़कर घसीट लाऊंगा और गांव
के बाहर कर दूंगा. बात तो एक दिन खुलनी ही है, फिर आज ही क्यों न खुल जाये? वह मेरे
घर आयी क्यों?जाये जहां गोबर है. उसके साथ कुकरम किया,तो क्या हमसे पूछकर किया था?
धनिया ने फिर उसका हात पकड़ा और धीरे से बोली-तुम उसका हाथ पकड़ोगे, तो वह चिल्लाये
गी. `तो चिल्लाया करे.’
`मुदा उतनी रात गये, अंधेरे सन्नाटे रात में जायगी कहां, यह तो सोचो?’
`जाये जहां उसके सगे हों. हमारे घर में उसका क्या रखा है?’
`हां, लेकिन इतनी रात गये, घर से निकालना उचित नहीं. पांव भारी है, कहीं डर-डरा
जाये,तो और आफत हो.ऐसी दशा में कुछ करते-धरते भी तो नहीं बनता.’
`हमें क्या करना है, मरे या जिये. जहां चाहे जाये. क्या अपने मुंह में कालिख लगाऊं?
मैं तो गोबर को भी निकाल बाहर करूंगा.’
धनिया ने गंभीर चिन्ता से कहा-कालिख जो लगनी थी, वह तो अब लग चुकी. बह अब
जीते जी नहीं छूट सकती. गोबर ने नौका डुबा दी.
`गोबर ने नहीं, डुबायी इसी ने. वह तो बच्चा था. इसके पंजे में आ गया.’
किसी ने डुबायी, अब तो डूब गयी.’
दोनों द्वार के सामने पहुंच गये. सहसा धनिया ने होरी के गले में हाथ डालकर कहा-देखो
तुम्हें मेरी सौंह, उस पर हाथ न उठाना. वह तो आप ही रो रही है. भाग की खोटी न होती,
तो यह दिन ही क्यों आता?
होरी की आंखे आर्द्र हो गयी. धनिया का यह मातृ-स्नेह उस अंधेरे में भी जैसे दीपक के
समान उसकी चिन्ता-जर्जर आकृति को शोभा प्रदान करने लगा. दोनों ही के हृदय में जैसे
अतीत यौवन सचेत हो उठा.होरी को इस गतयौवना में भी वही कोमल हृदय बालिका नजर आयी,
जिसने पच्चीस साल पहले उसके जीवन में प्रवेश किया था. उस आलिंगन में कितना अथाह
वात्सल्य था, जो सारे कलंक, सारी बाधाओं और सारी मूलबद्ध परम्पराओं को अपने अन्दर
समेट लेता था.
दोनों ने द्वार पर आकर किवाड़ों के दराज से अन्दर झांका. दीवट पर तेल
की कुप्पी जल रही थी और उसके मद्धिम प्रकाश में झुनिया घुटने पर सिर रखे, द्वार की
ओर मुंह किये, अन्धकार में उस आनन्द को खोज रही थी, जो एक क्षण पहले अपनी मोहिनी
छवि दिखाकर विलीन हो गया था. वह आफत की मारी , व्यंग्य-बाणों से आहत और जीवन
के आघातों से व्यथित किसी वृक्ष की छांह खोजती फिरती थी, और उसे एक भवन मिल गया था,
जिसके आश्रय में वह अपने को सुरक्षित और सुखी समझ रही थी, पर आज वह भवन अपना
सारा सुख-विलास लिये अलादीन के राजमहल की भांति गायब हो गया था और भविष्य एक विकराल
दानव के समान उसे निगल जाने को खड़ा था.
एकाएक द्वार खुलते और होरी को आते देखकर वह भय से कांपती हुई उठी और होरी के पैरों
पर गिरकर रोती हुई बोली-दादा, अब तुम्हारे सिवाय मुझे दूसरा ठौर नहीं है,चाहे मारो,
चाहे काटो, लेकिन अपने द्वार से दुरदुराओ मत.
होरी ने झुककर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए प्यार-भरे स्वर में कहा-डर मत बेटी,डर मत.
तेरा घर है, तेरा द्वार है, तेरे हम हैं. आराम से रह. जैसी तू भोला की बेटी है,
वैसी ही मेरी बेटी है. जब तक हम जीते हैं, किसी बात की चिन्ता मत कर . हमारे रहते,
कोई तुझे तिरछी आंखों न देख सकेगा. भोज-भात जो लगेगा, वह हम सब दे लेंगे, तू खातिर-
जमा रख.
झुनिया, सान्त्वना पाकर और भी होरी के पैरों से चिमट गयी और बोली-दादा, अब तुम्हीं
मेरे बाप हो, और अम्मां, तुम्हीं मेरी मां हो.मैं अनाथ हूं. मुझे सरन दो, नहीं मेरे
काका और भाई मुझे कच्चा ही खा जायेंगे.
धनिया अपने करुणा के आवेग को अब न रोकम सकी. बोली-तू चल, घर में बैठ, मैं देख लूंगी
काका और भैया को.संसार में उन्हीं का राज नहीं है.बहुत करेंगे अपने गहने ले लेंगे.
फेंक देना उतार कर .
अभी जरा देर पहले धनिया ने क्रोध के आवेश में झुनिया को कुलटा और कलंकिनी और कल
मुंही, न जाने क्या-क्या कह डाला था. झाड़ू मारकर घर से निकालने जा रही थी. अब जो
झुनिया ने स्नेह, क्षमा और आश्वासन से भरे यह वाक्य सुने, तो होरी के पांव छोड़कर
धनिया के पांव से लिपट गयी और वही साध्वी, जिसने होरी के सिवा किसी पुरूष को आंखभर
कर देखा भी न था, इस पापिष्ठा को गले लगाये उसके आंसू पोंछ रही थी और उसके त्रस्त
हृदय को कोमल शब्दों में शान्त कर रही थी, जैसे कोई चिड़िया अपने बच्चे को परों मे
छिपाये बैठी हो.
होरी ने धनिया को संकेत किया कि इसे कुछ खिला-पिला दे और झुनिया से पूछा-क्यों
बेटी, तुझे मालूम है, गोबर किधर गया?
होरी अपनी व्याकुलता न छिपा सका.
`जब तूने आज उसे देखा, तो कुछ दुखी था?’
`बातें तो हंस-हंस कर कर रहे थे. मन का हाल भगवान् जाने.’
`तेरा मन क्या कहता है, गांव में ही है कि कहीं बाहर चला गया?’
`मुझे तो शंका होती है, कहीं बाहर चले गये हैं.’
यही मेरा मन कहता है, कैसी नादानी की? हम उसके दुश्मन थोड़े ही थे जब भली या बुरी
एक बात हो गयी,तो उसे निभानी पड़ती है.इस तरह भागकर उसने हमारी जान आफत में डाल दी’
धनिया ने झुनिया का हाथ पकड़कर अन्दर ले जाते हुए कहा- कायर कहीं का. जिसकी बांह
पकड़ी, उसका निबाह करना चाहिए कि मुंह में कालिख लगाकर भाग जाना चाहिए. अब जो आये,
तो घर में बैठने न दूं.
होरी वहीं पुआल में लेटा. गोबर कहां गया? यह प्षश्न उसके हृदयाकाश में किसी पक्षी
की भांति मंडराने लगा.

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