54. कल्याण

54. कल्याण

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धनि यह वृन्दावन की रैनु।
नंदकिसोर चराई गैयां, बिहरि बजाई बैनु।।
मनमोहन कौ ध्यान धरै जो, अति सुख पावत चैनु।
चलत कहां मन, बसहिं सनातन, जहां लैनु नहीं दैनु।।
यहां रहौ जहं जूठन पावैं, ब्रजवासी के ऐनु।
सूरदास ह्यां की सरबरि नहिं, कल्पवृच्छ सुरधैनु।।3।।
शब्दार्थ :- रेनु = रज,धूल। बेनु =बंशी। चैनु =चैन, आनन्द।
जहां लैनु नहिं देनु =जहां किसी तरह का कोई झंझट नहीं। सनातन =सदा।
ऐनु =अयन, घर। सरबरि= तुलना।

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