दस महाव्रत

ईश्वरप्रणिधान
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समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्। (योगदर्शन 2 .45)

बाबा रघुनाथदास जी कुछ पढ़े-लिखे नहीं थे; बचपन में ग्राम-पाठशाला में पढ़ने जाते अवश्य थे; किन्तु जिस दिन अध्यापक ने हाथ लाल कर दिये, उसी दिन से उन्होंने भी सरस्वती को नमस्कार कर लिया। माता के एकमात्र वही संतान थे, सो भी पितृहीन।
ऐसे प्यारे बच्चे कहाँ पढ़ा करते हैं?
कोई चिन्ता थी नहीं। माता के स्नेह ने भाव का अनुभव करने ही नहीं दिया था।
भोजन, खेल और अखाड़ा-बस, वे इतना ही जानते थे। शरीर अच्छा बना हुआ था।
आकार भी लम्बा था। लम्बी आकृति, पुष्ट शरीर और गेहुँआ रंग, एक भव्य मूर्ति प्रतीत होती थी।
भाग्य किसी का सगा नहीं है। माता का शरीरान्त होते ही अवस्था बदल गयीं। घर पर कोई सम्पत्ति तो थी नहीं।

यजमानों के घर जाकर, सैकड़ों युक्तियों से माता सब काम चलाती थी। उसकी अनुपस्थिति में अपने सिर भार पड़ा। पुरोहिती कभी की हो तो करते भी बने। कभी एक मित्र के घर भोजन कर आये और कभी दूसरे के।
इस प्रकार कितने दिन काम चलता? अन्त में नौकरी कर ली पुलिस में। घर पर तो कोई था नहीं, जिसकी चिन्ता करनी हो। पैसे के लिए झूठ-सच करने से वैसे भी उन्हें घृणा थी। संग अच्छा मिल गया। अक्षरज्ञान तो था ही। अपने साथी की देखा-देखी ‘रामचरितमानस’ को उल्टा सीधा पढ़ने का अभ्यास करने लगे। प्रारम्भ से वैष्णव साधुओं पर श्रद्धा थी कोई साधु आ जाता तो उसे भोजन बनवाकर प्रसाद कराकर तब जाने देते। पास में एक साधु की कुटी थी। समय मिलता तब वहाँ दिन में एक चक्कर अवश्य लगा आते।
एक दो दोहे रामायण के साधु महाराज से सुन आते। हो सकता तो कुछ सेवा भी कर देते।
साधु महाराज रामनवमी अयोध्याजी में करना चाहते। काशी, प्रयाग, चित्रकूट होकर घूमते-घामते उन्हें अयोध्याजी जाना था। पोष में चलने का विचार था , जिसमें माघभर तीर्थराज में कल्पवास किया जा सके। रघुनाथ त्रिपाठी ने भी उनके साथ चलने का निश्चय किया। छुट्टी की अर्जी भेजने पर जब वह स्वीकृत नहीं हुई तो नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

साधू महाराज के सात प्रयाग में कल्पवास करके चित्रकूट दर्शन करने के अनन्तर अयोध्या पहुँचे। वहाँ का जो दृष्य देखा तो फिर इच्छा न हुई कि उस दिव्यभूमि का परित्याग किया जाय। साधु महाराज तो रामनवमी करके विदा हो गये और रघुनाथ त्रिपाठी ने बाबा सीतारामदास के चरणों की शरण ग्रहण की। गुरुदेव की कृपा से वे रघुनाथ त्रिपाठी से बाबा रघुनाथ हो गये। लाल पगड़ी के स्थान पर मस्तक जटाओं से भूषित हुआ।
मनुष्य को देखकर कोई नहीं कह सकता कि उसके भीतर कितने महान् संस्कार दबे पड़े हैं और कब वे किस रूप में जाग्रत होंगे। कौन जानता था कि एक पुलिस का अनपढ़ सिपाही एक दिन उत्कृष्ट तितिक्षु एवं प्रगाढ़ भगवद्भक्त होगा। किन्तु हुआ कुछ ऐसा ही।
श्रीसरयूजी के विमल पुलिन पर कटि में मौंजी-मेखला तथा एक कौपीन लगाये बाबा रघुनाथ दास वर्ष के आठ मास व्यतीत कर देते थे। केवल चातुर्मास्य में, जब सरयूजी पुलिन को गर्भस्थ कर लेतीं तो वे घाट की एक बुर्ज में आ जाते थे। वहाँ न धूनी थी और न कन्था। एक तुम्बी अवश्य वे साथ रखते थे, नित्यकर्म में उपयोग के लिए।
दिन में एक बार सरयूजी में प्रातःस्नान करने के उपरान्त चले जाते हनुमानगढ़ी और कनक भवन। उधर से ही पेट को भाड़ा देते आते। कण्ठ और कर तुलसी की मणियों से भूषित थे ही। करकी सुमिरनी अविश्रान्त चलती ही रहती थी। एक ही कार्य था ‘सीताराम, सीताराम’ बस।
पता नहीं उनके उस गौर चर्म को स्थूल एवं कृष्णप्राय बनाने में कितनी शीत एवं ग्रीष्म ऋतुओं ने श्रम किया होगा। सरयूजी की लहरें ही बता सकती हैं कि उनकी सीता राम की ध्वनि की कितनी मालाएँ श्रीकौशलकिशोर के पावन पदों में समर्पित हो गयी हैं।
स्वयं बाबा रघुनाथदास को इन उलझनों से कोई मतलब नहीं था। सर्दी आवे या गरमी जाय, उनके लिए सब समान। उनकी समझ से ‘सीताराम’ का जप कभी भी पूरा नहीं हो पाता था। वे उसमें नित्य अतृप्त बने रहते थे।
यम-नियम तो व्यापक हैं। इनके बिना कोई किसी भी साधन का अधिकारी होता ही नहीं।
जो पल-पल में आसन बदलता है, वह अभ्यास क्या करेगा। एक आसन सभी साधकों को सिद्ध करना ही पड़ता है। बाबा रघुनाथदासजी के लिए यम-नियमों की चर्चा व्यर्थ है। ये तो उनके स्वभाव बन गये थे। जब वे सिद्धासन लगाकर बैठते तो आवश्यकता होने पर ही उठते थे। चार-छः घण्टेतक तो क्या, एकादशी को वे पूरी रात्रि एक ही आसन से बैठे रहते थे।
मन और प्राण का अभिन्न सम्बन्ध है। प्राणनिरोध से मनोनिरोध और मनोनिरोध से प्राण-निरोध सम्पन्न होता है। बाबा जब अपनी ‘सीताराम’ रट में तल्लीन होते तो मनको कहीं जाने का अवकाश ही नहीं मिलता। इस मनोनिरोध में जैसा दृढ़ एवं दीर्घ कालीन प्राणायाम हो जाता था, वैसा चेष्टापूर्वक कभी हो नहीं सकता। जब मन ही एकाग्र है तो इन्द्रियाँ कहाँ जायँ? उसके सहयोग के बिना उनमें शक्ति ही कहाँ है? प्रत्याहार तो स्वयं हुआ करता है। बाबा रघुनाथदासजी ने न कभी प्राणायाम किया और न प्रत्याहार। ये स्वयं हो जाते हैं, यह भी उन्होंने कभी सोचा नहीं। धारणा यदि थी तो ‘सीताराम’ नाम की और ध्यान था तो ‘युगल सरकार’ का। यह धारणा-ध्यान भी वे जान-बूझकर योग करने के लिए नहीं करते थे।
जब वे आसन लगाकर प्रारम्भ करते ‘सीताराम, सीताराम’ तो उन्हें शरीर और संसार दोनों ही विस्मृत हो जाते थे। प्रारम्भ तो वे करते थे उच्च स्वरसे; पर धीरे-धीरे स्वर गिरता और अन्त में वाणी रुक जाती। जप श्वास से चलता और जब श्वास भी शिथिल हो जाता तो मनीराम इस गुरुतर कार्य को सँभालते। सामने रहते थे युगल सरकार। और दोनों नेत्रों से दो धाराएँ कपोल, हृदय और घुटनों पर होती हुई श्रीसरयूजी की रेणुकामें अदृष्य होती जाती थीं। इसके अतिरिक्त भी कोई समाधि हो तो वह हुआ करे। इतना अवश्य है कि यह सबीज समाधि ही थी। ‘नाम’ स्वयं महान् है और कहीं उसके साथ नामी का स्मरण भी रहे, तब तो उसकी तुलना केवल उसी से हो सकती है। क्या आश्चर्य था जो नाम के सहारे बाबा रघुनाथदास इस भौतिक शरीर से ऊपर ऊठ जाते थे? जिस समय वे आसन लगाकर बैठते थे, लोग कहते हैं कि उनका न श्वास चलता था, न हृदय और न शरीर में उष्णता ही रहती थी। वे कनक-भवन से लौटकर प्रायः ग्यारह-बारह बजे बैठते थे और दस बजे रात्रितक उधर जानेवाले देखते थे कि वे वैसे ही बैठे हैं। प्रातः साढ़े तीन बजे सरयू-स्नान करनेवाले एक साधु कहते हैं कि वे ‘उस आसन से चार बजे के लगभग उठते हैं, उठकर स्नानादिमें लग जाते हैं। पता नहीं, वे सोते कब होंगे। सोते हैं भी या नहीं?’
एक दिन प्रातःस्नान करनेवालों ने देखा कि रघुनाथजी ज्यों-के-त्यों बैठे हैं। जब वे दस बजे तक भी न उठे तो भक्तों ने पुकारा, हिलाया। बड़ी कठिनता से उन्होंने नेत्र खोले। पता नहीं, उन्हें क्या हो गया था? न तो किसी की बात सुनते थे, और न समझते थे। ऐसे चारों ओर देखते थे, मानो कोई आश्चर्य देख रहे हों। हाथ जोड़कर रोने भी लगते थे। भक्तों ने उठाकर स्नान कराया। प्रसाद सम्मुख आनेपर भी जब उन्होंने नहीं उठाया तो भक्तों ने उनके मुख में अपने हाथ से ग्रास दिये।
थोड़े दिन यही क्रम चलता रहा। भक्तजन लगभग नौ-दस बजे बाबा रघुनाथदास को स्नान कराते और उन्हें अपने हाथ से भोजन कराते। वे अब कभी अपने-आप में रहते नहीं थे। भक्त उन्हें सरयू-किनारे से उठाकर कनक-भवन में जो आरम्भ से ऐसे प्रभु के लड़ैते लालों का क्रीड़ाप्रांगण बनता रहा है, बाहरी घेरे के एक कमरे में उनका आसन लगा दिया।
एक दिन लोगों ने देखा कि बाबा के मुखमण्डल से दीप्त प्रकाश निकल रहा है। उनकी ओर देखा नहीं जाता। नेत्र चकाचौंध करते हैं। मस्तिष्क में वहाँ पहुँचते ही ‘सीताराम, सीताराम’ की ध्वनि इतनी प्रबलता से गूँजती है कि प्रतीत होता है कि यदि मुख से दुराग्रहपूर्वक सीताराम न कहा जाय तो मस्तिष्क फट जायगा। वहाँ पहुँचते ही प्रत्येक व्यक्ति बराबर वहाँ रहने तक सीताराम कहने को विवश हो जाता है।
एक-एक करके अठारह दिन व्यतीत हो गये। भक्तों ने सब प्रकार से हिलाकर, पुकारकर, शंख-घड़ियाल बजाकर प्रयत्न कर लिया, बाबा रघुनाथदास के नेत्र नहीं खुले। उनके मुख का प्रकाश प्रखरतर होता गया। यहीं प्रकाश बतलाता था कि शरीर में अभी प्राण है। आज है रामनवमी। ठीक बारह बजे उधर प्रभु के जन्म की पहली तोप दगी और इधर उसी क्षण रघुनाथदासजी के कमरे में एक धड़ाका हुआ। एक भक्त ने बढ़कर देखा और फिर वहाँ भीड़ हो गयी। मस्तक ठीक मध्य से फट गया था। शरीर रक्तारुण बना था और रघुनाथदास श्रीरघुनाथ के दिव्यधाम में पहुँच चुके थे!

:इति श्री:

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