35. गौरी

35. गौरी

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मैया, मोहिं दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसों कहत मोल कौ लिन्हौं, तू जसुमति कब जायौ।।
कहा कहौं इहिं रिस के मारे खेलत हौं नहि जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरो तात।।
गोरे नंद, जसोदा गोरी, तू कत स्याम सरीर।
चुटकी दै दै हंसत ग्वाल सब, सिखै देत बलबीर।।
तू मोहीं कों मारन सीखी, दाउहिं कबहुं न खीझै।।
मोहन-मुख रिस की ये बातें, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।।
“सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।”
सूर श्याम, “मोहिं गोधन की सौं, हौं माता, तू पूत”।।9।।
शब्दार्थ :-जायौ = जन्म दिया। रिस = गुस्सा। कत =क्यों, कैसा।
चुटकी दै दै = ताना मार-मारकर। बलबीर =भाई बलराम। कबहुं न खीझै = कभी नहीं
डांटती। चबाई =चालाक। धूत =कपटी। गोधन =गाय रूपी धन,,बहुत सी गोएं। सौं= शपथ।
टिप्पणी :- ‘तू मोहीं…..कबहुं न खीझै’ इस पंक्ति ने तो भाव में जान डाल दी है।
जब देखो, तू मुझे ही डांटती-दपटती है। सीधे-सादे को सभी बुरा-भला कहते हैं।
मैया, दाऊ से तो तू कुछ नहीं कहती।
शपथ भी गायों की, ग्वालिनी के लिए गोधन से बड़ा धन और क्या हो सकता है ! गाय ही
धन है, गाय ही धाम है और गाय ही धर्म है। अब भी कृष्ण विश्वास न करेंगे कि यशोदा
ही उनकी माता है।

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