72. मलार

72. मलार

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तबतें बहुरि न कोऊ आयौ।
वहै जु एक बेर ऊधो सों कछुक संदेसों पायौ।।
छिन-छिन सुरति करत जदुपति की परत न मन समुझायौ।
गोकुलनाथ हमारे हित लगि द्वै आखर न पठायौ।।
यहै बिचार करहु धौं सजनी इतौ गहरू क्यों लायौ।
सूर, स्याम अब बेगि मिलौ किन मेघनि अंबर छायौ।।17।।
शब्दार्थ :- द्वै आखर = दो अक्षर, छोटी-सी चिट्ठी। गहरू =विलंब। किन =क्यों नहीं।
टिप्पणी :- परत न मन समुजायो,’ मन समझाने से भी नहीं समझता।
‘अब बेगि… छायौ,’ घनघोर घटाएं घिर आई है। यह संकेत किया गया है कि
कहीं इन्द्र तब का बदला न चुका बैठे। ब्रज को, कौन जाने, अबकी बार डुबा कर ही
छोड़े।इसलिए गोवर्द्धनधारी, ये काली-काली घटनाएं देखकर तो, ब्रज को बचाने के लिए आ
जाओ।

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