73. मलार

73. मलार

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अब या तनुहिं राखि कहा कीजै।
सुनि री सखी, स्यामसुंदर बिनु बांटि विषम विष पीजै।।
के गिरिए गिरि चढ़ि सुनि सजनी, सीस संकरहिं दीजै।
के दहिए दारुन दावानल जाई जमुन धंसि लीजै।।
दुसह बियोग अरी, माधव को तनु दिन-हीं-दिन छीजै।
सूर, स्याम अब कबधौं मिलिहैं, सोचि-सोचि जिय जीजै।।18।।
शब्दार्थ :- बांटि = पीसकर। सीस संकरहिं दीजै = यह सिर काट-कर शिव पर चढ़ा दिया
जाय। दावानल = वन में लगी हुई आग। छीजै = क्षीण होता है। जीजै = जी रहा है।
टिप्पणी :- शरीर का रखना व्यर्थ है अब। बिना स्यामसुन्दर के देह-धारण किये रहना
अच्छा नहीं। ऐसे जीने से तो मर जाना ही अच्छा। शरीर नित्य क्षीण होता जाता हैं।

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