65. टोडी

65. टोडी

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अंखियां हरि-दरसन की भूखी।
कैसे रहैं रूप-रस रांची ये बतियां सुनि रूखी।।
अवधि गनत इकटक मग जोवत तब ये तौ नहिं झूखी।
अब इन जोग संदेसनि ऊधो, अति अकुलानी दूखी।।
बारक वह मुख फेरि दिखावहुदुहि पय पिवत पतूखी।
सूर, जोग जनि नाव चलावहु ये सरिता हैं सूखी।।10।।
शब्दार्थ :- रांची =रंगी हुईं अनुरूप। अवधि = नियत समय। झूखी = दुःख से पछताई
खीजी। दुःखी =दुःखित हुई। बारक =एक बार। पतूखी =पत्तेश का छोटा-सा दाना
टिप्पणी :- ‘अंखियां… रूखी,’ जिन आंखों में हरि-दर्शन की भूल लगी हुई है, जो रूप-
रस मे रंगी जा चुकी हैं, उनकी तृप्ति योग की नीरस बातों से कैसे हो सकती है ?
‘अवधि…..दूखी,’ इतनी अधिक खीझ इन आंखों को पहले नहीं हुई थी, क्योंकि श्रीकृष्ण
के आने की प्रतीक्षा में अबतक पथ जोहा करती थीं। पर उद्धव, तुम्हारे इन योग के
संदेशों से इनका दुःख बहुत बढ़ गया है।
‘जोग जनि…सूखी,’ अपने योग की नाव तुम कहां चलाने आए हो? सूखी रेत की नदियों में
भी कहीं नाव चला करती है? हम विरहिणी ब्रजांगनाओं को क्यों योग के संदेश देकर
पीड़ित करते हो ? हम तुम्हारे योग की अधिकारिणी नहीं हैं।

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