60. सारंग

60. सारंग

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नीके रहियौ जसुमति मैया।
आवहिंगे दिन चारि पांच में हम हलधर दोउ भैया।।
जा दिन तें हम तुम तें बिछुरै, कह्यौ न कोउ ‘कन्हैया’।
कबहुं प्रात न कियौ कलेवा, सांझ न पीन्हीं पैया।।
वंशी बैत विषान दैखियौ द्वार अबेर सबेरो।
लै जिनि जाइ चुराइ राधिका कछुक खिलौना मेरो।।
कहियौ जाइ नंद बाबा सों, बहुत निठुर मन कीन्हौं।
सूरदास, पहुंचाइ मधुपुरी बहुरि न सोधौ लीन्हौं।।5।।
शब्दार्थ :- नीके रहियौ = कोई चिम्ता न करना। न पीन्हीं पैया = ताजे दूध की धार
पीने को नहीं मिली। बिषान = सींग, (बजाने का)। अबेर सबेरी = समय-असमय, बीच-बीच में
जब अवसर मिले। सोधौ =खबर भी।
टिप्पणी :- ‘कह्यौ न कोउ कन्हैया’ यहां मथुरा में तो सब लोग कृष्ण और यदुराज के नाम
से पुकारते है, मेरा प्यार का ‘कन्हैया’ नाम कोई नहीं लेता।
‘लै जिनि जाइ चुराइ राधिका’ राधिका के प्रति 12 बर्ष के कुमार कृष्ण का निर्मल
प्रेम था,यह इस पंक्ति से स्पष्ट हो जाता है।राधा कहीं मेरा खिलौना न चुरा ले जाय,
कैसी बालको-चित सरलोक्ति है।

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