57. रामकली

57. रामकली

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संदेसो दैवकी सों कहियौ।
‘हौं तौ धाय तिहारे सुत की, मया करति नित रहियौ।।
जदपि टेव जानति तुम उनकी, तऊ मोहिं कहि आवे।
प्रातहिं उठत तुम्हारे कान्हहिं माखन-रोटी भावै।।
तेल उबटनों अरु तातो जल देखत हीं भजि जाते।
जोइ-जोइ मांगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करिकैं न्हाते।।
सुर, पथिक सुनि, मोहिं रैनि-दिन बढ्यौ रहत उर सोच।
मेरो अलक लडैतो मोहन ह्वै है करत संकोच।।2।।
शब्दार्थ :- मया = दया। तऊ = तोभी। टेव =आदत। उबटनो =बटना, तिल चिरौंजी आदि
पीसकर शरीर में लगाने की चीज, जिससे मैल छूट जाता है और शरीर का रूखापन दूर हो जाता
है। तातो =गरम। भजि जाते = भाग जाते थे। क्रम-क्रम करिकैं =धीरे-धीरे।
अलक लड़ैतो = प्यारा।
टिप्पणी :- ‘मैं तो तुम्हारे पूत की मात्र एक धाय हूं, इसलिए सदा से दया बनाए रखना,’
जदपि टेव…आवै,’ तुम्हारा तो वह लड़का ही ठहरा, तुम उसकी आदतें जानती ही हो, पर
ढिढाई क्षमा करना, पाला-पोसा तो मैंने ही उसे है , उसकी कुछ खास-खास आदतें मैं ही
जानती हूं, सो कुछ निवेदन मुझे करना ही पड़ता है।
‘ह्वै-है करत संकोच,’ तुम्हारे घर को वह पराया घर समझता होगा और मेहमान की तरह वहां
मेरा कन्हैया संकोच करता होगा।

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