दस महाव्रत

शौच
शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः। (योगदर्शन 2.40)

वह विचारक था। सम्भव नहीं था कि वह दूसरों की देखा-देखी एक छकड़ा सामान यों ही लादे-लादे फिरता। वैसे वह श्रद्धालु था और जिस दिन से उसने रामानुजसम्प्रदाय की दीक्षा ली, आचारसम्बन्धी प्रत्येक नियम का उसने अक्षरश: पालन किया। बिना कोई अपवाद निकाले, बिना कोई बहाना बनाये, वह नियमों को बड़ी कठोरता से निभाता था। दूसरे लोगों के लिए वह आदर्श हो गया। फिर भी यह केवल कर्म-भार वह कबतक ढोता। वह विचारक था।
रमाकान्त ने सोचना प्रारम्भ किया – ‘दूसरों की दृष्टि मात्र से मेरा भोजन अपवित्र हो जाता है। मेरे पात्र दूसरों के स्पर्श के पश्चात फिर अग्नि से भी शुद्ध नहीं होते। मेरे आसन पर कोई हाथ भी रख दे तो वह मेरे काम का नहीं। अन्तत: यह सब क्यों! क्या श्रीमन्नारायण की पूजा के निमित्त? किन्तु प्रभु तो प्रेमाधीन है।
वे तो शूद्रों पर भी प्रसन्न होते ही हैं। अविधि और विधि वहाँ केवल सच्ची प्रपत्ति है। तब क्या मैं दूसरों से अधिक पवित्र हूँ? लोग ऐसा कहते तो हैं; फिर भी क्या यह सत्य है?’
‘दूसरों से मैं अधिक श्रेष्ठ हूँ’ यह अहंकार ही तो गहन जाल है। रमाकान्त तन्मय था विचारों में, ‘मेरे मन में काम-क्रोधादि भरे हैं। मैं ही जानता हूँ कि मेरा मन कितना अशुद्ध है। रहा शरीर -हे भगवान्! हड्डी, मज्जा, मेद, मांस, रक्त, कफ, पित्त, थूक, मूत्र, मल, चर्म, केश प्रभृति से भरा यह शरीर!! इनमें-से कोई भी छू जाय तो मुझे स्नान करना पड़ता है और मैं इन्हीं को ढो रहा हूँ।’
शास्त्र और गुरु की आज्ञा समझकर उसने नियमों को शिथिल नहीं किया, पर अब उसे शरीर से घृणा हो गयी। ‘मैं शुद्धाचारी और पवित्र हूँ’-यह धारणा जाने कहाँ लुप्त हो गयी।
जब वह शौच के पश्चात हाथ में मिट्टी लगाता- ‘उफ, यह रक्त और हड्डी क्या मलने से पवित्र होगी? ‘भोजन बनाते समय जब पर्दा लगाकर वह भीतर बैठता – ‘छिः! यह मांस का लोथड़ा तो चौके में ही है। ‘जब भोजन करने लगता – ‘यह चर्म और नख मुख में डाला जा रहा है। मुख में ही क्या है? लार, अस्थि, चर्म!! भगवान् का प्रसाद समझकर भोजन कर लेता।’
शरीर से उसे घृणा हो गयी। जिस शरीर के साज-श्रंगार में हम सब मरे जाते हैं; जिसे पुष्ट, नीरोग एवं निरापद रखने के लिये जमीन-आसमान एक किया जाता है, उसे वह फूटी आँखों देखना नहीं चाहता था। विवश था उसे धारणा करने के लिए। आत्महत्या पाप जो है।
‘ओह, यही अत्यन्त अशुद्ध और मलपूर्ण शरीर फिर धारण करना पड़ेगा? ‘वह फूट-फूट कर रोने लगता था यह सोचकर ही। उसे इसी जीवन में शरीर रखना पल-पल भारी हो रहा था।
माता-पिता का आग्रह था और रमाकान्त-जैसा श्रद्धालु उनकी आज्ञा टाल नहीं सकता था।
विवाह हो गया और पत्नी घर आयी। व्यर्थ! भला, वह नितान्त एकान्त-प्रिय कहीं संतानोत्पादन कर सकता है।
‘माता के उदर में नौ महीने निवास-एक ओर मल, एक ओर मूत्र, कहीं पीव और कहीं रक्त
उस मांस की थैली में रहना और फिर रक्त में लथपथ निकलना। एक जीव को मेरे कारण यह सब कष्ट-छिः!’ वह इसकी कल्पना से काँप जाता था। यों काम उसमें भी था, पर स्त्री को देखते ही उसे दिखता था मांस, रक्त, अस्थि। वासना हवा हो जाती ओर घृणा से वह दूर भगता। जिसे अपने ही शरीर से घृणा हो, वह दूसरे के शरीर को भला कैसे छू सकता है।
वह रोगी नहीं था ओर न कभी रोग ने उसे दर्शन ही दिया। रोग तो होते हैं असंयम से। जो भोजन में रुचि न रखता हो, ‘इसका बनेगा क्या? ‘यह सोचकर भोज्य पदार्थों से घृणा करता हो, केवल प्रसाद समझकर, कुछ भगवान् को भोग लगाकर पेट में डालता हो, – वह भी शुद्ध सात्विक, नपा-तुला, बाल की खाल निकाल-निकालकर जिसकी अशुद्धि दूर की गयी हो,
ऐसे भोजन को ग्रहण करने वाले के समीप रोग के आने का मार्ग ही क्या है।
उसका काम क्या था? दिनभर अपनी पवित्रता के खटराग में और अपने लक्ष्मीनारायण की पूजा में लगे रहना। दूसरों का प्रभाव तो तब पड़े जब दूसरे पास जा सकें दूसरों की वस्तुएँ भी तो बत्तीस बार धोकर प्रयोग में आती थीं। अन्न-दोष, संग-दोष, स्थान-दोष, क्रिया-दोष- इनमें-से किसी के फटकने को स्थान ही न था। ऐसी स्थीति में मनीराम का कल्याण प्रसन्न ही रहने में था। वे भी डरते थे कि अप्रसन्न हुए और इन्होंने अपवित्र समझकर हमें भी थाली की भाँति रगड़-रगड़कर माँजना-धोना प्रारम्भ किया तो पानी में ही खोपड़ी सफाचट हो जायगी।
रूप-हड्डी, माँस, आदि हैं, नेत्र-बेचारे जहाँ जाते, वहीं घृणा और फटकार पड़ती। शब्द-कोई मांस का लोथड़ा पास है-कर्ण का आनन्द मिट्टी हो जाता इस भाव के आते ही। स्पर्श-राम! राम!! चमड़ा छुयेगा। अरे ये फूल बने है मल की खाद खाकरसब गुड़ गोबर हो उठता त्वक्का। रस-क्या? इनका परिणाम हैं मल और मूत्र, और तब ये उससे भिन्न हैं! रसना बेचारी क्या करे। वमन करने को जी चाहता था। गन्ध नासिका सब मजा किरकिरा हो जाता जब उसे बुद्धि खरी-खरी सुनाती कि ये सब गन्ध केवल मल-मूत्र से पुष्ट हुई हैं या सड़कर नाबदान-जैसी गन्ध देती हैं।
ज्ञानेन्द्रियों की तो यह दशा थी और कर्मेंन्द्रियों को धोने, इधर-से-उधर करने, उठा ने-रखने से अवकाश ही नहीं था। वे करें तो क्या? तनिक किसी कार्य में विलम्ब होने पर सब में देर होने लगती। मनीराम फटकारने लगते; क्योंकि रमाकान्तजी तो सब कार्य तिल-तिल पूरा करेंगे और फलतः मनीरामजी का रात्रि-विश्राम मारा जायगा। इसलिये इन्द्रियों के तनिक भी प्रमाद करने पर वे लाल फिले होने लगते। वे बेचारी बस में न रहें तो जायें कहाँ?
‘ओह, फिर स्नान करना होगा! सो भी इस शीत काल में। लोग इतना भी ध्यान नहीं रखते कि जूते को मार्ग से तनिक दूर उतारा करें। ‘रमाकान्त स्नान करके आ रहे थे। द्वारके समीप ही किसी ने जूता उतार दिया था। वह पैर को लग गया। उन्हें तनिक खेद हुआ। सर्दी के मारे हाथ-पैर अकड़े जा रहे थे। ‘प्रमाद तो मेरा ही है, मुझे देखकर चलना चाहिये। ‘वे वहीं से चल पड़े और पुनः स्नान करके आये। पूजाजो अभी शेष थी।
पूजा समाप्त हुई। प्रसाद अपने हाथ ही प्रस्तुत करना था। पात्र में चूल्हे पर चावल सिद्ध होने लगा और रमाकान्तजी पास बैठे अपनी विचारधारा में तल्लीन हो गये। ‘यह शरीर-इसका निर्माण ही समस्त अपवित्र वस्तुओं से हुआ है और इसे पवित्र करने के लिए इतना प्रयास! क्या यह कभी शुद्ध हो सकता है? तब यह प्रयास क्यों होता है? ‘जूते के स्पर्श का स्मरण हो आया -‘चमड़े का जूता और उसके स्पर्श से शरीर अपवित्र हो गया! क्यों? शरीर क्या उससे भी गन्दे चमड़े से बना है? तब यह पवित्रता किसके लिए!

शरीर का क्या पवित्र और क्या अपवित्र होना। यह सब है आत्मशुद्धि के निमित्त। किन्तु यह आत्मा है क्या? जिसकी शुद्धिके लिये रात-दिन एक करना पड़ता है, वह आत्मा शरीर के भीतर ही तो है!’
जैसे बिजली छू गयी हो- ‘जरा-से मृतक चर्म के स्पर्श से तो यह शरीर अपवित्र हो गया और जो आत्मा शरीर के भीतर इस मज्जा-मांस में रहता है , वह कैसे शुद्ध होगा? ‘हृदय पर एक कठोर ठेस लगी। वे गम्भीर चिन्ता में तल्लीन हो गये। इतने तल्लीन कि चांवल जलकर भस्म हो गये, पर उन्हें कुछ पता नहीं।
रमाकान्त विशेष पढ़े-लिखे नहीं थे। थोड़ी हिन्दी और काम चलाने भर को संस्कृत जानते थे। उसी से विशिष्टाद्वैत सम्प्रदाय के कुछ ग्रन्थ पढ़ लेते थे। वैसे उन्हें पढ़ने का अवकाश भी कहाँ था। अपनी ही पद्धति से वे सोच रहे थे- ‘यदि आत्मा शरीर में ही रहता है तो कहाँ रहता है! उसका स्थान हृदय बतलाया गया है, तब क्या रक्तपूर्ण हृदय में वह रक्त से लथपथ है!’
उन्होंने हृदय में मन को एकाग्र किया। इन्द्रियों को थोड़ी शान्ति मिली, इस बराबर धोने-माँजने की खटपट से। मनीराम में इतनी शक्ति ही न थी, जो इधर-उधर कर सकें। उन्हें तो आज्ञापालन करना था; क्योंकि बराबर की स्वच्छता ने उन्हें भी झाड़-पोंछ कर स्वच्छ कर दिया था। बाहरी शुद्धि मन शुद्ध करने में हेतु होती ही है और मन शुद्ध होने पर इस प्रकार अपने ही अंगों में अपवित्रता का बोध होना स्वाभाविक है!

‘हृदय है- छिः यह भी मांस का ही है! इसके भीतर है रक्त। अति अपवित्र रक्त!! इसके और भीतर- अन्तस्तल में? हृदयाकाश-विशुद्ध प्रकाशमय हृदयाकाश! !!’
बस! इसके पश्चात् मनीराम पता नहीं कहाँ छूमंतर हो गये। वे भगे नहीं, उनकी सत्ता ही लुप्तप्राय हो गयी। रमाकान्तजी स्थिर, अविचल, शान्त बैठे थे।
दिन गया, रात्रि आयी और वह भी चली गयी। ‘प्रातःकाल आज रमाकान्त चरणस्पर्श भी करने नहीं आया? सर्दी में भी वह दिनभर पानी में हाथ डाले रहता है। उसे स्नान और संध्या ही दिनभर लगी रहती है। कहीं सर्दी तो नहीं लग गयी? ‘माता का ममत्व आर्द्र हो उठा।
रमाकान्तजी के एकान्त में कोई बाधा न पड़े, इसलिए कोई उनके पास नहीं जाता था। वे प्रायः दूसरे घेरेवाली कोठरी में अकेले रहते थे। माता उधर गयीं। द्वार खुला पड़ा था, चूल्हेपर पात्र रक्खा था, अग्नि के बदले कुछ भस्म थी रमाकान्त आसन पर बैठे थे।
माता ने पुकारा, बहुत पुकारने पर भी जब वे न बोले तो स्पर्श किया शरीर शीतल, जैसे! नासिका के पास हाथ ले जानेपर भी श्वास की गति प्रतीत नहीं होती! ‘माता चीख पड़ीं। भीड़ लग गयी और बहुत चिल्लाहट हुई। थोड़ी देर में श्वास चला, शरीर में थोड़ी उष्णता आयी और रमाकान्त जी ने नेत्र खोल दिये।
सत्यं, शिवं, सुन्दरम्’ रमाकान्त पूर्णतः बदल गये थे। अब न शरीर का पता था और न संसार का।

जब मौज आती तो उपर्युक्त वाक्य कहते और हँस पड़ते। इसके सिवा उन्हें कोई कार्य न था।

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