39. गौरी

39. गौरी

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मैया री, मोहिं माखन भावै।
मधु मेवा पकवान मिठाई मोंहि नाहिं रुचि आवे।।
ब्रज जुवती इक पाछें ठाड़ी, सुनति स्याम की बातें।
मन-मन कहति, कबहुं अपने घर देखौ माखन खातें।।
बैठें जाय मथनियां के ढिंग, मैं तब रहौं छिपानी।
‘सूरदास” प्रभु अन्तरजामी, ग्वालि मनहिं की जानी।।13।।
शब्दार्थ :- मधु =स्वादिष्ट। नहिं रुचि आवै =पसंद नहीं आते। मन-मन कहति = मन ही
मन अभिलाषा करती है। ढिंग =पास।
टिप्पणी :- ‘मन-मन….छिपानी,’ कभी क्या ऐसा दिन होगा, जब अपने घर मे गोपाल को
मैं माखन खाते हुए देखूंगी? अच्छा हो कि मैं छिपकर खड़ी हो जाऊंगा और नंद-नंदन यह
जानकर कि अब यहां कोई नहीं है, मथानी के पास बैठकर माखन खाने लगें।

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