दस महाव्रत

संतोष
संतोषादनुत्तमसुखलाभः (योगदर्शन 2 . 42)

‘मातृभूमि से इतनी दूर, एकाकी, यहाँ न कोई अपना परिचित है और न स्वदेश का ही। यहाँ भला, पाँच रुपये क्या उद्योग करूँ? शरीर भी तो इतना सबल नहीं कि कहीं मजदूरी ही कर लूँ। कोई उच्च प्रामाणिक परीक्षा भी नहीं दी, नौकरी कौन देगा? कोई कला या व्यवसाय भी नहीं जानता! ‘बन्दरगाह पर खड़े-खड़े गिरधारीसिंह सोच रहे थे।
दुर्दैव के मारे बेचारे गिरधारीसिंह घर से कलकत्ते आये जब वहाँ कोई काम न मिला तो बैठे-बैठे पास की छोटी-सी पूँजी को भी पेट की भेंट करने की अपेक्षा उन्होंने रंगून जाकर भाग्य परीक्षा करने का निश्चय किया। एक मास कलकत्ते काटकर वे कल जहाज से रंगून उतरे थे।
‘समुद्रयात्रा और जलवायु के परिवर्तन से आज ज्वर भी प्रतीत होता है। यदि बैठकर दवा-दारू करने लगा तो ये पाँच रुपये भी उदर में जा रहेंगे और तब…..’

उनके सम्मुख उपवास या दर-दर भिक्षा माँगने का दृश्य आ गया। ‘यदि दवा न की और ज्वर बढ़ गया? ‘स्वजन एवं परिचितों से हीन इस अपरचित स्थान में रुग्ण होने पर जो दशा हो तो, उसका दृश्य पहले से भी अधिक भयानक था। सिर पर हाथ रखकर वहीं बैठ गये।
‘ऐश्वर्य चाहते हो तो उद्योग करो! अवश्य मिलेगा! !’ भीतर से किसी ने कहा। गिरिधारीसिंह को स्वामी पूर्णानन्दजी के वचनों पर अटूट श्रद्धा थी। वे उन्हें साक्षात परमात्मा मानते थे। उन्हीं के वचनों पर विश्वास करके तो वे घर से कलकत्ते के लिए चले थे। तब क्या स्वामीजी के ये वचन असत्य हैं! ना, ऐसा तो हो नहीं सकता। अब भी तो मेरे पास पाँच रुपये हैं। एक बार नवीन उत्साह लेकर वे फिर उठे।
आस्ट्रेलिया से एक जहाज आया था और उस पर गेहूँ भरा था। जहाज पर आनेवाले लोग नवीन थे। गिरिधारीसिंह तनिक स्थूल शरीर थे और अच्छे कपड़ों में रहनेवाले। पास में कुछ न रहने पर भी उनके वस्त्र स्वच्छ रहते थे। गिरधारीसींह ने सोचा-कारावास ही तो होगा। वहाँ कम-से-कम पेट की चिन्ता से मुक्त रहेंगे। ‘सीधे जाकर जहाज के अधिकारियों से पूरा जहाज गेहूँ खरीदने की बातचीत करने लगे।
जहाज के अधिकारियों ने समझा – ‘बिना दलाल के आनेवाला यह कोई धनी, पर नवीन व्यापारी है। ‘गिरिधारीसिंह को अपने घर से क्या देना था! झटपट

मोलभाव हो गया। इन्होंने पाँच रुपये देकर उन लोगों से गेहूँ बेचने की रसीद लिखा ली।
लोग कहते हैं कि भगवान को देना होता है तो छप्पर फाड़कर देते हैं। रसीद लिखकर गिरिधारीसिंह हटे ही थे कि जहाज के अधिकारी ने उन्हें फिर बुलवाया।
‘आस्ट्रेलिया से कम्पनी के स्वामी का तार आया है कि गेहूँ अभी न बेचा जाय!’
गिरिधारीसिंह समझ गये कि गेहूँ का बाजार चढ़ गया है। उन्होंने गेहूँ वापस देना अस्वीकार कर दिया। जहाज के स्वामियों ने फिर आस्ट्रेलिया तार खटकाये।
गिरिधारीसिंह से अनुनय-विनय की। अन्ततः खरीदे हुए भाव से आधपाव प्रति रुपये कम करके जहाज वालों को ही गेहूँ बेच दिया गया। पूरे तेरह हजार सात सौ पचपन रुपये का चेक लेकर गिरधारीसिंह नगर में लौटे।
भगवती भागीरथी के भव्य कूल पर अश्वत्थमूल में आज तीन-चार मास से एक मस्त महात्मा पड़े हैं। कमर में एक कौपीन के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। मध्याह्न में गाँव में जाकर ‘नारायण हरि’ करते हैं और जो कुछ मिला, अञ्जलि में लेकर मुख में डाल लेते हैं वहीं। दो चार घरों से इसी प्रकार भिक्षा करके लौटते हैं और फिर भर-भर अञ्जलि वे चरणोदक पान करते हैं। उन्हें किसी से माँगना तो है नहीं।
भावुक अपनी भावना के अनुसार स्वामीजी के सम्बन्ध में अटकल लगाते हैं। कोई उन्हें सिद्ध बतलाता है, कोई तपस्वी, कोई विरक्त और कोई आत्मदर्शी। स्वामीजी कुछ भेंट तो लेते नहीं, गाँव के भोले लोग यों ही उनके दर्शनों को सुविधानुसार आया करते हैं। स्वामीजी एक तो वैसे ही कम बोलते हैं और दूसरे उनकी गूढ़ बातें समझने की यहाँ योग्यता भी किसमें है। खेत और घर से ही अवकाश नहीं, यह कौन पता लगाये कि मुक्ति, ज्ञान, जिज्ञासा आदि किन पक्षियों के नाम हैं। महात्माओं के दर्शन से पुण्य होता है या उनका दर्शन करना चाहिये, इसी सामान्य भावना से लोग आते हैं। जो हो सकता है, सेवा भी करते हैं। पुण्य होगा, घर में मंगल होगा- इस लोभ से या महात्मा कहीं अप्रसन्न होकर कोई, शाप न दे दें-इस भय से भी।
दोपहरी की भिक्षा करके स्वामीजी लौटे तो एक दिन उन्होंने एक ग्रामीण को अपनी प्रतीक्षा करते पाया। वैसे ये सज्जन प्रायः नित्य प्रातः-सायं आते हैं और स्थान पर झाडू देना आदि छोटी-मोटी सेवाएँ करते ही रहते हैं। आनेवालों में सबसे उज्ज्वल वस्त्रोंवाले होनेपर भी यहाँ निसंकोच धूलि में बैठते हैं। आज इस दोपहरी में सब अपने -अपने काम में लगे होंगे, स्वामीजी के पास एकान्त होगा-यह समझकर वे आये थे। स्वामी जी से अकेले में वे कुछ कहना चाहते थे और अवसर मिलता ही न था।
‘गिरिधारीसिंह! आज दोपहरी में कैसे! ‘असमय में आने के कारण स्वामीजी ने पूछा। उत्तर के स्थान पर आगन्तुक स्वामीजी के चरणों में मस्तक रख कर सिसकने लगा ठीक बच्चों के समान। स्वामीजी ने उसे उठाया और आश्वासन देकर कारण पूछा।

‘माता-पिता के प्यार ने कष्ट सहने मे असमर्थ बना दिया है। कभी अपमान सहना नहीं पड़ा और न परिश्रम ही करना पड़ा। पिछले वर्ष पिता के देहान्त से ही विपत्ति प्रारम्भ हुई। घर में कोई सम्पत्ति नहीं। कृषि का श्रम सहा नहीं जाता। पर्याप्त पढ़े-लिखे भी नहीं कि कहीं नौकरी करे। अब सरकारी लगान देना है। महाजन ऋण देता नहीं और पुराने ऋण को कड़ाई से माँगता है। घर में भोजन के लिए भी नहीं।’
यही सब कष्ट-कथा सिसकते हुए सुनाने के पश्चात् वे फिर स्वामीजी के चरणों पर गिरकर फूट-फूट-कर रोने लगे।
स्वामीजी ने उठाया – भैया! रोओ मत! मैं विरक्त साधु हूँ। मेरे पास द्रव्य तो है नहीं जो तुम्हें दे दूँ। मैं केवल आशीर्वाद दे सकता हूँ। सुख यदि चाहते हो तब तो संतोष करो! नहीं, यदि, ऐश्वर्य चाहते हो तो उद्योग करो! अवश्य मिलेगा, जिसे चाहोगे! ‘ऐश्वर्य से भिन्न सुख की कल्पना भी उस समय गिरिधारीसिंह नहीं कर सकते थे। उन्होंने तो ‘उद्योग करो और ऐश्वर्य अवश्य मिलेगा! ‘इसी आशीर्वाद को ग्रहण किया।
स्वामीजी के आशीर्वाद पर उन्हें विश्वास था। ‘वे प्रसन्न हो गये। ‘न ठिकाने से भोजन, न स्नान, दिनभर हाय-हाय करते-करते जान चली जाती है। रात्रि में भी विश्राम नहीं। ‘झुँझलाकर रंगून के प्रसिद्ध आढ़ती बाबू गिरधारीसिंह ने टेलीफोन की घंटी बजने पर फोन लेने के बदले कनेक्शन पृथक कर दिया। आज दिन भर उन्हें अत्यधिक व्यस्त रहना पड़ा था। बारह बजे रात्रि में शयन करने को लेटने पर इस टेलीफोन का आना उन्हें बहुत अखरा।
‘इससे तो मैं घर पर ही शान्ति से रहता था। न इतनी चिन्ता थी और न इतना परिश्रम ही करना पड़ता था। उससे मिलो, उसे देखो, ये संतुष्ट रहें, उन्हें अप्रसन्न करने से हानि होगी -मैं इन सब बखेड़ों में दिनभर नाचते नाचते तंग आ गया। ‘उनके झुँझलाये मस्तिष्क में एक आँधी चल रही थी। नेत्र बंद करने पर भी निद्रा पास नहीं फटकती थी। अन्त में विचारों की उद्विग्नता से त्राण पाने के लिए उन्होंने बिजली का बटन दबाया और पास पड़ी रामायण उठा ली।
बिंनु संतोष न काम नसाहीं।
काम अछत सुख सपनेहुँ नाही।।
सर्वप्रथम यही पंक्ति सामने आई और यहीं समाप्त! पुस्तक बंद करके यथास्थान रख दी गयी। स्वामीजी ने यही कहा था कि सुख चाहते हो तो संतोष करो।
‘मैं उस समय सम्पत्ति का इतना भूखा था कि उससे भिन्न सुख को समझ ही न सका।
उन महापुरुष का आशीर्वाद अब भी मेरे साथ हैं। ऐश्वर्य-रोग की पीड़ा भली प्रकार भोग चुका। अब और नहीं- बस! ‘ उन्होंने प्रकाश बंद कर दिया और सो गये।

दूसरे दिन से सबने देखा कि गिरिधारीसिंह कुछ दूसरे ही हो गये है। ‘घाटा हो रहा है- हो जाने दो! अत्यावश्यक कार्य है- पूजा से निवृत होने पर। कलक्टर अप्रसन्न हो गये तो हानि हो सकती है-क्या मेरा प्रारब्ध ले लेंगे। सहकारी हैरान थे। घाटे-पर घाटा होता जा रहा है और यह ऐसा अजीब मनुष्य कि इसे सिर-पैर का ध्यान ही नहीं रहता।
पहले तो यह बड़ा उद्योगी था। अब क्या हो गया? ‘किसी ने धन का गर्व बताया और किसी ने मस्तिष्क का विकार। संसार में नीति चलती है और परलोक तथा अन्तःकरण में धर्म। धर्म नीति पर विजय पाता अवश्य है ; किन्तु पराकाष्ठा पर पहुँचकर। अन्यथा नीति की उपेक्षा का दण्ड महाराज हरिश्चन्द्र को भी भोगना पड़ा। यहाँ भी यही हुआ। इस उपेक्षा के फल से दिवाला निकल गया। गिरिधारीसिंह को कुछ छिपाकर तो रखना नहीं था। सब कुछ एक ही दिन में जिस समाज से एकत्र हुआ था, उसी में वितरित हो गया। रंगून छोड़कर जब गिरिधारीसिंह कलकत्ते उतरे, उनके पास केवल पाँच रुपये थे। ठीक उस दिन की भाँति, जिस दिन वे सर्वप्रथम रंगून पहुँचे थे।
+ + +
भगवती भागीरथी के भव्य कूल पर एक अश्वत्थ के मूल में एक ईंटों का छोटा-सा चबूतरा है। वृद्ध भगत ठाकुर उस पर गंगामें गोता लगाकर घर लौटते हुए एक लोटा जल और पास के कनैर से दो पीले पुष्प नित्य चढ़ाते हैं। लोग कहते हैं कि इकलौते पुत्र तथा पत्नी की मृत्यु पर भी भगत ठाकुर ने मुसकराकर कह दिया था कि ‘चलो ठीक हुआ, किंतु इस चबूतरे पर चढ़ाते हुए उनके नेत्रों के कोनों से एक साथ कई बूँदें निकल आती हैं। लोग बाबू गिरधारीसिंह को अब इसी नाम से सम्बोधन करते है। उनके नित्य मुख पर किसी ने कभी विषाद का चिह्न नहीं देखा कि यमराज भी उनकी मुस्कान को म्लान न कर सके।

Leave a Reply

Are you human? *