76. विदुर के अतिथि

76. विदुर के अतिथि
हरि, तुम क्यों न हमारैं आये।
षटरस व्यंजन छाड़ि रसौई साग बिदुर घर खाये।।
ताकी कुटिया में तुम बैठे, कौन बड़प्पन पायौ।
जाति पांति कुलहू तैं न्यारो, है दासी कौ जायौ।।
मैं तोहि कहौं अरे दुरजोधन, सुनि तू बात हमारी।
बिदुर हमारो प्रान पियारो तू विषया अधिकारी।।
जाति-पांति हौं सबकी जानौं, भक्तनि भेद न मानौं।
संग ग्वालन के भोजन कीनों, एक प्रेमव्रत ठानौं।।
जहं अभिमान तहां मैं नाहीं, भोजन बिषा सो लागे।
सत्य पुरुष बैठ्यो घट ही में, अभिमानी को त्यागे।।
जहं जहं भीर परै भक्तन पै पइ पयादे धाऊं।
भक्तन के हौं संग फिरत हौं, भक्तनि हाथ बिकाऊं।।
भक्तबछलता बिरद हमारो बेद उपनिषद गायौ।
सूरदास प्रभु निजजन-महिमा गावत पार न पायौ।।1।।
शब्दार्थ :- जायौ =गर्भ से उत्पन्न,पुत्र। विषया = माया, विषय-वासना।
ठानैं =पक्का कर लिया है। घट =शरीर। भीर =कष्ट। भक्तवछलता =भक्त-वत्सलता, भक्तों
पर प्यार करना। बिरद = गाना
टिप्पणी :- अभिमानी दुर्योधन का राजसी सम्मान और षटरस व्यंजन छोड़कर श्रीकृष्ण ने
विदुर के यहां, बिना ही निमंत्रण के अलौना साग बड़े प्रेम से खाया था। यह पद उसी
प्रसंग का है।
‘सत्य पुरुष…त्यागै,’ अंतःकरण में विराजमान सत्यरूपी नारायण अभिमानी के पास कभी
नहीं जाता। जहां अहंभाव है, वहां ईश्वरभाव का काम ही क्या ? भगवान् तो प्रेम के
भूखे हैं, राजसी सम्मान के नहीं। गर्गभंजन गोविन्द को अभिमानी दुर्योधन का मान भंग
तो करना ही था, इसीलिए उसका आतिथ्य त्याग दिया और विदुर की कुटिया में जाकर
रूखा-सूखा भोजन बड़े प्रेम से किया।

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