66. मलार

66. मलार

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ऊधो, हम लायक सिख दीजै।
यह उपदेस अगिनि तै तातो, कहो कौन बिधि कीजै।।
तुमहीं कहौ, इहां इतननि में सीखनहारी को है।
जोगी जती रहित माया तैं तिनहीं यह मत सोहै।।
कहा सुनत बिपरीत लोक में यह सब कोई कैहै।
देखौ धौं अपने मन सब कोई तुमहीं दूषन दैहै।।
चंदन अगरु सुगंध जे लेपत, का विभूति तन छाजै।
सूर, कहौ सोभा क्यों पावै आंखि आंधरी आंजै।।11।।
शब्दार्थ :- सिख = शिक्षा, उपदेश। तातो =गरम। जती =यति, संन्यासी।
यह मत सोहै = यह निर्गुणवाद शोभा देता है। कैहै =कहेगा। चंदन अगरु = मलयागिर चंदन
विभूति =भस्म, भभूत। छाजै =सोहती है।
टिप्पणी :- ‘हम लायक,’ हमारे योग्य, हमारे काम की। अधिकारी देखकर उपदेश दो।
‘कहौ …कीजै,’ तुम्हीं बताओ, इसे किस तरह ग्रहण करे ? ‘विपरीत’ उलटा, स्त्रियों
को भी कठिन योगाभ्यास की शिक्षा दी जा रही है, यह विपरीत बात सुनकर संसार क्या
कहेगा ? ‘आंखि आंधरी आंजै’ अंधी स्त्री यदि आंखों में काजल लगाए तो क्या वह उसे
शोभा देगा ? इसी प्रकार चंदन और कपूर का लेप करने वाली कोई स्त्री शरीर पर भस्म रमा
ले तो क्या वह शोभा पायेगी ?

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