मधि का अंग – कबीर के दोहे

मधि का अंग

– संत कबीर

`कबीर’दुबिधा दूरि करि,एक अंग ह्वै लागि ।
यहु सीतल बहु तपति है, दोऊ कहिये आगि ॥1॥

भावार्थ / अर्थ – कबीर कहते हैं — इस दुविधा को तू दूर कर दे – कभी इधर की बात करता है, कभी उधर की । एक ही का हो जा । यह अत्यन्त शीतल है और वह अत्यंत तप्त – आग दोनों ही हैं । [ दोनों ही `अति’ को छोड़कर मध्य का मार्ग तू पकड़ ले ।]

दुखिया मूवा दुख कौं, सुखिया सुख कौं झुरि ।
सदा अनंदी राम के, जिनि सुख दुख मेल्हे दूरि ॥2॥

भावार्थ / अर्थ – दुखिया भी मर रहा है, और सुखिया भी एक तो अति अधिक दुःख के कारण, और दूसरा अति अधिक सुख से । किन्तु राम के जन सदा ही आनंद में रहते हैं , क्योंकि उन्होंने सुख और दुःख दोनों को दूर कर दिया है ।

काबा फिर कासी भया, राम भया रे रहीम ।
मोट चून मैदा भया ,बैठि कबीरा जीम ॥3॥

भावार्थ / अर्थ – काबा तो बन गया है काशी, और मेरा राम ही है रहीम । पहले जो आटा मोटा था, वह अब मैदा बन गया ।कबीर मौज में बैठा जीम रहा है, स्वाद ले-लेकर । [साम्प्रदायिकता ने खींचातानी कर-कर मजा किरकिरा कर दिया था ।`मध्य का मार्ग पकड़ लेने से दुविधा सारी दूर हो गयी और जीवन में स्वाद आ गया ।]

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