80. बिलावल

80. बिलावल

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हरि हरि हरि सुमिरन करौ।
हरि चरनारबिंद उर धरौं।।
हरि की कथा होइ जब जहां।
गंगाहू चलि आवै तहां।।
जमुना सिन्धु सरस्वति आवै।
गोदावरी विलंब न लाबै।।
सर्व तीर्थ को बासा तहां।
सूर, हरि-कथा होवे जहां।।1।।

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