दस महाव्रत

तप
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कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः (योगदर्शन 2 .43)

चारों ओर सुनसान जंगल देखकर शिष्य ने कहा, गुरुदेव! हम सब मार्ग भूल गये हैं!’
‘नहीं वत्स, यहाँ आने का कुछ उद्देश्य है। गोरख कभी नहीं भूलता। देखो, उस पीपल की सीध में वह ग्राम दिखायी दे रहा है। वहाँ पर्याप्त भीड़ है। आज एक भक्त ने साधुओं को भोजन कराने का निश्चय किया है। कोलाहल स्पष्ट सुनायी पड़ता है और घी की सुगन्धि भी आती है। महात्मा गोरखनाथजी ने एक ओर संकेत किया। ‘यह सीधा मार्ग है।
दूसरे मार्ग से आने पर संध्या तक भी वहाँ न पहुँचते।’

चलते-चलते दिन ढलने लगा और तब जाकर कहीं ग्राम में पहुँचे। शिष्य सोच रहा था –
‘अवश्य गुरुदेव ने वे बातें अनुमान से कही होंगी। अन्यथा उतनी दूर से ग्राम देख लेना, शब्दसुन लेना या सुगन्धि प्राप्त कर लेना कैसे सम्भव है। जो भी हो, गुरुदेव का अनुमान अत्यन्त सच्चा होता है।’
पंक्ति बैठी और साधु भोजन करे लगे। महात्मा गोरखनाथजी ने एक लड्डू को काटते हुए कहा, ‘इधर लड्डुओं में नीम के पत्ते डालने की भी प्रथा है क्या!’ गृहस्थ उस नवीन शिष्य की भाँति महात्माजी से अपरिचित नहीं था। वह उन योगिराज की अलौकिक शक्तियों से परिचित था। उसने घर में पूछताछ की और यह स्वीकार करते हुए क्षमा याचना की कि ‘घृत खौलाते समय दो-तीन नीम के पत्ते हवा से उड़कर कड़ाहे में जा गिरे थे। ‘भोजनोपरान्त सबको आसन देकर बैठाया गया। श्रीगोरखनाथजी ने अपना आसन छोड़ते हुए कहा, ‘मैं अस्थि पर तो बैठने से रहा!’ वहीं एक दूरे सिद्ध भी थे। उन्होंने उस आसन पर चरण रक्खा – ‘पृथ्वी में कहाँ अस्थि नहीं है? सो यहाँ तो पूरे एक हाथ नीचे एक पशु का पैर मात्र है।’ वे वहीं बैठने लगे। उत्सुकतावश लोगों ने उन्हें दूसरे आसन पर बैठाकर उस स्थान को खोदा। निकला क्या! एक कुत्ते का पैर!
शिष्य को अब गुरु की शक्ति का बोध हुआ। एकान्त प्राप्त कर उसने वहाँ से आश्रम में
आने पर एक दिन अपने महान् गुरु के पदप्रान्त में मस्तक रखकर इन सिद्धियों का रहस्य जानने की इच्छा प्रकट की।
‘ये कोई सिद्धियाँ नहीं है, यह तो स्वाभाविक शक्ति है प्रत्येक मानव की।’ योगिराज ने गम्भीरता पूर्वक समझाया। ‘आदिशक्ति ने किसी से पक्षपात नहीं किया है। सबको समान शक्ति प्रदान की है। गिद्ध की दृष्टि, पिपीलिका की घ्राणशक्ति, हंस की रसना, श्वान का श्रवन, अन्धों की स्पर्शशक्ति और मकड़ी का कालज्ञान प्रत्येक प्राणी को प्राप्त है। उपयोग न करने से इन सबकी स्वाभाविक शक्ति नष्ट हो जाती है और उन पर मल एकत्र हो जाता है। तपस्या के द्वारा अशुद्धि नष्ट होने पर वे शक्तियाँ पुनः जाग्रत हो जाती है।’
समर्थ गुरु ने भाँप लिया कि शिष्य में इनके प्रति अनावश्यक उत्सुकता है -ये कोई महत्व की वस्तुएँ नहीं हैं। गिद्धादि पक्षी बनने की अपेक्षा तुम्हें मानवता से भी ऊपर उठना है और वह दिव्य बोध प्राप्त करना है जो इस जीवन का लक्ष्य है।
तुम्हारी शक्ति का उपयोग उसी के लिए होना चाहिये। इन बाजीगरों के कौतुकों के लिए नहीं।
उस समय तो शिष्य ने गुरुदेव के वचनों को स्वीकार कर लिया, पर उसके हृदय में वह उत्सुकता गयी नहीं। आवश्यक शिक्षा प्राप्त कर उसे तपस्या करने का आदेश हुआ। नेपाल की तराई के एक उपयुक्त वन के लिए उसने प्रस्थान किया।

‘तुम बड़े बल से गर्वित दिखते हो, तनिक वह मेरा कमण्डलू तो दे दो!’
एक हट्टे-कट्टे पहलवान को सिद्धनाथजी का आदेश हुआ। उस बेचारे ने बड़ा बल लगाया, उसके माथे पर पसीना आ गया ; किन्तु वह तुम्बी उससे उठी नहीं। ‘बस, इसीपर इतने घमंडी बने हो?’ उसने लज्जा से मस्तक झुका लिया। कुछ अधिक सम्पन्न लोग आ गये थे दर्शनार्थ। इतनी सिद्धि दिखाने से संतोष हुआ नहीं।
‘बच्चे! मुझे तनिक उठाकर वहाँ तो बैठा दो! ‘भला वह आठ वर्ष का बालक उन्हें कैसे उठाता! लोगों के पुचकारने पर वह उठा। यह क्या उसने फूल के समान स्वामीजी को उठा कर दूसरी चौकीपर बैठा दिया। लोगों को तब और भी आश्चर्य हुआ। जब उन्होंने देखा कि महाराज का शरीर उस चौकीपर पहुँचने के पश्चात ही घटने लगा और घटते-घटते नवजात शिशु के समान हो गया। उसी अवस्था में रहकर वे उपदेश और प्रवचन करते रहे।
दिन थे गरमी के, आम पकने लगे थे। महात्माजी ने पास के वृक्ष के शिखर पर चमकता बड़ा पीला आम लाने का आदेश दिया। चढ़ने को एक व्यक्ति चढ़ गया, पर वह फल बहुत दूर सीधी डाल पर था। वहाँ चढ़ना बहुत कठिन था। डाल हिलानेपर कच्चे फल कई गिरे, पर वह नहीं
गिरा। ‘व्यर्थ में कच्चे फल मत गिराओ।’ महाराज ने आदेश किया। विवश होकर बाँस की खोज होने लगी।
सच्ची बात तो यह थी कि महाराज को चमत्कार दिखाना था। ‘मैं स्वयं तोड़ लूँगा।’
कहकर वे उठे और उनका शरीर लम्बा होने लगा। इतने लम्बे हुए कि हाथ से फल को तोड़ा। फल एक भक्त को, जो सब में सम्पन्न जान पड़ता था , प्रसादस्वरूप दिया गया। शरीर अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गया।
भीड़ जुटने लगी सिद्धनाथजी के समीप। जनता तिल का ताड़ तो चुटकी बजाते करती है। चर्चा होने लगी कि वे पत्थर को मनुष्य, बाघ को बछड़ा आदि बना देते हैं। सबके मन की बात बतला देते हैं। रोगी रोग से त्राण पाने, दरिद्र धन के लिए, संतानहीन पुत्र के लिए, इस प्रकार लोग अपनी-अपनी कामना के लिए आने लगे।
महाराज को खाँसी भी आ जाय तो भक्त उसका कुछ-न-कुछ अर्थ अवश्य लगा लेते। प्रसिद्धि के साथ माया भी एकत्र होने लगी। भव्य मठ तो बन ही गया था, सरोबर के घाट बँध रहे थे। बगीचा लग गया था। आगन्तुकों के ठहरने के लिए धर्मशाला की नींव भी पड़ गयी। भन्डारा तो नित्य होता है।
पूरे चौदह वर्ष पश्चात् शिष्य को सुयोग मिला कि वह अपने परम पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में उपस्थित हो सके। बाबा गोरखनाथजी आये थे और उन्होंने घाघरा के दूसरे तट पर एक वटवृक्ष के नीचे आसन लगा दिया था। पता नहीं क्या समझकर वे इस पार श्रीसिद्नाथजी के मठ पर नहीं पधारे।

‘गुरुदेव नहीं पधारे तो मुझे तो उनके चरणों में उपस्थित होना ही चाहिए।’ सिद्धनाथ जी के साथ उनका सेवकमण्डल भी चला। सिद्ध और साधारण मानव में प्रभेदही क्या हो, यदि वह भी सर्वसाधारण के सदृश ही सब काम करे! लोग तो बैठे नौकाओं पर ; किंतु सिद्धनाथजी तो सिद्ध ठहरे, वे खड़ाऊँ पहने ही नदी के वक्षस पर चलने लगे। उनके खड़ाऊँ जल के ऊपर वैसे ही पड़ते थे, जैसे पृथ्वी पर। चरणों की अंगुलियों को भी जलने स्पर्श नहीं किया। वे घाघरा पार हो गये। वट की सघन छाया में मूल के समीप बाबा गोरखनाथजी एक शिला पर व्याघ्राम्बर डाले बैठे थे। धूनी जल रही थी और लम्बा चिमटा गड़ा हुआ था। दोनों कानों में विशाल मुद्रा झूल रही थी। पास ही बहुत-से भक्त मस्तक झुकाये पृथ्वी पर बैठे थे।
सीधे पहुँचकर सिद्धनाथजी सम्मुख दण्ड की भाँति गिर पड़े। भक्तों ने उनके लिए मार्ग छोड़ दिया था। गुरु ने मस्तक उठाया। पता नहीं क्यों महापुरुष का मुख तकम उठा।
नेत्र लाल हो गये। चिमटा उखाड़ कर उन्होंने अन्धाधुन्ध बौछारें प्रारम्भ कर दीं सिद्धनाथ की पीठ पर!
किसी में इतना साहस नहीं था कि उन योगीराज को उस समय रोके। प्रसिद्ध सिद्ध सिद्धनाथ भी इस प्रकार भीत हुए पिट रहे थे, जैसे अध्यापक के हाथों कोई बालक ताड़ना पा रहा हो।

गुरुदेव की उग्र मुखाकृति को एक बार देखने के पश्चात् फिर नेत्र नहीं उठ सके। चिमटे की मार पीठ, सिर, हाथ, जहाँ भी जो अंग सामने पड़ता, वहीं बेभाव की पड़ रही थी।
‘क्यों रे, नदी पार होने में कितने पैसे लगते हैं?’ भली प्रकार पीठ-पूजा करने के उपरान्त गुरुदेव ने पूछा। ‘केवल एक पैसा और साधु से कुछ नहीं।’ डरते डरते शिष्य ने उत्तर दिया।
‘इतने दिनों शरीर को तपस्या की अग्नि में भस्म करके तूने यह एक पैसे की मजदूरी का व्यापार सीखा है? मूर्ख! ताड़ तुझसे अधिक लम्बा है और हिमालय से भारी तू बन नहीं सकता। कोई तेरा कमण्डलु उठा सके या न उठा सके, तुझे क्या लाभ? तूने पशु और जड़ बनने के लिए ही घर-द्वार छोड़कर इतना कष्ट उठाया था?’
चिमटे की मार उतनी गहरी नहीं थी, जितनी इन शब्दों की। गुरु क्या जो शीष्य के बाह्याभ्यन्तर का प्रतिपल का ज्ञान न रखे? चिमटे की मार से मूक रहने वाले सिद्धनाथ बच्चों की भाँति गुरुदेव के समर्थ श्रीचरणों में फूट-फूटकर रोने लगे।
‘बस-इसीलिये आया था। अब फिर मिलूँगा चौदह वर्ष बाद।’
गोरखनाथजी ने चिमटा और व्याघ्राम्बर उठाया और एक ओर सघन वन में लीन हो गये। वे पुनः चौदह वर्ष पश्चात सिद्धनाथ जी को मिले या नहीं, यह तो पता नहीं, पर इतिहास साक्षी है कि सिद्धनाथ अपने गुरुदेव से तनिक भी न्यून नहीं थे। वे एक उच्च कोटि के महापुरुष हो गये हैं।

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