36. कान्हरा

36. कान्हरा

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सांझ भई, घर आवहु प्यारे।
दौरत तहां, चोट लगि जैहै, खेलियौ होत सकारे।।
आपुहिं जाइ बांह गहि ल्याई, खेह रही लपटाई।
सपट झारि तातो जल लाई तेल परसि अन्हवाई।।
सरस बसन तन पोंछि स्याम कौ भीतर गई लिवाई।
सूर श्याम कछु करी बियारी, पुनि राख्यौ पौढ़ाई।।10।।
शब्दार्थ :-सकारे = सवेरे। खेह = धूल। सुपट =सुन्दर वस्त्र।
झारि = धूल साफ करके। तातो = गरम। परसि =लगाकर। बियारि =ब्यालू,रात का भोजन।
टिप्पणी :- ‘दौरत…..सकारे,’ कहां दौड़ते फिरते हो ? अंधेरे में कहीं गिर पड़ोगे
तो चोट लग जायगी। बस करो, सवेरे खेलना।

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