38. गौरी

38. गौरी

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सखा सहित गये माखन-चोरी।
देख्यौ स्याम गवाच्छ-पंथ है गोपी एक मथति दधि भोरी।।
हेरि मथानी धरी माट पै, माखन हो उतरात।
आपुन गई कमोरी मांगन, हरि हूं पाई घात।।
पैठे सखन सहित घर सूने, माखन दधि सब खाई।
छूंछी छांड़ि मटुकिया दधि की हंस सब बाहिर आई।।
आइ गई कर लियें मटुकिया, घर तें निकरे ग्वाल।
माखन कर, दधि मुख लपटायें देखि रही नंदलाल।।
भुज गहि लियौ कान्ह कौ बालक भाजे ब्रज की खोरि।
सूरदास, प्रभु ठगि रही ग्वालिनि मनु हरि लियौ अंजोरि।।12।।
शब्दार्थ :- गवाच्छ =झरोखा। हो =था। माट =मिट्टी का बड़ा बर्तन, जिसमें दही मथा
जाता है। कमोरी =मिट्टी का छोटा-सा बर्तन जिसमें मक्खन निकालकर रखते हैं।
घात =मौका। छूंछी =खाली। खोरि= गली। ठगि रही =मोहित हो गई।
टिप्पणी :- ‘ठगि रही ग्वालिनि,’ चोर पकड़ तो लिया, पर कुछ करते न बना। माखन-चोर की
मोहनी छवि देखकर ग्वालिनी मोहित-सी हो गई। अब तक तो माखन ही चोरी गया था,
अब मन भी चुरा लिया गया। भौली-भाली गोपी का मन बालगोविन्द ने अपनी मुट्ठी में कर
लिया। हाथ में माखन लिये और मुख पर दही का लेप किये गोपाल को देखकर मन हाथ में
रखना बड़ा कठिन था।

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