44. सोरठ

44. सोरठ

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जसोदा, तेरो भलो हियो है माई।
कमलनयन माखन के कारन बांधे ऊखल लाई।।
जो संपदा दैव मुनि दुर्लभ सपनेहुं दई न दिखाई।
याही तें तू गरब भुलानी घर बैठें निधि पाई।।
सुत काहू कौ रोवत देखति दौरि लेति हिय लाई।
अब अपने घर के लरिका पै इती कहा जड़ताई।।
बारंबार सजल लोचन ह्वै चितवत कुंवर कन्हाई।
कहा करौं, बलि जाउं, छोरती तेरी सौंह दिवाई।।
जो मूरति जल-थल में व्यापक निगम न खोजत पाई।
सोई महरि अपने आंगन में दै-दै चुटकि नचाई।।
सुर पालक सब असुर संहारक त्रिभुवन जाहि डराई।
सूरदास, प्रभु की यह लीला निगम नेति नित गई।।18।।
शब्दार्थ :- संपदा = धन संपत्ति। जड़ताई =निष्ठुरता, कठोरता। सौंह=कसम। थल =स्थल
व्यापक =पूर्ण। त्रिभुवन = तीन लोक। नेति = ऐसा नहीं।
टिप्पणी :- ‘तेरो भलो….माई,’ धन्य है, तेरा हृदय बड़ा अच्छा है, अर्थात् बड़ा
बुरा है, बड़ा कठोर है।
‘सुत काहू….जड़ताई,’ तेरा हृदय तो इतना सरस था कि किसी के भी बच्चे को रोता
देखती, तो दौड़कर उसे छाती से लगा लेती थी। न जाने, अब तुझे क्या हो गया, जो अपनी
ही कोख के लाल पर तू इतना कठोरपन दिखा रही है।
‘कहा करौं….दिवाई,’ अपने प्रति सहानुभूति दिखाने वाली उस गोपी की ओर कृष्ण
आंखें डबडबाकर जब बार-बार देखते हैं, तब वह कहती है, ” क्या करूं, मैं लाचार हूं।
मैं तुम्हारी मैया से नहीं डरती। अबतक तो मैंने यह रस्सी खोल दी होती। पर
तुम्हारी ही सौगंध तुम्हारी मां ने मुझे रखा दी है। सो बंधन खोलने से लाचार हूं।”

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