37. बिहाग

37. बिहाग

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खेलत में को काको गुसैयां।
हरि हारे, जीते श्रीदामा, बरबसहीं कत करत रिसैयां।।
जाति पांति हम तें बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयां।
अति अधिकार जनावत हम पै, हैं कछु अधिक तुम्हारे गैयां।।
रुहठि करै तासों को खेलै, कहै बैठि जहं तहं सब ग्वैयां।
सूरदास, प्रभु कैलोई चाहत, दांव दियौ करि नंद-दुहैया।।11।।
शब्दार्थ :-गुसैयां =स्वामी। श्रीदामा =श्रीकृष्ण का एक सखा।
बरबस हीं =जबरदस्ती ही। कत =क्यौं। रिसैयां =गुस्सा। छैयां =छत्र-छायां के
नीचे, अधीन। रुहठि = बेईमानी। ग्वैयां =सुसखा।
टिप्पणी :- हार गये, तो बहुत बुरा लगा। खेल में भी अपना विशेष अधिकार चाहते हैं
श्रीदामा बिलकुल ठीक कहता है। भाई, जबरदस्ती ही अपनी जीत मनवाना चाहते हो ?
रूठना हो रूठ जाओ, हम तुमसे डरने वाले नहीं। खेल में कौन किसका मालिक और कौन
किसका नौकर ? फिर तुम हमसे बड़े किस बात में हो? तुम भी ग्वाल हम भी ग्वाल।
तुम्हारी जमींदारी में तो हम बस नहीं रहे हैं। तुम राजा होगे तो अपने घर के, हम
लोगों पर शासन जताने आए हैं नंद के राजकुमार! तुम्हारे खरिक में कुछ गौएं अधिक हैं,
तो इसी से क्या तुम राजाधिराज हो गए? जो खेल में बेईमानी करता है, उसके साथ कौन
खेलेगा?

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