32. रामकली

32. रामकली

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मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी।
किती बार मोहिं दूध पिवत भई, यह अजहूं है छोटी।।
तू तो कहति बल की बैनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत ओंछत नागिनि-सी भुंई लोटी।।
काचो दूध पिवावति पचि-पचि, देति न माखन रोटी।
सूर, स्याम चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी।।6।।
शब्दार्थ :-किती बार = कितना समय, कितने दिन, यानी बहुत दिन। बल = बलदेव।
बेनी = चोटी। काढ़त =बनाते हुए। ओंछत =कंघी करते हुऐ। भुईं = भूमि, जमीन।
पचि-पचि =जैसे तैसे। कठिनाई से = हलधर =बलदेव। जोटी = जोड़ी।
टिप्पणी :- ‘काचो….रोटी,’ मैया, तू मुझे कच्चा दूध पिलाती है, वह भी राजी से
नहीं। मक्खन-रोटी तू मुझे देती नहीं। दाऊ को देती है। हां, इसीलिए उनकी चोटी लंबी
और मोटी है।

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