51. नट

51. नट

——————–
मैया, हौं न चरैहों गाइ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों, मेरे पाइं पिरांइ।।
जौ न पत्याहि पूछि बलदाउहिं अपनी सौंह दिवाइ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि गारी देति रिसाइ।।
मैं पठवति अपने लरिका कों आवै मन बहराइ।
सूर श्याम मेरो अति बारो, मारत ताहि रिंगाइ।।25।।
शब्दार्थ :- घिरावत =इधर-उधर से हांककर एक जगह करना। न पत्याहि =विश्वास न करे।
सौंह =कसम। आवै मन बहराइ = मन बहला आवै। बारो = बालक। मारत रिंगाई = चला-चला
कर थका डालते हैं।
रूप-माधुरी

——————-

Leave a Reply

Are you human? *