45. सोरठ

45. सोरठ

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यह सुनिकैं हलधर तहं धाये।
देखि स्याम ऊखल सों बांधे, तबहीं दोउ लोचन भरि आये।।
“मैं बरज्यौ कै बार कन्हैया, भली करी, दोऊ हाथ बंधाये।
अजहूं छांड़ोगे लंगराई” दोउ कर जोरि जननि पै आये।
‘स्यामहिं छोरि मोहिं बरु बांधौ,’ निकसतसगुन भले नहिं पाये।
मेरो प्रान जीवन धन भैया, ताके भुज मोहिं बंधे दिखाये।।
माता सों कहि करौं ढिठाई शेषरूप कहि नाम सुनाये।
सूरदास, तब कहति जसोदा,’दोउ भैया एकहिं मत भाये।।19।।
शब्दार्थ :- हलधर = बलराम। बरज्यौ =रोका। लंगराई =शरारत। जननि = माता यशोदा
के पास। बरू =चाहे, भले ही। सगुन = शकुन।
टिप्पणी :- ‘स्यामहि छोरि…..दिखाये,’ यशोदा मैया से बल राम कहते हैं,’ मैया, मेरे
प्यारे जीवन धन भाई को तू छोड़ दे। उसके बदले मुझे भले रस्सी से बांध ले। घर से
निकलते आज इसी से अपशकुन हुए थे। अपने प्यारे बाई को मैंने आज आंखों बंधा हुआ
देखा।” पर यह कैसे हो सकता था कि अपराध तो करें कृष्ण और बांधे जायें बलराम!
‘शेष-रूप कहि नाम सुनाये’ अब बलरामजी ने जरा तनकर कहा, ” तुम जानती नहीं, मैं
कौन हूं। मैं साक्षात शेषनाग हूं। खोल दो इसी समय मेरे भाई को।” इस धमकी का भी
कोई असर न हुआ। मुस्कराकर यशोदा ने कहा,”तुम दोनों ही भाई बातें बनाना सीख गये हो।
माखन का यह चोट्टा कहने लगता है कि मैं विष्णु भगवान् हूं, और तू आज कहता है कि मैं
साक्षात् शेषनाग हूं।”

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