67. सारंग

67. सारंग

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ऊधो, मन माने की बात।
दाख छुहारो छांड़ि अमृतफल, बिषकीरा बिष खात।।
जो चकोर कों देइ कपूर कोउ, तजि अंगार अघात।
मधुप करत घर कोरि काठ में, बंधत कमल के पात।।
ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात।
सूरदास, जाकौ जासों हित, सोई ताहि सुहात।।12।।
शब्दार्थ :- ‘अंगार अघात,’ =अंगारों से तृप्त होता है , प्रवाद है कि चकोर पक्षी
अंगार चबा जाता है। कोरि =छेदकर। पात =पत्ता।
टिप्पणी :- ‘अंगार अघात,’ तजि अंगार न अघात’ भी पाठ है उसका भी यही अर्थ होता है,
अर्थात अंगार को छोड़कर दूसरी चीजों से उसे तृप्ति नहीं होती। ‘तजि अंगार कि अघात’
भी एक पाठान्तर है। उसका भी यही अर्थ है।

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