40. देश

40. देश

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गोपालहिं माखन खान दै।
सुनु री सखी, कोऊ जिनि बोले, बदन दही लपटान दै।।
गहि बहिया हौं लै कै जैहों, नयननि तपनि बुझान दै।
वा पे जाय चौगुनो लैहौं, मोहिं जसुमति लौं जान दै।।
तुम जानति हरि कछू न जानत, सुनत ध्यान सों कान दै।
सूरदास, प्रभु तुम्हरे मिलन कों राखौं तन मन प्रान दै।।14।।
शब्दार्थ :- कोउ जिनि बोलै =बीच में कोई मत रोको।तपनि =जलन। वापै =यशोदा से।
जसुमतिलौं =यशोदा के पास तक।
टिप्पणी :- ‘ नयननि तपनि बुझान दै,’ ” अरी सखी, बीच में बोलकर विघ्न मत कर।
तू जानती नहीं, कितने दिनों से यह अभिलाषा थी कि कभी कृष्ण को अपने घर में माखन
खाते हुए देखूं। वह आज कहीं पूरी हुई है। इतनी बाकी और है कि मैं इस नन्हें-से
प्यारे चोर का हाथ पकड़कर यशोदा के पास ले जाऊं। तू चुप रह। इस सुन्दर छवि की
जलधारा से मुझे अपनी आंखों की जलन सिरा लेने दे। ”

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