42. रामकली

42. रामकली

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मैया, मैं नहिं माखन खायौ।
ख्याल परे ये सखा सबै मिलि, मेरे मुख लपटायौ।।
देखि तुही सीके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायौ।
तुहीं निरखि नान्हें कर अपने, मैं कैसे करि पायौ।।
मुख दधि पौंछि बुद्धि इक कीन्हीं, दौना पीठि दुरायौ।
डारि सांटि मुसुकाइ जसोदा स्यामहिं कंठ लगायौ।।
बाल बिनोद मोद मन मोह्यौ, भक्ति प्रताप-दिखायौ।
सूरदास, यह जसुमति कौ सुख, सिव बिरचि नहिं पायौ।।16।।
शब्दार्थ :- ख्याल परे =मजाक करने की इच्छा से, चोर बनाने की इच्छा से।
भाजन =बर्तन। सींका =सिकहर। कैसै करि पायौ = कैसे उतार सकता था।
बुद्धि =तरकीब। सांटि = छड़ी।

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