49. बिलावल

49. बिलावल

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आजु बन बन तैं ब्रज आवत।
रंग सुरंग सुमन की माला, नंद नंदन उर पर छबि पावत।।
ग्वाल बाल गोधन संग लीनें, नाना गति कौतुक उपजावत।
कोउ गावत, कोउ नृत्य करत, कोउ उघटत, कोउ ताल बजावत।।
रांभति गाय बच्छ हित सुधि करि प्रेम उमंगि थन दूध चुवावत।
जसुमति बोलि उठी हरषित ह्वै ‘कान्हा’ धेनु चराये आवत।। ‘
इतनी कहत आय गये मोहन, जननी दौरि हियें लै लावत।
सूर, स्याम के कृत जसुमति सों ग्वाल बाल कहि प्रकट सुनावत।।23।।
शब्दार्थ :- कौतुक =आश्चर्य, आनंद। उघटत =फूदता है। रांभति =रंभाती है, जोर से
शब्द करती है। हियें ले =हृदय लगाकर।
टिप्पणी :- ‘नाना गति ….उपजावत,’ ग्वाल-बाल अनेक प्रकार के नाच-कूद से आनन्द पैदा
कर रहे हैं, कोई किसी गति से चला आ रहा है तो कोई किसी गति से।
‘रांभति….चुवावत,’ गाय अपने बछड़े की याद करके दौड़ती हुई चली आ रही है।
बार-बार रंभाती है, थनों से दूध मानों चू रहा है।
‘स्याम के कृत,’ दिन भर की कृष्ण की बातें, जैसे, इन्होंने, मैया बड़ा ऊधम मचाया,
कहीं इस पेड़ पर चढ़े, कहीं उस पेड़ पर, जमुना में भी खूब नहाये, श्रीदामा से लड़ाई
की और सुबल से मित्रता आदि, शिकायतें। पर गाय चराने की तो सबने तारीफ ही की होगी,
कारण कि गोचारण में गोपाल बड़े कुशल थे। यही सब कृत्य थे कृष्ण के। इन्हीं सब
बातों को बढ़ा-चढ़ा कर यशोदा के सामने कहा गया।

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