52. धनाश्री

52. धनाश्री

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जौ बिधिना अपबस करि पाऊं।
तौ सखि कह्यौ हौइ कछु तेरो, अपनी साध पुराऊं।।
लोचन रोम-रोम प्रति मांगों पुनि-पुनि त्रास दिखाऊं।
इकटक रहैं पलक नहिं लागैं, पद्धति नई चलाऊं।।
कहा करौं छवि-रासि स्यामघन, लोचन द्वे, नहिं ठाऊं।
एते पर ये निमिष सूर , सुनि, यह दुख काहि सुनाऊं।।1।।
शब्दार्थ :- बिधिना =विधाता, ब्रह्मा। अपबस =अपने वश में। साध पुराऊं =इच्छा पूरी
करूं। त्रास =डांट-दपट, भय। पद्धति =रीति। ठाऊं =स्थान। निमिष = पलक।
टिप्पणी :- ‘तौ सखि….तेरो’ सखी, तूने कृष्ण की छवि देखने को कहा है, पर इन दो
छोटी-छोटी आंखों से उस अनंत रूप राशि कौ कैसे निरखूं ? यदि विधाता को किसी तरह वश
में कर सकूं, तो तेरा भी कहना सफल हो जाय और कृष्ण को देखने की मेरी लालसा भी पूरी
हो जाय।
‘कहा करौं….ठाऊं’ क्या करूं, श्यामसुंदर तो सौन्दर्य के सागर हैं, उन्हें इन दो
नेत्रों में बसा सकती हूं। स्थान ही नहीं, लाचारी है।
‘एते पर …सुनाऊं,’ एक तो दोही आंखें, फिर पलकों का बार-बार लाना, यह और भी बला
है। सदा खुली ही रहतीं पलक न गिरते, तो फिर भी कुछ संतोष हो जाता। एकटक देखती
तो रहती। पर वह भी अब होने का नहीं।

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