47. आसावरी

47. आसावरी

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मैया, हौं गाय चरावन जैहों।
तू कहि महर नंद बाबा सों, बड़ो भयौ, न डरैहौं।।
रैता पैता मना मनसुखा हलधर संगहिं रैहौं।
बंसीबट तर ग्वालिन के संग खेलत अति सुख पैहौं।।
ओदन भोजन दै दधि कांवरि भूख लगे तैं खैहौं।
सूरदास, है साखि जमुन जल सौंह देहु जु नहैहौं।।21।।
शब्दार्थ :- रैता, पैता, मना,मनसुखा-श्रीकृष्ण के बाल-सखाओं के नाम। हलधर =बलराम।
रैहों = रहूंगा। बंसीबट =एक वृक्ष, जिसके नीचे श्रीकृष्ण बंसी बजाया करते थे। आज
भी वृंदावन में यमुना-तट पर बंसीवट प्रसिद्ध है। ओदन =भात। कांवरि = बहंगी, एक
लकड़ी के दोनों सिरों पर पात्र बंधे होते हैं, जिनमें जल, दूध, दही आदि चीजें ढोई
जाती है। कावर कन्धे पर रखी जाती है। साखि =साक्षी।
टिप्पणी :- तू कहि डरै…हरौं, “मैया, अब तो तू नंद बाबा से सिफारिश कर दे। मैं,
देख, कितना बड़ा हो गया हूं। मुझे बन में जाते कुछ भी डर न लगेगा।”
‘है साखि… नहै हौं,’ मैया, तू सदा यह आशंका किया करती है कि कृष्ण कहीं यमुना में
डूब न जाय, तो मैं यमुना जल की सौगंध खाकर कहता हूं कि मैं कभी उसमें न नहाऊंगा।
तू मेरा विश्वास रख।”

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