34. रामकली

34. रामकली

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प्रात समय उठि सोवत हरि कौ बदन उघारौ नंद।
रहि न सकत, देखन कों आतुर नैन निसा के द्वंद।।
स्वच्छ सैज में तें मुख निकसत गयौ तिमिर मिटि मंद।
मानों मथि पय सिंधु फेन फटि दरस दिखायौ चंद।।
धायौ चतुर चकोर सूर मुनि सब सखि सखा सुछंद।
रही न सुधिहुं सरीर, धीर मति पिवत किरन मकरंद।।8।।
शब्दार्थ :-निसा के द्वंद =रात्रि के झंझट से। पय-सिन्धु = दूध का समुद्र।
सुकंद = प्रसन्नचित्त। किरन मकरंद = सुन्दरतारूपी पराग।
टिप्पणी :- ‘रहिन…द्वंद’ कृष्ण का सुन्दर शरीर देखने के लिए नन्द बाबा के नेत्र
बड़े उत्कंठित हो रहे हैं। निगोड़ी नींद ने इतना बीच डाल दिया, नहीं तो वे निरन्तर
देखते ही रहते। रात्रि की यह सोने की झंझट बुरी है। उतनी देर तक मुखचंद्र को
नन्द बाबा के निद्रित नेत्र न देख सके। स्नेह-पथ में यह घाटा क्या कम है।
‘स्वच्छ सेज..चंद,’ स्वच्छ सेज में से कृष्ण ने मुख क्या खोला, मानो दूध का समुद्र
मथे जाने पर, उसमें से फेन अलग हो गया और चंद्रमा निकल पड़ा। फेन यहां सफेद चादर
है, उसके अलग करते ही मुख-चंद्र दीख पड़ा।

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