46. गोरी

46. गोरी

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निरखि स्याम हलधर मुसुकानैं।
को बांधे को छोरे, इनकों, इन महिमा एई पै जानैं।।
उतपति प्रलय करत हैं एई, सेष सहसमुख सुजस बखानैं।
जमलार्जुनहिं उघारन कारन करत अपन मनमानैं।।
असुर संहारन, भगतहिं तारन, पावन पतित कहावत बानैं।
सूरदास, प्रभु भाव-भगति के अति हित जसुमति हाथ बिकाने।।20।।
शब्दार्थ :- उतपति = उत्पत्ति, सृष्टि रचना। कारन करत = कारण अर्थात हेतु निकाल
लेते है। बानैं =विरुद्ध।
कृष्ण को बंधन में पड़ा देखकर बलराम मन-ही-मन मुसकराये और कहने लगे, इन्हें कौन
बांध सकता है और कौन खोल सकता है? इनकी महिमा यही जानें। यही सृष्टि रचते हैं, और
यही संहार करते हैं। इनका यशोगान शेष सहस्र मुखों से ही करते हैं। इन्हीं ने तो आज
स्वयं ही अपने को बंधाने का एक हेतु निकाल लिया है। बात यह है कि यमलार्जुन का
उद्दार करना था। राक्षसों को मारने वाले, भक्तों को मुक्ति देने वाले और पापियों
का उद्धार करने वाले यही तो हैं। यह सदा भक्ति के अधीन हैं, इसी कारण यशोदा मैया के
वश में हो गये हैं।
इस समस्त पद में श्रीकृष्ण की ईश्वरता ही दिखाई गई है। ‘यमलार्जुन उद्धार’ के
प्रसंग में ईश्वरता की निदर्शन करना आवश्यक था। ‘यमलार्जुन’ नलकूबर और मणिग्रीव
नामक दो कुबेर पुत्र नारद के शाप से ब्रज में जुड़वां अर्जुन वृक्ष के रूप में पैदा
हुए थे। उन्हें सान्त्वना दे दी गई थी कि श्रीकृष्ण के स्पर्श से उनका उद्धार होगा
वही हुआ। वे दोनों वृक्ष धड़ाम से गिर पड़े और नलकूबर के रूप में उन्होंने भगवान्
की स्तुति की। दोनों भाई शाप-मुक्त होकर पिता कुबेर के लोक में चले गये।

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