63. केदारा

63. केदारा

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फिर फिर कहा सिखावत बात।
प्रात काल उठि देखत ऊधो, घर घर माखन खात।।
जाकी बात कहत हौ हम सों, सो है हम तैं दूरि।
इहं हैं निकट जसोदानन्दन प्रान-सजीवनि भूरि।।
बालक संग लियें दधि चोरत, खात खवावत डोलत।
सूर, सीस नीचैं कत नावत, अब नहिं बोलत।।8।।
शब्दार्थ :- नावत =झुकाते हो।
टिप्पणी :- ‘जाकी बात….दूरि,’ जिस निर्गुण ब्रह्म की बात तुम हमारे सामने बना रहे
हो, वह तो हमसे बहुत दूर है , हमारे परिमित ज्ञान के परे है।
‘सीस नीचें…बोलत,’ अब क्यों नीचे को सिर कर लिया ? कुछ बोलते क्यों नहीं ?

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