41. सारंग

41. सारंग

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जसोदा, कहां लौं कीजै कानि।
दिन प्रति कैसे सही जाति है दूध-दही की हानि।।
अपने या बालक की करनी जो तुम देखौ आनि।
गोरस खाई ढूंढ़ि सब बासन, भली परी यह बानि।।
मैं अपने मण-दिर के कोनैं माखन राख्यौ जानि।
सोई जाई तुम्हारे लरिका लोनों है पहिचानि।।
बूझी ग्वालिनि, घर में आयौ नैकु व संका मानि।
सूर, स्याम तब उत्तर बनायौ, चींटी काढ़त पानि।।15।।
टिप्पणी :-‘दिन प्रति…हानि,’ एक दिन की बात हों तो जानें दूं। यह तो रोज-रोज
ही दूध-दही की चोरी हो रही है। कहां तक लिहाज किया जाय, कहां तक नुकसान
उठाया जाय ! ‘स्याम तब…पानि,’ ने तुरंत बात बना दी, बोले, “मैया, इस ग्वालिनि
के घर दहीं थोड़ा ही खा रहा था , मैं तो दही देखकर उसमें की चीटियां हाथ से निकाल
रहा था। इसने समझ लिया, मैं दही चाट रहा था!”

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