दस महाव्रत

स्वाध्याय
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स्वाध्यायाविष्टदेवतासम्प्रयोगः (योगदर्शन. 2.44)

‘चैतन्य महाप्रभु जब दक्षिण की यात्रा करने गये थे तब एक स्थान पर उन्होंने एक ब्राह्मण को श्रीमद्भगवतगीता का पाठ करते देखा। ब्राह्मण सम्भवतः संस्कृत नहीं जानता था; क्योंकि वह श्लोकों का शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाता था। किंतु पाठ के समय उसके नेत्रों से अजस्त्र अश्रुप्रवाह चल रहा था। महाप्रभु उसके पीछे पाठ समाप्त होने तक खड़े रहे और जब वह पाठ समाप्त करके अपने समीप एक संन्यासी को देख उन्हें प्रणिपात करने लगा तो महाप्रभु ने ‘श्रीहरिः’ कहकर उसे आशीर्वाद देने के पश्चात पूछा – ‘विप्रवर! आप गीताजी के श्लोकों को समझते हैं?’ ब्राह्मण ने नम्रता
पूर्वक उत्तर दिया- ‘भगवन्! मैं अज्ञ भला इन गूढ़ श्लोकों को क्या जानूँ! मैं तो इनको पढ़ते समय यह देखता हूँ कि एक रथ पर अर्जुन धनुष-बाण डाले बैठे हैं और श्यामसुन्दर एक हाथ में घोड़ों की रास तथा दूसरे में चाबुक लिए रथ के आगे बैठे हैं तथा अर्जुन की ओर मुख घुमाकर कुछ कह रहे हैं। उनके पतले-पतले लाल-लाल होंठ बोलते समय बड़ी सुन्दरता से हिल रहे हैं। यही देखते-देखते मैं भूल जाता हूँ कि पाठ समाप्त भी करना है।’ महाप्रभु बच्चों की बाँति फूट पड़े। रोते-रोते ब्राह्मण को हृदय से लगाया। उन्होंने कहा – ‘गीताजी का ठीक-ठीक अर्थ केवल तुम्हीं ने समझा है। ‘क्या तुम कह सकते हो कि ‘उस विप्र की भाँति तुमने एक दिन भी सप्तशती का स्वाध्याय किया है?’
भगवन्! मैंने इस प्रकार तो स्वाध्याय नहीं किया।
‘तब तुम कैसे कहते हो कि माँ तुम पर प्रसन्न नहीं होतीं? माँ और अप्रसन्न! बच्चे!
माँ तो प्रसन्नता की मूर्ति का दूसरा नाम है। वह करुणामयी नित्य प्रसन्न हैं। तुम उन्हें सचमुच कभी पुकारते ही नहीं। कैसे हो सकता है कि तुम पुकारो और माँ आवें नहीं?’ ‘किन्तु मैंने तो…..।’
‘रुको! तुमने दुर्गासप्तशती के पाठ सविधि समाप्त कर दिये और नवाक्षर बीजमन्त्रों का जप भी किया हवन-तर्पण के साथ। यही तो तुम कहना चाहते हो? पर सच कहो क्या तुम्हारे मन में श्रद्धा थी? मन एकाग्र और प्रेम से पूर्ण था? तुम बता सकते हो कि यदि ग्रामोफोन में सप्तशती के रेकार्ड बनाकर सहस्त्र बार बजाये जाय तो माँ आवेंगी या नहीं?’
‘भला रेकार्ड बजाने से माँ कैसे आयेंगी?’
‘ठीक -रेकार्ड बजाने से माँ नहीं आ सकती: क्योंकि वह जड़ है और उससे क्रिया मात्र होती है- भावहीन। माँ क्रियाधीन या कर्मपरतंत्र नहीं हैं। वे यदि परतंत्र हैं भी तो भाव या प्रेमपरतंत्र। इसी से रेकार्ड बजाने पर नहीं आतीं और तुम्हारी पूजा पर उन्हें आना चाहिये क्यों?’
‘मैं ऐसा ही सोचता हूँ।’
‘अब बताओ कि तुम्हारा पाठ और जप रेकार्ड की भाँति रटन्त हुआ या मानव की भाँति प्रेमपूर्ण भाव तथा एकाग्र चित्त से?’
‘गुरदेव! मुझे अपने प्रश्न का उत्तर तो प्रप्त हो गया ; किन्तु श्रीचरणों ने आदेश किया था कि स्वाध्यायमात्र से इष्टदेवता का साक्षात् होता है।’
‘मैंने कहा अवश्य था; किंतु कहा था मानव के लिए। स्वाध्यायमात्र का अर्थ दूसरे साधनों की अपेक्षा बिना केवल स्वाध्याय से, यह कहना था। पहले स्वाध्याय को समझ लो। जिसकी आवृत्ति करते-करते उसे हृदय का एक भाग बना लिया जाय , जो अपने हृदय का एक अध्याय हो जाय, वही स्वाध्याय है। फिर चाहे वह मन्त्र-जप हो या ग्रन्थ-पाठ। ऐसे ही स्वाध्याय से आराध्य की प्राप्ति अथवा इष्ट सिद्धि होती है।’
हम सब की भाँति महेश ने भी आध्यात्मिक पुस्तकों को यों ही सूँघ लिया था। कुछ सुन-सुना लिया था। पिता माँ दुर्गा के उपासक थे , घर में माता के गुणों का वर्णन होता ही रहता था। बचपन से पिता ने दुर्गाकवच रटा दिया था। भय के ही कारण सही, महेश उनका नित्य पाठ करता था। बचपन के संस्कार धीरे-धीरे वैसा ही सुसंग पाकर पुष्ट होते गये। अब महेश को माता के अतिरिक्त दूसरे किसी की चर्चा भाती नहीं थी।
घर पर अन्न-वस्त्र का अभाव था नहीं, पत्नी भी अनुकूल मिली थी। यों तो ‘जीवन’ अतृप्ति का नाम है ही; फिर भी महेश उतना हाय-हाय करनेवाला नहीं था।
दूसरे, पिताने बराबर उसे समझाया था कि सर्वेश्वरी जगन्माता से उसकी ‘मंगल मंजुल गोद’ माँगने के अतिरिक्त दूसरे, तुच्छ सांसारिक पदार्थ माँगना महामूर्खता है। ‘जब हम जगन्माता के राजकुमार हो सकते हैं तो भिखमंगे क्यों बनें! ‘महेश को इस भिक्षुक मनोवृति से घृणा थी। वह चाहता था केवल माता के दर्शन।
एक चाह होती है और दूसरी होती है भूख। हम संसार में जाने क्या-क्या चाहते हैं, यदि कोई बिना हाथ-पैर हिलाये दे दे तो; किंतु जिसके लिए हम भूखे होते हैं, उसके लिए आकाश-पाताल एक कर डालते हैं। महेश में माता के दर्शनों की जो चाह थी, वह बढ़ी और बढ़ते-बढ़ते भूख बन गयी।
पिता का शरीरान्त होने से घर का सारा भार महेष के ही सिर आ गया। वह अब स्वयं पिता बन चुका था, इससे उसका दायित्व और भी बढ़ गया था। घर के जंजालों से अवसर ही नहीं मिलता था। कई बार विन्ध्याचल जाने का विचार हुआ; किन्तु जा न सका।
‘ये कार्य तो जीवन भर अवकाश न देंगे।’ यह सोचकर उसने जाने का निश्चय ही कर लिया। जहाँ निश्चय में शक्ति है, वहाँ बाधा क्या!
अष्टभुजा के दर्शन करके जब वह मन्दिर से निकला तो उसने पंडे से पूछा- ‘इस रमणीक वन में कोई महात्मा भी रहते हैं?’ पता लगा कि पहाड़ी के उस ओर यहाँ से तीन चार मील पर एक अच्छे सिद्ध महापुरुष रहते हैं, किन्तु वहाँ जाने का मार्ग बड़ा कठिन है। महेश ने कठिनाइयों की चर्चा व्यर्थ समझी। वह पंडे की बतायी पगडंडी से चल पड़ा। झाड़ियों में झुकते, कण्टकों में उलझते, ऊँची-नीची चट्टानों पर चढ़ते-उतरते किसी प्रकार वह उस गहन वन की एकान्त फूस की कुटिया में पहुँच गया।
एक तूँबी, एक कुल्हाड़ी, चिमटा, मृगचर्म और धूनी के पास कुछ काष्ठ, बस वहाँ इतना ही सामान था। जगत के नेत्रों से दूर वहाँ एक जटा-भस्मधारी श्यामकाय महापुरुष धूनी के समीप दिगम्बर शक्ति-आसन पर बैठे थे। हाथों में रुद्राक्ष की माला घूम रही थी। महेश ने साष्टांग प्रणिपात किया। महापुरुष के नेत्र उठे। उस बेधक एवं गम्भीर दृष्टि ने सब समझ लिया। तू आ गया यहाँ? कैसे आया है?’
‘श्रीचरणों के दर्शनार्थ? ‘एक क्षण रुककर महेश ने पुनः हाथ जोड़कर पूछा – ‘प्रभो!
क्या इस अधम को भी माँ अपनायेंगी? ‘मैं भी उनके पादपद्मों के दर्शन पा सकता हूँ?’

महात्मा मुस्कराये – ‘अवश्य! स्वाध्याय करो! इष्ट की सिद्धि जप और पाठ से ही होती।’
महेश ने अनुनय किया और उसे दुर्गासप्तशती के अष्टात्तर शत पाठ तथा नवाक्षर बीजमंत्र के जप का आदेश हुआ। ‘तुम आओगे, यह माता ने प्रथम ही मुझे सूचित किया था। अब जाओ! दिन ढल रहा है, बस्तीतक अंधेरा होने से पूर्व पहुँचना ठीक होगा। जंगल तो हम जंगली लोगों के लिए ही उपयुक्त है।’
महेश ने पुनः साष्टांग प्रणिपात किया और धूनी से मिली प्रसाद-स्वरुप भस्म को वस्त्र में बाँधकर लौटा।
वह घर आया और पहुँचने के तीन दिन पश्चात ही उसने विधिपूर्वक फलाहार एवं भूमि-शयन करते हुए सप्तशती का पाठ और जप प्रारम्भ कर दिया। कुल एक सौ आठ ही पाठ तो करने थे, पूरे हो गये। जप भी समाप्त हो गया, पर माता का साक्षात हुआ नहीं।
‘मुझसे विधि में कोई त्रुटि हुई नहीं, माँने दर्शन क्यों नहीं दिया? ‘गुरु के वचनों पर अविश्वास के लिए हृदय में स्थान नहीं था। अपनी त्रुटि का स्वयं ज्ञान न होने पर वह फिर गुरुदेव के चरणों में उपस्थित होने विन्ध्याचल को चला।
पाठ-पाठ में भी भेद होता है। सप्तशती का पाठ तो सभी करते हैं; किन्तु महेशजी का पाठ कुछ और ही ढंग का है। वे श्लोकों को केवल वाणी से पढ़ नहीं जाते, हृदय से उनका पाठ करते हैं। जिन सात सौ श्लोकों को पण्डित लोग एक घण्टे में समाप्त कर देते हैं, इन्हीं में लगते उन्हें पूरे सात घंटे। पाठ के पश्चात जब जप प्रारम्भ होता- दूसरा ही कोई उनसे बार-बार भोजन के लिए आग्रह करता तो वे उठ पाते। अन्यथा उन्हें स्मरण ही नहीं होता कि कुछ और भी संसार में मुझको करना है।
दुर्गापाठ के उन सीधे-सादे श्लोकों की स्फूर्ति जब हृदय से होती, पता नहीं कितने गुरुतर गम्भीर अर्थों का उनसे उद्भव होता। वे गहन तत्त्व जो हम सब बड़े-बड़े भाष्यों के द्वारा भी समझ नहीं पाते, दीर्घकालीन शास्त्रों के पठन-पाठन से भी कठिनता से उपलब्ध होते हैं, महेशजी को उन श्लोकों में सरलता से प्राप्त हो जाते थे इसे चाहे माँकी कृपा कहिये या एकाग्रताका परिणाम।
धीरे धीरे वासनाएँ शान्त होती गयीं और दशा यहाँतक पहुँच गयी कि ‘माँ का दर्शन हो’ यह इच्छा भी पता नहीं कहाँ चली गयी। पाठ में स्वाभाविक रुचि थी और जप में आनन्द आता था। यह भूल ही गया कि पाठ कितना हुआ और जप कितना? जब कभी महेशजी गुनगुनाते रहते–
सब कुछ ले लो किन्तु, तुम्हारी पूजा का अधिकार रहे।
प्यार रहे न रहे पर प्रिय, मुझ पर पूजा का भार रहे।।
एद दिन प्रातःकाल सदा की भाँति उनके कमरे का द्वार खुला नहीं। पत्नी घबरायी और आठ बजते-बजते तक जब पुकारने पर भी द्वार न खुला तो उसने बढ़ई से किवाड़ तुड़वा दिये। महेशजी के नेत्रों से गंगा-यमुना बह रही थीं। वे किसी दूसरे ही लोक में थे। बड़ी देर में वे प्रकृतिस्थ हुए।
लोग कहते हैं कि महेशजी रात्रि में कमरा बंद करने पर ‘माँ, माँ’ कहकर प्रायः किसी से बातें किया करते हैं।

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